अंतिम संशोधित (Last Updated): October 21, 2026
दोस्तो आज की पोस्ट में आप हिंदी साहित्य में भक्तिकाल के अंतर्गत संतकाव्य धारा की विशेषताएँ(Sant kavya dhara ki Visheshta) पढेंगे ,जो आपके लिए जानना बेहद जरुरी है ।
संतकाव्य धारा की विशेषताएंTable of Contents |
- हिंदी सन्त काव्य का प्रारम्भ निर्गुण काव्य धारा से होता है ।
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने नामदेव और कबीर द्वारा प्रवर्तित भक्ति धारा को ‘निर्गुण ज्ञानाश्रयी धारा’ की संज्ञा प्रदान की है ।
- डा. रामकुमार वर्मा ने इसे ‘सन्त काव्य परम्परा’ जैसे विशेषण से अभिहित किया है ।
- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे ‘निर्गुण भक्ति साहित्य’ का नाम दिया है ।
- निर्गुण काव्य धारा मे सन्त काव्य का विशेष महत्व है । संत काव्य धारा को ज्ञानश्रयी शाखा भी कहा जाता है ।
- सदाचार के लक्षणों से युक्त व्यक्ति को सन्त कहा जाता है । इस प्रकार का व्यक्ति आत्मोन्नति एवं लोक मंगल मे लगा रहता है ।
- डा. पीताम्बर दत्त बडथ्वाल ने सन्त का सम्बंध शान्त से माना है और इसका अर्थ उन्होने किया है – निवृत्ति मार्गी या वैरागी ।
संतकाव्य धारा की विशेषताएँ
- संत काव्य भाव प्रधान है , कला प्रधान नहीं l
- अद्वैतवाद दर्शन , रहस्यवाद की प्रधानता l
- गुरु की महत्ता का प्रतिपादन तथा ज्ञान के महत्व का प्रतिपादन , आडम्बरों का विरोध , कुरीतियों का विरोध , सामाजिक कुरीतियों का कड़ा विरोध l
- नारी के प्रति असंतुलित एवं अतिवादी द्रष्टिकोण , नाथपंथी प्रभाव l
- भाषा अपरिष्कृत एवं बोलचाल की भाषा , शांत रस की प्रधानता , अनायास ही अलंकार प्रयोग , उलटवासियो का प्रयोग l
संतकाव्य धारा विशेषताएँ
- संत काव्य इस लोक की बात करते है और खंडन की प्रवृत्ति भी है जबकि सूफी पारलौकिक परम ब्रम्ह का मंडन करते है।
- संत ज्ञान से ईश्वर प्राप्ति की बात करते है जबकि सूफी प्रेम से ईस्वर प्राप्ति पर बल देते है।
- संतो ने उपदेशात्मक दोहों की रचना की जबकि सूफी साहित्य प्रबंध ओर मसनवी शैली में रचा गया l
- संतो का उद्देश्य समाज सुधार जबकि सूफी अपने दर्शन के प्रचार में साहित्य रचना करने वाले थे l
- संत समाज के शोषित तबके से संबंधित जबकि सूफी देश से बाहर से आये l
संतकाव्य धारा विशेषताएँ
- गुरू को महत्व
- सधुकड़ी भाषा का प्रयोग
- जातिवाद का विरोध
- निर्गुण ब्रम्हा मै विश्वास
- उलटबासी का प्रयोग
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