अंतिम संशोधित (Last Updated): September 3, 2026
कार्नेलिया का गीत: जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कविता का परिचय और संपूर्ण अध्ययन
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हिंदी साहित्य में छायावादी युग के प्रमुख शलाका पुरुष, नाटककार और ऐतिहासिक नाटकों के सम्राट जयशंकर प्रसाद का आधुनिक हिंदी साहित्य में अत्यंत गौरवशाली स्थान है। उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रप्रेम की सजीव झाँकी मिलती है, वहीं दूसरी ओर प्रकृति के सानिध्य में पले-बढ़े विदेशी पात्रों की कोमल भावनाओं और भारत भूमि के प्रति अगाध श्रद्धा का अत्यंत मार्मिक अंकन भी देखने को मिलता है। UGC NET/JRF, KVS, NVS, EMRS, UP/MP TGT-PGT, RPSC, BPSC, DSSSB तथा देश भर की विभिन्न हिंदी साहित्य प्रतियोगी परीक्षाओं और अकादमिक अध्ययन की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक ‘चंद्रगुप्त’ में संकलित गीत ‘कार्नेलिया का गीत’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस आलेख में हम इस प्रसिद्ध और राष्ट्र-भक्ति से ओत-प्रोत गीत की पृष्ठभूमि, विस्तृत व्याख्या और मुख्य बिंदुओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
’कार्नेलिया का गीत’ प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक ’चंद्रगुप्त’ का एक प्रसिद्ध गीत है। सिकन्दर के सेनापति सिल्यूकस की पुत्री कार्नेलिया सिंधू नदी के किनारे ग्रीक शिविर के पास एक वृक्ष के नीचे बैठी है। वहाँ कार्नेलिया के मुख से जयशंकर प्रसाद ने प्रकृति चित्रण के बहाने भारतवर्ष का यशोगान करवाया है तथा भारत देश की गौरवमयी पहचान निर्धारित की है।
अरुण यह मधुमय देश हमारा!
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुंकुम सारा!
लघु सुरधनुसे पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे।
उङते खग जिस ओर मुँह किए-समझ नीङ निज प्यारा।
बरसाती आँखों के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकराती अनंत की पाकर जहाँ किनारा।
हेम कुंभ ले उषा सवेरे भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा।
गीत की व्याख्याः-
कार्नेलिया भारत भूमि की महिमा का बखान कर रही है। प्रातःकालीन लालिमा से युक्त हमारा यह भारत देश बहुत ही आनंददायी है। विश्व के कोने-कोने से आए ज्ञानियों, जिज्ञासुओं एवं सुख कामनाओं वाले मनुष्यों को यहाँ आकर तृप्ति एवं संतुष्टि का अहसास मिलता है। प्रातःकाल में वृक्ष की फुनगियों पर लालिमा का सौन्दर्य ऐसा लग रहा है मानों किसी ने जीवन रूपी हरियाली पर कुंकुप रूपी लालिमा बिखेर दी हो। छोटे-छोटे इंद्रधनुष के समान रंग-बिरंगे पँखों वाले पक्षी चंदन वाली शीतल बयार के साथ जिस तरफ अपने प्यारे घोंसलों में जाने हेतु उत्साहित हो उङे आते हैं, ऐसा मेरा मनोहर भारत देश है।
भारत के लोगों की विशेषता इस गीत के माध्यम से स्पष्ट करती हुई कार्नेलिया कहती है। यहाँ के निवासी करुणा एवं दया से परिपूरित है। दूसरे के दुखों से द्रवित हो उनकी आँखों से निकलने वाले आँसू ही बादल बन करुणा की वर्षा करते है। सागर की लहरें किसी अनन्त से आकर अनन्तः भारतवर्ष को अपना आश्रय स्थल बनाती है।
वस्तुतः यहाँ की प्रातःकालीन शोभा अवर्णनीय है। रातभर चमकने वाले तारे भौर के समय मदमस्त हो ऊँघने लगते हैं तब उषा रूपी सुंदरी सूर्य रूपी घङे को आकाश रूपी कुएँ में डुबा कर लाती है और भारतवर्ष पर आनंद और सुख का प्रकाश बिखेरती है।
काव्यगत सौन्दर्यः
✔️ इस गीत में भारत की गौरव-गाथा एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का वर्णन है।
✅ छायावाद के आधार स्तंभ प्रसाद की उक्त कृति में छायावादी शिल्प शैली दृष्टिगोचर होती है।
✔️ तत्सम शब्दावली में खङी बोली की साहित्यिकता का निर्धारण उक्त गीत से हो जाता है।
✅ छिटका जीवन हरियाली पर मंगल कुंकुम सारा-रूपक अलंकार है।
✔️ लघु सुरधनु से पंख पसारे- उपमा अलंकार है।
✅ ’समीर सहारे’, ’बादल बनते’, ’जब जगकर’ में छेकानुप्रास अलंकार है।
✔️ बरसाती आँखों के बादल बनते जहाँ भरे करुणा जल- में रूपक अलंकार है।
✅ ’’हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे, मदिर ऊघते रहते जब-जगकर रजनीभर तारा।’’ में रूपक एवं मानवीकरण अलंकार के साथ बिम्ब निर्माण से काव्य में अनुपम सौंदर्य की आभा आ गई है।
🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि
| क्र.सं. | लेखक / कवि का नाम | मुख्य विशेषता / काल | इंटरनल लिंक (URL) |
| 1. | भारतेंदु हरिश्चंद्र | आधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युग | लिंक देखें |
| 2. | महावीर प्रसाद द्विवेदी | द्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकार | लिंक देखें |
| 3. | जयशंकर प्रसाद | छायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककार | लिंक देखें |
| 4. | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ | छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेता | लिंक देखें |
| 5. | सुमित्रानंदन पंत | प्रकृति के सुकुमार कवि / छायावाद | लिंक देखें |
| 6. | महादेवी वर्मा | आधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्री | लिंक देखें |
| 7. | प्रेमचंद (धनपत राय) | उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुष | लिंक देखें |
| 8. | अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) | प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक | लिंक देखें |
| 9. | रामधारी सिंह ‘दिनकर’ | राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कवि | लिंक देखें |
| 10. | कृष्णा सोबती | आधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर | लिंक देखें |


