अलंकार सम्पूर्ण परिचय ⇓⇓⇓

अलंकार का अर्थ एवं परिभाषा-

अलंकार शब्द दो शब्दों के योग से मिलकर बना है- ‘अलम्’ एवं ‘कार’ , जिसका अर्थ है- आभूषण या विभूषित करने वाला। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्व को अलंकार कहते हैं। दूसरे शब्दों में जिन उपकरणों या शैलियों से काव्य की सुंदरता बढ़ती है, उसे अलंकार कहते हैं।

अलंकारों की निम्न विशेषताएँ होती है –
1. अलंकार काव्य सौन्दर्य का मूल है।
2. अलंकारों का मूल वक्रोक्ति या अतिशयोक्ति है।
3. अलंकार और अलंकार्य में कोई भेद नहीं है।
4. अलंकार काव्य का शोभाधायक धर्म है।
5. अलंकार काव्य का सहायक तत्त्व है।
6. स्वभावोक्ति न तो अलंकार है तथा न ही काव्य है अपितु वह केवल वार्ता है।
7. ध्वनि, रस, संधियों, वृत्तियों, गुणों, रीतियों को भी अलंकार नाम से पुकारा जा सकता है।
8. अलंकार रहित उक्ति शृंगाररहिता विधवा के समान है।

अलंकार के प्रकार-
1. शब्दालंकार-
जहाँ शब्दों के कारण काव्य की शोभा बढ़ती है, वहाँ शब्दालंकार होता है। इसके अंतर्गत अनुप्रास,यमक,श्लेष और पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार आते हैं।
2. अर्थालंकार-
जहाँ अर्थ के कारण काव्य की शोभा में वृध्दि होती है, वहाँ अर्थालंकार होता है। इसके अंतर्गत उपमा,उत्प्रेक्षा,रूपक,अतिशयोक्ति, अन्योक्ति, अपन्हुति, विरोधाभास आदि अलंकार शामिल हैं।
2. उभयालंकार – जहाँ अर्थ और शब्द दोनों के कारण काव्य की शोभा में वृध्दि हो, उभयालंकार होता है | इसके दो भेद हैं-

1. संकर 2. संसृष्टि

शब्दालंकार के प्रकार-

1.अनुप्रास अलंकार-
जहाँ काव्य में किसी वर्ण की आवृत्ति एक से अधिक बार होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।
उदाहरण :
”तरनि-तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।”

यहाँ पर ‘त’ वर्ण की आवृत्ति एक से अधिक बार हुआ है। इसी प्रकार अन्य उदाहरण निम्नांकित हैं-

‘चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में।’

यहाँ पर ‘च’ वर्ण की आवृत्ति एक से अधिक बार हुआ है।

बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।।’

यहाँ पर ‘स’ वर्ण की आवृत्ति एक से अधिक बार हुआ है।

रघुपति राघव राजा राम।
पतित पावन सीताराम।।

यहाँ पर ‘र ‘ वर्ण की आवृत्ति चार बार एवं ‘प ‘ वर्ण की आवृत्ति एक से अधिक बार हुआ है।

2. यमक अलंकार-
जिस काव्य में एक शब्द एक से अधिक बार आए किन्तु उनके अर्थ अलग-अलग हों, वहाँ यमक अलंकार होता है।
उदाहरण:

कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय।
या खाए बौरात नर या पाए बौराय।।

इस पद में ‘कनक’ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। पहले ‘कनक’ का अर्थ ‘सोना’ तथा दूसरे ‘कनक’ का अर्थ ‘धतूरा’ है।
अन्य उदाहरण-

माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डारि दे,मन का मनका फेर।।

इस पद में ‘मनका ‘ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। पहले ‘मनका ‘ का अर्थ ‘माला की गुरिया ‘ तथा दूसरे ‘मनका ‘ का अर्थ ‘मन’ है।

ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी
ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।

इस पद में ‘घोर मंदर ‘ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। पहले ‘घोर मंदर ‘ का अर्थ ‘ऊँचे महल ‘ तथा दूसरे ‘घोर मंदर ‘ का अर्थ ‘कंदराओं से ‘ है।

कंद मूल भोग करैं कंदमूल भोग करैं
तीन बेर खाती ते बे तीन बेर खाती हैं।

इस पद में ‘कंदमूल ‘ और ‘ बेर’ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। पहले ‘कंदमूल ‘ का अर्थ ‘फलों से’ है तथा दूसरे ‘कंदमूल ‘ का अर्थ ‘जंगलों में पाई जाने वाली जड़ियों से ‘ है। इसी प्रकार पहले ‘ तीन बेर’ से आशय तीन बार से है तथा दूसरे ‘तीन बेर’ से आशय मात्र तीन बेर ( एक प्रकार का फल ) से है ।

भूखन शिथिल अंग, भूखन शिथिल अंग
बिजन डोलाती ते बे बिजन डोलाती हैं।

तो पर वारों उर बसी, सुन राधिके सुजान।
तू मोहन के उर बसी, ह्वै उरबसी समान।।

देह धरे का गुन यही, देह देह कछु देह |
बहुरि न देही पाइए, अबकी देह सुदेह ||

मूरति मधुर मनोहर देखी।
भयउ विदेह -विदेह विसेखी।।

सूर -सूर तुलसी शशि।

बरछी ने वे छीने हाँ खलन के

चिरजीवी जोरी जुरै क्यों न सनेह गंभीर।
को घाटी ये वृषभानुजा वे हलधर के वीर।।

यहां पर वृषभानुजा के दो अर्थ – 1. वृषभानु की पुत्री – राधिका २. वृषभा की अनुजा – गाय
इसी प्रकार हलधर के भी दो अर्थ है – 1. हलधर अर्थात बलराम 2. हल को धारण करने वाला – बैल

’’सारंग ले सारंग उड्यो, सारंग पुग्यो आय।
जे सारंग सारंग कहे, मुख को सारंग जाय।।’’
3. श्लेष अलंकार-
श्लेष का अर्थ – चिपका हुआ। किसी काव्य में प्रयुक्त होनें वाले किसी एक शब्द के एक से अधिक अर्थ हों, उसे श्लेष अलंकार कहते हैं। इसके दो भेद हैं- शब्द श्लेष और अर्थ श्लेष।

शब्द श्लेष- जहाँ एक शब्द के अनेक अर्थ होता है , वहाँ शब्द श्लेष होता है। जैसे- .

उदाहरण:

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे, मोती, मानुस, चून।।

यहाँ दूसरी पंक्ति में ‘पानी’ शब्द तीन अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।
मोती के अर्थ में – चमक, मनुष्य के अर्थ में- सम्मान या प्रतिष्ठा तथा चून के अर्थ में- जल।

अर्थ श्लेष- जहाँ एकार्थक शब्द से प्रसंगानुसार एक से अधिक अर्थ होता है, वहाँ अर्थ श्लेष अलंकार होता है।

नर की अरु नल-नीर की गति एकै कर जोय
जेतो नीचो ह्वै चले, तेतो ऊँची होय।।

इसमें दूसरी पंक्ति में ‘ नीचो ह्वै चले’ और ‘ऊँची होय’ शब्द सामान्यतः एक अर्थ का बोध कराते है, किन्तु नर और नलनीर के प्रसंग में भिन्न अर्थ की प्रतीत कराते हैं।

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय |
बारे उजियारो करे, बढ़ै अंधेरो होय |

यहाँ बारे का अर्थ ‘लड़कपन’ और ‘जलाने से है और’ बढे’ का अर्थ ‘बड़ा होने’ और ‘बुझ जाने’ से है

‘‘चरण धरत चिन्ता करत भावत नींद न सोर।
सुबरण को ढूँढ़त फिरै, कवि कामी अरु चोर।।’’
4. प्रश्न अलंकार-
जहाँ काव्य में प्रश्न किया जाता है, वहाँ प्रश्न अलंकार होता है। जैसे-

जीवन क्या है? निर्झर है।
मस्ती ही इसका पानी है।

5.वीप्साअलंकार या पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार-
घबराहट, आश्चर्य, घृणा या रोचकता किसी शब्द को काव्य में दोहराना ही वीप्सा या पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।

उदाहरण :

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।

विहग-विहग
फिर चहक उठे ये पुंज-पुंज
कल- कूजित कर उर का निकुंज
चिर सुभग-सुभग।

जुगन- जुगन समझावत हारा , कहा न मानत कोई रे ।

लहरों के घूँघट से झुक-झुक , दशमी शशि निज तिर्यक मुख ,
दिखलाता , मुग्धा- सा रुक-रुक ।

अर्थालंकार के प्रकार-

1. उपमा अलंकार-
काव्य में जब दो भिन्न वस्तुओं में समान गुण धर्म के कारण तुलना या समानता की जाती है, तब वहाँ उपमा अलंकार होता है।

उपमा के अंग-
उपमा के 4 अंग हैं।

i. उपमेय- जिसकी तुलना की जाय या उपमा दी जाय। जैसे- मुख चन्द्रमा के समान सुंदर है। इस उदाहरण में मुख उपमेय है।

ii. उपमान- जिससे तुलना की जाय या जिससे उपमा दी जाय। उपर्युक्त उदाहरण में चन्द्रमा उपमान है।

iii. साधारण धर्म- उपमेय और उपमान में विद्यमान समान गुण या प्रकृति को साधारण धर्म कहते है। ऊपर दिए गए उदाहरण में ‘सुंदर ‘ साधारण धर्म है जो उपमेय और उपमान दोनों में मौजूद है।

iv. वाचक -समानता बताने वाले शब्द को वाचक शब्द कहते हैं। ऊपर दिए गए उदाहरण में वाचक शब्द ‘समान’ है। (सा , सरिस , सी , इव, समान, जैसे , जैसा, जैसी आदि वाचक शब्द हैं )

उल्लेखनीय- जहाँ उपमा के चारो अंग उपस्थित होते हैं, वहाँ पूर्णोपमा अलंकार होता है। जब उपमा के एक या एक से अधिक अंग लुप्त होते हैं, तब लुप्तोपमा अलंकार होता है।

उपमा के उदाहरण-

1. पीपर पात सरिस मन डोला।
2. राधा जैसी सदय-हृदया विश्व प्रेमानुरक्ता ।
3. माँ के उर पर शिशु -सा , समीप सोया धारा में एक द्वीप ।
4. सिन्धु सा विस्तृत है अथाह,
एक निर्वासित का उत्साह |
5. ”चरण कमल -सम कोमल ”

2. रूपक अलंकार-
जब उपमेय में उपमान का निषेध रहित आरोप करते हैं, तब रूपक अलंकार होता है। दूसरे शब्दों में जब उपमेय और उपमान में अभिन्नता या अभेद दिखाते हैं, तब रूपक अलंकार होता है।उदाहरण-

उदाहरण :

चरण-कमल बंदउँ हरिराई।

राम कृपा भव-निशा सिरानी

बंदउँ गुरुपद पदुम- परागा।
सुरुचि सुवास सरस अनुरागा।।

चरण सरोज पखारन लागा |

‘उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल-पतंग।
बिकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन-भृंग।।’’

 ‘‘बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डूबो रही तारा-घट उषा नागरी।।’’

 ‘‘नारि-कुमुदिनी अवध सर रघुवर विरह दिनेश।
अस्त भये प्रमुदित भई, निरखि राम राकेश।।’’

 ‘‘रनित भृंग घंटावली, झरत दान मधुनीर।
मंद-मंद आवतु चल्यो, कुंजर कुंज समीर।।’’

 ‘‘छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोई बहुरंग कमल कुल सोहा।।
अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोई पराग मकरंद सुवासा।।’’

 ‘‘बढ़त-बढ़त सम्पत्ति सलिल मन सरोज बढ़ि जाय।
घटत-घटत फिरि ना घटै, तरु समूल कुम्हलाय।।’’

 ‘‘जितने कष्ट कंटकों में है, जिनका जीवन सुमन खिला।
गौरव ग्रंथ उन्हें उतना ही, यत्र तत्र सर्वत्र मिला।।’’

3. उत्प्रेक्षा अलंकार-

जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना की जाती है, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। उत्प्रेक्षा के लक्षण- मनहु, मानो, जनु, जानो, ज्यों,जान आदि। उदाहरण-

 लता भवन ते प्रकट भे,तेहि अवसर दोउ भाइ।
मनु निकसे जुग विमल विधु, जलद पटल बिलगाइ।।

 दादुर धुनि चहु दिशा सुहाई।
वेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।

 मेरे जान पौनों सीरी ठौर कौ पकरि कौनों ,
घरी एक बैठि कहूँ घामैं बितवत हैं ।

 मानो तरु भी झूम रहे हैं, मंद पवन के झोकों से |

4. अतिशयोक्ति अलंकार-
काव्य में जहाँ किसी बात को बढ़ा चढ़ा के कहा जाए, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण-

 हनुमान की पूँछ में, लगन न पायी आग।
लंका सगरी जल गई, गए निशाचर भाग।।

 आगे नदिया पड़ी अपार, घोडा कैसे उतरे पार।
राणा ने सोचा इस पार, तब तक चेतक था उस पार।।

 देखि सुदामा की दीन दसा,
करुना करिकै करणानिधि रोए।
पानी परात को हाथ छुयौ नहिं ,
नैनन के जल सों पग धोए।

 जनु अशोक अंगार दीन्ह मुद्रिका डारि तब।

मनो झूम रहे हैं तरु भी मंद पवन के झोकों से।

5. अन्योक्ति अलंकार-
जहाँ उपमान के बहाने उपमेय का वर्णन किया जाय या कोई बात सीधे न कहकर किसी के सहारे की जाय, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है। जैसे-

 नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिकाल।
अली कली ही सौं बंध्यो, आगे कौन हवाल।।

 इहिं आस अटक्यो रहत, अली गुलाब के मूल।
अइहैं फेरि बसंत रितु, इन डारन के मूल।।

 माली आवत देखकर कलियन करी पुकार।
फूले-फूले चुन लिए , काल्हि हमारी बारि।।

 केला तबहिं न चेतिया, जब ढिग लागी बेर।
अब ते चेते का भया , जब कांटन्ह लीन्हा घेर।।

6. अपन्हुति अलंकार –
अपन्हुति का अर्थ है छिपाना या निषेध करना।काव्य में जहाँ उपमेय को निषेध कर उपमान का आरोप किया जाता है,वहाँ अपन्हुति अलंकार होता है। उदाहरण-

 यह चेहरा नहीं गुलाब का ताजा फूल है।

 नये सरोज, उरोजन थे, मंजुमीन, नहिं नैन।
कलित कलाधर, बदन नहिं मदनबान, नहिं सैन।।

 सत्य कहहूँ हौं दीन दयाला।
बंधु न होय मोर यह काला।।

7. व्यतिरेक अलंकार-
जब काव्य में उपमान की अपेक्षा उपमेय को बहुत बढ़ा चढ़ा कर वर्णन किया जाता है, वहाँ व्यतिरेक अलंकार होता है। जैसे-

 जिनके जस प्रताप के आगे ।
ससि मलिन रवि सीतल लागे।

8. संदेह अलंकार-
जब उपमेय में उपमान का संशय हो तब संदेह अलंकार होता है। या जहाँ रूप, रंग या गुण की समानता के कारण किसी वस्तु को देखकर यह निश्चित न हो कि वही वस्तु हैऔर यह संदेह अंत तक बना रहता है, वहाँ सन्देह अलंकार होता है। उदाहरण-

 कहूँ मानवी यदि मैं तुमको तो ऐसा संकोच कहाँ?
कहूँ दानवी तो उसमें है यह लावण्य की लोच कहाँ?
वन देवी समझूँ तो वह तो होती है भोली-भाली।।

 विरह है या वरदान है।

 सारी बिच नारी है कि नारी बिच सारी है।
कि सारी ही की नारी है कि नारी ही की सारी है।

 कहहिं सप्रेम एक-एक पाहीं।
राम-लखन सखि होहिं की नाहीं।।

9. विरोधाभास अलंकार-
जहाँ बाहर से विरोध दिखाई दे किन्तु वास्तव में विरोध न हो। जैसे-

 ना खुदा ही मिला ना बिसाले सनम।
ना इधर के रहे ना उधर के रहे।।

 जब से है आँख लगी तबसे न आँख लगी।

 या अनुरागी चित्त की , गति समझे नहिं कोय।
ज्यों- ज्यों बूड़े स्याम रंग, त्यों-त्यों उज्ज्वल होय।।

 सरस्वती के भंडार की बड़ी अपूरब बात ।
ज्यों खरचै त्यों- त्यों बढे , बिन खरचे घट जात ॥

 शीतल ज्वाला जलती है, ईंधन होता दृग जल का। यह व्यर्थ साँस चल-चलकर,करती है काम अनिल का।.

10. वक्रोक्ति अलंकार-
जहाँ किसी उक्ति का अर्थ जान बूझकर वक्ता के अभिप्राय से अलग लिया जाता है, वहाँ वक्रोक्ति अलंकार होता है। उदाहरण-

 कौ तुम? हैं घनश्याम हम ।
तो बरसों कित जाई।

 मैं सुकमारि नाथ बन जोगू।
तुमहिं उचित तप मो कहँ भोगू।।

इसके दो भेद है- (i) श्लेष वक्रोक्ति (ii) काकु वक्रोक्ति

11. भ्रांतिमान अलंकार-
जहाँ प्रस्तुत को देखकर किसी विशेष साम्यता के कारण किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाता है, वहाँ भ्रांतिमान अलंकार होता है। उदाहरण-

चंद के भरम होत मोड़ है कुमुदनी।

 नाक का मोती अधर की कान्ति से,
बीज दाड़िम का समझकर भ्रान्ति से,
देखकर सहसा हुआ शुक मौन है,
सोचता है, अन्य शुक कौन है।

 चाहत चकोर सूर ऒर , दृग छोर करि।
चकवा की छाती तजि धीर धसकति है।

बादल काले- काले केशों को देखा निराले।
नाचा करते हैं हरदम पालतू मोर मतवाले।।

12. ब्याजस्तुति अलंकार
काव्य में जहाँ देखने, सुनने में निंदा प्रतीत हो किन्तु वह वास्तव में प्रशंसा हो,वहाँ ब्याजस्तुति अलंकार होता है।

दूसरे शब्दों में – काव्य में जब निंदा के बहाने प्रशंसा किया जाता है , तो वहाँ ब्याजस्तुति अलंकार होता है ।

उदाहरण :

गंगा क्यों टेढ़ी -मेढ़ी चलती हो?
दुष्टों को शिव कर देती हो ।
क्यों यह बुरा काम करती हो ?
नरक रिक्त कर दिवि भरती हो ।

स्पष्टीकरण – यहाँ देखने ,सुनने में गंगा की निंदा प्रतीत हो रहा है किन्तु वास्तव में यहाँ गंगा की प्रशंसा की जा रही है , अतः यहाँ ब्याजस्तुति अलंकार है ।

रसिक शिरोमणि, छलिया ग्वाला ,
माखनचोर, मुरारी ।
वस्त्र-चोर ,रणछोड़ , हठीला ‘
मोह रहा गिरधारी ।

स्पष्टीकरण – यहाँ देखने में कृष्ण की निंदा प्रतीत होता है , किन्तु वास्तव में प्रशंसा की जा रही है । अतः यहाँ व्याजस्तुति अलंकार है ।

जमुना तुम अविवेकनी, कौन लियो यह ढंग |
पापिन सो जिन बंधु को, मान करावति भंग ||

स्पष्टीकरण – यहाँ देखने में यमुना की निंदा प्रतीत होता है , किन्तु वास्तव में प्रशंसा की जा रही है । अतः यहाँ व्याजस्तुति अलंकार है ।

13. ब्याजनिंन्दा अलंकार
काव्य में जहाँ देखने, सुनने में प्रशंसा प्रतीत हो किन्तु वह वास्तव में निंदा हो,वहाँ ब्याजनिंदा अलंकार होता है।

दूसरे शब्दों में – काव्य में जब प्रशंसा के बहाने निंदा किया जाता है , तो वहाँ ब्याजनिंदा अलंकार होता है ।

उदाहरण  :

तुम तो सखा श्यामसुंदर के ,

सकल जोग के ईश ।

स्पष्टीकरण – यहाँ देखने ,सुनने में श्रीकृष्ण के सखा उध्दव की प्रशंसा प्रतीत हो रहा है ,किन्तु वास्तव में उनकी निंदा की जा रही है । अतः यहाँ ब्याजनिंदा अलंकार हुआ ।

समर तेरो भाग्य यह कहा सराहयो जाय ।
पक्षी करि फल आस जो , तुहि सेवत नित आय ।

स्पष्टीकरण – यहाँ पर समर (सेमल ) की प्रशंसा करना प्रतीत हो रहा है किन्तु वास्तव में उसकी निंदा की जा रही है । क्योंकि पक्षियों को सेमल से निराशा ही हाथ लगती है ।

राम साधु तुम साधु सुजाना |
राम मातु भलि मैं पहिचाना ||
14. विशेषोक्ति अलंकार –
काव्य में जहाँ कारण होने पर भी कार्य नहीं होता, वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण  :

न्हाये धोए का भया, जो मन मैल न जाय।
मीन सदा जल में रहय , धोए बास न जाय।।

नेहु न नैननि कौ कछु, उपजी बड़ी बलाय।
नीर भरे नित प्रति रहै , तऊ न प्यास बुझाय।।

मूरख ह्रदय न चेत , जो गुरु मिलहिं बिरंचि सम |
फूलहि फलहि न बेत , जदपि सुधा बरसहिं जलद |

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में कारण होते हुए भी कार्य का न होना बताया जा रहा है ।
15. विभावना अलंकार :-
जहाँ कारण के न होते हुए भी कार्य का होना पाया जाय , वहां विभावना अलंकार होता है ।
जैसे-

 बिनु पग चलै सुनै बिनु काना।
 कर बिनु करम करै विधि नाना।।
 आनन रहित सकल रस भोगी ।
 बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।

स्पष्टीकरण – उपर्युक्त उदाहरण में कारण न होते हुए भी कार्य का होना बताया जा रहा है । बिना पैर के चलना , बिनाकान के सुनना, बिना हाथ के नाना कर्म करना , बिना मुख के सभी रसों का भोग करना और बिना वाणी के वक्ता होना कहा गया है । अतः यहाँ विभावना अलंकार है ।

निंदक नियरे राखिए , आँगन कुटी छबाय।
बिन पानी साबुन निरमल करे स्वभाव।।
16. मानवीकरण अलंकार –
जब काव्य में प्रकृति को मानव के समान चेतन समझकर उसका वर्णन किया जाता है , तब मानवीकरण अलंकार होता है 
जैसे –

1. है विखेर देती वसुंधरा मोती सबके सोने पर ,
रवि बटोर लेता उसे सदा सबेरा होने पर ।

2. उषा सुनहले तीर बरसाती
जय लक्ष्मी- सी उदित हुई ।

3. केशर -के केश – कली से छूटे ।

4. दिवस अवसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही
वह संध्या-सुन्दरी सी परी धीरे-धीरे।

17.समासोक्ति अलंकार
जहाँ पर कार्य, लिंग या विशेषण की समानता के कारण प्रस्तुत के कथन में अप्रस्तुत व्यवहार का समावेश होता है अथवा अप्रस्तुत का स्फुरण होता हे तो वहाँ समासोक्ति अलंकार माना जाता है।
समासोक्ति में प्रयुक्त शब्दों से प्रस्तुत अर्थ के साथ-साथ एक अप्रस्तुत अर्थ भी सूचित होता है जो यद्यपि प्रसंग का विषय नहीं होता है, फिर भी ध्यान आकर्षित करता है।
उदाहरण –
1. ‘‘कुमुदिनी हुँ प्रफुल्लित भई, साँझ कलानिधि जोई।’’
यहाँ प्रस्तुत अर्थ है- ‘‘संध्या के समय चन्द्र को देखकर कुमुदिनी खिल उठी।’’
अर्थ – इस अर्थ के साथ ही यहाँ यह अप्रस्तुत अर्थ भी निकलता है कि संध्या के समय कलाओं के निधि अर्थात् प्रियतम को देखकर नायिका प्रसन्न हुई।
2. ‘‘चंपक सुकुमार तू, धन तुव भाग्य विसाल।
तेरे ढिग सोहत सुखद, सुंदर स्याम तमाल।।’’
3. ‘‘नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल।
अली कली ही सों बिन्ध्यो, आगे कौन हवाल।।’’
यहाँ भ्रमर के कली से बंधने के प्रस्तुत अर्थ के साथ-साथ राजा के नवोढ़ा रानी के साथ बंधने का अप्रस्तुत अर्थ भी प्रकट हो रहा है। अतः यहाँ समासोक्ति अलंकार है।
4. ‘‘जब तुहिन भार से चलता था धीरे धीरे मारुत सुकुमार।
तब कुसुमकुमारी देख-देख, उस पर जाती निस्सार।।’’

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alankaar sampoorn parichay ⇓⇓⇓

alankaar ka arth aur paribhaasha-
alankaar shabd do shabdon ke yog se milakar bana hai- alam ’aur, kaar’, jisaka arth hai- aabhooshan ya vibhooshit karane vaala. kaavy kee shobha badhaane vaale tatv ko alankaar kahate hain. doosare shabdon mein jin upakaranon ya shailiyon se kaavy kee sundarata badhatee hai, use alankaar kahate hain.

alantars kee nimnalikhit kshamata hotee hai –
1. alankaar kaavy saundary ka mool hai.
2. alankaaron ka mool vakrokti ya atishayokti hai.
3. alankaar aur alankaary mein koee antar nahin hai.
4. alankaar kaavy ka shobhaadhir dharm hai.
5. alankaar kaavy ka sahaayak tattv hai.
6. svabhaavokti na to alankaar hai aur na hee kaavy hai apitu vah keval vaartaakaar hai.
7. dhvani, ras, sandhiyaan, vrttaadhikaaree, gun, reetiyaan ko bhee alankaar naam se pukaara ja sakata hai.
8. alankaar rahit ukti shrngaararahita vidhava ke samaan hai.

alankaar ke prakaar-
1. shabdaalankaar-
jahaan shabdon ke kaaran kaavy kee shobha badhatee hai, vahaan shabdaalankaar hota hai. isake antargat anupraas, yamak, shlesh aur punarutthaan prakaash alankaar aate hain.
2. arthaalankaar-
jahaan arth ke kaaran kaavy kee shobha mein vrdhdi hotee hai, vahaan arthaalankaar hota hai. isake antargat upama, utpreksha, roopak, atishayokti, anyokti, apanhuti, virodhaabhaas aadi alankaar shaamil hain.
2. ubhayaalankaar – jahaan arth aur shabd donon ke kaaran kaavy kee shobha mein vrdhdi ho, ubhayaalankaar hota hai | isake do bhed hain-

1. san 2. vanshee

shabdaalankaar ke prakaar-
1.anupraas alankaar-
jahaan kaavy mein kisee varn kee aavrtti ek se adhik baar hotee hai, vahaan anupraas alankaar hota hai.
udaaharan:
taranee-thekua tat tamaal taruvar bahu ​​chhae.

yahaan par ta varn kee aavrtti ek se adhik baar huee hai. isee prakaar ke any udaaharan nimnaankit hain-

chaaru chandr kee chanchal kiranen, khel rahee hain jal-thal mein.

yahaan par ch varn kee aavrtti ek se adhik baar huee hai.

bandun guru pad padum paraag.
suruchi suvaas saras anuraaga.

yahaan par sa varn kee aavrtti ek se adhik baar huee hai.

raghupati raaghav raaja raam.
patit paavan seetaaraam ..

yahaan par ra varn kee aavrtti chaar baar aur pa varn kee aavrtti ek se adhik baar huee hai.

2. yamak alankaar-
jis kaavy mein ek shabd ek se adhik baar aaya kintu unake arth alag-alag hon, vahaan yamak alankaar hota hai.
udaaharan:

kanak kanak te sau gunee maadity adhikaay.
ya khae burat nar ya pae bauraay ..

is pad mein kanak shabd kee aavrtti do baar huee hai. pahale kanak ka arth sona aur doosare kanak ka arth dhatura hai.
any udaaharan-

maala pherat jug gaya, phira na man ka pher.
kar ka manaka daari de, man ka manaka pher ..

is pad mein manaka shabd kee aavrtti do baar huee hai. pahale manaka ka arth granth kee guriya aur doosare manaka ka arth man hai.

oonche ghor mandar ke andar rahanavaaree
oonche ghor mandar ke andar raheetee hain.

is pad mein ghor mandar shabd kee aavrtti do baar huee hai. pahale ghor mindar ka arth oonche mahal aur doosare ghor mindar ka arth kandaraon se hai.

kand mool bhog karan kandamool bhog karan
teen ber khaate te be teen ber khaate hain.

is pad mein kandamool aur ber shabd kee aavrtti do baar huee hai. pahale kandamool ka arth pairon se hai aur doosare kandamool ka arth jangalon mein pae jaane vaalee jadiyon se hai. isee prakaar ke pahale teen ber se aashay teen baar se hai aur doosare teen ber se aashay keval teen ber (ek prakaar ka phal) se hai.

bhookka shithil ang, bhookhan shithil ang
bijan dolaatee te be bijan dolaatee hain.

to par vaaron ur basee, sun raadhike sujaan.
ta mohan ke ur basee, havay udabansee samaan ..

deh dhare ka gun yahee, deh deh kachhu deh |
bahuri na dehee paie, abakee deh subal ||

moorati madhur manohar ne dekha.
bhayu videh-videh videh ..

soor -soor tulasee shashi

barachhee ne ve chheene haan khalaan ke

chirajeevee joree jurai kyon na saneh gambheer.
ko ghaatee ye vrshabhaanuja ve haladhar ke veer ..

yahaan vrshabhaanuja ke do arth hain – 1. vrshabhaanu kee putree – raadhika 2. vrshabha kee anuja – gaay
isee prakaar haladhar ke bhee do arth hai – 1. haladhar arthaat balaraam 2. hal ko dhaaran karane vaala – bail

saar le saarang udyo, saar pugyo aay.
je saarang saarang kahe, mukh ko saarang jaana.
3. shlesh alankaar-
shlesh ka arth – chipaka hua. kisee kaavy mein prayukt honen vaale kisee ek shabd ke ek se adhik arth hon, use shlesh alankaar kahate hain. isake do bhed hain- shabd shlesh aur arth shlesh.

shabd shlesh- jahaan ek shabd ke kaee arth hote hain, vahaan shabd shlesh hota hai. jaise-.

udaaharan:

rahiman jal raakhie, bin paanee sab soon.
paanee chala na oobar, motee, maanas, choon ..

yahaan doosaree pankti mein paanee shabd teen arthon mein prayukt hua hai.
motee ke arth mein – chamak, manushy ke arth mein- sammaan ya pratiphal aur choon ke arth mein- jal.

arth shlesh- jahaan ekaarthak shabd se prasang ke anusaar ek se adhik arth hota hai, vahaan arth shlesh alankaar hai.

nar kee aru nal-neer kee gati ekai kar joy
jeto neecho hvai chale, teto oonchee hoy ..

isamen doosaree pankti mein o neecho hvai chale ’aur ho oonchee hoy’ shabd ka ek arth ka bodh banaana hai, kintu nar aur tepar ke prasang mein alag-alag arth kee vaanchhit rachanaen hain.

jo raheem gati deep kee, kul kapoot gati soy |
baare mein ujiyaaro kare, badhai andhero hoy |

yahaan ke baare mein ka arth ladakiyompan aur jalaane se hai aur badhe ka arth bada hone aur bujh hai

‘neend charan dharatangata karat bhaavat neend na sor.
subaran ko dhoondhat phirai, kavi kaamee aru th.
4. prashn alankaar-
jahaan kaavy mein prashn kiya jaata hai, vahaan prashn alankaar hota hai. jaise-

jeevan kya hai? najeer hai.
mastee hee isaka paanee hai.

5.veepsaalankaar ya punarutthaan prakaash alankaar-
ghabaraahat, aashchary, ghrna ya rochakata kisee shabd ko kaavy mein punaraana hee veepsa ya punarukti prakaash alankaar hai.

udaaharan:

madhur-madhur maayak jal.

vihag

-vihag
phir chahak uthe ye punj-punj
kal- koojit kar ur ka nikunj
chir subh-subhage.

jugan- jugan samajhaavat haara, kaha na maanat koee re.

laharon ke ghoonghat se jhuk-jhuk, dashamee shashi nijee tiryak pramukh,
dikhalaata, mugdha- sa thaharaav.

arthalankaar ke prakaar-
1. upama alankaar-
kaavy mein jab do bhinn vastuon mein samaan gun dharm ke kaaran tulana ya samaanata kee jaatee hai, tab vahaan upama alankaar hota hai.

upama ke ang-
upama ke 4 ang hain.

main. upamey- jisakee tulana kee jaay ya upama dee jaay. jaise- mukh chandrama ke samaan sundar hai. is udaaharan mein mukhy upamey hai.

ii. upamaan- jisase tulana kee jae ya jisase upama dee jae. uparyukt udaaharan mein chandrama upamaan hai.

iii. saadhaaran dharm- upamey aur upamaan mein vidyamaan samaan gun ya prakrti ko saadhaaran dharm kahata hai. oopar die gae udaaharan mein sundar saadhaaran dharm hai jo upamey aur upamaan donon mein maujood hai.

iv. vaachak -samaanata bataane vaale shabd ko vaachak shabd kahate hain. oopar die gae udaaharan mein vaachak shabd samaan hai. (sa, saris, see, iv, samaan, jaise, jaisa, jaise aadi vaachak shabd hain)

ullekhaneey- jahaan upama ke chaaro ang upasthit hote hain, vahaan poornopama alankaar hota hai. jab upama ke ek ya ek se adhik ang lupt hote hain, tab luptopama alankaar hota hai.

upama ke udaaharan-

1. peepar pat saris man dola.
2. raadha jaisee saday-hrdaya vishv premaanurakta.
3. maan ke ur par shishu -sa, sameepy dhaara mein ek dveep.
4. sindhu sa vistrt hai athaah,
ek nirvaasit ka utsaah |
5. charan kamal-purush komal

2. roopak alankaar-
jab upamey mein upamaan ka pratibandh rahit aarop karate hain, to roopak alankaar hota hai. doosare shabdon mein jab upamey aur upamaan mein abhinnata ya abhed dikhaate hain, tab roopak alankaar hota hai.upachaar-

udaaharan:

charan-kamal bandun hariraee.

raam krpa bhav-nisha siraanee

bandun gurupad padum- paraag.
suruchi suvaas saras anuraaga ..

charan saroj pakharan laaga |

‘ra udit udayagiri manch par, raghuvar baal-patang.
bikase sant saroj sab, harashe lochan-bhrng.

‘‘ beetee vibhaavaree jee ree.
ambar-panaghat mein doobane vaalee taara-ghat usha naagaree.

‘‘ naari-kumudinee avadh sar raghuvar virah dinesh.
ast bhaye pramudit bhee, nirakhi raam raakesh.

rat rat ranit bhrng ghantaavee, jharat daan madhuner.
mand-mand aavatu chali, kunjar kunj sameer.

‘‘ chhand soratha sundar doha. soee bahurang kamal kul soha ..
arath anoop subhaav subhaasa. soee paraag makarand suvaasa.

sar sar uthaan-sampaadan sampatti salil man saroj badhi jaay.
ghatat-ghatat phiri na ghatai, taru samul kumhalaay.

‘jinaka jitane til yogadaanakartaon mein hai, jinake jeevan suman khilaate hain.
gaurav ne unhen itana hee samajha, yatr tatr sarvatr mila.

3. utpreksha alankaar-

jahaan upamey mein upamaan kee sambhaavana kee jaatee hai, vahaan utpreksha alankaar hotee hai. utpreksha ke lakshan- manahu, maano, janu, jaano, jyon, jaan aadi. udaaharan-

lata bhavan te prakat bhela, tehi avasar dou bhai.
manu nikase jug vimal vidhu, jalad patal bilagai ..

daadur dhuni chahu disha suhaee.
ved padhahin janu batu samudaee ..

mere jaan ponon seeree thaur ka pakari kaunon,
gharee ek baithi kahoon ghaamar thaharavat hain.

maano taru bhee jhoom rahe hain, mand pavan ke jhokon se |

4. atishayokti alankaar-
kaavy mein jahaan kisee bhee baat ko badha chadha ke kaha jae, vahaan atishayokti alankaar hotee hai. udaaharan-

hanumaan kee poonchh mein, lagan na paayee aag.
lanka sagaree jal gaya, gaya nishaachar bhaag ..

aage nadiya padee apaar, ghoda kaise utare paar.
raana ne socha is paar, tab tak chetak us paar tha ..

dekhi sudaama kee deen dasa,
karuna karikai karanaanidhi ro.
paanee paraat ko haath chhuyau navin,
nainan ke jal son pag dhoe.

janu ashok angaar deenh purika daari tab.

mrtyu jhoom rahe hain taru bhee mand pavan ke jhokon se.

5. anyokti alankaar-
jahaan upaman ke bahaane upamey ka varnan kiya gaya ya koee baat seedhe na kahakar kisee ke sahaare kee jaay, vahaan anyokti alankaar hotee hai. jaise-

naveen paraag navin madhur madhu, naveen vikaas ihikaal.
alee kalee hee saun bandho, aage kaun havaal ..

ihin aas atakyo rahat, alee gulaab ke mool.
aheen pheri basant ritu, in daaran ke mool ..

kali karee pukaar dekhakar maalee aavat.
phule-phoole chunen, kaalhi hamaaree baari ..

kela tabahin na chetr, jab dhigejee ber.
ab te chete ka bhaya, jab kaanta leenha gher ..

6. apanhutee alankaar –
apanhuti ka arth hai chhipaana ya nishedh karana. pratibandh mein jahaan upamey ko nishedh kar upamaan ka aarop kiya jaata hai, vahaan apanhuti alankaar hota hai. udaaharan-

yah gulaab ka taaja phool nahin hai.

naveen saroj, urojaning, manjumin, naveeneen the.
kalit kalaadhar, badan navin madanabaan, naveen sant ..

saty kahahoon haun deen dayaala.
bandhu na hoy ​​mor yah kaala ..

7. vyatirek alankaar-
jab kaavy mein upaman kee apeksha upamey ko bahut badha chadha kar varnan kiya jaata hai, vahaan vyatirek alankaar hota hai.) jaise-

un jas prataap ke aage.
sasi malin raav seetalage.

8. sandeh alankaar-
jab upamey mein upamaan ka sanshay ho tab sandeh alankaar hota hai. ya jahaan roop, rang ya gun kee samaanata ke kaaran kisee vastu ko dekhakar yah nishchit na ho ki vahee vastu hai aur yah sandeh ant tak bana rahata hai, vahaan sandeh alankaar hota hai. udaaharan-

kahoon maanavee • main tumako to aisa sankoch kahaan?
kahoon daanavee to isamen laavany kee loch kahaan hai?
van devee samajhoon to vah to hota hai bholee-bhaalee ..

virah hai ya varadaan hai.

sa bich naaree hai ki naaree bich saaree hai.
us sab hee kee naaree hai ki naaree hee kee saaree hai.

kahahin saprem ek-ek paaheen.
raam-madhu kathor hohin kee naaheen ..

9. virodhaabhaas alankaar-
jahaan baahar se virodh dikhaee de kintu vaastav mein virodh na ho. jaise-

na khuda hee mila na bisaale sanam.
na idhar ke hone na udhar ke rahe ..

jab se aankh lagee hai tabase na aankh lagee hai.

ya anuraagee chitt kee, gati samajhe nahin see.
jyon- jyon boode syaam rang, tyon-tyon ujjval hoy ..

sarasvatee ke bhandaar kee badee apoorab baat.
jy

n kharachai tyon- tyon badhe, bin kharahe ghat jaat ai

sheetal jvaala jalatee hai, eendhan hota hai drg jal ka. yah vyarth saans lene-dene vaala, kaam karata hai anil ka.]

10. vyangy alankaar-
jahaan kisee ko ukti ka arth jaan boojhakar baad ke abhipraay se alag liya jaata hai, vahaan vakrokti alankaar hota hai. udaaharan-

ka tum? ghanashyaam ham.
to barason kee jaee.

main sukamaari naath ban jogoo.
tumahin uchit tap mo kahan bhogoo ..

isaka do bhed hai- (i) shlesh vakrokti (ii) kaaku vakrokti

11. svatantra alankaar-
jahaan prastut kiya jaata hai vahaan kisee vishesh saamarthy ke kaaran kisee doosare vastu ka bhram ho jaata hai, vahaan bhraantimaan alankaar hota hai. udaaharan-

chand ke bharam hot mod hai kumudanee.

naak ka motee adhar kee kaanti se,
beej daadim ka samajhakar bhraanti se,
dekhakar sahasa hua shuk maun hai,
sochata hai, any shuk kaun hai.

chaahat chakor soor ,ra, drg chhor kari.
chakava kee chhaatee tajee dheer dhasikati hai.

baadal kaale- kaale keshon ko dekha niraale.
naacha karate hain haradam paalatoo jaanavar mor matavaale ..

12. hitostuti alankaar
kaavy mein jahaan bhee dekhane, sunane mein ninda lag ho kintu vah vaastav mein prashansa ho, vahaan byaajastuti alankaar hotee hai.

doosare shabdon mein – kaavy mein jab ninda ke bahaane kee prashansa kee jaatee hai, to vahaan byaajastuti alankaar hotee hai.

udaaharan:

ganga kyon tedhee-medhee chalatee ho?
raakshasonon ko shiv kar rahe ho.
kyon yah bura kaam karata hai?
narak khaalee kar divi bharatee ho.

nasabandee – yahaan dekhane, sunane mein ganga kee ninda lag rahee ho rahee hai ki vaastav mein yahaan ganga kee prashansa kee ja rahee hai, atah yahaan ruchisthaanati alankaar hai.

rasik shiromani, chhaliya gvaala,
maakhanachor, muraaree.
vastr-chor, ranachhod, hatheela
mohin giradhaaree.

nishechan – yahaan dekhane mein krshn kee ninda prateet hotee hai, ki vaastav mein prashansa kee ja rahee hai. atah yahaan vyaajasthati alankaar hai.

jamuna tum avivekanee, hoo liyo yah dhang |
paapin so jin bandhu ko, maan karaavati bhang ||

adhisoochana – yahaan dekhane mein yamuna kee ninda prateet hotee hai, ki vaastav mein prashansa kee ja rahee hai. atah yahaan vyaajasthati alankaar hai.

13. hitaninaada alankaar
kaavy mein jahaan bhee dekhane, sunane mein prashansa prateet ho kintu vah vaastav mein ninda ho, vahaan hitaninda alankaar hota hai.

doosare shabdon mein – kaavy mein jab prashansa ke bahaane ninda kiya jaata hai, to vahaan hitaninda alankaar hota hai.

udaaharan:

tum to sakha shyaamasundar ke,

sakal jog ke eesh.

nasabandee – yahaan dekhane, sunane mein shreekrshn ke sakha udhdav kee prashansa prateet ho rahee hai, ki vaastav mein unakee ninda kee ja rahee hai. atah yahaan hitaninda alankaar hua.

samar tero bhaagy yah kaha saraahayo jaana.
pakshee kari phal aas jo, tuhi sevat nit aay.

adhisoochana – yahaan par samar (semal) kee prashansa karana lag raha hai ki lekin vaastav mein usakee ninda kee ja rahee hai. kyonki pakshiyon ko semal se niraasha hee haath lagatee hai.

raam saadhu tum saadhu sujaana |
raam maatu bhali main pahichaana ||
14. visheshan alankaar –
kaavy mein jahaan kaaran hone par bhee kaary nahin hota hai, vahaan visheshokti alankaar hotee hai.

udaaharan:

nhaye dhoe ka bhaya, jo man pighal jae.
meen sada jal mein rahay, dhoe baas na jaay ..

nehu nanni kau kachhu, upajee badee balaay.
neer bhare nit prati rahai, taoo na pyaas bujhaay ..

moorakh hraday na chet, jo guru milahin biranchi sam |
phoolahi phalahi na bet, jadapi sudha barasahin jalad |

nishechan – uparyukt udaaharan mein kaaran hote hue bhee kaary ka na hona bataaya ja raha hai.
15. vibhav alankaar: –
jahaan kaaran ke na hote hue bhee kaary ka hona paaya jaay, vahaan vibhav alankaar hota hai.
jaise-

binu pag chalai sunai binu kaana.
kar binu karam karai vidhi naana ..
aanan rahit sakal ras bhogee.
binu baanee kahat bad jogee ..

nishechan – uparyukt udaaharan mein kaaran na hote hue bhee kaary ka hona bataaya ja raha hai. bina pair ke chalana, binaakaan ke sunana, bina haath ke naana karm karana, bina mukh ke sabhee rason ka bhog karana aur bina vaanee ke launj hona kaha gaya hai. atah yahaan vishnu alankaar hai.

nindak niyare raakhie, aangan kutee chhabaay.
bin paanee saabun nirat taapasee ..
16. maanaveekaran alankaar –
jab kaavy mein prakrti ko maanav ke samaan chetan samajhakar usaka varnan kiya jaata hai, tab maanaveekaran alankaar hota hai
jaise –

1. vikherats vasundhara motee sabake sone par,
ravi praapti use sada sabera hone par le jaatee hai.

2. usha sunahale teer barasaatee
jay lakshmee- see udit huee.

3. keshar -ke kesh – kalee se chhoote.

4. din avasaan ka samay
meghamay aakaash se utar rahee hai
vah sandhya-sundaree see paree dheere-dheere.

17.maasokti alankaar
jahaan par kaary, ling ya visheshan kee samaanata ke kaaran prastut ke kathan mein apratyaksh vyavahaar ka samaavesh hota hai ya apratyaksh roop se sphuran hota hai to vahaan samaasokti alankaar maana jaata hai.
samaasokti mein prayukt shabdon se prastut arth ke saath-saath ek apratyaksh arth bhee ingit hota hai jo yadyapi prasang ka vishay nahin hota hai, phir bhee dhyaan aakarshit karata hai.
udaaharan –
1. ph ‘kumudinee hun praphullit bhee, shez kalanidhi joee.
yahaan prastut arth hai- ‘ya sandhya ke samay chandr ko dekhakar kumudinee khil uthee.
arth – is arth ke saath hee yahaan yah apratyaksh arth bhee nikalata hai ki sandhya ke samay kalaon ke nidhi arthaat priyatam ko dekhakar naayika prasann huee.
2., dhan champak sukumaar too, dhan tuv bhaagy visaal.
tera dhong sohat sukhad, sundar shyaam tamaal.
3. ur ‘par‘in madh madh paraag madhur madhin naveen vikaas ihee avadhi.
alee kalee hee son badhyo, aage kaun havaal.
yahaan bhramar ke kalee se bandhane ke prastut arth ke saath-saath raaja ke navodhaanee ke saath bandhane ka apratyaksh arth bhee prakat ho raha hai. atah yahaan samaasokti alankaar hai.
4. tha dheere jab tuhin bhaar se chalata tha to dheere dheere maarut sukumaar tha

tab kusumakumaaree dekh-dekh kar, us par chalee jaatee hai.

dosto hamaare dvaara kiya gaya prayaas kese laga, aap apanee raay neeche kament boks me jaroor deven

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