कारक || Kaarak || Case || hindi vyakaran || हिंदी व्याकरण

दोस्तों आज की पोस्ट में हम हिंदी व्याकरण का महत्वपूर्ण विषय कारक(Kaarak) के बारें में जानेगे ,जो आपके लिए hindi vyakaran में काफी मायने रखता है

हिंदी व्याकरण के महत्वपूर्ण टॉपिक : 

स्वर व्यंजन , शब्द भेद,  उपसर्ग  ,कारक , क्रिया, वाच्य , समास ,मुहावरे , विराम चिन्ह |

कारक(Kaarak)

आइए अब परिभाषा देखते है 

कारक की परिभाषा(kaarak ki paribhasha)

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उसका सम्बन्ध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ जाना जाए, उसे कारक कहते हैं।

वाक्य में प्रयुक्त शब्द आपस में सम्बद्ध होते हैं। क्रिया के साथ संज्ञा का सीधा सम्बन्ध ही कारक है।

कारक को प्रकट करने के लिये संज्ञा और सर्वनाम के साथ जो चिन्ह लगाये जाते हैं, उन्हें विभक्तियाँ कहते हैं।

 

जैसे – पेङ पर फल लगते हैं। इस वाक्य में पेङ कारकीय पद हैं और ’पर’ कारक सूचक चिन्ह अथवा विभक्ति है।

 

हिन्दी में ’आठ कारक’ माने गये हैं –

 

कारकविभक्तियाँ
 1. कर्ता  ने
 2. कर्म  को
 3. करण  से, द्वारा
 4. सम्प्रदान  को, के लिये, हेतु
 5. अपादान  से (अलग होने के अर्थ में)
 6. सम्बन्ध   का, की, के, रा, री, रे
 7. अधिकरण   में, पर, विषय में
 8. सम्बोधन  हे! अरे! ऐ! ओ! हाय!

 

1-कर्ता कारक(karta kaarak)

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के करने वाले का बोध हो, उसे कर्ता कारक कहते हैं।

इसका चिन्ह ’ने’ कभी कर्ता के साथ लगता है, कभी नहीं।

उदाहरणार्थ –

  • रमा ने पुस्तक पढ़ी।
  • मोहन खेलता है।
  • पक्षी उङता है।

इन वाक्यों में ’रमा’, ’मोहन’ और ’पक्षी’ कर्ता कारक हैं, क्योंकि इनके द्वारा क्रिया के करने वाले का बोध होता है।

2-कर्मकारक(karmkaarak)

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप पर क्रिया का प्रभाव या फल पङे, उसे कर्म कारक कहते हैं।

कर्म के साथ ’को’ विभक्ति आती है। इसकी यही मुख्य पहचान होती है। कभी-कभी ’को’ विभक्ति का लोप भी हो जाता है।

  •  उसने श्याम को पढ़ाया।
  • राहुल ने चोर को पकङा।
  • लङकी ने लङके को देखा।
  • राम पुस्तक पढ़ रहा है।

’कहना’ और ’पूछना’ के साथ ’से’ प्रयोग होता हैं। ’को’ का नहीं, जैसे –

  • राम ने रहीम से कहा।
  •  मोहन ने श्याम से पूछा।

यहाँ ’से’ के स्थान पर ’को’ का प्रयोग अनुचित है।

3-करण कारक(karan kaarak)

जिस साधन से अथवा जिसके द्वारा क्रिया पूरी की जाती है, उस संज्ञा को करण कारक कहते हैं।

इसकी मुख्य पहचान ’से’ अथवा ’द्वारा’ है

उदाहरणार्थ –

  • श्याम गेंद से खेलता है।
  • आदमी चोर को लाठी द्वारा मारता है।

यहाँ ’गेंद से’ और ’लाठी द्वारा’ करणकारक है।

4-सम्प्रदान कारक (samprdaan kaarak)

जिसके लिए क्रिया की जाती है, उसे सम्प्रदान कारक कहते हैं।

इसमें कर्म कारक ’को’ भी प्रयुक्त होता है, किन्तु उसका अर्थ ’के लिये’ होता है।

उदाहरणार्थ –

  • कमल मोहन के लिए गेंद लाता है।
  • हम पढ़ने के लिए स्कूल जाते हैं।
  • माँ बच्चे को मिठाई देती है।

उपरोक्त वाक्यों में ’मोहन के लिये’ ’पढ़ने के लिए’ और बच्चे को सम्प्रदान  है।

5-अपादान कारक(apadaan kaarak)

अपादान का अर्थ है अलग होना। जिस संज्ञा अथवा सर्वनाम से किसी वस्तु का अलग होना ज्ञात हो, उसे अपादान कारक कहते हैं।

करण कारक की भाँति अपादान कारक का चिन्ह भी ’से’ है, परन्तु करण कारक में इसका अर्थ सहायता होता है और अपादान में अलग होना होता है।

उदाहरणार्थ –

  • हिमालय से गंगा निकलती है।
  • वृक्ष से पत्ता गिरता है।
  • घुङसवार घोङे से गिरता है।

इन वाक्यों में ’हिमालय से’, ’वृक्ष से’, ’घोङे से’ अपादान कारक है।

6-सम्बन्ध कारक(sambandh kaarak)

संज्ञा अथवा सर्वनाम के जिस रूप से एक वस्तु का सम्बन्ध दूसरी वस्तु से जाना जाये, उसे सम्बन्ध कारक कहते हैं।

इसकी मुख्य पहचान है – ’का’, ’की’, के।

उदाहरणार्थ –

  •  कमल की किताब मेज पर है।
  •  राम का घर दूर है।

सम्बन्ध कारक क्रिया से भिन्न शब्द के साथ ही सम्बन्ध सूचित करता है।

7-अधिकरण कारक (adhikaran kaarak)

संज्ञा के जिस रूप से क्रिया के आधार का बोध होता है, उसे अधिकरण कारक कहते हैं।

इसकी मुख्य पहचान है ’में’, ’पर’।

उदाहरणार्थ –

  • घर पर माँ है।
  • घोंसले में चिङिया है।
  • सङक पर गाङी खङी है।

यहाँ ’घर पर’, ’घोंसले में’, और ’सङक पर’, अधिकरण  है।

8-सम्बोधन कारक(sambodhan kaarak)

संज्ञा या जिस रूप से किसी को पुकारने तथा सावधान करने का बोध हो, उसे सम्बोधन कारक कहते हैं।

इसका सम्बन्ध न क्रिया से और न किसी दूसरे शब्द से होता है। यह वाक्य से अलग रहता है। इसका कोई कारक चिन्ह भी नहीं है।

उदाहरणार्थ –

  • खबरदार
  • रीना को मत मारो।
  •  रमा! देखी कैसा सुन्दर दृश्य है।
  • लङके! जरा इधर आ।

 

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