हिन्दी मुहावरे hindi muhavare

हिन्दी मुहावरे hindi muhavare

मुहावरे तथा लोकोक्तियाँ
मुहावरा:- मुहावरा बात कहने की एक शैली है। यह अरबी भाषा क ‘मुहावर’ शब्द से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- ‘अभ्यास करना’ या ‘बातचीत’
‘लक्षणा व व्यंजना द्वारा वह सिद्ध वाक्य जो किसी बोली जाने वाली भाषा में प्रचलित हो कर रूढ़ हो गया हो तथा प्रत्यक्ष अर्थ के बजाय सांकेतिक अर्थ देता हो’, ‘मुहावरा’ कहलाता है।
जैसे:- खिचड़ी पकाना, लाठी खाना, नाम धरना आदि।
मुहावरों की निम्न विशेषताएँ होती है:-
1. मुहावरों का शाब्दिक अर्थ नहीं, बल्कि सांकेतिक अवबोधक अर्थ लिया जाता है। जैसे ‘खिचड़ी पकाना’ इसका शाब्दिक अर्थ होगा- खिचड़ी बनाना, परन्तु मुहावरे के रूप में सांकेतिक अर्थ होगा-षड्यंत्र करना।
2. मुहावरे का अर्थ प्रसंग के अनुसार होता है, जैसे- लडाई में खेत आना’ इसका अर्थ है ‘युद्ध में शहीद हो जाना’ न कि लड़ाई के स्थान पर किसी खेत का चले आना।
3. मुहावरे का मूल रूप कभी  नहीं बदलता अर्थात् मुहावरे का स्वरूप स्थिर होता है, अन्यथा मुहावरा नष्ट हो जाता। जैसेः ‘कमर टूटना’ एक मुहावरा है इसके स्थान पर ‘कटि  भंग’ शब्द का प्रयोग नहीं किया जा सकता।
4. हिन्दी के अधिकांश मुहावरों का सीधा संबंध शरीर के विभिन्न अंगों यथा- मुँह, कान, नाक, हाथ, पाँव, आँख, सिर आदि से होता है, जैसे-मुँह की खाना, कान खड़े होना।
5. मुहावरा भाषा की समृद्धि तथा सभ्यता के विकास का मापक होता है।

मुहावरों का महत्त्व:-
1. भाषा को सजीव बनातें है।
2. कथन को प्राणयुक्त एंव प्रभावपूर्ण बनातें है।
3. भाषा में सरलता एवं सरसता उत्पन्न करतें है।
4. भाषा में प्रवाह व चमत्कार उत्पन्न करते है।
5. भाषा को समृद्ध बनातें है।
मुहावरों के प्रयोग में सावधानियाँ:-
1. पहले मुहावरा फिर उसका अर्थ तथा अगली लाइन से वाक्य प्रयोग करना चाहिए,
जैसे:- बात का धनी – वायदे का पक्का।
वाक्य प्रयोग – मैं जानता हूँ कि वह बात का धनी है।
2. मुहावरे का वाक्य प्रयोग करते समय तुलना नहीं करनी चाहिए,
जैसे:- के समान, की तरह, के जैसा आदि शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
यथा:- अँधे की लकड़ी – एक मात्र सहारा
वाक्य प्रयोग – अपने वृद्ध माता-पिता का एक मात्र संतान मोहन उनके लिए अँधे की लकड़ी है।
3. मुहावरों को कहीं भी डाल देना गलत है, बल्कि कारण बताते हुए कार्य बताना है।
4. घिसे-पिटे वाक्य प्रयोग से बचना चाहिए। (पाक, चीन)
5. वाक्य प्रयोग का संदर्भ तथा संभव छोटा रहना चाहिए।
6. वाक्य प्रयोग में मुहावरे का प्रयोग करना होता है न कि उसके अर्थ का।
7. मुहावरे को एक वाक्य में लिखना चाहिए।
जैसे:- टेढ़ी खीर होना – कठिन काम होना
वाक्य प्रयोग – अपने देश में भ्रष्टाचार की जड़े इतनी गहरी हो गई है कि इसे खत्म करना टेढ़ी खीर हो गई है।
लोकोक्तियाँ/कहावतें:- लोकोक्ति का अर्थ है ‘लोक समाज में कही जाने वाली उक्तियाँ’ तथा कहावत का अर्थ है-‘कही जानें वाली बात’।
ऐसा वाक्य जो चमत्कृत ढंग से संक्षेप में, किसी सत्य या निधि का आशय, सशक्त रूप से व्यक्त करे तथा अधिक समय तक प्रयोग में आकर जन जीवन में प्रचालित हो गया हो, लोकोक्ति/कहावत कहलाता है।
लोकोक्तियों/कहावतों की निम्न विशेषताएँ होतीं है:-
1. लोकोक्तियाँ/कहावतें प्रत्यक्ष अर्थ नहीं सांकेतिक अर्थ देतें है।
2. लोकोक्तियों/कहावतों में जीवन के गहरे तथा मूल्यवान अनुभव छिपे रहतें हैं, इसलिए इन्हें ‘ज्ञान की पिटारियाँ’ कहा जाता है।
3. लोकोक्तियाँ/कहावतें एक व्यक्ति से संबंधित न होकर ‘जन साधारण की घरोहरें’ होती है।
लोकोक्तियों/कहावतों का महत्त्व:-
1. बोली को अधिक प्रमाणिक तथा जोरदार बनाती है।
2. भाषा स्पष्ट तथा जीवन्त से उठती है।
3. भाषा को सुन्दर बनाने के साथ-साथ जीवन को सीख भी देतें है।
4. इनमें गहरे व मूल्यवान अनुभव दिये रहतें है।
5. अलंकार शास्त्र में ‘लोकोक्ति अलंकार’ नाम से प्रसिद्ध होता है।

लोकोक्तियों/कहावतों के प्रयोग में सावधानियाँ:-
1. कहावतों का वाक्य प्रयोग ढाई से तीन लाइन में देना चाहिए।
2. पहले प्रकरण देना है फिर कहावत। प्रकरण ऐसा होना चाहिए जो कहावत सिद्ध करें।
3. प्रकरण समाप्त होनें पर – ठीक ही कहा गया है
यह तो वही बात हुई
यहाँ यह बात चरितार्थ होती है, आदि शब्दों का प्रयोग करते हुए कहावतों को जोड़ना चाहिए।
मुहावरा तथा लोकोक्ति की पहचान:-
1. 95 प्रतिशत मुहावरों के अन्त में ‘ना’ आता है।
2. मुहावरों के अन्त में क्रिया होती है।
3. 95 प्रतिशत मुहावरों का संबंध शरीर के विभिन्न अंगों से होता है।
4. मुहावरे छोटे होतें है, लोकोक्तियाँ बड़ी होती है।
5. लोकोक्तियों/कहावतों में कोई न कोई शिक्षा होती है।

 

मुहावरा तथा लोकोक्ति में अन्तर
क्र.स. मुहावरा लोकोक्ति
1. मुहावरे वाक्यांश है। लोकोक्ति पूर्ण वाक्य है।
2. मुहावरो  का स्वतंत्र प्रयोग नहीं हो सकता कहावतों का स्वतंत्र प्रयोग होता है।
3. मुहावरों का अर्थ बिना वाक्य प्रयोग के स्पष्ट नहीं होता लोकोक्तियाँ अपने आप में अर्थपूर्ण होतीं है।
4. मुहावरा एक पक्षीय होता है। लोकोक्तियाँ भाषा को सुन्दर बनानें के साथ-साथ कोई न कोई सीख/शिक्षा भी देती है।
5. मुहावरा छोटा होता है तथा भाव को उद्दीपित करता है। लोकोक्ति बड़ी होती है तथा स्वंय में भावपूर्ण होती है।
6. मुहावरों की क्रिया काल, वचन तथा लिंग के अनुसार बदल जाती है। लोकोक्तियों पर काल, वचन तथा लिंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात् जस की तस रहतीं है।
7. मुहावरा भाषा पर आधारित होता है। लोकोक्ति बोली पर आधारित होती है।
8. मुहावरों का प्रयोग अपेक्षाकृत पढ़ा-लिखा समास अधिक करता है। लोकोक्तियों का प्रयोग अपेक्षाकृत ग्रामीण समास में अधिक होता है।
9. ये मुख्यतः गद्य रूप में होतें हैं तथा सामान्यतः मौखिक के साथ-साथ लिखित रूप में प्रयुक्त होतें हैं। ये मुख्यतः पद्य रूप में होते हैं तथा सामान्यतः मौखिक रूप में अधिक प्रयुक्त होतें है।
10. मुहावरों के उद्भव व विकास की दिशा ऊपर से नीचंे की ओर होती है। लोकोक्तियों के उद्भव व विकास की दिशा नीचे से ऊपर की ओर होती है।

मुहावरे

1. अंक भरना (स्नेह से लिपटा लेना) – माँ ने देखते ही बेटी को अंक भर लिया।
2. अंग टूटना (थकान का दर्द) – इतना काम करना पड़ा कि आज अंग टूट रहे हैं।
3. अंगार बनना (लाल होना, क्रुद्ध होना) – कमजोर लोग ही छोटी बात पर अंगार हो उठते हैं या बनते हैं, सयाने नहीं।
4. अंगारों पर पैर रखना (जान-बूझकर हानिकारक कार्य करना) – अपने बाप के अकेले बेटे हो। इस तरह अंगारों पर पैर न रखो।
5. अंगारों पर लोटना (डाह होना, दुःख सहना) – वह उसकी तरक्की देखते ही अंगारों पर लोटने लगा। मैं जीवन भर अंगारों पर लोटता रहा हूँ।
6. अँगूठा दिखाना (समय पर धोखा देना) – अपना काम तो निकाल लिया, पर जब मुझे जरूरत पड़ी, तब अँगूठा दिखा दिया। भला, यह भी कोई मित्र का लक्षण है!
7. अँचरा पसारना (माँगना, याचना करना) – हे देवी मैया, अपने बीमार बेटे के लिए आपके आगे अँचरा पसारती हूँ। उसे भला-चंगा कर दो, माँ!
8. अंटी मारना (चाल चलना) – ऐसी अंटी मारो कि बच्चू चारों खाने चित गिरें।
9. अंड-वंड कहना (भला-बुरा या अंट-संट कहना) – क्या अंड-बंड कहे जा रहे हो। वह सुन लेगा, तो कचूमर ही निकाल छोड़ेगा।
10. अंधाधुंध लुटाना (बिना विचारे व्यय) – अपनी कमाई भी कोई अंधाधुंध लुटाता है ?
11. अंधा बनना (आगेे-पीछे कुछ न देखना) – धर्म से प्रेम करो, पर उसके पीछे अंधा बनने से तो दुनिया नहीं चलती।
12. अंधा बनाना (धोखा देना) – मायामृग ने रामजी तक को अंधा बनाया था। इस माया के पीछे मौजीलाल अंधे बने तो क्या!
13. अंधा होना (विवेकभ्रष्ट होना) – अंधे हो गए हो क्या! जवान बेटे के सामने यह क्या जो-सो बके जा रहे हो ?
14. अंधे की लकड़ी (एक ही सहारा) – भाई, अब तो यही एक बेटा बचा, जो मुझ अंधे की लकड़ी है। इसे परदेश न जाने दूँगा।
15. अंधेरखाता (अन्याय) – मुँहमाँगा दो, फिर भी चीज खराब। यह कैसा अंधेरखाता है।
16. अंधेरनगरी (जहाँ धाँधली का बोलबाला हो) – अठन्नी का सिक्का था, तो चाय अठन्नी में मिलती थी, एक रुपया का निकला, तो एक रुपया में मिलने लगी। यह बाजार नहीं, अंधेरनगरी ही है।
17. अकेला दम (अकेला) – मेरा क्या! अकेला दम हूँ; जिधर सींग समाएगा, चल दूँगा।
18. अक्ल पर पत्थर पड़ना (बुद्धिभ्रष्ट होना) – विद्वान और वीर होकर भी रावण की अक्ल पर पत्थर ही पड़ गया था कि उसने राम की पत्नी का अपहरण किया।
19. अक्ल की दुम (अपने को बड़ा होशियार समझनेवाला) – दस तक का पहाड़ा भी तो आता नहीं, मगर अक्ल की दुम गणित का पंडित बनता है।
20. अगले जमाने का आदमी (सीधा-सादा, ईमानदार) – आज की दुनिया ऐसी हो गई कि अगले जमाने का आदमी बुद्धू समझा जाता है।
21. अड़ियल टट्टू (अटक-अटककर या मूँह जोहकर काम करनेवाला) – ऐसा अड़ियल टट्टू है वह मुनीम कि कहो तभी कुछ करेगा, नहीं तो सारा काम ठप।
22. अढ़ाई दिन की हुकूमत (कुछ दिनों की शानोशौकत) – जनाब, जरा होशियारी से काम लें। यह अढ़ाई दिन की हुकूमत जाती रहेगी।
23. अन्न-जल उठन (रहने का संयोग न होना, मरना) – मालूम होता है कि तुम्हारा यहाँ से अन्न-जल उठ गया है, जो सबसे बिगाड़ किए रहते हो।
24. अन्न-जल करना (जलपान, नाराजगी आदि के कारण निराहार के बाद आहार-ग्रहण) – भाई, बहुत दिनों पर आए हो। अन्न-जल तो करते जाओ।
25. अन्न लगना (स्वस्थ रहना) – उसे ससुराल का ही अन्न लगता है। इसलिए तो वह वहीं का हो गया।
26. अपना उल्लू सीधा करना (अपना काम निकालना) – अपना उल्लू सीधा करना हो, तो गधे तक को बाप कहो।
27. अपना किया पाना (कर्म का फल भोगना) – बेहूदों को जब मुँह लगाया है, तो अपना किया पाओ। झखते क्या हो ?
28. अपना-सा मुँह लेकर रह जाना (शार्मिंदा होना) आज-मैंने ऐसी चुभती बात कही कि वे अपना-सा मुँह लिए रह गए।
29. अपनी खिचड़ी अलग पकाना (स्वार्थी होना, अलग रहना) – यदि सभी अपनी खिचड़ी अलग पकाने लगें, तो देश और समाज की उन्नति होने से रही।
30. अपने पाँव आप कुल्हाड़ी मारना (संकट मोल लेना) – उससे तकरार कर तुमने अपने पाँव आप कुल्हाड़ी मारी है।
31. अपने पैरों खड़ा होना (स्वावलंबी होना) – अपनी तरक्की के लिए अपने पैरों खड़े होना जरूरी है।
32. अपने मुँह मियाँ मिट्ठू होना (अपनी बड़ाई आप करना) – जो योग्य होते हैं, उनकी प्रशंसा दूसरे करते ही हैं। वे अपने मुँह मियाँ मिट्ठू नहीं बनते।
33. अब-तब करना (बहाना करना) – कोई भी चीज माँगो, वह अब-तब करना शुरू कर देगा।
34. आँच न आने देना (जरा भी कष्ट या दोष न आने देना) – तुम निश्ंिचत रहो। तुमपर आँच न आने दूँगा।
35. आठ-आठ आँसू रोना (बुरी तरह पछताना) – इस उम्र में न पढ़ा, तो आठ-आठ आँसू रोना पड़ेगा।
36. आसन डोलना (लुब्ध या विचलित होना) – धन के आगे ईमान का भी आसन डोल जाया करता है।
37. आस्तीन का साँप (कपटी मित्र) – उससे सावधान रहो। आस्तीन का साँप है वह।
38. आसमान टूट पड़ना (गजब का संकट पड़ना) – पाँच लोगों को खिलाने-पिलाने में ऐसा क्या आसमान टूट पड़ा कि तुम सारा घर सिर पर उठाए हो ?
39. ईंट-से-ईंट बजाना (युद्धात्मक विनाश लाना) – शुरू मंे तो हिटलर ने यूरोप में ईंट-से-ईंट बजा छोड़ी, मगर बाद में खुद उसकी ईंटे बजने लगीं।
40. ईंट से जवाब पत्थर से देना (किसी की दुष्टता का करारा जवाब देना) – ऐसे दुश्मनों की ईंट का जवाब हम पत्थर से देते हैं।
41. ईद का चाँद होना (बहुत दिनों पर दिखना) – तुम्हें देखने को तरस गया, तुम तो ईद के चाँद हो गए।
42. उगल देना (गुप्त बात प्रकट करना) – कोतवाल से डरकर चोर ने सारी बात उगल दी।
43. उठा न रखना (कसर न छोड़ना) – मैं तुम्हारी नौकरी के लिए कुछ न उठा रखूँगा।
44. उलटी गंगा बहाना (प्रतिकूल कार्य) – ईश्वर और जीव में प्रेमी और प्र्रेमिका-जैसे संबंध की सूफियोंवाली कल्पना उलटी गंगा बहाना है। हमारा साहित्य भगवान और भक्त में पिता और पुत्र-जैसा ही संबंध मानता रहा है।
45. उड़ती चिड़िया पहचानना (मन की या रहस्य की बात ताड़ना) – कोई मुझे धोखा नहीं दे सकता। मैं उड़ती चिड़िया पहचान लेता हूँ।
46. उन्नीस-वीस होना (एक का दूसरे से कुछ अच्छा होना) – दोनों गायें बस उन्नीस-बीस हैं।
47. एक आँख से देखना (बराबर मानना) – प्रजातंत्र वह शासन है जहाँ कानून, मजदूरी, अवसर इत्यादि सभी मामले में सदस्यों को एक आँख से देखा जाता है।
48. एक लाठी से सबको हाँकना (उचित-अनुचित का बिना विचार किए व्यवहार) – समानता का अर्थ एक लाठी से सबको हाँकना नहीं है, बल्कि सबको समान अवसर और जीवन-मूल्य देना है।
49. कल पड़ना (चैन मिलना) – कल रात वर्षा हुई, तो थोड़ी कल पड़ी।
50. किरकिरा होना (विघ्न आना) – जलसे में अनके शरीक न होने से सारा मजा किरकिरा हो गया।
51. किस मर्ज की दवा (किस काम के) – चाहते हो चपरासीगीरी और साइकिल चलाओगे नहीं। आखिर तुम किस मर्ज की दवा हो ?
52. कोसों दूर भागना (बहुत अलग रहना) – भाँग की क्या बात, मैं तो बीड़ी के घुएँ तक से कोसों दूर भागता हूँ।
53. कलेजे पर साँप लोटना (कुढ़ना, डाह करना) – जो सब तरह से भरा पूरा है, दूसरे की उन्नति पर उसके कलेजे पर साँप क्यों लोटे!
54. कलेजा ठंडा होना (संतोष होना) – बड़ी बहू जब मरी, तब सौत का कलेजा ठंडा हुआ।
55. कागजी घोड़े दौड़ना (केवल लिखा-पढ़ी करना, पर कुछ काम की बात न होना) – आजकल सरकारी दफ्तर में सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ते हैं, होता-जाता कुछ नहीं।
56. कुत्ते की मौत मरना (बुरी तरह मरना) – कंस की किस्मत ही ऐसी थी। कुत्ते की मौत मरा तो क्या !
57. किताब का कीड़ा होना (पढ़ने के सिवा कुछ न करना) – विद्यार्थी का अर्थ किताब का कीड़ा होना नहीं, बल्कि स्वस्थ शरीर और उन्नत मस्तिष्कवाला होनहार युवक होना है।
58. कलम तोड़ना (बढ़िया लिखना) – वाह! क्या अच्छा लिखा है! तुमने तो कलम तोड़ दी।
59. काँटा निकलना (बाधा दूर होना) – उस बेईमान से पल्ला छूटा। चलो, काँटा निकला।
60. कागज काला करना (बिना मतलब कुछ लिखना) – वारिसशाह ने अपनी ‘हीर’ के शुरू में ही प्रार्थना की है-रहस्य की बात लिखनेवालों का साथ दो, कागज काला करनेवालों का नहीं।
61. किस खेत की मूली (अधिकारहीन, शक्तिहीन) – मेरे सामने तो बड़ों-बड़ों को झुकना पड़ा है। तुम किस खेत की मूली हो ?
62. कुआँ खोदना (हानि पहुँचाने का यत्न करना) – जो दूसरों के लिए कुआँ खोदता है उसमें वह खुद गिरता है।
63. खरी-खोटी सुनान (भला-बुरा कहना) – कितनी खरी-खोटी सुना चुका हूँ, मगर वह बेकहा माने तब तो ?
64. खरी-खरी सुनाना (कटु सत्य कहना) – मैंने उसे वह खरी-खरी सुनाई कि वह अपनी सारी हेकड़ी भूल गया।
65. खून-पसीना एक करना (कठिन परिश्रम करना) – बाप ने खून-पसीना एक कर पढ़ाया और साहबजादे कमाने लगे, तो उसी बाप को दूध की मक्खी कर बैठे।
66. खटाई में पड़ना (झमेले में पड़ना, रुक जाना) – बात यह थी, लेकिन ऐन मौके पर उसके मुकर जाने से सारा काम खटाई में पड़ गया।
67. खाक छानना (भटकना) – नौकरी की खोज में वह खाक छानता रहा।
68. खेल खेलाना (परेशान करना) – खेल खेलाना छोड़ो और साफ-साफ कहो कि तुम्हारा इरादा क्या है।
69. गाल बजाना (डींग हाँकना) – जो करता है, वही जानता है। गाल बजानेवाले क्या जानें ?
70. गिन-गिनकर पैर रखना (सुस्त चलना, हद से ज्यादा सावधानी बरतना) – माना कि थक गए हो, मगर गिन-गिनकर पैर क्या रख रहे हो ? शाम के पहले घर पहुँचना है या नहीं ?
71. गुस्सा पीना (क्रोध दबाना) – गुस्सा पीकर रह गया। चाचा का वह मुँहलगा न होता, तो उसकी गत बना छोड़ता।
72. गला छूटना (पिंड छूटना) – उस कंजूस की दोस्ती टूट ही जाती, तो गला छूटता।
73. गिरगिट की तरह रंग बदलना (एक रंग-ढंग पर न रहना) – उसका क्या भरोसा। वह तो गिरगिट की तरह रंग बदलता है।
74. गूलर का फूल होना (लापता होना) – वह तो ऐसा गूलर का फूल हो गया है कि उसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है।
75. गड़े मुर्दे उखाड़ना (दबी हुई बात फिर से उभारना) – जो हुआ सो हुआ, अब गड़े मुर्दे उखाड़ने से क्या लाभ ?
76. गाँठ का पूरा (मालदार) – धूर्त नौकरों को अक्ल का अंधा, गाँठ का पूरा मालिक बहुत पंसद आता है।
77. गाँ में बाँधना (खूब याद रखना) – यह बात गाँठ में बाँध लो, तंदुरुस्ती रही, तो सब रहेगा।
78. गुदड़ी का लाल (गरीब के घर में गुणवान का उत्पन्न होना) अपने वंश में प्रेमचंद सचमुच गुदड़ी के लाल थे।
79. घोड़े बेचकर सोना (बेफिक्र होना) – बेटी तो ब्याह दी। अब क्या, घोड़े बेचकर सोओ।
80. घड़ों पानी पड़ जाना (अत्यंत लज्जित होना) – वह हमेशा वर्ग में प्रथम होता था, मगर इस बार परीक्षा में चोरी करते समय रँगे हाथ पकड़े जाने पर बच्चू पर घड़ों पानी पड़ गया।
81. घी के दीये जलाना (अप्रत्याशित लाभ पर प्रसन्नता) – जिससे तुम्हारी बराबर उनती रही, वह बेचारा कल शाम कूच कर गया। अब क्या है, घी के दीये जलाओ।
82. घर बसाना (विवाह करना) – उसने घर क्या बसाया, बाहर निकलता ही नहीं।
83. घर का न घाट का (कहीं का नहीं) – कोई काम आता नहीं और न लगन ही है कि कुछ सीखे-पढ़े। ऐसा घर का न घाट का जिए तो कैसे जिए!
84. घात लगाना (मौका ताकना) – वह चोर दरवान इसी दिन के लिए तो घात लगाए था, वरना विश्वास का ऐसा रँगीला नाटक खेलकर सेठ की तिजोरी-चाबी तक कैसे पहुँच पाता ?
85. चल बसना (मरना, खत्म होना) – बेचारे का बेटा भरी जवानी में चल बसा।
86. चार दिन की चाँदनी (थोड़े दिन का सुख) – राजा बलि का सारा बल भी जब चार दिन की चाँदनी ही रहा, तो तुम किस खेत की मूली हो ?
87. चींटी के पर लगना या जमना (विनाश के लक्षण प्रकट होना) – इसे चींटी के पर जमना ही कहेंगे कि अवतारी राम से रावण बुरी तरह पेश आया।
88. चूँ न करना (सह जाना, जवाब न देना) – वह जीवनभर सारे दुःख सहता रहा, पर चूँ तक न की।
89. चंडूखाने की गप (बहकी या बेतुकी बातें करना) – तुम जो कह गए, वह चंडूखाने की गप के सिवा और क्या है ?
90. चादर से बाहर पैर पसारना (आय से अधिक व्यय करना) – डेढ़ सौ ही कमाते हो और इतनी खर्चीली लतें पाल रखी हैं। चादर के बाहर पैर पसारना कौन-सी अक्लमंदी है ?
91. चाँद पर थूकना (व्यर्थ निंदा या सम्माननीय का अनादर करना) – जिस भलेमानस ने कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा, उसे ही तुम बुरा-भला कह रहे हो ? भला, चाँद पर भी थूका जाता है ?
92. चिराग तले अँधेरा (पंडित के घर में घोर मूर्खता का आचरण) – पंडितजी स्वयं तो बड़े विद्वान हैं, किंतु उनके लड़के को चिराग तले अँधेरा ही जानो।
93. चूड़ियाँ पहनना (स्त्री की सी असमर्थता प्रकट करना) – इतने अपमान पर भी चुप बैठे हो। चुड़ियाँ तो नहीं पहन रखी है तुमने ?
94. चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना (डरना, घबराना) – साम्यवाद का नाम सुनते ही पूँजीपतियों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगती हैं।
95. छप्पर फाड़कर देना (अचानक या बिना परिश्रम के संपन्न करना) – भगवान देता है, तो छप्पर फाड़कर देता है।
96. छक्के छूटना (बुरी तरह पराजित होना) – महाराजकुमार विजयनगरम् की विकेट-कीपरी में अच्छे-अच्छे बाॅलर के छक्के छूट चुके हैं।
97. जल-भुनकर खाक हो जाना (क्रोध से पागल होना) – तुम तो जरा-सी बात पर जल-भुनकर खाक हुए जा रहे हो।
98. जहर उगलना (अपमानजनक बात कहना) – आजकल की चुनाव सभाओं में पार्टियाँ अपना कार्यक्रम बताती नहीं, अधिकतर अपने विरोधी उम्मीदवार के खिलाफ जहर उगलने का ही काम किया करती हैं।
99. जीती मक्खी निगलना (जानबूझकर कुछ अशोभन या अभद्र करना) – उस बेकसूर के खिलाफ गवाही ? मुझसे यह जीती मक्खी नहीं निगली जाएगी।
100. जूते चाटना (चापलूसी करना) – अफसरों के जूते चाटते-चाटते वह थक गया, मगर कोई फल न निकला।
101. जमीन पर पैर न पड़ना (अधिक घमंड करना) – अधिकार पाकर आज हमारे नेताओं के पैर जमीन पर
नहीं पड़ते।
102. जान पर खेलना (साहसिक कार्य करना) – हम जान पर खेलकर भी अपने देश की रक्षा करेंगे।
103. टका-सा मुँह लेकर रहना (शर्मिंदा होना) – जादूगर की पोल खुली कि वह टका-सा मुँह लेकर रह गया।
104. टट्टी की ओट में शिकार खेलना (छिपे तौर पर किसी के विरुद्ध कुछ करना) – भिड़ना ही हो, तो सामने आओ। टट्टी की ओट में शिकार क्या खेलते हो ?
105. टाँग अड़ाना (अड़चन डालना) – हर बात में टाँग की अड़ाते हो या कुछ आता भी है तुम्हें ?
106. टाट उलटना (दिवाला निकलना) – जब उसका टाट उलटा, तो रकम डूबी ही समझो।
107. तूती बोलना (प्रभाव जमाना) – आजकल तो आपकी ही तूती बोल रही है।
108. तोते की तरह आँखें फेरना (बेमुरव्वत होना) – कितना ही किसी का भला करो, वह तोते की तरह आँखे फेर ही लेगा। भैया, जमाना ही ऐसा है।
109. तीन तेरह होना (तितर-बितर होना) – यों तो आपसी मतभेद था ही, श्रीकृष्ण के आँखे मूँदते ही रहा-सहा यदुकुल और भी तीन-तेरह हो गया।
110. तिल का ताड़ करना (बात को तूल देना) – मैंने उसे सिर्फ बेहूदा कहा, मगर मुहल्लेवालों ने यह तिल का ताड़ कर दिया कि मैंने उसे दुनियाभर की गालियाँ दीं।
111. दौड़धूप करना (बड़ी कोशिश करना) – कौन बाप अपनी बेटी के ब्याह के लिए दौड़धूप नहीं करता ?
112. दो कौड़ी का आदमी (तुच्छ या अविश्वसनीय व्यक्ति) – किस दो कौड़ी के आदमी की बात करते हो ?
113. दिन दूना रात चैगुना (खूब उन्नति) – योजनओं के चलते ही देश का विकास दिन दूना रात चैगुना हुआ।
114. दो टूक बात कहना (स्पष्ट कह देना) – अंगद ने रावण से दो टूक बात की। दूत हो तो ऐसा!
115. दो दिन का मेहमान (जल्द मरनेवाला) – किसी का क्या बिगाड़ेगा ? वह बेचारा तो खुद दो दिन का मेहमान है।
116. दूध के दाँत न टूटना (ज्ञानहीन या अनुभवहीन) – वह सभा में क्या बोलेगा ? अभी तो उसके दूध के दाँत भी नहीं टूटे हैं।
117. धज्जियाँ उड़ाना (किसी के दोषों को चुन-चुनकर गिनाना) – उसने उनलोगों की धज्जियाँ उड़ाना शुरू किया कि वे वहाँ से भाग खड़े हुए।
118. निनानवे का फेर (धन जोड़ने का बुरा लालच) – जेठमल निनानवे के फेर में दोपहर को दतुअन करता है, तो तीसरे पहर नाश्ता।
119. नौ-दो ग्यारह होना (चंपत होना) – लोग दौड़े कि चोर नौ-दो ग्यारह हो गए।
120. न इधर का, न उधर का (कहीं का नहीं) – कंबख्त ने न पढ़ा, न बाप की दस्तकारी सीखी; न इधर का रहा, न उधर का।
121. नाच नचाना (तंग करना) – यह नाच नचाना ठीक नहीं। आज तुम्हें दो टूक कह ही देना होगा।
122. पेट में चूहे कूदना (जोर की भूख लगना) – पेट में चूहे कूछ रहे हैं। पहले कुछ खा लूँ, तब तुम्हारी सुनूँगा।
123. पट्टी पढ़ाना (बुरी राय देना) – तुमने मेरे बेटे को कैसी पट्टी पढ़ाई कि वह घर जाता ही नहीं ?
124. पहाड़ टूट पड़ना (भारी विपत्ति आना) – उस बेचारे पर तो दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा।
125. पौ बारह होना (खूब लाभ होना) – क्या पूछना है! आजकल तुम व्यापारियों के ही तो पौ बारह हैं।
126. पाँचों उँगलियाँ घी में (पूरे लाभ में) – पिछड़े देशों में गरीबों और मेहनतकशों की हालत पतली रहती है तथा दलालों, कमीशन एजेंटों और नौकरशाहों की ही पाँचों उँगलियाँ घी में रहती हैं।
127. पगड़ी रखना (इज्जत बचाना) – हल्दीघाटी में झाला सरदार ने राजपूतों की पगड़ी रख ली।
128. फूलना-फलना (धनवान या कुलवान होना) – मेरा आशीर्वाद है; सदा फूलो-फलो।
129. बरस पड़ना (क्रोध में आना) – गलती न जाने किसकी थी और वह बरस पड़ा मुझ पर!
130. बाँसों उछलना (बहुत खुशी होना) – परीक्षा में सफलता का समाचार पाकर वह बाँसों उछल रहा है।
131. बाजी ले जाना या मारना (जीतना, आगे निकल जाना) – देखें, दौड़ में कौन बाजी ले जाता या मारता है।
132. बट्टा लगाना (कलंक लगाना) – शराब पीकर तुमने अपने धर्मात्मा पिता के नाम पर बट्टा लगा दिया।
133. बाजार गर्म होना (बोलबाला, काम में तेजी) – आजकल जात-पाँत का बाजार इतना गर्म है कि जिस दल को देखो, इसी आधार पर अपने उम्मीदवार खड़ा करता है।
134. बाँछें खिलना (अत्यंत प्रसन्न होना) – इस बार उसे लड़का हुआ है। तभी तो उसकी बाँछें खिली हुई हैं।
135. भाड़े का टट्टू (पैसे का गुलाम) – ये भाड़े के टट्टू क्या बिगाड़ लेंगे ? एक-एक आएँ। अगर छठी का दूध न याद दिलाया, तो मेरा नाम नहीं।
136. भींगी बिल्ली बनना (डर से दबना, डर या आशंका से दुबकना) – क्या भींगी बिल्ली बने घर में घुसे हो? अगहन का जाड़ा भी कोई जाड़ा है कि टहलते ही तुम्हंे निमोनिया धर दबाए ?
137. मक्खियाँ मारना (बेकार बैठे रहना) – आजकल पढ़े-लिखे लोग जब मक्खियाँ मार रहे हैं, तब जिसे कुछ नहीं आत उसका क्या कहना।
138. मैदान मारना (बाजी या लड़ाई जीतना) – पानीपत की लड़ाई मंे आखिर अब्दाली ने ही मैदान मारा।
139. मोटा असामी (मालदार) – रामलाल को बहुत दिनों बाद आज मोटा असामी हाथ लगा है।
140. मुट्ठी गरम करना (घूस देना) – पुलिस की मुट्ठी गरम करो, तो काम होगा।
141. रंग जमना (धाक जमना) – तुम्हारा तो कल खूब रंग जमा।
142. रंग लाना (प्रभाव उत्पन्न करना) – यह मामला एक-न-एक दिन रंग लाएगा।
143. रंग बदलना (परिवर्तन होना) – जमाने का रंग बदल गया है।
144. रास्ता देखना (इंतजार करना) – कल दुपहर मैं तुम्हारा रास्ता देखता रहा।
145. रोंगटे खड़े होना (चकित होना, भयभीत होना) – वह इतनी ऊँचाई से कूदा कि हमारे रोंगटे खड़े हो गए।
146. लकीर का फकीर होना (पुरानी प्रथा पर ही चलना) – ये अबतक लकीर के फकीर ही हैं। टेबुल पर नहीं, चैके में ही खाएँगे।
147. लोहा मानना (श्रेष्ठ समझना) – आज दुनिया भारतीय जवानों का लोहा मानती है।
148. लेने के देने पड़ना (लाभ के बदले हानि) – नया काम है। सोच-समझकर आगे बढ़ाना। कहीं लेने के देने न पड़ जाएँ।
149. श्रीगणेश करना (शुभारंभ करना) – कोई शुभ दिन देखकर किसी शुभ कर्म का श्रीगणेश करना चाहिए।
150. सफेद झूठ (सरासर झूठ) – यह सफेद झूठ है कि मैंने उसे गाली दी।
151. सर्द हो जाना (डरना, मरना) – बड़ा साहसी बनता था, पर भूत का नाम सुनते ही सर्द हो गया।
152. साँप-छछूँदर की हालता (दुविधा) – पिता अलग नाराज हैं, माँ अलग। किसे क्या कहकर मनाऊँ ? मेरी तो साँप-छछूँदर की हालत है इन दिनों।
153. समझ (अक्ल) पर पत्थर पड़ना (बुद्धि भ्रष्ट होना) – रावण की समझ पर पत्थर पड़ा था कि भला कहनेवालों को उसने लात मारी।
154. सिक्का जमना (प्रभाव जमना) – आज तुम्हारे भाषण का वह सिक्का जमा कि उसके बाद बाकी वक्ता जमे ही नहीं।
155. सवा सोलह आने सही (पूरे तौर पर ठीक) – राम की सेना में हनुमान इसलिए श्रेष्ठ माने जाते थे कि हर काम में वे ही सवा सोलह आने सही उतरते थे।
156. हाथ पैर मारना (काफी प्रयत्न करना) – दारासिंह की कैंची में आने के बाद बदिये अय्यूब कितना ही हाथ-पैर मारता रहा, मगर तभी छूटा, जब पुट्ठा उखड़ने पर रेफरी ने आकर कैंची छुड़वाई।
157. हाथ के तोते उड़ना (स्तब्ध होना) – सर्बिया पर हिटलर का आक्रमण क्या हुआ, मित्रराष्ट्रों के हाथ के तोते उड़ गए।
158. हथियार डाल देना (हार मान लेना) – जब कुछ करते न बना तो उसने हथियार डाल दिए।
159. हाथ मलना (पछताना) – मौका चूक जाने पर बेचारा हाथ मलता रह गया।
‘गर्दन’ पर मुहावरे
160. गर्दन उठाना (प्रतिवाद करना) – सत्तारूढ़ सरकार के विरोध में गर्दन उठाना टेढ़ी खीर है।
161. गर्दन पर सवार होना (पीछा न छोड़ना) – जब देखो, तब मेरी गर्दन पर सवार रहते हो।
162. गर्दन काटना (जान से मारना, हानि पहुँचाना) – वह तो उनकी गर्दन काट डालेगा। झूठी शिकायत कर क्यों गरीब की गर्दन काटने पर तुले हो ?
‘सिर’ पर मुहावरे
163. सिर उठाना (विरोध में खड़ा होना) – देखता हूँ, मेरे सामने कौन सिर उठाता है ?
164. सिर भारी होना (सिर में दर्द होना, शामत सवार होना) – मेरा सिर भारी हो रहा है। किसका सिर भारी हुआ है जो इसकी चर्चा करे ?
165. सिर पर सवार होना (पीछे पड़ना) – तुम कब तक मेरे सिर पर सवार रहोगे ?
166. सिर से पैर तक (आदि से अंत तक) – तुम्हारी जिंदगी सिर से पैर तक बुराइयों से भरी है।
167. सिर पीटना (शोक करना) – चोर उस बेचारे की पाई-पाई ले गए। सिर पीटकर रह गया वह।
168. सिर पर भूत सवार होना (एक ही रट लगाना, धुन सवार होना) – मालूम होता है कि धनश्याम के सिर पर भूत सवार हो गया है, जो वह जी-जान से इस काम में लगा है।
169. सिर फिर जाना (पागल हो जाना) – धन पाकर उसका सिर फिर गया है।
170. सिर चढ़ाना (शोख करना) – बच्चों को सिर चढ़ाना ठीक नहीं।
‘मुँह’ पर मुहावरे
171. मुँह छिपाना (लज्जित होना) – वह मुझसे मुँह छिपाए बैठा है।
172. मुँह पकड़ना (बोलने से रोकना) – लोकतंत्र में कोई किसी का मुँह नहीं पकड़ सकता।
173. मुँह की खाना (बुरी तरह हारना) – अंत में उसे मुँह की खानी पड़ी।
174. मुँह दिखाना (प्रत्यक्ष होना) – तुमने ऐसा कुकर्म किया है कि अब किसी के सामने मुँह दिखाने के लायक न रहे।
175. मुँह उतरना (उदास होना) – परीक्षा में असफल होने पर श्याम का मुँह उत्तर आया।
‘वात’ पर मुहावरे
176. बात का धनी (वायदे का पक्का) – मैं जानता हूँ, वह बात का धनी है।
177. बात की बात में (अतिशीघ्र) – बात की बात में वह चलता बना।
178. बात चलाना (चर्चा चलाना) – कृपया मेरी बेटी के ब्याह की बात चलाइएगा।
179. बात तक न पूछना (निरादर करना) – मैं विवाह के अवसर पर उसके यहाँ गया, पर उसने बात तक न पूछी।
180. बात बढ़ाना (बहस छिड़ जाना) – देखो, बात बढ़ाओगे तो ठीक न होगा।
181. बात बनाना (बहाना करना) – तुम्हें बात बनाने से फुर्सत कहाँ ?
‘दाँत’ पर मुहावरे
182. दाँत दिखाना (खीस काढ़ना) – खुद ही देर की और अब दाँत दिखाते हो।
183. दाँत तले उँगली दबाना (चकित होना) – ढाका का मलमल देखकर इंगलैंड के जुलाहे दाँतों तले उँगली दबाते थे।
184. दाँत काटी रोटी (गहरी दोस्ती) – राम के पिता से श्याम के पिता की दाँत काटी रोटी है।
185. दाँत गिनना (उम्र पता लगाना) – कुछ लोग ऐसे हैं कि उनपर वृद्धावस्था का असर ही नहीं होता। ऐसे लोगों के दाँत गिनना आसान नहीं।
‘कान’ पर मुहावरे
186. कान खोलना (सावधान करना) – मैंने उसके कान खोल दिए। अब वह किसी के चक्कर में नहीं आएगा।
187. कान खड़े होना (होशियार होना) – दुश्मनों के रंग-ढंग देखकर मेरे कान खड़े हो गए।
188. कान फूँकना (दीक्षा देना, बहकाना) – मोहन के कान ऊधो ने फूँके थे, फिर उसने किसी की कुछ न सुनी।
189. कान लगाना (ध्यान देना) – उसकी बातें कान लगाने योग्य हैं।
190. कान भरना (पीठ-पीछे शिकायत करना) – तुम बराबर मेरे खिलाफ अफसर के कान भरते हो।
191. कान में तेल डालना (कुछ न सुनना) – मैं कहते-कहते थक गया, पर ये कान में तेल डाले बैठे हैं।
192. कान पर जूँ न रेंगना (ध्यान न देना, अनसुनी करना) – सरकार तो बड़ी-बड़ी बातें कहती है, मगर अफसरों के कान पर जूँ नहीं रेंगती।
193. कान देना (ध्यान देना) – शिक्षकों की बातों का कान दीजिए।
‘नाक’ पर मुहावरे
194. नाक कट जाना (प्रतिष्ठा नष्ट होना) – पुत्र के कुकर्म से पिता की नाक कट गई।
195. नाक काटना (बदनाम करना) – भरी सभा में उसने मेरी नाक काट ली।
196. नाक-भौं चढ़ाना (क्रोध अथवा घृणा करना) – तुम ज्यादा नाक-भौं चढ़ाओगे, तो ठीक न होगा।
197. नाक में दम करना (परेशान करना) – शहर में कुछ गुंडो ने लोगों की नाक में दम कर रखा है।
198. नाक का बाल होना (अधिक प्यारा होना) – मैनेजर मुंशी की न सुनेगा तो किसी सुनेगा ? वह तो आजकल उनकी नाक का बाल बना हुआ है।
199. नाक रगड़ना (दीनतापूर्वक प्रार्थना करना) – उसने मालिक के सामने बहुत नाक रगड़ी, पर सुनवाई न हुई।
200. नाकों चने चबवाना (तंग करना) – भारतीयों ने अँग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए।
201. नाक पर मक्खी न बैठने देना (निर्दोष बचे रहना) – उसने कभी नाक पर मक्खी बैठने ही न दी।
202. नाक पर गुस्सा (तुरंत क्रोध) – गुस्सा तो उसकी नाक पर रहता है।
‘आँख’ पर मुहावरे
203. आँखें खुलना (होश आना, सावधान होना) – जनजागरण से हमारे शासकों की आँखें अब खुलने लगी है।
204. आँखें चार होना (आमने-सामने होना) – जब आँखें चार होती हैं, मुहब्बत हो ही जाती है।
205. आँखें मूँदना (मर जाना) – आज सबेरे उसके पिता ने आँखें मूँद लीं।
206. आँखें चुराना (नजर बचाना, अपने को छिपाना) – मुझे देखते ही वह आँखें चुराने लगा।
207. आँखों में खून उतरना (अधिक क्रोध करना) – बेटे के कुकर्म की बात सुनकर पिता की आँखों में खून उतर आया।
208. आँखों में गड़ना (किसी वस्तु को पाने की उत्कट लालसा) – उसकी कलम मेरी आँखों में गड़ गई है।
209. आँखें फेर लेना (उदासीन हो जाना) – मतलब निकल जाने के बाद उसने मेरी ओर से बिलकुल आँखें फेर ली है।
210. आँख मारना (इशारा करना) – उसने आँख मारकर मुझे बुलाया।
211. आँखों में धूल झोंकना (धोखा देना) – वह बड़ों-बड़ो की आँखों में धूल झोंक सकता है।
212. आँखें बिछाना (प्रेम से स्वागत करना) – मैंने उनके लिए अपनी आँखें बिछा दीं।
213. आँखों का काँटा होना (शत्रु होना) – वह मेरी आँखों का काँटा हो रहा है।

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