अंतिम संशोधित (Last Updated): October 22, 2026
अभिक्रमित अनुदेशन शिक्षण विधि: अर्थ, परिभाषा, आवश्यकता, सिद्धांत, प्रकार और सीमाएँ (Programmed Instruction Teaching Method)
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शिक्षा के क्षेत्र में तकनीकी और मनोवैज्ञानिक आविष्कारों ने शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अत्यंत सरल, प्रभावी और वैज्ञानिक बना दिया है। शिक्षक-केंद्रित शिक्षा से छात्र-केंद्रित शिक्षा की ओर बढ़ते हुए कई आधुनिक शिक्षण तकनीकों का विकास हुआ, जिनमें ‘अभिक्रमित अनुदेशन विधि’ (Programmed Instruction Teaching Method) का एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान है। यह विधि शिक्षक की अनुपस्थिति में भी छात्र को स्वगति से सीखने का अवसर प्रदान करती है।
प्रतियोगिता परीक्षाओं (जैसे CTET, HTET, UPTET, REET और अन्य टेट परीक्षाओं) की दृष्टि से यह टॉपिक बहुत ही स्कोरिंग है। इस आलेख में हम अभिक्रमित अनुदेशन विधि का संपूर्ण और विस्तृत अध्ययन करेंगे।

📌 अभिक्रमित अनुदेशन शिक्षण विधि का परिचय
अभिक्रमित अध्ययन विधि को ‘अभिक्रमित अनुदेशन’ अथवा ‘अभिक्रमित अधिगम’ भी कहा जाता है। यह शिक्षण की एक आधुनिक तकनीक है, हालांकि इसके मूल बीज प्राचीनकाल में सुकरात की प्रश्नोत्तर प्रणाली में भी देखने को मिलते हैं।
प्रणेता एवं इतिहास: इस आधुनिक विधि के प्रणेता अमेरिकी मनोवैज्ञानिक बी. एफ. स्किनर (B. F. Skinner) हैं, जिन्होंने डॉ. सिडनी एल. प्रैसी (Sidney L. Pressey) के सहयोग से शिक्षा जगत को यह महान देन दी थी।
मूल अवधारणा: स्किनर ने अधिगम के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत (सक्रिय अनुबंधन) को व्यावहारिक रूप में एक शिक्षण पद्धति के रूप में प्रयुक्त किया। उनका यह मानना था कि यदि बालक को उसके प्रश्न के हल का मूल्यांकन तुरंत बता दिया जाए, तो उसके सीखने में वृद्धि के अवसर काफी बढ़ जाते हैं। स्किनर ने सन् 1950 में एक ऐसे शैक्षिक यंत्र का आविष्कार किया जो बालक को उसके प्रश्न का हल ‘सही’ या ‘गलत’ तुरंत बता देता था।
📖 अभिक्रमित अनुदेशन का अर्थ (Meaning)
यह विधि ज्ञान की विषयवस्तु को छोटे-छोटे पदों (Frames) में विभाजित कर क्रमबद्ध और तार्किक ढंग से इस प्रकार नियोजित करती है कि विद्यार्थी अपनी रुचि और स्वगति से स्वाध्याय (Self-study) की ओर अग्रसर होता जाता है। इसमें बालक को तुरंत परिणाम ज्ञात होने से प्रतिपुष्टि (Feedback) के माध्यम से पुनर्बलन (Reinforcement) मिलता है, जिससे वह आगे का अधिगम करने के लिए अत्यधिक प्रेरित होता है।
👥 अभिक्रमित अनुदेशन की प्रमुख परिभाषाएँ
विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने इसे अपने-अपने ढंग से परिभाषित किया है:
प्रो. रूश के अनुसार:
“अधिगम में एक विशेष प्रकार का निर्देशन जो विद्यार्थी को नई सामग्री सिखाता है और अपने अधिगम को जाँचने का अवसर देता है, अभिक्रमित अनुदेशन या कभी-कभी स्वचालित अनुदेशन कहा जाता है।”
एन. एस. मावी के अनुसार:
“अभिक्रमित अनुदेशन प्राणवान अनुदेशनात्मक प्रक्रिया को स्व-अधिगम अथवा स्व-अनुदेशन में परिवर्तित करने की वह तकनीक है जिसमें विषय-वस्तु को छोटी-छोटी श्रृंखलाओं में विभाजित किया जाता है। अधिगमकर्ता को इन्हें पढ़कर सही अथवा गलत कैसी भी अनुक्रिया करनी होती है, अपनी गलत अनुक्रिया को ठीक करना होता है तथा सही अनुक्रिया की प्रतिपुष्टि करनी होती है।”
फ्रैड स्टोफेल के अनुसार:
“ज्ञान के छोटे-छोटे घटकों की तार्किक क्रम में व्यवस्था की प्रक्रिया है तथा इस प्रकार की संपूर्ण पद्धति अभिक्रमित अधिगम कहलाती है।”
सुसान माइकल के अनुसार:
“अभिक्रमित अधिगम वैयक्तिक अनुदेशन की एक ऐसी विधि है जिसमें विद्यार्थी स्वयं को संलग्न रखते हुए अपनी गति के अनुसार अग्रसर होता है एवं उसे परिणामों की जानकारी भी तुरंत मिल जाती है।”
डेल एजर के अनुसार:
“अभिक्रमित अनुदेशन एक क्रमबद्ध पद से पद तक स्व-शिक्षण कार्यक्रम है जो पूर्व निर्धारित व्यवहार के अधिगम को सुनिश्चित करता है।”
🎯 अभिक्रमित अधिगम की आवश्यकता
सामान्य कक्षा-शिक्षण में हमेशा यह कठिनाई आती है कि बालकों को व्यक्तिगत भिन्नता (Individual Differences) के आधार पर शिक्षा कैसे प्रदान की जाए ताकि वे अपनी स्वगति से सुगमता पूर्वक सीख सकें। शिक्षक द्वारा इस दिशा में अनेक प्रयास किए जाते हैं, लेकिन पूरी जटिलता का निवारण कक्षा-शिक्षण में कठिन होता है।
अभिक्रमित अधिगम शिक्षा की एक ऐसी अनूठी विधि है जो बालक को पूरी तरह से स्वगति से सीखने का अवसर प्रदान करती है। इससे व्यक्तिगत भिन्नता के कारण अध्यापन में आने वाली जटिलताएँ स्वतः ही समाप्त या कम हो जाती हैं।
📐 अभिक्रमित अधिगम के मूल सिद्धांत (Fundamental Principles)
यह विधि निम्नलिखित प्रमुख मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित है:
छोटे सोपानों का सिद्धांत (Principle of Small Steps):
इसका अर्थ है कि जिस विषय-वस्तु को विद्यार्थी के समक्ष प्रस्तुत किया जाना हो, उसे अत्यंत छोटे-छोटे पदों या भागों में विभाजित कर दिया जाए। यह माना जाता है कि यदि सीखने वाले को सामग्री खंडों में परोसी जाए, तो वह उसे अधिक अच्छी तरह से आत्मसात कर सकता है।
सक्रिय सहयोग का सिद्धांत (Principle of Active Responding):
प्रत्येक इकाई या प्रश्न का छात्र द्वारा किसी न किसी रूप में अनिवार्य रूप से उत्तर दिया जाना चाहिए। मनोवैज्ञानिक खोजों से यह सिद्ध हो चुका है कि अध्येता भली-भांति तभी सीखता है, जब उसे उस कार्य में सक्रिय रूप से भाग लेने का पूर्ण अवसर मिले। पारंपरिक शिक्षण में केवल एक छात्र उत्तर देता है और बाकी सिर्फ सोचते हैं, किंतु इसमें हर छात्र सक्रिय रहता है।
तुरंत आश्वासन का सिद्धांत (Principle of Immediate Feedback):
उत्तरित सोपान के सही या गलत होने की जानकारी तुरंत देते हुए छात्र को अभिप्रेरणा के माध्यम से पुनर्बलन (Reinforcement) प्रदान करना। जो छात्र अपने उत्तर के बारे में अधिक देर तक प्रतीक्षारत रहता है, वह उस छात्र की तुलना में कम सीखता है जिसे परिणाम तुरंत मिल जाता है।
स्वतः गतिक्रम का सिद्धांत (Principle of Self-Pacing):
अनुक्रमित सोपानों में क्रमशः एक-एक पर अधिकार करने के पश्चात् ही दूसरे सोपान पर पहुँचना। हर छात्र की सीखने की गति अलग होती है। अभिक्रमित अधिगम में प्रत्येक छात्र अपनी क्षमता, आवश्यकता और इच्छा के अनुसार तीव्र या मंद गति से आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होता है।
छात्र-परीक्षण का सिद्धांत:
पाठ्य-सामग्री की इकाइयों या घटकों का आकार, संख्या तथा मात्रा छात्रों के बुद्धि स्तर, अभिरुचि और शारीरिक क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए। छात्रों के सीखने की गतिविधि के आधार पर किसी अभिक्रम में सुधार या संशोधन इसी सिद्धांत पर आधारित होता है।
🗂️ अभिक्रमित अनुदेशन शिक्षण विधि के प्रमुख प्रकार
विश्व भर में इसके प्रसार के साथ मुख्य रूप से तीन प्रकार के अभिक्रमों की रचना की गई है:
1. रेखीय या बाह्य अभिक्रम (Linear Programming)
प्रवर्तक: इसका प्रतिपादन और विकास बी. एफ. स्किनर द्वारा 1954 में ‘सक्रिय अनुबंध’ सिद्धांत के आधार पर किया गया था।
स्वरूप: यह पुनर्बलन एवं प्रतिपुष्टि के सिद्धांत पर आधारित है। यह अधिगम एक सीधी रेखा की तरह होता है जिसमें क्रमिक तथा सीधी व्यवस्था होती है। यह उस समय तक चलती है जब तक छात्र लक्ष्य तक न पहुँच जाए।
विशेषताएँ: इसमें छात्र बिना शिक्षक की उपस्थिति के स्वयं सीखता है, विषय-वस्तु पूर्णतः क्रमबद्ध होती है, छात्र अपनी क्षमता से आगे बढ़ता है तथा सही होने पर तुरंत पुनर्बलन प्राप्त करता है।
2. शाखीय या आंतरिक अभिक्रम (Branching or Intrinsic Programming)
प्रवर्तक: इसका विकास नार्मन ए. क्राउडर (Norman A. Crowder) द्वारा 1954 में किया गया था। इसे ‘क्राउडर अभिक्रम’ भी कहते हैं। इसका आविष्कार मूल रूप से लड़ाकू विमानों की खराबी को सुधारने हेतु कारीगरों को प्रशिक्षित करने के लिए किया गया था।
स्वरूप: इसमें शिक्षार्थी की कमजोरियों, कठिनाइयों और त्रुटियों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न पद दिए जाते हैं। एक पद पढ़ने के बाद बहुविकल्पीय प्रश्न पूछे जाते हैं। सही उत्तर आने पर वह अगले पद पर जाता है, और यदि उत्तर गलत हो तो उसे उपचारात्मक निर्देश (Remedial instructions) दिए जाते हैं। इसे ‘बहुरूपिया अभिक्रम’ भी कहा जाता है।
3. अवरोही अभिक्रम या अभिक्रमित अधिगम
प्रवर्तक: इसका विकास थॉमस एफ. गिल्बर्ट (Thomas F. Gilbert) द्वारा 1962 में गणित विषय के प्रत्ययों के लिए किया गया था।
स्वरूप: यह स्किनर के सक्रिय अनुबंध सिद्धांत पर आधारित है। यह जटिल व्यवहार-समूह विश्लेषण एवं पुनर्बलन के सिद्धांतों का व्यवस्थित प्रयोग है, जो विषय-वस्तु पर पूर्ण अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें विषय को छोटे पदों में प्रस्तुत कर प्रदर्शन और अनुक्रिया के आधार पर स्वामित्व प्राप्त किया जाता है।
📊 रेखीय अभिक्रम एवं शाखीय अभिक्रम में अंतर
| क्र.सं. | रेखीय अभिक्रम (Linear Program) | शाखीय अभिक्रम (Branching Program) |
| 1. | यह पूरी तरह क्रमानुसार और सीधी रेखा में होता है। | यह बिखरा हुआ और शाखाओं वाला होता है। |
| 2. | इसमें छात्र को प्रत्येक प्रोग्राम या समस्या से अनिवार्यतः गुजरना पड़ता है। | इसमें यह अनिवार्यता नहीं होती है, छात्र आवश्यकतानुसार आगे-पीछे जा सकता है। |
| 3. | छात्र जब तक एक चरण पूरी तरह सीख नहीं लेता, अगले पर नहीं जा सकता। | इसमें गलत उत्तर देने पर उपचारात्मक शाखाओं या पिछले सोपान पर जाने का प्रावधान होता है। |
🪜 अभिक्रमित अधिगम के प्रमुख सोपान (Steps)
यह विधि निम्नलिखित चरणों या सोपानों के माध्यम से संपन्न होती है:
शिक्षण हेतु उपयुक्त प्रकरण (Topic) का चयन करना।
शिक्षण उद्देश्यों का प्रतिपादन करना तथा उन्हें व्यावहारिक रूप में लिखना।
पाठ्य-वस्तु का तार्किक विश्लेषण करना तथा अनुदेशन क्रम का निर्धारण करना।
मानदण्ड परीक्षा (Criterion Test) का निर्माण करना।
अनुदेशन के प्रारूप का निर्धारण करना।
अभिक्रमित अनुदेशन के पदों (Frames) को लिखना।
छात्र समूह पर परीक्षण करना तथा पदों की जाँच करना।
अंत में मूल्यांकन करना।
🚀 अभिक्रमित अनुदेशन विधि के मुख्य लाभ / विशेषताएँ
छात्र को उसके प्रदर्शन और परिणामों की जानकारी तुरंत मिल जाती है।
यह पूर्ण रूप से पुनर्बलन (Reinforcement) के सिद्धांत पर बल देती है।
भारत में अभिक्रमित शिक्षण का प्रारंभिक चरण सन् 1963 में हुआ था।
यह स्व-अधिगम और रचना शिक्षण के लिए एक अत्यंत उत्तम विधि मानी जाती है।
इसके जन्मदाता अमेरिकी मनोवैज्ञानिक बी. एफ. स्किनर हैं।
⚠️ अभिक्रमित अनुदेशन की सीमाएँ एवं दोष
किसी भी शिक्षण तकनीक की तरह इसकी भी कुछ अपनी सीमाएँ हैं:
इसमें बालकों की व्यक्तिगत भावनाओं, मौलिक सृजनात्मकता तथा सामाजिक आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान नहीं दिया जाता।
यह तकनीक पूरी तरह नियंत्रित और कृत्रिम परिस्थितियों में ही अधिगम करवाती है।
यह तकनीक मेधावी या बहुत उच्च कोटि के छात्रों को वैसी प्रेरणा नहीं देती जैसी सामान्य या मंदबुद्धि बालकों को देती है।
इस तकनीक के अंतर्गत उपयुक्त फ्रेम या पदों का निर्माण करना एक अत्यंत कठिन और समयसाध्य कार्य है।
इसके सफल प्रयोग के लिए अध्यापकों को विशेष प्रकार के तकनीकी प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, जो हर जगह आसानी से उपलब्ध नहीं होता।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जा सकता है कि अभिक्रमित अनुदेशन शिक्षण विधि (Programmed Instruction) आधुनिक शैक्षिक तकनीक का एक मील का पत्थर है। यह विधि ‘करके सीखने’ और ‘स्वयं की गति से सीखने’ के मनोवैज्ञानिक सिद्धांत को चरितार्थ करती है। यद्यपि इसके निर्माण में जटिलता और मानवीय संवेगों की कमी जैसी कुछ सीमाएँ अवश्य हैं, तथापि व्यक्तिगत भिन्नता के समाधान और सुदूर शिक्षा (Distance Education) के क्षेत्र में इसका योगदान अत्यंत अतुलनीय और सराहनीय है।
🔗 शिक्षण विधियाँ: महत्वपूर्ण आर्टिकल्स की सूची
| क्र.सं. | शिक्षण विधि का नाम | मुख्य विशेषता / क्षेत्र | डायरेक्ट लिंक (URL) |
| 1. | अभिक्रमित अनुदेशन विधि (Programmed Instruction) | छोटे-छोटे पदों में विभाजित करके स्व-अधिगम कराना | क्लिक करके पढ़ें |
| 2. | अनुकरण शिक्षण विधि (Simulation / Imitation Method) | शिक्षक या आदर्श व्यक्ति के व्यवहार का अनुकरण करके सीखना | क्लिक करके पढ़ें |
| 3. | पर्यवेक्षित अध्ययन विधि (Supervised Study Method) | शिक्षक के मार्गदर्शन और देखरेख में छात्रों द्वारा अध्ययन | क्लिक करके पढ़ें |
| 4. | सूक्ष्म शिक्षण विधि (Micro-Teaching) | शिक्षण कौशलों के विकास की लघु एवं प्रायोगिक विधि | क्लिक करके पढ़ें |
| 5. | इकाई शिक्षण विधि (Unit Approach Method) | संपूर्ण पाठ्यक्रम को सार्थक इकाइयों में बाँटकर पढ़ाना | क्लिक करके पढ़ें |



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Yes, 1960 according to Dr.S.K.Mangal Sir’s Book