घनानंद कवि परिचय

📚.साहित्य विशेष 📚

By -संजय धौलपुरिया
-घनानन्द
【 1689-1739

★आश्रय – मुहम्मद शाह रंगीला(मीर मुंशी पद पर)

★ रीतिमुक्त काव्यधारा के प्रमुख कवि ।

★इन्हें ब्रजभाषा प्रवीण कह जाता

★ “प्रेम की यातना” का कवि।

★इनके छंदों को सुछन्दो की उपमा दी गयी ह ।

★रचनाये-
सुजान सागर
कृपा काण्ड
रस केलि वल्ली
विरह लीला
लोकसार
इश्कलता

घनानंद कवि परिचय

★इन्होंने 752 कवित सवैया, 1057 पद और 2354 दोहे चौपाइयां की रचना की ह।(नगेन्द्र के अनुसार )

★ विश्वनाथ प्रसाद मिश्र द्वारा “घनानन्द ग्रन्थावली सम्पादित ह ।

★निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित!

★सुजान नामक नर्तकी पर आसक्त होने के कारण दरबार से निष्काषित।

★वियोग श्रृंगार के प्रधान मुक्तक कवि!

★घनानन्द के काव्य की मूल प्रेरक उनकी प्रेमिका सुजान ह ।

★ घनानन्द के प्रिय प्रतीक – चातक

★ अपनी रचनाओं में कृष्ण के लिए “सुजान” शब्द का प्रयोग किया ह ।

★ विरहलीला ग्रन्थ फ़ारसी छंदों से आबद्ध ह।

★शुक्ल के कथन –***************
“मोन मधि की पुकार ”

“घनानंद प्रेम के पीर के कवि ह।”

“”घनानन्द को साक्षात् रसमूर्ति ” एवं”लाक्षणिक मूर्ति पूजा ” कहा ह।

“ब्रजभाषा काव्य के प्रकाश स्तम्भो में से एक ह।”

” प्रेम मार्ग का ऎसा प्रवीण धीर कवि एव जबादानी का दावा रखने वाला ब्रज भाषा का कोई दूसरा कवि नही हुआ।”

“भाषा के लक्षक एव व्यंजन बल की सीमा कहा तक ह , इसकी पूरी परख इनको ही थी”

“प्रेम की गूढ़ अंतर्दशा का उद्घाटन जैसा इनमे ह। वैसा अन्य श्रृंगारी कवि में नही ह।”

★दिनकर का कथन-****************
“विरह तो घनानंद के काव्य की पूंजी ह।”

★प्रसिद्ध पंक्तिया –

“अति सूधो स्नेह को मार्ग ,जहाँ नेकु सयापन बाँक नही”
*****
” मन लेहु पर देहु छँटाक नही “******
“लोग लागि कवित्त बनावत, मोहि तो मेरो कवित बनावत”
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