देवसेना का गीत – जयशंकर प्रसाद | व्याख्या सहित | Devsena ka geet

अंतिम संशोधित (Last Updated): September 3, 2026

देवसेना का गीत: जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध कविता का परिचय और अध्ययन

हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख शलाका पुरुष, नाटककार और ‘कामायगी’ जैसे महाकाव्य के रचयिता जयशंकर प्रसाद का आधुनिक हिंदी साहित्य में अत्यंत गौरवशाली स्थान है। उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रप्रेम की सजीव झाँकी मिलती है, वहीं दूसरी ओर वैयक्तिक जीवन के सुख-दुख, प्रेम, वेदना और आत्मसमर्पण का मार्मिक अंकन भी देखने को मिलता है। UGC NET/JRF, KVS, NVS, EMRS, UP/MP TGT-PGT, RPSC, BPSC, DSSSB तथा देश भर की विभिन्न हिंदी साहित्य प्रतियोगी परीक्षाओं और अकादमिक अध्ययन की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद के नाटकों में संकलित गीत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनके प्रसिद्ध नाटक ‘स्कंदगुप्त’ से ली गई यह कविता ‘देवसेना का गीत’ त्याग, प्रेम की विफलता, और जीवन के अंतिम पड़ाव पर क्षितिज की ओर बढ़ते वैराग्य की एक अमर गाथा है। इस आलेख में हम इस प्रसिद्ध गीत की विस्तृत व्याख्या, पृष्ठभूमि और मुख्य बिंदुओं का अध्ययन करेंगे।

देवसेना का गीत – Devsena ka geet

’देवसेना का गीत’ प्रसाद कृत स्कंदगुप्त नाटक से उद्धृत है। हूणों के आक्रमण से आर्यावर्त संकट में है। मालव नरेश बंधुवर्मा सहित परिवार के सभी लोग राष्ट्र रक्षार्थ वीरगति पा चुके है। बंधुवर्मा की बहन देवसेना स्कन्दगुप्त से प्रेम करती थी लेकिन स्कन्दगुप्त का रूझान विजया के प्रति था।

नाटक में कथानक मोङ पर स्कन्दगुप्त स्वयं देवसेना से प्रणय निवेदन करता है किंतु तब देवसेना कहती है- इस जन्म के देवता और उस जन्म के प्राप्य क्षमा! और वह वृद्ध पर्णदत्त के साथ आश्रम में गाना गाकर भिक्षावृत्ति से जीवन-निर्वाह करती है। उधर स्कन्दगुप्त आजीवन ब्रह्मचर्य व्रतधारण कर लेता है।

आह! वेदना मिली विदाई!
मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,
मधुकरियों की भीख लुटाई।
छलछल थे संध्या के श्रमकण,
आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।
मेरी यात्रा पर लेती थीं-
नीरवता अनंत अँगङाई।
श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,
गहन-विपिन की तरु-छाया में,
पथिक उनींदी श्रुति में किसने-
यह विहाग की तान उठाई।
लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,
रही बचाए फिरती कबकी।
मेरी आशा आह! बावली,
तूने खो दी सकल कमाई।
चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,
प्रलय चल रहा अपने पथ पर।
मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,
उससे हारी-होङ लगाई।
लौटा लो यह अपनी थाती
मेरी करुणा हा-हा खाती
विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे
इससे मन की लाज गँवाई।

गीत की व्याख्याः-

देवसेना इस गीत में कह रही है कि आज मैं वेदना से भरे इस हृदय से सुखद जीवन की कल्पनाओं से विदाई ले रही हूँ। स्कन्दगुप्त के प्रेम में मेरी अभिलाषा रूपी प्राप्त भिक्षा को वापस भिक्षा के रूप में ही लौटा रही हूँ। जीवन के अंतिम पङाव पर पहुँचते-पहुँचते देवसेना थक चुकी है। थकान में पसीने की बूँदों के साथ ही निराश जीवन गाथा के कारण आँखों से आँसू भी गिर रहे हैं। देवसेना कहती है कि मेरे इस जीवन रूपी यात्रा में सदैव नीरवता ही रही, जीवन में हमेशा तनहाइयाँ आलस करती रहती थी।

जिस प्रकार कोई यात्री दिनभर की यात्रा से थक कर साँझ को जंगल के किसी पेङ तले सुखद सपनों को देखता हुआ विश्राम करता है उसी प्रकार मेरे जीवन रूपी यात्रा का अंतिम पङाव घटित हो रहा था, ऐसे समय में अर्द्धरात्रि को गाया जाने वाला विहाग राग गाने लगे तो यात्री को अच्छा नहीं लगेगा, देवसेना को भी इस समय स्कन्दगुप्त का प्रणय निवेदन अच्छा नहीं लगा।

देवसेना कहती हैं मेरी यौवनावस्था में सभी लोगों की प्यासी नजर मेरे तन को पाने मुझ पर गङी रहती थी और मैं हमेशा स्वयं को बचाए रखती थी क्योंकि आशा अमर धन होती है और स्कन्दगुप्त की आशा लगाए पूरी जिंदगी बीत गई वह यौवन रूपी कमाई अब मैं खो चुकी हूँ।

मेरा जीवन रूपी रथ तो अब प्रलय की राह पर चल रहा है। मैं अपने कमजोर कदमों से व्यर्थ की इस प्रलय से आगे निकलने की स्पर्धा कर रही हूँ। वस्तुतः अब भी मेरी ही हार है। अन्त में वह वेदना और निराशा से भरे वचनों में विश्व से कहती है कि इस प्रेम रूपी धरोहर को लौटा लो। मुझमें थति को सँभालने का साहस नहीं है। स्कन्दगुप्त के निष्फल प्रणय-व्यापार में मैंने लाज भी गँवा दी है।

‘देवसेना का गीत’ – काव्यगत सौन्दर्य एवं मुख्य बिंदु

  • भावातिरेक एवं अलंकार: ’आह! वेदना मिली विदाई’ पंक्ति में भावातिरेक के कारण विस्मयादि बोधक चिह्न का प्रयोग हुआ है, जिससे वीप्सा नामक शब्दालंकार की छटा दिखती है।

  • प्रमुख अलंकार:

    • ’मधुकरियों की भीख’ में रूपक अलंकार है।

    • ’छल-छल’ शब्दों में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।

    • ’लेती थी नीरवता अनंत अंगड़ाई’ पंक्ति में मानवीकरण अलंकार है।

    • ’जीवन रथ’ में रूपक अलंकार निहित है।

    • ’श्रमित स्वप्न’ जैसे तत्सम शब्दों के मेल में अनुप्रास अलंकार है।

    • ’प्रलय चल रहा अपने पथ पर’ पंक्ति में मानवीकरण अलंकार दर्शाया गया है।

    • ’हारी होड़’ में छेकानुप्रास अलंकार है।

  • भाव पक्ष: इस गीत में देवसेना की गहरी निराशा और वेदना का अत्यंत भावमय चित्रण किया गया है।

  • भाषा और शैली:

    • भाषा तत्सम शब्दावली से युक्त, सुसंस्कृत एवं परिष्कृत है, जिसमें लाक्षणिकता इसकी अन्यतम विशेषता है।

    • इन पंक्तियों में सुंदर संगीतात्मकता और लयता विद्यमान है।

    • भाषा के अंतर्गत प्रसाद गुण और शैली में पांचाली रीति का प्रयोग हुआ है।

  • रस: इस संपूर्ण गीत में प्रधान रस के रूप में वियोग शृंगार का आधिपत्य है।

निष्कर्ष:

जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित कविता ‘देवसेना का गीत’ जीवन के यथार्थ, प्रेम की विडंबना और आत्मसमर्पण के भाव का एक बहुत ही मार्मिक और दार्शनिक निष्कर्ष प्रस्तुत करती है। इस कविता का निष्कर्ष इस प्रकार है कि कवि ने देवसेना के माध्यम से यह दर्शाया है कि जीवन का सफर संघर्षों, आशाओं और निराशाओं का एक ऐसा चक्र है, जहाँ अंततः व्यक्ति को अपने सारे अहंकार और इच्छाओं को त्यागकर प्रकृति या ईश्वर की शरण में जाना पड़ता है।

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9 thoughts on “देवसेना का गीत – जयशंकर प्रसाद | व्याख्या सहित | Devsena ka geet”

  1. बहुत बहुत धन्यवाद… आप जैसे हिन्दी सेवक के कारण ही आज मातृभाषा की उन्नति संभव है।

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