अंतिम संशोधित (Last Updated): August 31, 2026
गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन परिचय, रचनाएँ और साहित्यिक योगदान (Gajanan Madhav Muktibodh Jivan Parichay)
Table of Contents
हिंदी साहित्य के प्रगतिशील और प्रयोगवादी आंदोलन के शिखर पुरुष, बहुमुखी प्रतिभा के धनी तथा ‘तार सप्तक’ के प्रमुख हस्ताक्षर गजानन माधव मुक्तिबोध का आधुनिक हिंदी साहित्य में अत्यंत महत्वपूर्ण एवं युगांतकारी स्थान है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से मुक्तिबोध का जीवन परिचय, उनकी लंबी कविताएँ, आलोचनात्मक ग्रंथ और कहानी संग्रह अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस आलेख में हम उनके संपूर्ण जीवन और कृतित्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
📌 गजानन माधव मुक्तिबोध का संक्षिप्त परिचय (Quick Facts)
जन्म: 13 नवंबर 1917 ई. (मध्य प्रदेश)
मृत्यु: 11 सितंबर 1964 ई. (भोपाल, मध्य प्रदेश)
माता-पिता: पिता—माधवराव गोपालराव मुक्तिबोध (जो ग्वालियर स्टेट में सब-इंस्पेक्टर थे), माता—पार्वतीबाई (घरेलू और धर्मपरायण महिला)
भाई-बहन: मुक्तिबोध चार भाई थे—गजानन माधव मुक्तिबोध (हिंदी साहित्यकार), शरदचंद्र मुक्तिबोध (मराठी साहित्यकार), बसंत मुक्तिबोध और चंद्रकांत मुक्तिबोध।
शरतचंद्र (भाई) के शब्दों में: “बड़े भैया बहुत लाड़-प्यार में पले थे। पहले दो पुत्र गुजर जाने के बाद माता-पिता उन्हें आँखों से ओझल होने नहीं देते थे। इसी कारण बड़े भैया बहुत जिद्दी बन गए थे और घर में हम उन्हें ‘बाबू साहब’ कहकर पुकारते थे।”
📖 शिक्षा, व्यक्तित्व एवं जीवन-संघर्ष
शिक्षा: पिता के सब-इंस्पेक्टर होने के कारण तबादलों के चलते मुक्तिबोध का पढ़ाई का सिलसिला टूटता-जुड़ता रहा। सन 1930 में उज्जैन में मिडिल क्लास की परीक्षा में असफलता मिली, इस घटना को मुक्तिबोध अपने जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना मानते थे। उस समय देश में राष्ट्रीय आंदोलन चल रहा था; एक तरफ क्रांतिकारी विचार थे तो दूसरी तरफ गांधीवादी विचार।
घुमक्कड़ प्रवृत्ति: मुक्तिबोध घुमक्कड़ की भाँति अपने मित्र शांताराम क्षीरसागर के साथ रात-रात भर देर तक घूमते रहते थे। एक जगह टिक न पाने की अपनी इसी प्रवृत्ति को मुक्तिबोध ‘स्थानांतरगामी प्रवृत्ति’ कहते थे।
विवाह: मुक्तिबोध का परिवार संपन्न था। परिवार की घोर आलोचनाओं और सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध जाकर उन्होंने स्वेच्छा से विवाह किया। यह जाति-भेद तो नहीं था, किंतु वर्ग-भेद अवश्य था। इस स्वेच्छापूर्वक विवाह के पश्चात उनके जीवन-संघर्ष का वह सिलसिला प्रारंभ हुआ जो उनके अंतिम क्षणों तक चलता रहा।
नौकरी एवं कार्य: मुक्तिबोध नौकरी में भी एक जगह टिक नहीं सके। उन्होंने अनेक स्कूलों में अध्यापन कार्य किया। दैनिक पत्र ‘जय हिंद’ में काम किया, नागपुर के रेडियो स्टेशन के समाचार विभाग में ‘न्यूज़ रीडर’ की नौकरी की।
1946 ई.: ‘नया खून’ साप्ताहिक का संपादन किया।
1948 ई.: राजनांदगांव (मध्य प्रदेश) के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में नियुक्ति मिली। यहीं पर रहकर उन्होंने अपनी प्रसिद्ध लंबी कविताएँ ‘ब्रह्मराक्षस’ और ‘अंधेरे में’ की रचना की।
📚 रचना-संसार (Muktibodh Rachnaye)
1. काव्य रचना एवं काव्य संग्रह
मुक्तिबोध का काव्य-रचना काल 1935 से आरंभ होता है। उनकी शुरुआती रचनाओं में छायावाद का प्रभाव था, किंतु आगे चलकर उनकी कविताओं ने कल्पना के स्थान पर कठोर यथार्थ को अपना लिया। वे प्रगतिवादी परंपरा से गहराई से प्रभावित जनवादी कवि थे और साहित्य जगत में उनका प्रवेश ‘तार सप्तक’ (1943) के माध्यम से हुआ था।
चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964 ई.): यह उनके जीवनकाल के बाद उनकी मृत्यु के पश्चात प्रकाशित हुआ पहला काव्य संग्रह है, जिसमें कुल 28 कविताएँ संग्रहित हैं। इसे श्रीकांत वर्मा के विशेष सहयोग से प्रकाशित किया गया था।
रामस्वरूप चतुर्वेदी ने ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ को “बड़े कलाकार की स्केच बुक” कहा है।
भूरी भूरी खाक धूल (1980 ई.): इस काव्य संग्रह में 47 कविताएँ संग्रहित हैं, जिन पर मार्क्सवाद का गहरा प्रभाव है।
प्रमुख लंबी कविताएँ: मुक्तिबोध की कविताएँ आकार में अक्सर लंबी होती हैं, जैसे—‘ब्रह्मराक्षस’, ‘अंधेरे में’, ‘चंबल की घाटी’, और ‘जिंदगी का रास्ता’।
‘अंधेरे में’ (1957 ई.): यह उनकी अत्यंत प्रसिद्ध और महत्त्वपूर्ण लंबी कविता है जो 1964 में ‘कल्पना’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इस कविता का प्रारंभिक नाम “आशंका के द्वीप” था। यह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ काव्य संग्रह में भी संकलित है।
‘अंधेरे में’ कविता पर विभिन्न विद्वानों के मत:
रामविलास शर्मा: “अपराध भावना का अनुसंधान” तथा “आरक्षित जीवन की कविता”।
नामवर सिंह: “अस्मिता की खोज”।
प्रभाकर माचवे: “लावा”।
तार सप्तक की कविताएँ: ‘आत्मा के मित्र मेरे’, ‘दूर तारा’, ‘खोल आँखें’, ‘मेरे अंतर’, ‘बिहार’ आदि।
‘एक आत्मा वक्तव्य’ कविता के पूर्व ‘पुनश्च’ में उन्होंने लिखा था: “इससे छोटी कविता मैं नहीं लिख सकता।”
2. आलोचना एवं निबंध संग्रह
नई कविता का आत्म-संघर्ष: यह 13 निबंधों का एक महत्वपूर्ण संग्रह है।
समीक्षा की समस्याएँ: इसमें संकलित निबंध विभिन्न पत्रिकाओं में पहले प्रकाशित हो चुके थे। इसके अंतर्गत ‘अंधा युग: एक समीक्षा’ इनका एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक निबंध है, जिसमें इसके सामाजिक पक्ष पर प्रकाश डाला गया है।
‘मैं जो कुछ भी देखता हूँ’: यह आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह है जिसके अंतर्गत जटिल क्षणों के यथार्थ रेखाचित्र उपस्थित किए गए हैं।
लू सन की कहानियाँ: इस आलोचनात्मक निबंध में मुक्तिबोध ने चीनी लेखक ‘लू सन’ की कहानियों की गहरी समीक्षा की है।
एक साहित्यिक की डायरी: जबलपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘वसुधा’ में 1957, 1958 और 1960 में यह डायरी प्रकाशित हुई। ‘वसुधा’ पत्रिका में चले इस स्तंभ के कुल 13 प्रकरण हैं।
कामायनी एक पुनर्विचार: यह आलोचनात्मक ग्रंथ ‘हंस’ और ‘आलोचना’ पत्रिका में 1940 के दशक में प्रकाशित हुआ। इसमें कुल 13 अध्याय हैं और इसमें ‘फैंटेसी’ (Fantasy) तकनीक का भरपूर प्रयोग किया गया है।
नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र: मुक्तिबोध के पुत्र रमेश गजानन मुक्तिबोध ने 1981 में इसे संपादित कर प्रकाशित करवाया। इसी ग्रंथ में मुक्तिबोध ने यह प्रसिद्ध परिभाषा दी है— “कलाकृति को जीवन की पुनर्रचना कहा है।”
3. कहानी संग्रह
काठ का सपना (1967 ई.): इसमें कुल 11 कहानियाँ संग्रहित हैं।
क्लोड ईथरली: यह इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी है, जिसमें आधुनिक सभ्यता का भयावह और यांत्रिक रूप दिखाया गया है।
पक्षी और दीमक: इसमें व्यक्ति-स्वतंत्रता पर विशेष जोर दिया गया है।
विपात्र: यह मुक्तिबोध की सबसे महत्वपूर्ण कहानी (लघु उपन्यास, लंबी कहानी और निबंध का मिश्रण) है, जिसमें मध्यमवर्गीय विडंबना को गहराई से दर्शाया गया है।
सतह से उठता आदमी: यह उनका दूसरा कहानी संग्रह है, जिसमें ‘जिंदगी की खतरनाक’, ‘भूत के उपचार’, और ‘समझौता’ जैसी मूल्यवान कहानियाँ संकलित हैं।
4. विवादित एवं चर्चित कृति
भारत इतिहास और संस्कृति: यह मुक्तिबोध की एक सर्वश्रेष्ठ, बहुचर्चित और विवादित कृति है, जिसे मध्य प्रदेश शासन द्वारा “भद्रता और नैतिकता के विरुद्ध” ठहराया गया था और इस पुस्तक पर मुकदमा भी चला था।
🌟 मुक्तिबोध को प्राप्त पदवियाँ एवं उपाधियाँ
“मुक्तिबोध स्वाधीनता भारत का इस्पाती ढाँचा है।” — शमशेर बहादुर सिंह
तीव्र इंद्रिय बोध का कवि
भयानक खबरों का कवि
फैंटेसी का कवि
🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि
क्र.सं. लेखक / कवि का नाम मुख्य विशेषता / काल इंटरनल लिंक (URL) 1. भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युग लिंक देखें(उदाहरण यूआरएल) 2. महावीर प्रसाद द्विवेदी द्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकार लिंक देखें 3. जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककार लिंक देखें 4. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेता लिंक देखें 5. सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि / छायावाद लिंक देखें 6. महादेवी वर्मा आधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्री लिंक देखें 7. प्रेमचंद (धनपत राय) उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुष लिंक देखें 8. अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक लिंक देखें 9. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कवि लिंक देखें 10. कृष्णा सोबती आधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर लिंक देखें


Bahut hi gyanvardhak jankariya saral shabdo me mil jati hai, aise hi nit nai jankariya preshit karte rahe, apka bahut bahut aabhar
जी बिल्कुल
आपका बहुत- बहुत धन्यवाद! बहुत ही सरल शब्दों में विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की है।
जी धन्यवाद
बहुत बहुत धन्यवाद सर जी
सर अगर आपका कोई टेलीग्राम चैनल हो तो उसे उपलब्ध करना की कृपा करें।
Really a deeply knowledge…..