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            प्रयोजना विधि(project method)

⇒ प्रायोजना विधि का मूलाधार जाॅन ड्यूवी(Jan Dewey) की विचारधारा है।

ड्यूवी के शिष्य किलपैट्रिक ने ड्यूवी की विचारधारा पर प्रयोजना विधि(project method)का प्रतिपादन किया।

                      प्रयोजना विधि की परिभाषाएँ (Definition of project method)

किलपैट्रिक (W.H. Kilpatrick) के अनुसार, ’’हम चाहते हैं कि शिक्षा वास्तविक जीवन की गहराई में प्रवेश करे, केवल सामाजिक जीवन में ही नहीं वरन उस उत्तम जीवन में जिसकी हम आशा करते है।’’

“A Project is a whole hearted purposeful activity proceeding in a social environment.” -W.H. Kilpatrick

पार्कर के अनुसार, ’’प्रोजेक्ट कार्य की एक इकाई है, जिसमें छात्रों को कार्य की योजना और सम्पन्नता के लिए उत्तरदायी बनाया जाता है।’’

बेलार्ड के अनुसार, ’’प्रोजेक्ट यथार्थ जीवन का एक ही भाग है जो विद्यालय में प्रयोग किया जाता है।’’

स्टीवेन्सन के अनुसार, ’’ प्रोजेक्ट एक समस्यामूलक कार्य है, जो स्वाभाविक स्थिति में पूरा किया जाता है।’’

प्रायोजना विधि के आधारभूत सिद्धान्त(Basic Principles of the Project Method)

 

– प्रायोजना विधि निम्रलिखित सिद्धान्तों पर आधारित है –

1. रोचकता -बालक स्वयं ही किसी समस्या के प्रोजेक्ट या कार्य को चुनते है।

2. प्रायोजना उद्देश्य – जो समस्या बालकों को हल करने के लिए दी जाती है वह उद्देश्यपूर्ण होती है।

3. क्रियाशीलता-

⇒ बालक स्वभाव से ही क्रियाशील है। उनके अन्दर जिज्ञासा, चिन्तन, तर्क-शक्ति तथा संग्रह आदि की जो प्रवृत्तियाँ हैं, वे उन्हंे किसी क्रिया के लिए प्रेरित करती हैं।

⇒ प्रोजेक्ट विधि में बालक एवं शिक्षक क्रियाशील रहते हैं। इससे स्थाई एवं उपयोगी शिक्षा प्राप्त होती है।

4. वास्तविकता या यथार्थता –

⇒ प्रोजेक्ट के द्वारा जो भी कार्य कराया जाता है वह वास्तविक परिस्थितियों के अनुकूल होता है जिसके फलस्वरूप बालकों को प्रेरणा मिलती है। अतः शिक्षा को बालकों के जीवन सेजोङा जाता है।

5. सामाजिकता –

⇒ बालक समाज का एक अंग है। प्रोजेक्ट विधि द्वारा बालकों को अनेक ऐसे अवसर प्रदान किये जाते हैं जिनके द्वारा उनको सामाजिक जीवन का अनुभव हो सके तथा उनके अन्दर सहयोग, सद्भावना, प्रेम और सहकारिता जैसे सामाजिक गुणों का विकास हो।

6. उपयोगिता-

⇒ उपयोगिता वाले कार्यों में ही बालक की रूचि उत्पन्न होती है। रूचि ही किसी प्रायोजना का मनोवैज्ञानिक तत्व है। अतः प्रोजेक्ट से बालक जो कुछ भी सीखता है, करके सीखता है।

⇒ यह व्यावहारिता ही सामाजिक उपयोगिता का सबसे बङा आधार है। तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले प्रोजेक्ट छात्रों के लिए विशेष रूचिकर होते हैं। ड्यूवी ने सामाजिक उपयोगिता को ही शिक्षा का लक्ष्य माना है।

7. स्वतंत्रता –

⇒ शिक्षक का यह दायित्व है कि बालकांे को कोई कार्य अपनी ओर से करने के लिए बाध्य न करे।

⇒ प्रोजेक्ट विधि में बालक आरम्भ से अन्त तक कार्य करने को स्वतंत्र रहता है। छात्र स्वयं योजनाओं का चुनाव एवं उनकी कार्यान्वयन विधियों का निर्धारण करते हैं।

8. व्यक्तिगत भिन्नता –

⇒ बालकों में योग्यता, क्षमता तथा अन्य गुणों के अनुसार व्यक्तिगत भिन्नता पाई जाती है। प्रोजेक्ट विधि में ऐसी ही व्यवस्था है कि बालक अपनीरूचियों और योग्यता के आधार पर काम करते है।

प्रायोजना विधि के सोपान या चरण या घटक (Stepping of Project Method)

सफलता पूर्वक परियोजना चलाने के लिए प्रोजेक्ट में निम्र चरण पद होने चाहिए –

1. परिस्थिति उत्पन्न करना –

⇒ शिक्षक बालकों की योग्यताओं तथा क्षमताओं के आधार पर ऐसी परिस्थितियों का निर्माण करें जिनके द्वारा किसी न किसी समस्या या प्रोजेक्ट को चुन सकें। इस प्रकार बालक स्वयं कुछ प्रायोजनाएँ प्रस्तुत करेंगे।

प्रोजेक्ट में छात्रों की रूचि और आकर्षण के कारण वे उस सम्बन्ध में शिक्षक से विचार-विमर्श करेंगे। अध्यापक बालकों को भिन्न-भिन्न मेलों, प्रदर्शनियों, दर्शनीय स्थलों इत्यादि पर ले जाएगा तथा त्योहारों और अन्य सामाजिक गतिविधियों का परिचय कराएगा।

2. प्रायोजना कार्य का चुनाव –

⇒ बालक प्रोजेक्ट के रूप में किसी ऐसी समस्या को चुनेंगे जिसमें अधिकांश बालकों की रूचि हो। विचार-विमर्श के द्वारा शिक्षक को प्रायोजना के गुण और दोषों से बालकों को परिचित करा देना चाहिए।

शिक्षक बालकों को प्रोजेक्ट में मार्ग-प्रदर्शन करेगा। योजना के चुनने की स्वीकृति तथा निर्णय छात्रों के द्वारा ही होनी चाहिए।

3. कार्यक्रम बनाना –

⇒ योजना निश्चित हो जाने के पश्चात् उसको पूरा करने के लिए कार्यक्रम तैयार किया जाना चाहिए। वास्तविक तथा स्वाभाविक परिस्थितियों में पूरा होने वाला कार्यक्रम विचार-विमर्श के द्वारा निश्चित किया जा सकता है।

प्रत्येक छात्र को अपनी योग्यता के अनुसार कार्य मिलता है और उस योजना को सब मिलकर ही पूरा करते हैं।

4. कार्यक्रम क्रियान्वित करना –

⇒ कार्यक्रम बन जाने के पश्चात् प्रत्येक बालक अपना कार्य ’क्रिया द्वारा सीखना’ के आधार पर स्वयं करता है। सभी छात्र अपनी योग्यता और सामथ्र्य के अनुसार अपने-अपने उत्तदायित्व को निभाते हैं।

⇒ शिक्षक को उनके कार्य में सहायता, निरीक्षण, प्रोत्साहन तथा आदेश भी देना चाहिए।
⇒ छात्र को अनेक कार्य करने पङते हैं,

जैसे – लिखना, पढ़ना, वस्तुओं को एकत्रित करना, विचार-विमर्श करना तथा निर्माण कार्य करना आदि। छात्रों में स्व-आलोचना की आदत डालनी चाहिए।

5. कार्य का मूल्यांकन करना –

⇒ प्रोजेक्ट पूरा कर लेने के पश्चात् यह आवश्यक हो जाता है कि बालक अपने किये हुए कार्य का स्वयं निरीक्षण तथा मूल्यांकन करें।

⇒ योजना कार्यक्रम के अनुसार इस पर सामूहिक तौर से विचार किया जाता है और तभी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं।

⇒ प्रोजेक्ट कार्य पूर्ण होने पर अध्यापक की सहायता से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

6. कार्य का लेखा-जोखा रखना –

⇒ प्रोजेक्ट के चुनाव से लेकर पूरा होने तक सभी क्रिया-कलापों का पूरा ब्यौरा रखा जाता है। वे अपने कार्य के बारे में कठिनाइयाँ व आलोचना आदि पंजिका में अंकित करते हैं।

⇒ वे किये गये कार्य, उनकी विधियाँ, उपकरण, पुस्तकों आदि का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं।

प्रायोजना विधि का महत्व (Importance of planning method)

प्रायोजना विधि का महत्व निम्रलिखित बिन्दुओं से स्पष्ट किया जा सकता है।

1. प्रत्यक्ष अनुभव होना –

⇒ इस विधि के द्वारा छात्रों को स्वयं अवलोकन वा मापन आदि के अवसर मिलते हैं जिससे उन्हें स्थिति और तथ्यों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त होता है। अर्जित ज्ञान स्थायी बनता है।

2. करके सीखना –

⇒ बालक स्वयं ’करके सीखते’ हैं, जिससे छात्रों में विषय के प्रति अधिक रूचि, उत्साह और आत्म-विश्वास उत्पन्न होता है।

3. मनोवैज्ञानिकता –

⇒ छात्रों में जिज्ञासा, क्रियाशीलता और रचना की प्रवृत्ति उग्र रूप से विद्यमान रहती है।

4. प्रयोगात्मकता –

⇒ योजना विधि द्वारा छात्र स्वयं प्रयोग करके, उपकरणों आदि के द्वारा मापन के आधार पर हिन्दी के तथ्यों, सम्प्रत्ययों, उच्चारण, वर्तनी अशुद्धियाँ व परिस्थितियों का ज्ञान प्राप्त करते हैं।

5. उपयोगिता या व्यावहारिकता –

⇒ इस विधि द्वारा सीखे हुए ज्ञान और तथ्यों तथा नियमांे को दैनिक जीवन की समस्याओं में उपयोग कर सकता है।

⇒ उपयोगिता या व्यावहारिकता से प्राप्त ज्ञान का अन्य स्थितियों में और अन्य समस्याओं में उपयोग करना जानता है।

6. स्वाध्याय की प्रवृत्ति – छात्रांे में स्वाध्याय की प्रवृत्ति विकसित होती है।

7. अधिगम में सरलता – उनका अधिगम सरल,सुबोध तथारोचक होता है।

प्रायोजना विधि के गुण/विशेषताएँ (Features of the Project Method)

1. मनोवैज्ञानिकता –

⇒ प्रोजेक्ट विधि मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तांे पर आधारित होती है। बालकों की स्वाभाविक रूचियों, मनोवृत्तियों तथा चेष्टाओं का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है।

⇒ उनकी जिज्ञासा संग्रह – रचनात्मकता एवं अन्वेषणात्मक प्रवृत्तियों का पोषण होता है। अनुभव से सीखने का अवसर मिलता है।

2. चरित्र-निर्माण में सहायक-

⇒ प्रोजेक्ट के द्वारा बालकों के सर्वांगीण विकास में पर्याप्त सहायता मिलती है।

⇒ उनमें आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता, सामाजिक गुणों, सौन्दर्यानुभूति,नेतृत्व तथा भावात्मक स्थिरता आदि का विकास होता है।

3. प्रयोगात्मक एवं व्यावहारिक विधि –

⇒ इसमें छात्र व अध्यापक दोनों क्रियाशील रहते हैं।

⇒ इस विधि द्वारा बालक अपने वास्तविक जीवन की समस्याओं को सुलझाने का प्रशिक्षण लेते है। यह विधि ’करके सीखना’ नियम पर आधारित है।

⇒ इससे बालक की सृजनात्मक तथा क्रियात्मक प्रवृत्तियों का विकास होता है।

4. पिछङे बालकों की समस्या –

⇒ प्रोजेक्ट विधि में पिछङे बालकों की भी अभिव्यक्ति के अनेक अवसर प्रदान किये जाते हैं। स्वावलम्बन की भावना सुदृढ़ होती है।

5. तर्क, निर्णय, चिन्तन, अन्वेषण शक्ति का विकास –

⇒ इस विधि द्वारा बालकों में निरीक्षण, तर्क, चिन्तन, अन्वेषण तथा निर्णय लेने की शक्ति का विकास होता है।

6. प्रजातन्त्रवादी भावना का विकास –

⇒ बालक स्वतंत्रता से कार्य करते हैं। बालकों में उत्तदायित्व की भावना, धैर्य, सहिष्णुता, कत्र्तव्यनिष्ठा, पारस्परिक प्रेम एवं सहयोग की भावना आदि सामाजिक गुणों का विकास होता है।

7. स्थायी एवं स्पष्ट ज्ञान –

⇒ इस विधि में रटने का महत्व नहीं है। विद्यार्थी सतत् सक्रिय होकर पूरी लगन और प्रत्यक्ष अनुभवों एवं क्रियाओं द्वारा ज्ञान प्राप्त करते हैं। इससे अर्जित ज्ञान व्यवहार या कौशलों से अधिक स्थायी होते हैं।

8. समवाय के सिद्धान्त द्वारा शिक्षण –

⇒ यह विधि समवायी रूप से शिक्षण देने की एक आदर्श विधि है।

⇒ इसमें समन्वय क्रिया द्वारा स्थापित किया जाता है।

⇒ विषय का चुनाव बालक की आवश्यकतानुसार किया जाता है।

9. अनुशासन, गृहकार्य आदि समस्याओं से मुक्ति –

⇒ विद्यार्थी पूर्ण रूचि और उत्साह के साथ अपने-अपने उत्तदायित्व को निभाते हैं। अतः सदैव रचनात्मक अनुशासन बना रहता है। इसमें गृह कार्य देने की कोई आवश्यकता नहीं होती है।

10. हस्तकार्य के प्रति अनुराग –

⇒ इस विधि में बालक मानसिक व शारीरिक परिश्रम करते हैं। वे स्वयं हाथ से काम करते है और श्रम के महत्व को समझते हैं।

प्रायोजना विधि के दोष/सीमाएँ (Defect of the planning method)
  •  इस विधि के प्रयोग में अधिक व्यय करना पङता है क्योंकि विभिन्न प्रकार की सामग्री तथा यंत्रों की आवश्यकता पङती है।
  • इस विधि से यदि शिक्षा दी जाये तो पूरा पाठ्यक्रम एक वर्ष की अवधि में पूरा नहीं किया जा सकता। इसका प्रयोग कुछ प्रकरण में ही सम्भव हो पाता है।
  •  प्रोजेक्ट विधि के आधार पर उचित पाठ्य-पुस्तकें नहीं मिलती।
  • विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने पर उसके अनुपात में योग्य, प्रशिक्षितएवं अनुभवी अध्यापक नहीं मिलते हैं। शिक्षण में छात्रों पर अधिक भार पङ जाता है।
  • अध्यापक को मनोवैज्ञानिक रूप से उनकी योग्यताओं, आवश्यकताओं, क्षमताआंे एवं रूचियों इत्यादि से परिचित होना पङता है तथा समय- समय  पर मार्ग-निर्देशन एवं निरीक्षण भी करना पङता है। इतना कार्य एक अध्यापक द्वारा सम्भव नहीं होता।
  •  इसमें क्रमबद्धता अध्ययन नहीं रह पाता है।

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