Bhikshuk Kavita -भिक्षुक कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी निराला | व्याख्या सहित

अंतिम संशोधित (Last Updated): September 3, 2026

‘भिक्षुक’: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की मार्मिक कविता का परिचय और अध्ययन

हिंदी साहित्य में प्रगतिवादी चेतना, शोषितों के प्रति अगाध संवेदना और मानवीय पीड़ा को अपनी कविताओं का मुख्य स्वर बनाने वाले यशस्वी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का आधुनिक हिंदी साहित्य में अत्यंत विशिष्ट और गौरवशाली स्थान है। उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर सामाजिक विषमता के प्रति तीव्र आक्रोश दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर समाज के उपेक्षित और दीन-हीन वर्ग के प्रति अत्यंत कोमल और करुणा से भरी भावनाएँ भी मिलती हैं। UGC NET/JRF, KVS, NVS, EMRS, UP/MP TGT-PGT, RPSC, BPSC, DSSSB तथा देश भर की विभिन्न हिंदी साहित्य प्रतियोगी परीक्षाओं और अकादमिक अध्ययन की दृष्टि से निराला की प्रसिद्ध कविता ‘भिक्षुक’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस आलेख में हम इस मार्मिक कविता की पृष्ठभूमि, विस्तृत व्याख्या और मुख्य बिंदुओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

📌 कविता का पाठ और उसकी विस्तृत व्याख्या

काव्यांश 1

वह आता-
दो टूक कलेजे के करता
पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठीभर दाने को, भूख मिटाने को,
मुँह फटी पुरानी झोली को फैलाता
दो टूक कलेजे के करता
पछताता पथ पर आता।
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट चलते हैं,
और दाहिना दयादृष्टि पाने की ओर बढ़ाये।

प्रसंग

यह अवतरण कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ’निराला’ द्वारा रचित ’भिक्षुक’ कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने पूरी संवेदना के साथ एक भिक्षुक का चित्रण किया है।

व्याख्या

कवि निराला वर्णन करते हैं कि जब भिक्षुक आता दिखाई देता है, तो उसकी दयनीय दशा देखकर हृदय के टुकड़े होने लगते हैं। वह स्वयं अपनी भी करुणाजनक स्थिति से सभी को हार्दिक वेदना से भर देता है। कारण यह है कि वह इतना दुर्बल और कमजोर है कि उसका पेट और पीठ मिलकर अर्थात् एकदम पिचककर एक ही प्रतीत होते हैं। वह अपने कष्टमय जीवन को लेकर पछताता रहता है और अपनी लाठी टेक-टेक कर चल रहा है।

वह एक मुट्ठी दाने को प्राप्त करके अपनी भूख मिटाना चाहता है और इसके लिए लोगों के सामने अपनी फटी हुई पुरानी झोली को फैलाता रहता है। उसकी उस स्थिति को देखकर संवेदनशील व्यक्ति के हृदय के दो टुकड़े होने लगते हैं। उस गरीब की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है, इस कारण दुख का अनुभव करते हुए वह अपने जीवन पर पछताता है और नित्य ही मार्ग पर आता-जाता दिखाई देता है। कवि वर्णन करता है कि उस भिखारी के साथ दो बच्चे भी हैं, जो सदा ही भिक्षा पाने के लिए हाथ फैलाए रहते हैं। वे बाएँ हाथ से अपने पेट को मलते हुए अर्थात् पेट की भूख से उत्पन्न वेदना को सहलाते हुए चलते हैं तथा दायाँ हाथ दाताओं की दया-दृष्टि अर्थात् भिक्षा प्राप्त करने के लिए सामने फैलाए रहते हैं।

विशेष

  1. भिखारी का यथार्थ चित्रण पूरी संवेदना के साथ किया गया है। कवि का मानवतावादी स्वर प्रमुख है। सामाजिक विषमता पर व्यंग्य किया गया है।

  2. ’कलेजे के टुकड़े होना’ मुहावरे का प्रयोग सटीक है।

काव्यांश 2

भूख से सूख होंठ जब जाते,
दाता-भाग्यविधाता से क्या पाते
घूँट-आँसुओं के पीकर रह जाते हैं,
चाट रहे जूठी पत्तल वे
कभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
ठहरिए, अहो है मेरे हृदय में,
अमृत से सींच दूँगा
अभिमन्यु जैसे को सकोगे तुम
तुम्हारे दुख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा।

प्रसंग

यह अवतरण कवि निराला की ’भिक्षुक’ कविता से लिया गया है। इसमें कवि ने भिखारियों की विवशता का चित्रण कर मानवीय संवेदना रखने का भाव व्यक्त किया है।

व्याख्या

कवि वर्णन करता है कि भिक्षुक जब भूख से व्याकुल हो जाता है और प्यास से उसके होंठ सूखने लगते हैं, तब उसकी स्थिति बड़ी दयनीय बन जाती है। ऐसी स्थिति में कोई भी व्यक्ति दाता बनकर उसकी सहायता नहीं करता है। उसे बड़े-बड़े लोगों से भी कुछ नहीं मिलता है। इस कारण भूख और प्यास से व्याकुल भिक्षुक केवल अपने आँसुओं को पीकर रह जाता है, अर्थात् निराश होकर अपने दर्द को दबाकर चुप रह जाता है। कवि कहता है कि कभी-कभी भिक्षुक सड़क पर खड़े रहकर जूठी पत्तलें चाटते हुए भी दिखाई देते हैं, किंतु उन पत्तलों को झपट लेने के लिए कुत्ते भी अड़े रहते हैं।

उस स्थिति को देखकर कवि करुणा और संवेदना से विगलित हो जाता है। इसलिए वह कहता है कि मैं अपने हृदय का सारा अमृत निकालकर इसके सूखे होंठों को सरस कर दूंगा और जीवन-शक्ति देकर इसकी भूख शांत कर दूंगा। व्यक्ति यदि संघर्ष करे, तो दृढ़ संकल्प करके वह जीवन के कष्टों को मिटाकर अपने लिए नया पथ बना सकता है, वह अभिमन्यु की भाँति अकेले ही सारी बाधाओं को झेल सकता है। अंत में कवि भावुक होकर कहता है कि वह ऐसे भिक्षुकों के दुखों को खींचकर अपने हृदय में रखना चाहता है और अपने हृदय की सारी संवेदनाओं को देकर बदले में उसे सुखी और तृप्त देखना चाहता है।

विशेष

  1. कवि का मानवतावादी दृष्टिकोण व्यक्त हुआ है।

  2. ’अभिमन्यु’ संघर्षरत एवं संकल्पनिष्ठ व्यक्ति के प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुआ है।

  3. आँसुओं के घूँट पीना और अमृत से सींचना जैसे भाषिक प्रयोग भाव-सौंदर्य को बढ़ा रहे हैं।

🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि

क्र.सं.लेखक / कवि का नाममुख्य विशेषता / कालइंटरनल लिंक (URL)
1.भारतेंदु हरिश्चंद्रआधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युगलिंक देखें(उदाहरण यूआरएल)
2.महावीर प्रसाद द्विवेदीद्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकारलिंक देखें
3.जयशंकर प्रसादछायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककारलिंक देखें
4.सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेतालिंक देखें
5.सुमित्रानंदन पंतप्रकृति के सुकुमार कवि / छायावादलिंक देखें
6.महादेवी वर्माआधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्रीलिंक देखें
7.प्रेमचंद (धनपत राय)उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुषलिंक देखें
8.अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तकलिंक देखें
9.रामधारी सिंह ‘दिनकर’राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कविलिंक देखें
10.कृष्णा सोबतीआधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षरलिंक देखें

1 thought on “Bhikshuk Kavita -भिक्षुक कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी निराला | व्याख्या सहित”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top