अंतिम संशोधित (Last Updated): October 21, 2026
समास हिंदी व्याकरण का ऐसा टॉपिक है जिससे लगभग हर परीक्षा में प्रश्न आता है, चाहे वह बोर्ड परीक्षा हो या REET, CTET, TGT, PGT, RPSC और UGC NET जैसी प्रतियोगी परीक्षाएँ। इस लेख में समास की परिभाषा, उसके छह भेद, हर भेद की पहचान और हर भेद के ढेरों उदाहरण विग्रह सहित एक ही जगह दिए गए हैं।
इस लेख में: समास की परिभाषा | समास और संधि में अंतर | समास के भेद | अव्ययीभाव | तत्पुरुष | कर्मधारय | द्विगु | द्वन्द्व | बहुव्रीहि | समासों में अंतर | महत्वपूर्ण प्रश्न
समास किसे कहते हैं? (समास की परिभाषा)
Table of Contents
दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर, उनके बीच के विभक्ति-चिह्न या योजक शब्द हटाकर, एक नया और छोटा सार्थक शब्द बनाने की प्रक्रिया को समास कहते हैं।

“समास” शब्द सम् + आस से बना है, जिसका अर्थ है “पास-पास बैठाना” या “संक्षिप्त करना”। समास से कम शब्दों में अधिक अर्थ कहा जा सकता है। जैसे “रसोई के लिए घर” को हम एक शब्द में “रसोईघर” कह देते हैं। यहाँ “के लिए” हट गया और दो शब्द मिलकर एक हो गए।
समस्त पद, पूर्वपद, उत्तरपद और समास-विग्रह
- समस्त पद (सामासिक पद): समास के नियमों से बना नया शब्द। जैसे: पाठशाला।
- पूर्वपद: समस्त पद का पहला शब्द। जैसे: पाठ।
- उत्तरपद: समस्त पद का दूसरा शब्द। जैसे: शाला।
- समास-विग्रह: समस्त पद को तोड़कर उसके शब्दों को फिर से हटे हुए चिह्नों के साथ लिखना। जैसे: पाठ के लिए शाला।
| समस्त पद | पूर्वपद | उत्तरपद | विग्रह | समास |
|---|---|---|---|---|
| पाठशाला | पाठ | शाला | पाठ के लिए शाला | तत्पुरुष |
| नीलकमल | नील | कमल | नीला है जो कमल | कर्मधारय |
| दाल-रोटी | दाल | रोटी | दाल और रोटी | द्वन्द्व |
| नवरत्न | नव | रत्न | नौ रत्नों का समूह | द्विगु |
| दशानन | दश | आनन | दश हैं आनन जिसके (रावण) | बहुव्रीहि |
| यथाशक्ति | यथा | शक्ति | शक्ति के अनुसार | अव्ययीभाव |

समास और संधि में अंतर
छात्र अक्सर समास और संधि को एक समझ लेते हैं। दोनों में शब्द जुड़ते हैं, पर जुड़ने का तरीका अलग है:
| संधि | समास |
|---|---|
| दो वर्णों (ध्वनियों) का मेल होता है। | दो या अधिक शब्दों (पदों) का मेल होता है। |
| मेल के समय ध्वनि में परिवर्तन होता है। जैसे: विद्या + आलय = विद्यालय। | शब्दों के बीच के विभक्ति-चिह्न हट जाते हैं। जैसे: विद्या के लिए आलय = विद्यालय। |
| तोड़ने की प्रक्रिया को संधि-विच्छेद कहते हैं। | तोड़ने की प्रक्रिया को समास-विग्रह कहते हैं। |
कुछ शब्दों में संधि और समास दोनों होते हैं। जैसे “विद्यालय” में संधि-विच्छेद है विद्या + आलय और समास-विग्रह है विद्या के लिए आलय।
समास के कितने भेद होते हैं?
समास के छह भेद होते हैं। किस पद की प्रधानता है, इससे समास पहचानना आसान हो जाता है:
| समास | कौन-सा पद प्रधान | पहचान | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| अव्ययीभाव | पूर्वपद | पहला पद अव्यय या उपसर्ग (यथा, प्रति, आ, नि, बे आदि); पूरा शब्द अव्यय की तरह प्रयोग होता है | यथाशक्ति, प्रतिदिन |
| तत्पुरुष | उत्तरपद | बीच के कारक-चिह्न (को, से, के लिए, का, में, पर) का लोप | राजपुत्र, विद्यालय |
| कर्मधारय | उत्तरपद | विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध | नीलकमल, कमलनयन |
| द्विगु | उत्तरपद | पहला पद संख्यावाचक; समूह या समाहार का बोध | त्रिलोक, सप्ताह |
| द्वन्द्व | दोनों पद | विग्रह में और, या, आदि लगता है; प्रायः योजक-चिह्न (-) | माता-पिता, दो-चार |
| बहुव्रीहि | कोई नहीं (अन्य पद) | दोनों पद मिलकर किसी तीसरे का बोध कराते हैं | दशानन, लम्बोदर |

1. अव्ययीभाव समास: परिभाषा और उदाहरण
जिस समास में पहला पद (पूर्वपद) प्रधान हो और अव्यय या उपसर्ग हो, तथा पूरा समस्त पद वाक्य में अव्यय की तरह प्रयोग हो, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं।
पहचान: शब्द प्रायः यथा, प्रति, आ, नि/निर्, बे, बा, स, भर, अनु जैसे शब्दों से शुरू होते हैं; या एक ही शब्द दोहराया जाता है, जैसे हाथोंहाथ, रातोंरात, घर-घर। ऐसे दोहराए शब्दों को द्वन्द्व समझने की भूल न करें।
अव्ययीभाव समास के उदाहरण
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार |
| आजीवन | जीवन पर्यन्त |
| प्रतिदिन | प्रत्येक दिन |
| भरपेट | पेट भरकर |
| निडर | बिना डर के |
| आमरण | मरण पर्यन्त |
| हाथोंहाथ | हाथ ही हाथ में |
| बेईमान | बिना ईमान के |
➕ 👉 अव्ययीभाव के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अतिरिक्त | रिक्त से अधिक |
| अतिवृष्टि | वृष्टि की अति |
| अत्याधुनिक | आधुनिक से भी अधिक |
| अत्यावश्यक | आवश्यक से भी अधिक |
| अध्यात्म | आत्मा से सम्बन्धित |
| अनजाने | बिना जाने हुए |
| अनुकृति | कृति के अनुरूप |
| अनुगमन | गमन के पीछे |
| अनुगुण | गुण के अनुसार |
| अनुदिन | दिन-दिन (प्रतिदिन) |
| अनुरूप | रूप के योग्य |
| अनुसन्धान | सन्धान के पीछे |
| अनुसरण | सरण (चलने) के पीछे |
| अनुस्मारक | स्मरण के पीछे (फिर से स्मरण कराने वाला) |
| अवसरानुसार | अवसर के अनुसार |
| आकण्ठ | कण्ठ पर्यन्त |
| आजन्म | जन्म से लेकर |
| आजानुबाहु | जानु (घुटनों) तक बाहु टिप्पणी: कई पुस्तकों में बहुव्रीहि (घुटनों तक बाहु हैं जिसकी — राम)। |
| आपादमस्तक | पाद से मस्तक तक |
| आयुपर्यन्त | आयु के अन्त तक |
| इच्छानुसार | इच्छा के अनुसार |
| एकाएक | एक के बाद एक (अचानक) |
| घड़ी-घड़ी | हर घड़ी |
| घर-घर | हर घर |
| चलाचली | चलने का क्रम |
| जीवनभर | पूरे जीवन |
| दरअसल | असल में |
| दिनभर | पूरे दिन |
| दिनानुदिन | दिन के बाद दिन |
| दिनों-दिन | दिन पर दिन |
| धीरे-धीरे | बहुत धीरे |
| निगोड़ा | बिना गोड़ (आधार) के |
| निधड़क | बिना धड़क के |
| निरामिष | आमिष (मांस) के बिना |
| निर्जल | बिना जल के |
| निर्देशानुसार | निर्देश के अनुसार |
| निर्विकार | बिना विकार के |
| निर्विवाद | विवाद के बिना |
| नीरंध्र | रंध्र (छिद्र) के बिना |
| नीरव | रव (शब्द) के बिना |
| नीरोग | रोग के बिना |
| परोक्ष | अक्षि (आँखों) के परे |
| प्रतिक्षण | प्रत्येक क्षण |
| प्रतिद्वन्द्व | द्वन्द्व के बदले द्वन्द्व |
| प्रतिध्वनि | ध्वनि के बदले ध्वनि |
| प्रतिनियुक्ति | नियुक्ति के बदले नियुक्ति |
| प्रतिवर्ष | प्रत्येक वर्ष |
| प्रतिशत | प्रत्येक शत (सौ) पर |
| प्रतिहिंसा | हिंसा के बदले हिंसा |
| प्रत्यक्ष | अक्षि (आँखों) के सामने |
| प्रत्येक | एक-एक |
| प्रयत्नपूर्वक | प्रयत्न के साथ |
| फूटमफूट | फूट ही फूट |
| बख़ूबी | ख़ूबी के साथ |
| बाअदब | अदब के साथ |
| बाइज़्ज़त | इज़्ज़त के साथ |
| बाक़ायदा | क़ायदे के साथ |
| बार-बार | हर बार |
| बीचों-बीच | ठीक बीच में |
| बेखटके | बिना खटके के |
| बेगैरत | बिना गैरत के |
| बेचैन | बिना चैन के |
| बेजान | बिना जान के |
| बेफ़ायदा | बिना फ़ायदे के |
| बेमुरव्वत | बिना मुरव्वत के |
| बेरहम | बिना रहम के |
| बेहया | बिना हया के |
| बेहिसाब | बिना हिसाब के |
| भरसक | सक (शक्ति) भर |
| भागमभाग | भागने के बाद भागना |
| मन्द-मन्द | बहुत मन्द |
| मरणोपरान्त | मरण के उपरान्त |
| मारामारी | मार के बाद मार |
| यथाक्रम | क्रम के अनुसार |
| यथागति | गति के अनुसार |
| यथामति | मति के अनुसार |
| यथायोग्य | योग्यता के अनुसार |
| यथार्थ | अर्थ के अनुसार |
| यथाविधि | विधि के अनुसार |
| यथाशीघ्र | जितना शीघ्र हो सके |
| यथासमय | समय के अनुसार |
| यथासम्भव | जहाँ तक सम्भव हो |
| यथास्थान | स्थान के अनुसार |
| यथास्थिति | स्थिति के अनुसार |
| यथोचित | जितना उचित हो |
| यावज्जीवन | जब तक जीवन है |
| योग्यतानुसार | योग्यता के अनुसार |
| रातोंरात | रात ही रात में |
| लाजवाब | जिसका जवाब न हो |
| लूटमलूट | लूट ही लूट |
| विवाहोपरांत | विवाह के उपरान्त |
| विशुद्ध | पूर्णतः शुद्ध |
| विश्वासपूर्वक | विश्वास के साथ |
| सपरिवार | परिवार के साथ |
| सप्रमाण | प्रमाण के साथ |
| समक्ष | अक्षि (आँखों) के सामने |
| सशक्त | शक्ति के साथ |
| सशर्त | शर्त के साथ |
| सानंद | आनंद के साथ |
| साफ़-साफ़ | बिल्कुल साफ़ |
| सार्थक | अर्थ के साथ |
| सुनासुनी | सुनने के बाद सुनना |
| सेवोपरान्त | सेवा के उपरान्त |
| हरवर्ष | प्रत्येक वर्ष |
2. तत्पुरुष समास: परिभाषा, भेद और उदाहरण
जिस समास में उत्तरपद (दूसरा पद) प्रधान हो और दोनों पदों के बीच का कारक-चिह्न (विभक्ति) लुप्त हो जाए, उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। जैसे “राजा का पुत्र” से “राजपुत्र”। तत्पुरुष के भेद उसी कारक के नाम पर होते हैं, जिसका चिह्न लुप्त होता है।
| तत्पुरुष का भेद | लुप्त चिह्न | उदाहरण |
|---|---|---|
| कर्म तत्पुरुष | को | स्वर्गप्राप्त (स्वर्ग को प्राप्त) |
| करण तत्पुरुष | से, के द्वारा | हस्तलिखित (हस्त से लिखित) |
| सम्प्रदान तत्पुरुष | के लिए | रसोईघर (रसोई के लिए घर) |
| अपादान तत्पुरुष | से (अलग होने के अर्थ में) | पथभ्रष्ट (पथ से भ्रष्ट) |
| संबंध तत्पुरुष | का, के, की | राजपुत्र (राजा का पुत्र) |
| अधिकरण तत्पुरुष | में, पर | वनवास (वन में वास) |
करण और अपादान दोनों में “से” आता है। अंतर यह है कि करण में “से” का अर्थ साधन (किसके द्वारा) होता है, जबकि अपादान में अलग होना। हस्तलिखित = हाथ के द्वारा लिखा (करण); पथभ्रष्ट = पथ से अलग (अपादान)।
कर्म तत्पुरुष के उदाहरण
इसमें कर्म कारक के चिह्न “को” का लोप होता है।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| स्वर्गप्राप्त | स्वर्ग को प्राप्त |
| गगनचुम्बी | गगन को चूमने वाला |
| शरणागत | शरण को आगत |
| मनोहर | मन को हरने वाला |
| सर्वज्ञ | सब को जानने वाला |
| चित्तचोर | चित्त को चुराने वाला |
➕ 👉 कर्म तत्पुरुष के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अग्निभक्षी | अग्नि को भक्षण करने वाला |
| कमरतोड़ | कमर को तोड़ने वाला |
| गिरहकट | गिरह को काटने वाला |
| गृहागत | गृह को आगत |
| ग्रामगत | ग्राम को गया हुआ |
| चिड़ीमार | चिड़ियों को मारने वाला |
| जलधर | जल को धारण करने वाला |
| जीभर | जी को भरकर टिप्पणी: वर्गीकरण पर मतभेद; कुछ पुस्तकें अव्ययीभाव मानती हैं। |
| दुःखद | दुःख को देने वाला |
| धनुर्धर | धनुष को धारण करने वाला |
| नरभक्षी | नर को भक्षण करने वाला |
| मांसभक्षी | मांस को खाने वाला |
| मुँहतोड़ | मुँह को तोड़ने वाला |
| मुक्तिप्राप्त | मुक्ति को प्राप्त |
| यशप्राप्त | यश को प्राप्त |
| रोज़गारोन्मुख | रोज़गार को उन्मुख |
| वनगमन | वन को गमन |
| विकासोन्मुख | विकास को उन्मुख |
| विदेशगमन | विदेश को गमन |
| विद्याधर | विद्या को धारण करने वाला |
| शक्तिवर्धक | शक्ति को बढ़ाने वाला |
| शत्रुघ्न | शत्रु को मारने वाला |
| सुखदायक | सुख को देने वाला |
| हस्तगत | हस्त को गत (हाथ में आया हुआ) |
करण तत्पुरुष के उदाहरण
इसमें करण कारक के चिह्न “से” या “के द्वारा” का लोप होता है।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| हस्तलिखित | हस्त (हाथ) से लिखित |
| तुलसीकृत | तुलसी द्वारा कृत |
| रेखांकित | रेखा से अंकित |
| शोकाकुल | शोक से आकुल |
| मनगढ़ंत | मन से गढ़ा हुआ |
| अश्रुपूर्ण | अश्रुओं से पूर्ण |
➕ 👉 करण तत्पुरुष के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अकालपीड़ित | अकाल से पीड़ित |
| आकाशवृत्ति | आकाश से (अनिश्चित साधन से) वृत्ति |
| आचारकुशल | आचार से कुशल |
| ईश्वरप्रदत्त | ईश्वर द्वारा प्रदत्त |
| गुणयुक्त | गुणों से युक्त |
| चिन्ताग्रस्त | चिन्ता से ग्रस्त |
| जलावृत | जल से आवृत (घिरा) |
| ज्ञानयुक्त | ज्ञान से युक्त |
| तारोंभरी | तारों से भरी |
| देवविरचित | देव द्वारा विरचित |
| धर्मयुक्त | धर्म से युक्त |
| नीतियुक्त | नीति से युक्त |
| पददलित | पद (पैरों) से दलित |
| फलावेष्टित | फलों से आवेष्टित |
| बाणाहत | बाण से आहत |
| भड़भूँजा | भाड़ में भूनने वाला |
| मदमत्त | मद से मत्त |
| मदान्ध | मद से अन्धा |
| महिमामण्डित | महिमा से मण्डित |
| मेघाच्छन्न | मेघों से आच्छन्न |
| रत्नजड़ित | रत्नों से जड़ित |
| रसभरी | रस से भरी |
| रससिक्त | रस से सिक्त |
| रेलयात्रा | रेल द्वारा यात्रा |
| वाग्युद्ध | वाक् (वाणी) से युद्ध |
| विधिप्रदत्त | विधि (विधाता) द्वारा प्रदत्त |
| शराहत | शर से आहत |
| श्रमजीवी | श्रम से जीने वाला |
| श्रमसाध्य | श्रम से साध्य |
सम्प्रदान तत्पुरुष के उदाहरण
इसमें सम्प्रदान कारक के चिह्न “के लिए” का लोप होता है।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| रसोईघर | रसोई के लिए घर |
| विद्यालय | विद्या के लिए आलय |
| गुरुदक्षिणा | गुरु के लिए दक्षिणा |
| देशभक्ति | देश के लिए भक्ति |
| गोशाला | गायों के लिए शाला |
| पुस्तकालय | पुस्तकों के लिए आलय |
➕ 👉 सम्प्रदान तत्पुरुष के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| आवेदन-पत्र | आवेदन के लिए पत्र |
| कन्याविद्यालय | कन्याओं के लिए विद्यालय |
| कारावास | कारा के लिए वास टिप्पणी: कई पुस्तकों में अधिकरण तत्पुरुष (कारा में वास)। |
| छात्रावास | छात्रों के लिए आवास |
| डाकगाड़ी | डाक के लिए गाड़ी |
| देवालय | देव के लिए आलय |
| धर्मशाला | धर्म के लिए शाला |
| न्यायालय | न्याय के लिए आलय |
| पुत्रशोक | पुत्र के लिए शोक |
| प्रयोगशाला | प्रयोग के लिए शाला |
| फलाकांक्षी | फल के लिए आकांक्षी |
| भिक्षाटन | भिक्षा के लिए अटन (भ्रमण) |
| भूतबलि | भूतों के लिए बलि |
| भोजनालय | भोजन के लिए आलय |
| मंत्रालय | मंत्री के लिए आलय |
| महँगाईभत्ता | महँगाई के लिए भत्ता |
| मार्गव्यय | मार्ग के लिए व्यय |
| मालगोदाम | माल के लिए गोदाम |
| यज्ञवेदी | यज्ञ के लिए वेदी |
| रणभूमि | रण के लिए भूमि |
| रनिवास | रानी के लिए निवास |
| राहखर्च | राह के लिए खर्च |
| लोकसभा | लोक के लिए सभा |
| विधानसभा | विधान के लिए सभा |
| शिवार्पण | शिव के लिए अर्पण |
| सचिवालय | सचिवों के लिए आलय |
| सत्याग्रह | सत्य के लिए आग्रह |
| सभाभवन | सभा के लिए भवन |
| सभामण्डप | सभा के लिए मण्डप |
| स्नानघर | स्नान के लिए घर |
| हथकड़ी | हाथ के लिए कड़ी |
| हवन-सामग्री | हवन के लिए सामग्री |
अपादान तत्पुरुष के उदाहरण
इसमें अलग होने के अर्थ वाले “से” का लोप होता है।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| पथभ्रष्ट | पथ से भ्रष्ट |
| ऋणमुक्त | ऋण से मुक्त |
| भयभीत | भय से भीत |
| पदच्युत | पद से च्युत |
| जन्मान्ध | जन्म से अंधा |
| आकाशपतित | आकाश से पतित |
➕ 👉 अपादान तत्पुरुष के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| आशातीत | आशा से अतीत (परे) |
| इन्द्रियातीत | इन्द्रियों से अतीत |
| कामचोर | काम से जी चुराने वाला |
| क्रियाहीन | क्रिया से हीन |
| गर्वशून्य | गर्व से शून्य |
| जलरिक्त | जल से रिक्त |
| जलशून्य | जल से शून्य |
| जातिभ्रष्ट | जाति से भ्रष्ट |
| दूरागत | दूर से आगत |
| देशनिकाला | देश से निकाला |
| दोषमुक्त | दोष से मुक्त |
| धनरहित | धन से रहित |
| धर्मविमुख | धर्म से विमुख |
| नेत्रहीन | नेत्रों से हीन |
| पापमुक्त | पाप से मुक्त |
| बन्धनमुक्त | बन्धन से मुक्त |
| मायारिक्त | माया से रिक्त |
| मृत्युभय | मृत्यु से भय |
| रणविमुख | रण से विमुख |
| रसहीन | रस से हीन |
| लक्ष्यभ्रष्ट | लक्ष्य से भ्रष्ट |
| लोकोत्तर | लोक से उत्तर (परे) |
| विद्याहीन | विद्या से हीन |
| व्ययमुक्त | व्यय से मुक्त |
| श्रमरहित | श्रम से रहित |
| सत्ताच्युत | सत्ता से च्युत |
| सेवानिवृत्त | सेवा से निवृत्त |
| सेवामुक्त | सेवा से मुक्त |
| हतभाग्य | भाग्य से हत टिप्पणी: कई पुस्तकों में बहुव्रीहि (हत है भाग्य जिसका)। |
| हतश्री | श्री से हत (रहित) |
संबंध (षष्ठी) तत्पुरुष के उदाहरण
इसमें संबंध कारक के चिह्न “का, के, की” का लोप होता है।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| राजपुत्र | राजा का पुत्र |
| गंगाजल | गंगा का जल |
| हिमालय | हिम का आलय टिप्पणी: “पर्वतराज” अर्थ में कुछ पुस्तकें बहुव्रीहि मानती हैं। |
| राष्ट्रपति | राष्ट्र का पति |
| सेनाध्यक्ष | सेना का अध्यक्ष |
| देशवासी | देश का वासी |
➕ 👉 संबंध तत्पुरुष के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अन्नदान | अन्न का दान |
| आनंदमठ | आनंद का मठ |
| उल्कापात | उल्का का पात |
| ऋषिकन्या | ऋषि की कन्या |
| कन्यादान | कन्या का दान |
| गोदान | गो (गाय) का दान |
| घुड़दौड़ | घोड़ों की दौड़ |
| दीपशिखा | दीप की शिखा |
| नगरसेठ | नगर का सेठ |
| पराधीन | पर (दूसरे) के अधीन |
| पाणिग्रहण | पाणि का ग्रहण |
| भारतरत्न | भारत का रत्न |
| भूदान | भू का दान |
| राजदरबार | राजा का दरबार |
| राजमाता | राजा की माता |
| रामचरित | राम का चरित |
| लोकनायक | लोक का नायक |
| सभापति | सभा का पति |
| स्वर्णपात्र | स्वर्ण का पात्र |
अधिकरण तत्पुरुष के उदाहरण
इसमें अधिकरण कारक के चिह्न “में” या “पर” का लोप होता है।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| वनवास | वन में वास |
| ध्यानमग्न | ध्यान में मग्न |
| आपबीती | आप पर बीती |
| घुड़सवार | घोड़े पर सवार |
| नरोत्तम | नरों में उत्तम |
| गृहप्रवेश | गृह में प्रवेश |
➕ 👉 अधिकरण तत्पुरुष के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| आत्मनिर्भर | आत्म (स्वयं) पर निर्भर |
| कविराज | कवियों में राजा |
| डिब्बाबन्द | डिब्बे में बन्द |
| पुरुषसिंह | पुरुषों में सिंह |
| फलासक्त | फल में आसक्त |
| विद्याप्रवीण | विद्या में प्रवीण |
| शोकमग्न | शोक में मग्न |
| स्नेहमग्न | स्नेह में मग्न |
नञ् तत्पुरुष
जिस समस्त पद का पहला पद निषेध (न, अ, अन) का अर्थ दे, उसे नञ् तत्पुरुष कहते हैं।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अज्ञान | न ज्ञान |
| अधर्म | न धर्म |
| अनपढ़ | न पढ़ा हुआ |
| अनाथ | न नाथ |
| असंभव | न संभव |
| असत्य | न सत्य |
मध्यमपदलोपी और अन्य तत्पुरुष
कुछ समस्त पदों में विग्रह करते समय बीच का एक पूरा शब्द (“वाला”, “डूबा हुआ”, “मिला हुआ” आदि) लुप्त रहता है। जैसे “दही में डूबा हुआ बड़ा” से “दहीबड़ा”। कुछ विद्वान इन्हें कर्मधारय का भेद भी मानते हैं।
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अश्रुगैस | अश्रु लाने वाली गैस (मध्यमपदलोपी) |
| गीदड़ भभकी | गीदड़ की भभकी |
| गुड़धानी | गुड़ मिली हुई धानी (मध्यमपदलोपी) |
| गुरुभाई | गुरु के संबंध से भाई (मध्यमपदलोपी) |
| घृतान्न | घृत में पका हुआ अन्न (मध्यमपदलोपी) |
| दहीबड़ा | दही में डूबा हुआ बड़ा (मध्यमपदलोपी) |
➕ 👉 मध्यमपदलोपी तत्पुरुष के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| बंदर घुड़की | बंदर की घुड़की |
| बैलगाड़ी | बैलों से चलने वाली गाड़ी (मध्यमपदलोपी) |
| मालगाड़ी | माल ढोने वाली गाड़ी (मध्यमपदलोपी) |
| रेलगाड़ी | रेल (पटरी) पर चलने वाली गाड़ी (मध्यमपदलोपी) |
| वायुयान | वायु में चलने वाला यान (मध्यमपदलोपी) |
3. कर्मधारय समास: परिभाषा और उदाहरण
जिस समास में उत्तरपद प्रधान हो और दोनों पदों में विशेषण-विशेष्य या उपमान-उपमेय का संबंध हो, उसे कर्मधारय समास कहते हैं।
- विशेषण-विशेष्य: विग्रह में “है जो” आता है। जैसे नीलकमल = नीला है जो कमल।
- उपमान-उपमेय: विग्रह में “के समान” या “रूपी” आता है। जैसे कमलनयन = कमल के समान नयन; करकमल = कर रूपी कमल।
कर्मधारय समास के उदाहरण
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| नीलकमल | नीला है जो कमल |
| महात्मा | महान है जो आत्मा |
| सज्जन | सत् है जो जन |
| चन्द्रमुख | चन्द्रमा के समान मुख |
| कमलनयन | कमल के समान नयन |
| लौहपुरुष | लौह के समान (दृढ़) पुरुष |
| करकमल | कर रूपी कमल |
| पीताम्बर | पीत है जो अम्बर (पीला वस्त्र) टिप्पणी: अर्थ के अनुसार कर्मधारय (पीला वस्त्र) या बहुव्रीहि (श्रीकृष्ण)। |
➕ 👉 कर्मधारय के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अरविन्दलोचन | अरविन्द के समान लोचन |
| अल्पाहार | अल्प है जो आहार |
| उड़नखटोला | उड़ने वाला है जो खटोला |
| उड़नतश्तरी | उड़ने वाली है जो तश्तरी |
| कदाचार | कुत्सित है जो आचार |
| कमलाक्ष | कमल के समान अक्ष (आँखें) |
| कापुरुष | कायर है जो पुरुष |
| कालीमिर्च | काली है जो मिर्च |
| कीर्तिलता | कीर्ति रूपी लता |
| कुदृष्टि | कुत्सित है जो दृष्टि |
| कुपुत्र | कु (बुरा) है जो पुत्र |
| कुसुमकोमल | कुसुम के समान कोमल |
| खाद्यान्न | खाद्य है जो अन्न |
| चंद्रवदन | चन्द्रमा के समान वदन (मुख) |
| चरणकमल | चरण रूपी कमल |
| चरणारविंद | चरण रूपी अरविन्द |
| चरमसीमा | चरम है जो सीमा |
| ज्वालामुखी | ज्वाला है मुख में जिसके (पर्वत) टिप्पणी: कई पुस्तकों में बहुव्रीहि। |
| तुषारधवल | तुषार के समान धवल |
| दुष्कर्म | दूषित है जो कर्म |
| देहलता | देह रूपी लता |
| नराधम | नरों में है जो अधम |
| नवोढ़ा | नई है जो ऊढ़ा (विवाहिता) |
| नीलगाय | नीली है जो गाय |
| नीलाकाश | नीला है जो आकाश |
| नीलोत्पल | नीला है जो उत्पल (कमल) |
| परमात्मा | परम है जो आत्मा |
| परमायु | परम है जो आयु |
| पाषाणहृदय | पाषाण के समान हृदय |
| पीला-ज़र्द | पीला है जो ज़र्द |
| पुरुषरत्न | पुरुष रूपी रत्न |
| पूर्णावतार | पूर्ण है जो अवतार |
| प्रधानमंत्री | मंत्रियों में प्रधान है जो |
| प्रभुदयाल | प्रभु है जो दयालु टिप्पणी: व्यक्तिवाचक नाम; पुस्तकों में दुर्लभ उदाहरण। |
| प्रियजन | प्रिय है जो जन |
| भुजदंड | भुजा रूपी दण्ड |
| मधुहास | मधु के समान हास |
| महर्षि | महान है जो ऋषि |
| महाकाल | महान है जो काल |
| महाकाव्य | महान है जो काव्य |
| महादेव | महान है जो देव टिप्पणी: “शिव” अर्थ में बहुव्रीहि भी। |
| महादेवी | महान है जो देवी |
| महापुरुष | महान है जो पुरुष |
| महाभोज | महान है जो भोज |
| महामात्य | महान है जो अमात्य |
| महाराजा | महान है जो राजा |
| महावीर | महान है जो वीर टिप्पणी: अर्थ के अनुसार कर्मधारय भी, बहुव्रीहि भी। |
| महोत्सव | महान है जो उत्सव |
| मुखकमल | मुख रूपी कमल |
| मुखचंद्र | मुख रूपी चन्द्र |
| मुखारविंद | मुख रूपी अरविन्द |
| मुनिवर | वर (श्रेष्ठ) है जो मुनि |
| मोटा-ताज़ा | मोटा है जो ताज़ा भी टिप्पणी: कई पुस्तकों में द्वन्द्व। |
| रक्तकमल | रक्त (लाल) है जो कमल |
| राजीवलोचन | राजीव (कमल) के समान लोचन |
| लाल-पीला | लाल है जो पीला भी टिप्पणी: कई पुस्तकों में द्वन्द्व; “क्रोधित” अर्थ में बहुव्रीहि। |
| लाल-सुर्ख | लाल है जो सुर्ख |
| वज्रदेह | वज्र के समान देह |
| वीरबाला | वीर है जो बाला |
| शिवदयाल | शिव है जो दयालु टिप्पणी: व्यक्तिवाचक नाम; पुस्तकों में दुर्लभ उदाहरण। |
| शीतोष्ण | शीत है जो उष्ण भी टिप्पणी: कई पुस्तकों में द्वन्द्व (शीत और उष्ण)। |
| शुभागमन | शुभ है जो आगमन |
| श्यामसुन्दर | श्याम है जो सुन्दर |
| श्वेताम्बर | श्वेत है जो अम्बर |
| सत्पुरुष | सत् है जो पुरुष |
| सदाचार | सत् है जो आचार |
| सदाशय | सत् है जो आशय |
| सद्गुण | सत् है जो गुण |
| सुबोध | सुन्दर है जो बोध |
| हस्तारविंद | हस्त रूपी अरविन्द |
4. द्विगु समास: परिभाषा और उदाहरण
जिस समास का पहला पद संख्यावाचक विशेषण हो और पूरा पद किसी समूह या समाहार का बोध कराए, उसे द्विगु समास कहते हैं। इसका विग्रह प्रायः “…का समूह” या “…का समाहार” से होता है।
द्विगु समास के उदाहरण
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| त्रिलोक | तीन लोकों का समूह |
| चौराहा | चार राहों का समूह |
| नवरत्न | नौ रत्नों का समूह |
| सप्ताह | सात दिनों का समूह |
| शताब्दी | शत (सौ) अब्दों (वर्षों) का समूह |
| पंचवटी | पाँच वटों का समूह |
➕ 👉 द्विगु के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अष्टाध्यायी | आठ अध्यायों का समूह |
| चौपाई | चार पदों का समूह टिप्पणी: कुछ पुस्तकों में बहुव्रीहि (छंद-विशेष के अर्थ में)। |
| चौमासा | चार मासों का समूह |
| त्रिदोष | तीन दोषों का समूह |
| त्रिफला | तीन फलों का समूह |
| त्रिभुवन | तीन भुवनों का समूह |
| त्रिवेणी | तीन वेणियों (धाराओं) का समाहार टिप्पणी: “प्रयाग” अर्थ में कुछ पुस्तकें बहुव्रीहि मानती हैं। |
| नवग्रह | नौ ग्रहों का समूह |
| पंचपात्र | पाँच पात्रों का समूह |
| पक्षद्वय | दो पक्षों का समूह |
| षड्रस | छह रसों का समूह |
| सतसई | सात सौ पद्यों का समूह |
| सप्तर्षि | सात ऋषियों का समूह |
| सप्तसिन्धु | सात सिन्धुओं का समूह |
5. द्वन्द्व समास: परिभाषा, भेद और उदाहरण
जिस समास में दोनों पद प्रधान हों और विग्रह करते समय बीच में “और”, “या”, “आदि” जैसे शब्द लगें, उसे द्वन्द्व समास कहते हैं। समस्त पद में प्रायः योजक-चिह्न (-) लगता है। इसके तीन भेद हैं:
- इतरेतर द्वन्द्व: विग्रह में “और” लगता है। जैसे माता-पिता = माता और पिता।
- वैकल्पिक द्वन्द्व: विग्रह में “या/अथवा” लगता है। जैसे दो-चार = दो या चार।
- समाहार द्वन्द्व: विग्रह में “आदि” लगता है और कहे गए शब्दों के अलावा उसी तरह की दूसरी चीज़ों का भी बोध होता है। जैसे कपड़ा-लत्ता = कपड़ा-लत्ता आदि।
इतरेतर द्वन्द्व के उदाहरण
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| अगल-बगल | अगल और बगल |
| अन्न-जल | अन्न और जल |
| आज-कल | आज और कल |
| आन-बान-शान | आन, बान और शान |
| आय-व्यय | आय और व्यय |
| आस-पास | आस और पास |
| इक्यासी | एक और अस्सी |
| ऊँच-नीच | ऊँच और नीच |
➕ 👉 इतरेतर द्वन्द्व के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| कंकर-पत्थर | कंकर और पत्थर |
| कंद-मूल-फल | कंद, मूल और फल |
| कील-कांटा | कील और कांटा |
| गाय-भैंस | गाय और भैंस |
| गौरीशंकर | गौरी और शंकर |
| चल-अचल | चल और अचल |
| चाय-पानी | चाय और पानी |
| चौसठ | चार और साठ |
| छियासी | छह और अस्सी |
| छोटा-बड़ा | छोटा और बड़ा |
| जन्म-मरण | जन्म और मरण |
| जल-थल | जल और थल |
| जी-जान | जी और जान |
| जीव-जन्तु | जीव और जन्तु |
| जीवन-मरण | जीवन और मरण |
| तन-बदन | तन और बदन |
| तन-मन-धन | तन, मन और धन |
| तिरानवे | तीन और नब्बे |
| तेईस | तीन और बीस |
| दाल-रोटी | दाल और रोटी |
| दूध-दही | दूध और दही |
| दूध-रोटी | दूध और रोटी |
| देश-विदेश | देश और विदेश |
| धनी-निर्धन | धनी और निर्धन |
| नर-नारी | नर और नारी |
| पच्चीस | पाँच और बीस |
| पशु-पक्षी | पशु और पक्षी |
| पान-तम्बाकू | पान और तम्बाकू |
| पाप-पुण्य | पाप और पुण्य |
| पूर्व-पश्चिम | पूर्व और पश्चिम |
| पूर्वापर | पूर्व और अपर |
| पेड़-पौधे | पेड़ और पौधे |
| पैंतालीस | पाँच और चालीस |
| बड़ा-छोटा | बड़ा और छोटा |
| बाल-बच्चा | बाल और बच्चा |
| भला-बुरा | भला और बुरा |
| भाई-बहन | भाई और बहन |
| भूत-प्रेत | भूत और प्रेत |
| भूल-चूक | भूल और चूक |
| माता-पिता | माता और पिता |
| मोल-तोल | मोल और तोल |
| यश-अपयश | यश और अपयश |
| राग-विराग | राग और विराग |
| राजा-रंक | राजा और रंक |
| राजा-रानी | राजा और रानी |
| रात-दिन | रात और दिन |
| राधा-कृष्ण | राधा और कृष्ण |
| राम-कृष्ण | राम और कृष्ण |
| राम-बलराम | राम और बलराम |
| राम-लक्ष्मण | राम और लक्ष्मण |
| रुपया-पैसा | रुपया और पैसा |
| रोटी-कपड़ा-मकान | रोटी, कपड़ा और मकान |
| लाभ-हानि | लाभ और हानि |
| लाल-पाल-बाल | लाला लाजपत राय, बिपिन चन्द्र पाल और बाल गंगाधर तिलक |
| वेद-पुराण | वेद और पुराण |
| शादी-गमी | शादी और गमी |
| सीता-राम | सीता और राम |
| सुख-दुःख | सुख और दुःख |
| सोलह | छह और दस |
| स्त्री-पुरुष | स्त्री और पुरुष |
| हरि-हर | हरि और हर |
| हाथी-घोड़ा | हाथी और घोड़ा |
| हाथी-घोड़ा-पालकी | हाथी, घोड़ा और पालकी |
| हार-जीत | हार और जीत |
वैकल्पिक द्वन्द्व के उदाहरण
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| दस-बीस | दस या बीस |
| दो-चार | दो या चार |
| धर्माधर्म | धर्म या अधर्म |
| पाँच-दस | पाँच या दस |
| बीस-तीस | बीस या तीस |
| लाख-दो लाख | लाख या दो लाख |
| सौ-दो सौ | सौ या दो सौ |
समाहार द्वन्द्व के उदाहरण
| समस्त पद | विग्रह |
|---|---|
| कपड़ा-लत्ता | कपड़ा आदि |
| काम-काज | काम आदि |
| कीड़ा-मकोड़ा | कीड़ा आदि |
| खाना-वाना | खाना आदि |
| चाय-वाय | चाय आदि |
| धन-दौलत | धन-दौलत आदि |
| पानी-वानी | पानी आदि |
6. बहुव्रीहि समास: परिभाषा और उदाहरण
जिस समास में कोई भी पद प्रधान नहीं होता, बल्कि दोनों पद मिलकर किसी तीसरे (अन्य) व्यक्ति या वस्तु की ओर संकेत करते हैं, उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं। इसके विग्रह में प्रायः “है जिसका”, “है जिसके”, “है जो” जैसे शब्द आते हैं। जैसे दशानन = दश हैं आनन जिसके, अर्थात् रावण।
बहुव्रीहि समास के उदाहरण
| समस्त पद | विग्रह | अर्थ (विशेष) |
|---|---|---|
| दशानन | दश हैं आनन जिसके | रावण |
| पीताम्बर | पीत है अम्बर जिसका टिप्पणी: अर्थ के अनुसार कर्मधारय (पीला वस्त्र) या बहुव्रीहि (श्रीकृष्ण)। | श्रीकृष्ण |
| लम्बोदर | लम्बा है उदर जिसका | गणेश |
| चतुर्भुज | चार हैं भुजाएँ जिसकी | विष्णु |
| नीलकण्ठ | नीला है कण्ठ जिसका | शिव |
| गिरिधर | गिरि को धारण करता है जो | श्रीकृष्ण |
| चक्रपाणि | चक्र है पाणि में जिसके | विष्णु |
| चन्द्रशेखर | चन्द्र है शेखर (मस्तक) पर जिसके | शिव |
➕ 👉 बहुव्रीहि के और उदाहरण देखें (क्लिक करें)
| समस्त पद | विग्रह | अर्थ (विशेष) |
|---|---|---|
| अंगराज | अंग (देश) का राजा है जो | कर्ण |
| अंजनिसुत | अंजनि का सुत है जो | हनुमान |
| अंशुमाली | अंशु (किरणें) हैं माला जिसकी | सूर्य |
| अनंग | नहीं है अंग जिसका | कामदेव |
| अन्नपूर्णा | अन्न से पूर्ण करती है जो | पार्वती/दुर्गा |
| आशुतोष | आशु (शीघ्र) प्रसन्न होते हैं जो | शिव |
| उदयपुर | उदय (सिंह) का पुर है जो टिप्पणी: कई पुस्तकों में षष्ठी तत्पुरुष। | एक नगर |
| एकदन्त | एक है दन्त जिसका | गणेश |
| कंसारि | कंस का अरि है जो | श्रीकृष्ण |
| कपीश्वर | कपियों का ईश्वर है जो | हनुमान |
| कुसुमशर | कुसुम हैं शर जिसके | कामदेव |
| गणपति | गणों का पति है जो | गणेश |
| गरुड़ध्वज | गरुड़ है ध्वज पर जिसके | विष्णु |
| गांडीवधारी | गांडीव को धारण करता है जो | अर्जुन |
| गिरिजा | गिरि से जन्मी है जो | पार्वती |
| गिरिजानन्दन | गिरिजा का नन्दन है जो | गणेश |
| घनश्याम | घन के समान श्याम है जो | श्रीकृष्ण |
| चक्षुश्रवा | चक्षु ही हैं श्रवा (कान) जिसके | साँप |
| चतुरानन | चार हैं आनन जिसके | ब्रह्मा |
| चतुर्मुख | चार हैं मुख जिसके | ब्रह्मा |
| चन्द्रचूड़ | चन्द्र है चूड़ा (मस्तक) पर जिसके | शिव |
| चन्द्रमौलि | चन्द्र है मौलि (मस्तक) पर जिसके | शिव |
| चौकन्ना | चारों ओर हैं कान जिसके | सतर्क व्यक्ति |
| छत्तीसगढ़ | छत्तीस हैं गढ़ जिसमें | एक राज्य |
| जनकनंदिनी | जनक की नंदिनी है जो | सीता |
| जमशेदपुर | जमशेद का पुर है जो टिप्पणी: कई पुस्तकों में षष्ठी तत्पुरुष। | एक नगर |
| जयपुर | जय का पुर है जो टिप्पणी: नगरों के नाम कई पुस्तकों में षष्ठी तत्पुरुष माने जाते हैं। | एक नगर |
| जितेंद्रिय | जीत ली हैं इन्द्रियाँ जिसने टिप्पणी: कुछ पुस्तकों में कर्म तत्पुरुष। | संयमी व्यक्ति |
| जोधपुर | जोधा का पुर है जो टिप्पणी: कई पुस्तकों में षष्ठी तत्पुरुष। | एक नगर |
| तुगलकाबाद | तुगलक द्वारा आबाद है जो टिप्पणी: कई पुस्तकों में तत्पुरुष। | एक स्थान |
| त्रिलोचन | तीन हैं लोचन जिसके | शिव |
| दशमुख | दश हैं मुख जिसके | रावण |
| दशरथनंदन | दशरथ का नंदन है जो | राम |
| दामोदर | दाम (रस्सी) है उदर पर जिसके | श्रीकृष्ण |
| दुर्वासा | बुरे हैं वस्त्र जिसके | एक ऋषि |
| देवराज | देवों का राजा है जो | इन्द्र |
| धनंजय | धन को जीतता है जो | अर्जुन |
| नंदनंदन | नंद का नंदन है जो | श्रीकृष्ण |
| नाकपति | नाक (स्वर्ग) का पति है जो | इन्द्र |
| पंचशर | पाँच हैं शर जिसके | कामदेव |
| पंचानन | पाँच हैं आनन जिसके | शिव |
| पंजाब | पाँच आब (नदियाँ) हैं जिसमें | एक प्रदेश |
| पद्मनाभ | पद्म है नाभि में जिसके | विष्णु |
| पद्मासना | पद्म है आसन जिसका | लक्ष्मी |
| पशुपति | पशुओं का पति है जो | शिव |
| पुंडरीकाक्ष | पुंडरीक (कमल) के समान अक्ष हैं जिसके | विष्णु |
| बाघाम्बर | बाघ (की खाल) है अम्बर जिसका | शिव |
| बारहसिंगा | बारह हैं सींग जिसके | एक हिरण |
| बीकानेर | बीका का नगर है जो टिप्पणी: कई पुस्तकों में षष्ठी तत्पुरुष। | एक नगर |
| ब्रजवल्लभ | ब्रज का वल्लभ है जो | श्रीकृष्ण |
| भूमिजा | भूमि से जन्मी है जो | सीता |
| मकरध्वज | मकर है ध्वज पर जिसके | कामदेव |
| मधुरिपु | मधु का रिपु है जो | विष्णु |
| मधुसूदन | मधु (दैत्य) का सूदन करता है जो | विष्णु/श्रीकृष्ण |
| मनसिज | मन में जन्मा है जो | कामदेव |
| मनोज | मन से जन्मा है जो | कामदेव |
| मन्दोदरी | मन्द (पतला) है उदर जिसका | रावण की पत्नी |
| मयूरवाहन | मयूर है वाहन जिसका | कार्तिकेय |
| मरुतसुत | मरुत (पवन) का सुत है जो | हनुमान |
| महावीर | महान वीर है जो टिप्पणी: अर्थ के अनुसार कर्मधारय भी, बहुव्रीहि भी। | हनुमान |
| महीपाल | मही का पालन करता है जो | राजा |
| मुरारि | मुर का अरि (शत्रु) है जो | श्रीकृष्ण |
| मोदकप्रिय | मोदक प्रिय है जिसे | गणेश |
| युधिष्ठिर | युद्ध में स्थिर रहता है जो | युधिष्ठिर (पांडव) |
| रघुनाथ | रघु (कुल) का नाथ है जो | राम |
| रघुपति | रघु (कुल) का पति है जो | राम |
| रतिकांत | रति का कांत है जो | कामदेव |
| रत्नगर्भा | रत्न हैं गर्भ में जिसके | पृथ्वी |
| राकेश | राका (पूर्णिमा) का ईश है जो | चन्द्रमा |
| रामप्रिया | राम की प्रिया है जो | सीता |
| राष्ट्रपिता | राष्ट्र का पिता है जो | महात्मा गांधी |
| रेवतीरमण | रेवती का रमण है जो | बलराम |
| रोहिणीनंदन | रोहिणी का नंदन है जो | बलराम |
| लोहागढ़ | लोहे के समान (दृढ़) है गढ़ जो | भरतपुर का किला |
| वक्रतुण्ड | वक्र है तुण्ड (सूँड़) जिसकी | गणेश |
| वक्षोज | वक्ष से जन्मे हैं जो | स्तन |
| वज्रपाणि | वज्र है पाणि में जिसके | इन्द्र |
| वज्रांग | वज्र के समान अंग हैं जिसके | हनुमान |
| वज्रायुध | वज्र है आयुध जिसका | इन्द्र |
| वाग्देवी | वाक् (वाणी) की देवी है जो | सरस्वती |
| वाचस्पति | वाचः (वाणी) का पति है जो | बृहस्पति |
| विश्वंभर | विश्व का भरण करता है जो | विष्णु |
| विषधर | विष को धारण करता है जो | साँप |
| वीणापाणि | वीणा है पाणि में जिसके | सरस्वती |
| शचीपति | शची का पति है जो | इन्द्र |
| शाखामृग | शाखाओं पर विचरण करने वाला मृग (पशु) | बंदर |
| शिवसुतवाहन | शिव के सुत (गणेश) का वाहन है जो | चूहा |
| शूलपाणि | शूल है पाणि में जिसके | शिव |
| शेषशायी | शेष पर शयन करता है जो | विष्णु |
| शैलजा | शैल से जन्मी है जो | पार्वती |
| शैलनंदिनी | शैल की नंदिनी है जो | पार्वती |
| श्रीश | श्री (लक्ष्मी) का ईश है जो | विष्णु |
| षडानन | छह हैं आनन जिसके | कार्तिकेय |
| षण्मुख | छह हैं मुख जिसके | कार्तिकेय |
| सफ़ेदपोश | सफ़ेद है पोशाक जिसकी | भद्र व्यक्ति |
| सहस्राक्ष | सहस्र हैं अक्ष (आँखें) जिसकी | इन्द्र |
| सिंहवाहिनी | सिंह है वाहन जिसका | दुर्गा |
| सुग्रीव | सुन्दर है ग्रीवा जिसकी | वानरराज सुग्रीव |
| सूतपुत्र | सूत का पुत्र है जो | कर्ण |
| सूरदास | सूर (अंधा) है जो दास टिप्पणी: वर्गीकरण पर मतभेद। | नेत्रहीन व्यक्ति |
| हंसासिनी | हंस पर आसीन है जो | सरस्वती |
| हलधर | हल को धारण करता है जो | बलराम |
| हिमसुता | हिम (हिमालय) की सुता है जो | पार्वती |
| हिरण्यगर्भ | हिरण्य है गर्भ में जिसके | ब्रह्मा |
| हृषीकेश | हृषीक (इन्द्रियों) का ईश है जो | विष्णु |
| हैदराबाद | हैदर द्वारा आबाद है जो टिप्पणी: कई पुस्तकों में तत्पुरुष। | एक नगर |
समासों में अंतर: परीक्षा में सबसे ज़्यादा भ्रम यहीं होता है
कर्मधारय और बहुव्रीहि में अंतर
कर्मधारय में शब्द अपना सामान्य अर्थ देता है, जबकि बहुव्रीहि में वह किसी तीसरे की ओर संकेत करता है। इसलिए एक ही शब्द अर्थ के अनुसार दोनों हो सकता है:
| शब्द | कर्मधारय | बहुव्रीहि |
|---|---|---|
| पीताम्बर | पीला है जो अम्बर (पीला वस्त्र) | पीत है अम्बर जिसका (श्रीकृष्ण) |
| नीलकण्ठ | नीला है जो कण्ठ | नीला है कण्ठ जिसका (शिव) |
| महावीर | महान है जो वीर | महान वीर है जो (हनुमान) |
द्विगु और बहुव्रीहि में अंतर
द्विगु में संख्या वाला शब्द किसी समूह का बोध कराता है, जबकि बहुव्रीहि में वही शब्द किसी तीसरे की ओर संकेत करता है। जैसे चौराहा = चार राहों का समूह (द्विगु), पर चतुर्भुज = चार हैं भुजाएँ जिसकी, अर्थात् विष्णु (बहुव्रीहि)। ज्यामिति में “चार भुजाओं वाली आकृति” के अर्थ में चतुर्भुज को द्विगु भी माना जाता है।
द्वन्द्व और अव्ययीभाव में अंतर
दोनों में शब्द प्रायः योजक-चिह्न से जुड़े दिखते हैं। अगर दोनों शब्द अलग-अलग हों (माता-पिता, रात-दिन), तो द्वन्द्व; अगर एक ही शब्द दोहराया गया हो (घर-घर, धीरे-धीरे, बार-बार), तो अव्ययीभाव।
🎯 परीक्षा के लिए याद रखने योग्य बातें
- 📌 पहला पद प्रधान = अव्ययीभाव; दूसरा पद प्रधान = तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु; दोनों पद प्रधान = द्वन्द्व; कोई पद प्रधान नहीं = बहुव्रीहि।
- 📌 विग्रह में “है जो” = कर्मधारय; “है जिसका/जिसके” = बहुव्रीहि; “का समूह” = द्विगु।
- 📌 एक ही शब्द दोहराया जाए (हाथोंहाथ, बार-बार) तो अव्ययीभाव, द्वन्द्व नहीं।
- 📌 विकल्पों में अगर कर्मधारय और बहुव्रीहि दोनों हों, तो देखें कि प्रश्न में शब्द किसी व्यक्ति/देवता के नाम के रूप में आया है या नहीं। आया है तो बहुव्रीहि चुनें।
- 📌 “शताब्दी”, “नवरत्न”, “त्रिलोक” जैसे समूह-बोधक शब्द द्विगु के पक्के उदाहरण हैं।
समास के महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न
नीचे दिए प्रश्न पिछली प्रतियोगी परीक्षाओं के पैटर्न पर आधारित हैं। हर प्रश्न के नीचे “उत्तर देखें” पर क्लिक करके सही उत्तर देखें।
1. ’महासागर’ सामासिक शब्द का विग्रह है-
(अ) बड़ा सागर
(ब) महान है जो सागर
(स) प्रशान्त महासागर
(द) सबसे बड़ा है जो सागर
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
2. ’लाख-दो लाख’ सामासिक पद के विग्रह में उचित समुच्चयबोधक शब्द होगा-
(अ) या
(ब) एवं
(स) आदि
(द) और
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
3. ’धन-दौलत’ समस्त पद के विग्रह में समुच्चयबोधक शब्द आएगा-
(अ) या
(ब) आदि
(स) और
(द) अथवा
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
4. जिस समास के दोनों पद प्रधान हों, वह है-
(अ) द्विगु
(ब) द्वन्द्व
(स) बहुव्रीहि
(द) तत्पुरुष
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
5. जिस समास का प्रथम पद प्रधान होता है, वह है-
(अ) द्वन्द्व
(ब) द्विगु
(स) अव्ययीभाव
(द) कोई नहीं
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
6. अन्य पद प्रधान होता है-
(अ) बहुव्रीहि में
(ब) कर्मधारय में
(स) तत्पुरुष में
(द) द्वन्द्व में
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
7. ’रघुपति’ शब्द उदाहरण है-
(अ) द्विगु
(ब) द्वन्द्व
(स) बहुव्रीहि
(द) कर्मधारय
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
8. ’एकदन्त’ पद का समास-विग्रह है-
(अ) एक दाँत
(ब) एक है दाँत जिसका (गणेश)
(स) एक दाँत का समूह
(द) एक जोड़ी दाँत
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
9. ’द्विगु’ सामासिक पद का विग्रह है-
(अ) दो पैरों वाला
(ब) दो गायों वाला
(स) दो गायों का समाहार
(द) दो गाय हैं जो
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
10. ’शताब्दी’ शब्द में समास है-
(अ) द्विगु
(ब) द्वन्द्व
(स) कर्मधारय
(द) बहुव्रीहि
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
11. ’धीरे-धीरे’ समस्त पद में समास है-
(अ) द्वन्द्व
(ब) द्विगु
(स) बहुव्रीहि
(द) अव्ययीभाव
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
12. ’जो पूर्व में न हुआ हो’ विग्रह का समस्त पद होगा-
(अ) पूर्ववत
(ब) अभूतपूर्व
(स) पूर्वरूप
(द) पूर्वभूत
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
13. ’नरेश’ शब्द का समास-विग्रह होगा-
(अ) नरों में ईश
(ब) नरों का ईश
(स) नरों द्वारा ईश
(द) नरों से ईश
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
14. ’रेलगाड़ी’ शब्द का सही समास-विग्रह है-
(अ) रेल और गाड़ी
(ब) पटरी पर चलने वाली रेलगाड़ी
(स) रेल से चलने वाली गाड़ी
(द) रेल पर चलने वाली गाड़ी
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
15. ’स्वर्णघट’ का विग्रह है-
(अ) स्वर्ण में घट
(ब) घट में स्वर्ण
(स) स्वर्ण का घट
(द) घट के लिए स्वर्ण
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
16. विशेषण और विशेष्य के योग से कौन-सा समास बनता है?
(अ) द्विगु
(ब) द्वन्द्व
(स) कर्मधारय
(द) तत्पुरुष
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
17. ’पुत्ररत्न’ का विग्रह होगा-
(अ) पुत्र का रत्न
(ब) पुत्र और रत्न
(स) पुत्र के लिए रत्न
(द) पुत्र रूपी रत्न
➕ ✅ उत्तर देखें (क्लिक करें)
18. ’विद्यामंदिर’ का विग्रह होगा-
(अ) विद्या का मंदिर
(ब) विद्या के लिए मंदिर
(स) विद्या और मंदिर
(द) विद्या के समान मंदिर
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19. ’यथाशक्ति’ का सही विग्रह क्या होगा?
(अ) जैसी शक्ति
(ब) जितनी शक्ति
(स) शक्ति के अनुसार
(द) यथा जो शक्ति
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20. ’त्रिफला’ में कौन-सा समास है?
(अ) अव्ययीभाव
(ब) द्वन्द्व
(स) द्विगु
(द) कर्मधारय
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FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
प्रश्न पर क्लिक करके उत्तर देखें:
➕ ❓ समास किसे कहते हैं?
➕ ❓ समास के कितने भेद होते हैं?
➕ ❓ समास-विग्रह किसे कहते हैं?
➕ ❓ समास और संधि में क्या अंतर है?
➕ ❓ कर्मधारय और बहुव्रीहि समास में क्या अंतर है?
➕ ❓ दशानन में कौन-सा समास है?
➕ ❓ राजपुत्र में कौन-सा समास है?
समास के हर भेद को और विस्तार से पढ़ें: अव्ययीभाव समास | तत्पुरुष समास | कर्मधारय समास | द्विगु समास | द्वन्द्व समास | बहुव्रीहि समास



प्रसंगानुकूल
Unpachas me konsa samas hoga
Thank you for this! Isse bohut sahayata mili hame