उपन्यास- उपन्यास का मूल अर्थ है,निकट रखी गई वस्तु किंतु आधुनिक युग में इसका प्रयोग साहित्य के एक विशेष रूप के लिए होता है। जिसमें एक दिर्ग कथा का वर्णन गद्द में क्या जाता है। एक लेखक महोदय का विचार है, कि जीवन को बहुत निकट से प्रस्तुत कर दिया जाता है। अतः इसका यह नाम सर्वथा उचित है, किंतु वे भूल गए हैं। साहित्य के कुछ अन्य अंगों जैसे- कहानी, नाटक,एकांकी आदि में भी जीवन को उपन्यास के भाति बहुत समीप उपस्थित कर दिया जाता है। प्राचीन काव्य शास्त्र में इस शब्द का प्रयोग नाटक की प्रति मुख्य संधि के एक उपभेद के रूप में किया गया है। जिसका अर्थ होता है किसी अर्थ को युक्तिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करने वाला तथा प्रसन्ता प्रदान करने वाला साहित्य के अन्य अंगों में भी लागू होती है। आधुनिक युग में उपन्यास शब्द अंग्रेजी के novel अर्थ में प्रयुक्त होता है। जिसका अर्थ है,एक दीर्घ कथात्मक गद्द रचना है। वह वृथक आकर का वृतांत जिसके अंतर्गत वास्तविक जीवन के प्रतिनिधित्व का दावा करने वाले पात्रो और कार्यों का चित्रण किया जाता हैं। उपन्यास के तत्व -पश्चात विद्वानों ने उपन्यास के मुख्यता छ तत्व निर्धारित किए गए हैं। कथावस्तु , पात्र या चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, देशकाल, शैली, उपदेश। इन तत्वों के अतिरिक्त एक और महत्वपूर्ण तत्व भाव या रस है। साहित्य का सबसे महत्वपूर्ण तत्व भाव माना गया है। तथा साहित्य और दर्शन साहित्य और विज्ञान को पृथक करने वाला तत्व भाव ही है। साहित्य का कोई भी अंग यह कोई भी रुप कविता, नाटक, उपन्यास इस भाव तत्व के बिना शुन्य रह जाता है। और वह साहित्य के श्रेणी में नहीं आ सकता। उपन्यास की कथावस्तु में प्रमुख कथानक के साथ-साथ कुछ प्रसंगिक कथाऐ भी चल सकती है। किंतु दोनों परस्पर दोनों में शुसंबंध होनी चाहिए। उसके कथानक का आधार वास्तविक जीवन होना चाहिए। जिसमें स्वभाविकता रहे, किंतु जिन उपन्यासों का लक्ष्य विचित्र घटनाओं द्वारा आश्चर्यजनक बातों का निरूपण करना हो या नियम लागू नहीं किया जा सकता। अतः उपन्यास इस ढंग से लिखना चाहिए कि उसमें स्वाभाविक बने रहे। पात्र के जीवन की घटनाओं का समावेश होना आवश्यक है। उपन्यास के कथावस्तु के तीन आवश्यक गुण हैं, रोचकता स्वाभाविकता और गतिशीलता उपन्यास के प्रथम पृष्ठ में ही इतनी शक्ति होनी चाहिए कि पाठक के हृदय में कोतूहल जागृत कर दे। कि वह पूरी रचना को पढ़ने के लिए विवश हो जाए, यदि कोई पाठक किसी उपन्यास को जानबूझकर छोड़ देता है, तो यह दोष पाठक का नहीं है, बल्कि लेखक का है। जो अपने उपन्यास के कथानक में प्राणहुक नहीं सकें। पात्रों के चरित्र चित्रण में भी स्वभाविकता संजीवता एवंम् धर्मिक विकास का होना आवश्यक है। प्राचीन महाकाव्यों के भाँति उपन्यास के पात्र न तो अति मानवीय होते हैं और न ही उनके चरित्र प्रारंभ से लेकर अंत तक एक जैसा होता है। पात्रों में वर्गगद्द विशेषताओं के साथ-साथ व्यक्तित्व विशेषताओं का भी समन्यव्य होना चाहिए अन्यथा उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पायेंगा पात्रों के चरित्र में परिवर्तन या विकास पस्थितियों वह वातावरण में प्रभाव के रूप में क्रमशः दिखाया जाना चाहिए। कथोक कथन देशकाल और शैली पर भी स्वभाविकता और सजीवता की बात लागू होती है। विचार समस्या और उद्देश्य की व्यंजना इस ढंग से होनी चाहिए कि वह रचना की स्वभाविकता और रोचकता में बाधा सीध ना हो इन सभी तत्वों का लक्ष्य मुख्यता पाठक को भावनोभूति प्रदान करता है। इनका सामान्य भय भाव तत्व के अनुकूल होना चाहिए। प्रत्येक उपन्यास में किसी एक भावना की प्रमुखता होती है। जैसे- प्रेमचंद्र जी की निर्मला और गोदान में करुणा की वर्मा जी की मृगनैनी में शौर्य या उत्साह और जोशी जी की सन्यासी में रचि यह प्रेम की उपन्यास के भाव तत्व का आयोजन एंवम् उसका विश्लेषण रस सिद्धांत के आधार पर किया जाना उचित है। यदि हमारे लेखक और आलोचक इस ओर ध्यान दें तो नवीनतम उपन्यास साहित्य में विकसित होने वाली अति भावुकता और शुष्कता की प्ररवाति को नियत्रित किया जा सकता है।

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