काव्य लक्षण || kavya lakshan || काव्यशास्त्र || हिंदी साहित्य

दोस्तो आज की पोस्ट में हम काव्यशास्त्र के महत्वपूर्ण विषयवस्तु काव्य लक्षण (Kavya Lakshan) को अच्छे से पढ़ेंगे ।

काव्य के लक्षण(kavya ke lakshn)

दोस्तो ‘किसी वस्तु अथवा विषय के असाधारण अर्थात विशेष धर्म का कथन करना उसका लक्षण कहलाता है।’अअलग -अलग आचार्यों के द्वारा काव्य लक्षण को परिभाषित किया गया।

  • संस्कृत आचार्यों के काव्य लक्षण
  • हिन्दी आचार्यों के काव्य लक्षण
  • पाश्चात्य समीक्षकों के काव्य लक्षण
काव्य लक्षण
काव्य लक्षण

संस्कृत आचार्यों के काव्य लक्षण

आचार्य दण्डी (7 वीं शताब्दी)

आचार्य दण्डी ने अपने ग्रन्थ ’काव्यादर्श’ में काव्य की निम्नलिखित परिभाषा दी है। ’’शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिना पदावली’’ अर्थात् इष्ट अर्थ से युक्त पदावली तो उसका अर्थात् काव्य का शरीर मात्र है।

स्पष्ट है दण्डी केवल शब्दार्थ को काव्य नहीं मानते क्योंकि उनके अनुसार शब्दार्थ तो काव्य का शरीर मात्र है, उसकी आत्मा नहीं। दण्डी अलंकारवादी आचार्य थे और अलंकार को काव्य की आत्मा मानते थे।

दण्डी के अनुसार, वह शब्दार्थ जो अलंकार युक्त हो, काव्य है। अलंकार विहीन शब्दार्थ दण्डी के विचार से काव्य नहीं कहा जा सकता।

आचार्य वामन (8 वीं शताब्दी)

रीति सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य वामन अपने ग्रन्थ ’काव्यालंकार सूत्रवृत्ति’ में काव्य की निम्न परिभाषा दी है। ’गुणालंकृतयों शब्दार्थर्यो काव्य शब्दो विद्यते।’ अर्थात् गुण और अलंकार से युक्त शब्दार्थ ही काव्य के नाम से जाना जाता है।

भामह (छठी शताब्दी)

भामह ने अपने ग्रन्थ ’काव्यालंकार’ में काव्य की परिभाषा देते हुए लिखा है ’’शब्दार्थों सहितौ काव्यम्।’’ अर्थात् शब्द और अर्थ के ’सहित भाव’ को काव्य कहते हैं।
आचार्य भामह शब्द और अर्थ के सामंजस्य पर बल देते हैं, अर्थात् कविता न तो शब्द चमत्कार है और न केवल अर्थ का सौष्ठव है।

आचार्य विश्वनाथ (14 वीं शताब्दी)

साहित्य दर्पणकार आचार्य विश्वनाथ ने मम्मट के काव्य लक्षण का तर्कपूर्ण खण्डन किया है। उन्होंने काव्य की निम्न परिभाषा प्रस्तुत की है। ’वाक्यरसात्मकंकाव्यम्’ अर्थात् रस से पूर्ण वाक्य ही काव्य है। इस परिभाषा से स्पष्ट है कि आचार्य विश्वनाथ ने रस को ही काव्य का प्रमुख तत्त्व माना है जबकि पूर्ववर्ती आचार्यों ने गुण सम्पन्ना और सालंकारिता पर अधिक बल दिया था।

पण्डितराज जगन्नाथ (17 वीं शताब्दी)

पण्डितराज जगन्नाथ ने अपने ग्रन्थ रस गंगाधर में काव्य लक्षण को निम्न शब्दों में व्यक्त कियाः ’’रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्’’ अर्थात् रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाला शब्द ही काव्य है। इस परिभाषा में रमणीय शब्द अस्पष्ट है। बाबू गुलाबराय ने रमणीय का अर्थ मन को रमाने वाला, लीन करने वाला बताया है। रस में लीन मन आनन्द से व्याप्त हो जाता है।

आचार्य मम्मट (12 वीं शताब्दी)

संस्कृत काव्य धारा के प्रमुख विद्वान् आचार्य मम्मट ने अपने ग्रन्थ ’काव्यप्रकाश’ में काव्य की निम्न परिभाषा दी है, ’’तद्दोषौ शब्दार्थों सगुणावनलंकृति पुनः क्वापि।’’ अर्थात् काव्य वह शब्द और अर्थ जो दोष से रहित हो, गुण से रहित हो तथा कभी-कभी अलंकार से रहित भी हो सकता है।

नाट्यशास्त्र –

आनंदवर्धन – शब्दार्थ शरीरं तावत्काव्यम्

मृदुललितपदाढयं गूढशब्दार्थहीनं जनपदसुखबोध्यं युक्तिमन्नृत्ययोज्यं।
बहुकृतरसमार्ग संधिसंधानयुक्तं सभवतिशभकाव्यंनाटक प्रेक्षकाणाम्।।

क्षेमेंद्र – काव्यंविशिष्टशब्दार्थ साहित्यसदलंकृति

अग्निपुराण –

संक्षेपाद् वाक्यमिष्टार्थं व्यवच्छिन्ना पदावली।
काव्यं स्फुरदलंकारं गुणवददोष वर्जितम्।।

आचार्य वामन – रीतिरात्मा काव्यस्य

भोजराज – अदोषौ गुणवत्काव्यं अलंकारैरलंकृतम्।
रसान्वितं कविः कुर्वन् कीर्तिं प्रीतिं च विन्दति।।

कुन्तक – शब्दार्थों सहितौ वक्र कविव्यापारशालिनी।
बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विदाह्लादकारिणी।।

जयदेव – निर्दोषगुणालंकार लक्षणरीतिवृत्तं वाक्यं काव्यम्।।

आनन्दवर्धन – काव्यास्यात्मा ध्वनिः।।

हेमचन्द – अदोषौ सगुणौ सालंकारौ च शब्दार्थों काव्यम्।।

रुद्रट – ’ननु शब्दार्थौ काव्यम्’

आनन्दवर्धन – सहृदय हृदयहलादि शब्दार्थमयत्वमेय काव्यलक्षणम्

विद्याधर – शब्दार्थौ वपुरस्य शब्दार्थवपुस्ताक्त् काव्यम्

हिन्दी आचार्यों के काव्य लक्षण (Kavya Lakshan)

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का काव्य लक्षण शुक्ल जी ने अपने निबन्ध संग्रह चिन्तामणि भाग-1 के निबन्ध ’कविता क्या है’’ में काव्य की परिभाषा देते हुए लिखा है ’’जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्त साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे कविता कहते हैं।

बालकृष्ण भट्ट – ’’साहित्य जनसमूह के हृदय का विकास है।’’

रामचंद्र शुक्ल – ’’कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-संबंधों के संकुचित मंडल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है, जहाँ जगत की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।’’

जयशंकर प्रसाद – ’’काव्य आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति है जिसका संबंध विश्लेषण या विज्ञान से नहीं है।’’

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी – ’’किसी प्रभावोत्पादक और मनोरंजक लेख बात या वक्तृता का नाम कविता है।’’ इस अर्थ में कविता अत्यन्त व्यापक हो जाती है। वह गद्य और पद्य दोनों ही रूपों में हो सकती है तथा दो गुण होने चाहिए प्रभाव डालने की क्षमता और आनन्द प्रदान करने की शक्ति।

महावीरप्रसाद द्विवेदी – ’’ज्ञान-राशि के संचित कोष का नाम साहित्य है।’’

बाबू गुलाबराय – ’’काव्य संसार के प्रति कवि की भाव प्रधान मानसिक प्रतिक्रियाओं की श्रेय को प्रेय देने वाली अभिव्यक्ति है।’’

महादेवी वर्मा – ’’कविता कवि विशेष की भावनाओं का चित्रण है और वह चित्रण इतना ठीक है कि उसके जैसी ही भावनाएँ दूसरे के हृदय में आविर्भूत हो जाती हैं।’’

आचार्य केशवदास –

’’जदपि सुजाति सुलक्षणी, सुबरन सरस सुवृत्त।
भूषन बिनु न बिराजई कविता बनिता मित्त।।’’

महावीरप्रसाद द्विवेदी – ’’कविता प्रभावशाली रचना है, जो पाठक या श्रोता के मन पर आनंदमयी प्रभाव डालती है।’’

पंत – ’’कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है।’’

डाॅ. गुलाबराय – ’’काव्य संसार के प्रति कवि की भावप्रधान, किंतु वैयक्तिक संबंधों से मुक्त मानसिक प्रतिक्रियाओं, कल्पना के साँचे में ढली हुई, श्रेय की प्रेयरूपा प्रभावोत्पादक अभिव्यक्ति है।’’

चिंतामणि – ’’सगुनालंकार सहित दोष रहित जो होई।
शब्द अर्थ ताको कवित्त कहत बिबुध सब कोई।।’’

प्रेमचंद – ’’साहित्य जीवन की आलोचना है।’’

कुलपति मिश्र – ’’जगते अद्भुत लोकोत्तर चमत्कार यह लक्षण मैं करयौ।’’

महात्मा गांधी – ’’साहित्य वह है जिसे चरस खींचता हुआ किसान भी समझ सके और खूब पढ़ा-लिखा भी समझ सके।’’

महावीरप्रसाद द्विवेदी – ’’मनोभाव शब्दों का रूप धारण करते हैं। वही कविता है, चाहे वह पद्यात्मक हो या गद्यात्मक।’’

ठाकुर कवि – ’’पंडित और प्रवीनन को जोह चित्त हरै सो कवित्त कहावै’’

महादेवी वर्मा – ’’काँटा चुभाकर उसकी पीङा की अनुभूति तो संसार कराता है पर कवि बिना काँटा चुभाए उसकी पीङा की अनुभूति करा देता है।’’

कुलपतिमिश्र – (रस रहस्य) ’’जगत अद्भुत सुखसदन, सब्दरु अर्थत कवित्त।
वह लच्छण मैने कियो, समूझि ग्रंथ बहुचित्त।’’

देव (काव्य रसायन) – ’’शब्द जीव तिहि अरथ मन, रसमत सुजस सरीर।
चलत वहै जुग छंद गति, अलंकार गंभीर।।’’

सुनि परैसो शब्द है, समुझि परै सो अर्थ-

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी – ’’अन्तःकरण की वृत्तियों के चित्र का नाम कविता है।’’

डाॅ. नगेन्द्र – ’’रसात्मक शब्दार्थ काव्य है और उसकी छंदोमयी विशिष्ट विधा आधुनिक अर्थ में कविता है।’’

आचार्य रामचंद्र शुक्ल – ’’अव्यक्त की अभिव्यक्ति जगत है अतः कविता अभिव्यक्ति की अभिव्यक्ति हुई।’’

आचार्य नंददुलारे वाजपेयी – ’’काव्य तो प्रकृत मानव अनुभूतियों का नैसर्गिक कल्पना के सहारे ऐसा सौन्दर्यमय चित्रण है, जो मनुष्यमात्र में स्वभावतः भावोच्छ्वास और सौन्दर्य संवेदन उत्पन्न करता है।’’

हजारी प्रसाद द्विवेदी – ’’साहित्य मनुष्य के अन्तर का उच्छलित आनन्द है, जो उसके अन्तर में अटाए नहीं अट सका था। साहित्य का मूल यही आनन्द का अतिरेक है। उच्छलित आनन्द के अतिरेक से उद्धृत सृष्टि ही सच्चा साहित्य है।’’

नगेन्द्र – ’’आत्माभिव्यक्ति ही वह मूल तत्त्व है, जिसके कारण कोई व्यक्ति साहित्यकार और उसका कृति साहित्य बन पाती है।’’

रामविलास शर्मा – ’’साहित्य जनता की वाणी है। उसके जातीय चरित्र का दर्पण है। प्रगति पथ में बढ़ने के लिए उसका मनोबल है। उनकी सौन्दर्य की चाह पूरी करने वाला साधन है।’’

रामचंद्र शुक्ल – ’’जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की मुक्ति की साधना के लिये मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं। इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग के समकक्ष मानते है।’’

पंत – ’’साहित्य अपने व्यापक अर्थ में, मानव जीवन की गम्भीर व्याख्या है।’’

धूमिल – ’’कविता शब्दों की अदालत में अपराधियों के कटघरे में खङे एक निर्दाेष आदमी का हलफनामा है।’’

अज्ञेय – ’’कविता सबसे पहले शब्द है और अन्त में भी यही बात रह जाती है कि कविता शब्द है।’’

धूमिल – ’’कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है।’’

रामचंद्र शुक्ल – ’’सत्त्वोद्रेक या हृदय की मुक्तावस्था के लिये किया हुआ शब्द विधान काव्य है।’’

आचार्य रामचंद्र शुक्ल – ’’जगत का नाना वस्तुओं-व्यापारों का एक रूप में रखना कि वे हमारे भाव चक्र के भीतर आ जायें। यही काव्य का लक्ष्य होता है।’’

प्रेमचंद – ’’जिस साहित्य में हमारी रुचि न जगे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें गति और शांति पैदा न हो, हमारा सौंदर्य-प्रेम न जागृत हो, न सच्ची दृढ़ता उत्पन्न करे, वह आज हमारे लिये बेकार है। वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं।’’

 

पाश्चात्य समीक्षकों के काव्य लक्षण

  • ड्राइडन कविता रागात्मक और छन्दोबद्ध भाषा के माध्यम से प्रकृति का अनुकरण है।
  • ड्राइडन ’’स्पष्ट संगीत कविता है।’’
  • वर्ड्सवर्थ कविता हमारे प्रबल भावों का सहज उच्छलन है।
  • जान्सन ’’छन्दमयी वाणी कविता है।’’
  • मैथ्यू आरनोल्ड ’’सत्य तथा काव्य सौंदर्य के सिद्धान्तों द्वारा निर्धारित उपबंधों के अधीन जीवन की समीक्षा का नाम काव्य है।’’
  • जान मिल्टन ’’सरल, प्रत्यक्ष तथा रागात्मक अभिव्यक्ति काव्य है।’’
  • वर्डसवर्थ ’’शान्ति के क्षणों में स्मरण किये हुए प्रबल मनोवेगों का सहज उच्छलन कविता है।’’
  • पी.बी. शैली कविता सुखद और उत्कृष्ट मस्तिष्क द्वारा सुखद और उत्कृष्ट क्षणों का संग्रह है।
  • एडगरे एलन ’’काव्य सौन्दर्य की लयपूर्ण सृष्टि है।’’
  • मैथ्यू आर्नल्ड ’’कविता मूल रूप से जीवन की आलोचना है।’’
  • कालरिज ’’सर्वाेत्तम् व्यवस्था में सर्वोत्तम शब्द ही कविता है।’’
  • हडसन ’’कविता कल्पना और संवेग के द्वारा जीवन की व्याख्या है।
  • पी. बी. शैली हमारे सबसे मधुर गीत वही हैं जो हमारे सर्वाधिक विषादपूर्ण विचारों की अभिव्यक्ति है।

हम इन परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते है कि काव्य की सर्वमान्य परिभाषा दे पाना कठिन है, क्योंकि कविता प्रत्येक काल में अपना रूप बदलती है। विद्वान् अपने-अपने ढंग से काव्य की परिभाषा देते हैं।

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