हिंदी भाषा: उद्भव, विकास, बोलियाँ, लिपि और भाषा विज्ञान के 96 प्रश्न-उत्तर

अंतिम संशोधित (Last Updated): October 12, 2026

हिंदी भाषा का इतिहास, उसकी उत्पत्ति, बोलियाँ और लिपि समझने के लिए भाषा विज्ञान की बुनियादी जानकारी ज़रूरी है। भाषा की परिभाषा, ध्वनि, पद, अर्थ, विश्व के भाषा परिवार और भारतीय आर्य भाषाओं का विकास: यही विषय UGC NET/JRF, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, स्कूल व्याख्याता (PGT), TGT, REET और B.A./M.A. हिंदी की परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाते हैं। इस लेख में हिंदी भाषा और भाषा विज्ञान के 96 महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर विषयवार दिए गए हैं, साथ में हिंदी के उद्भव-विकास और बोलियों की तालिकाएँ भी।

✅ हिंदी भाषा क्या है?
हिंदी भारोपीय (भारत-यूरोपीय) परिवार की एक आधुनिक भारतीय आर्य भाषा है, जिसका विकास लगभग 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश (मुख्यतः शौरसेनी अपभ्रंश) से हुआ। इसकी लिपि देवनागरी है। 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को संघ की राजभाषा स्वीकार किया (अनुच्छेद 343); इसी की याद में हर वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है।

हिंदी भाषा और भाषा विज्ञान के प्रश्न-उत्तर

📑 विषय-सूची

  1. हिंदी भाषा का उद्भव और विकास
  2. हिंदी की उपभाषाएँ और बोलियाँ
  3. भाषा किसे कहते हैं: परिभाषा, पक्ष और विशेषताएँ
  4. भाषा और बोली में अंतर
  5. भाषा विज्ञान क्या है? परिभाषा और अन्य शास्त्रों से संबंध
  6. ध्वनि विज्ञान: वाग्यंत्र, स्वर और व्यंजन के प्रश्न
  7. सुर, बलाघात और ध्वनि-आगम
  8. शब्द और पद-रचना (रूप विज्ञान)
  9. अर्थ विज्ञान: अर्थ परिवर्तन और अर्थबोध
  10. संसार के भाषा परिवार और भाषाओं का वर्गीकरण
  11. भारतीय आर्य भाषाएँ: वैदिक संस्कृत से अपभ्रंश तक
  12. हिंदी की बोलियाँ: अवधी, कन्नौजी और दक्खिनी हिंदी
  13. लिपि: अर्थ, विकास और हिंदी की लिपि देवनागरी
  14. एक नज़र में महत्वपूर्ण तथ्य
  15. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

हिंदी भाषा का उद्भव और विकास

Table of Contents

हिंदी का विकास एक लंबी परंपरा का परिणाम है। वैदिक संस्कृत से शुरू होकर भाषा लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत और अपभ्रंश से होती हुई लगभग 1000 ई. के आसपास पुरानी हिंदी के रूप में सामने आई। अपभ्रंश और आरंभिक हिंदी के बीच की संक्रमणकालीन भाषा को अवहट्ट कहा गया। सामान्य रूप से माना जाने वाला क्रम (तिथियाँ अनुमानित):

क्रमभाषा-रूपअनुमानित काल
1वैदिक संस्कृत1500 ई.पू. – 1000 ई.पू.
2लौकिक संस्कृत1000 ई.पू. – 500 ई.पू.
3पालि500 ई.पू. – 1 ई.
4प्राकृत1 ई. – 500 ई.
5अपभ्रंश500 ई. – 1000 ई.
6अवहट्ट (संक्रमण काल)900 ई. – 1100 ई.
7पुरानी हिंदी / हिंदी1000 ई. से आगे

👉 विस्तार से पढ़ें: अपभ्रंश, अवहट्ट और पुरानी हिंदी का परिचय | ब्रजभाषा का विकास

हिंदी की उपभाषाएँ और बोलियाँ

व्यापक अर्थ में हिंदी क्षेत्र की भाषा को पाँच उपभाषाओं में बाँटा जाता है, जिनके अंतर्गत 17 प्रमुख बोलियाँ आती हैं। परीक्षाओं में यह तालिका सीधे पूछी जाती है:

उपभाषाप्रमुख बोलियाँसंबंधित अपभ्रंश
पश्चिमी हिंदीखड़ी बोली (कौरवी), ब्रजभाषा, हरियाणवी (बाँगरू), बुंदेली, कन्नौजीशौरसेनी
पूर्वी हिंदीअवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ीअर्धमागधी
राजस्थानीमारवाड़ी, जयपुरी (ढूँढाड़ी), मेवाती, मालवीशौरसेनी
बिहारीभोजपुरी, मगही, मैथिलीमागधी
पहाड़ीकुमाऊँनी, गढ़वालीखस / शौरसेनी
💡 याद रखने की ट्रिक: 5 उपभाषाएँ, 17 बोलियाँ; बोलियों की गिनती: पश्चिमी हिंदी 5 + पूर्वी हिंदी 3 + राजस्थानी 4 + बिहारी 3 + पहाड़ी 2 = 17।

भाषा किसे कहते हैं: परिभाषा, पक्ष और विशेषताएँ

भाषा की परिभाषा, उसके व्यक्तिगत-सामाजिक पक्ष और विशेषताओं से जुड़े प्रश्न।

1. भाषा किसे कहते हैं?

भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर और पढ़कर अपने मन के भावों और विचारों का आदान-प्रदान करता है। भाषा को दो प्रकार से समझा जा सकता है: सामान्य अर्थ में और विशिष्ट अर्थ में। सामान्य अर्थ में भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है, जबकि विशिष्ट अर्थ में वह अभिव्यक्ति के अतिरिक्त भी बहुत कुछ है: वह समाज, संस्कृति और चिंतन की वाहक है।

👉 विस्तार से पढ़ें: भाषा किसे कहते हैं: परिभाषा, भेद और विशेषताएँ

2. डॉ. देवेन्द्रनाथ शर्मा के अनुसार भाषा की परिभाषा क्या है?

डॉ. देवेन्द्रनाथ शर्मा ने लिखा है कि उच्चरित ध्वनि संकेतों की सहायता से भाव या विचार की पूर्ण अभिव्यक्ति भाषा है। इस परिभाषा के अतिरिक्त उन्होंने एक स्थान पर यह कहा है कि जिसकी सहायता से मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय या सहयोग करते हैं, उस यादृच्छिक रूढ़ ध्वनि-संकेतों की प्रणाली को भाषा कहते हैं।

3. डॉ. बाबूराम सक्सेना और डॉ. देवेन्द्रनाथ शर्मा की भाषा-परिभाषाओं से क्या निष्कर्ष निकलते हैं?

डॉ. बाबूराम सक्सेना और डॉ. देवेन्द्रनाथ शर्मा की परिभाषाओं से ये निष्कर्ष निकलते हैं:

➡️ भाषा विचारों के आदान-प्रदान का साधन है।

➡️ भाषा उच्चारण-अवयवों से उत्पन्न ध्वनि-संकेतों की व्यवस्था है।

➡️ भाषा के अंतर्गत एक निश्चित व्यवस्था, संगठन और क्रम होता है।

➡️ भाषा में प्रयुक्त ध्वनि-समूह सार्थक होते हैं, किंतु भावों और विचारों के साथ उनका संबंध यादृच्छिक (‘आरबिटरी’) होता है।

4. भाषा के प्रमुख पक्ष कौन-कौन से हैं?

भाषा एक विकसनशील वस्तु है, उसमें समय, परिस्थिति और संदर्भ के अनुकूल परिवर्तन होता रहता है। जहाँ तक भाषा के पक्षों का प्रश्न है, वे तीन हैं- व्यक्तिगत पक्ष, सामाजिक पक्ष और सर्वव्यापक पक्ष। भाषा-विज्ञानी सोसूर ने भाषा के व्यक्तिगत पक्ष को ‘पारोल’ कहा है। यह एक ऐसा शब्द है जिसे अंग्रेजी में ‘स्पीच’ और हिन्दी में ‘वाणी’ के द्वारा समझा जा सकता है।

5. भाषा के व्यक्तिगत पक्ष से क्या तात्पर्य है?

भाषा का व्यक्तिगत पक्ष अत्यन्त महत्वपूर्ण है। भाषा का जन्म व्यक्ति से होता है, क्योंकि ध्वनि के उच्चारण की क्षमता उसी में रहती है। व्यक्ति समाज में भाषा प्राप्त करता है। वह समाज में रहकर उसका प्रयोग करता है और समय-समय पर परिस्थिति के अनुकूल उसे नया रूप प्रदान करता है।

डॉ. देवेन्द्रनाथ शर्मा ने लिखा है कि व्यक्तिगत भाषा या वाणी के दो अनिवार्य पहलू है- बोध और अभिव्यंजना। बोध आदान का साधन है और अभिव्यंजना प्रदान का। बोध की सहायता से भाषा ग्रहण की जाती है और अभिव्यंजना की सहायता से वह समाज को दी जाती है। यही भाषा का व्यक्तिगत पक्ष है।

6. भाषा का सामाजिक पक्ष क्या है?

भाषा की उत्पत्ति भले ही व्यक्ति द्वारा हुई हो, किन्तु वह पूर्णतः सामाजिक वस्तु है। भाषा का निर्माण समाज के लिए होता है और उसका उपयोग भी समाज के लिए ही किया जाता है। भाषा के जितने भी रूप है, उन सभी में सामाजिक रूप ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भाषा के वैयक्तिक पक्ष में मुख्य रूप से ध्वनन आता है। श्रवण का प्रश्न समाज से संबंधित है। व्यक्ति अकेला रहकर बोल तो सकता है, किन्तु सुनना उसके लिए सम्भव नहीं है।

7. आंगिक भाषा किसे कहते हैं?

विकासवाद के अनुसार मनुष्य एक दिन अन्य पशुओं की कोटि का ही जीव था, उसके पास कोई भाषा नहीं थी। अतः वह आंगिक चेष्टाओं की सहायता से अपनी बात दूसरों तक पहुँचाता था। आंगिक भाषा का अर्थ ही यह है कि शारीरिक चेष्टाओं के द्वारा अपनी बात को दूसरे को समझाना। आंगिक चेष्टाओं से भाव तो प्रकट हो जाता है, किन्तु उससे जीवन में अधिक काम नहीं चल सकता है। इस भाषा की इसीलिए अनेक सीमाएँ हैं।

8. क्या भाषा पैतृक संपत्ति है?

कुछ विद्वानों की मान्यता है कि भाषा पैतृक सम्पत्ति है। जिस प्रकार पैतृक सम्पत्ति का भागी और अधिकारी पुत्र होता है, उसी प्रकार भाषा भी पिता से पुत्र को सम्पत्ति के रूप में प्राप्त होती है। वस्तुतः भाषा की प्रथम विशेषता यह है कि वह पैतृक सम्पत्ति नहीं है। यदि वह पैतृक सम्पत्ति होती तो पिता की भाषा पुत्र की भाषा ही होती किन्तु ऐसा नहीं है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि भाषा अर्जित सम्पत्ति है।

9. भाषा आदि से अंत तक समाज की वस्तु है: स्पष्ट कीजिए।

भाषा को किसी भी स्थिति में पैतृक सम्पत्ति नहीं माना जा सकता है। भाषा अर्जित की जाती है। भाषा का यह अर्जन समाज से होता है। भाषा प्रारम्भ से अन्त तक समाज की ही वस्तु है और उसका जन्म और विकास भी समाज में ही होता है। अतः मनुष्य भाषा का अर्जन समाज से ही करता है और उसका प्रयोग भी, जो अर्जन के बाद की स्थिति है, समाज में ही होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि भाषा अथ से इति तक (आदि से अंत तक) समाज की वस्तु बनी रहती है।

10. मनुष्य और भाषा का क्या संबंध है?

मनुष्य के साथ भाषा का संबंध आदिकाल से है। आदिम व्यवस्था से मनुष्य अकेलेपन से भयभीत रहा है। सुरक्षा और सुविधा के लिए उसने मिल-जुलकर रहना प्रारम्भ किया। यह समूह भावना ही अपने मन की बात दूसरों तक पहुँचाने की इच्छा पैदा करती है। बात करने के लिए बोलना आवश्यक है। बोलना ही भाषा की प्रथम सीढ़ी है। आदमी का बोलना सृष्टि के अन्य प्राणियों के बोलने से पृथक् प्रकार का होता है। इसी से भाषा मानव-श्रम की श्रेष्ठतम निधि है।

11. भाषा सर्वव्यापी है: कैसे प्रमाणित करेंगे?

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसकी सामाजिकता गवाह है कि उसके प्रत्येक कार्य-कलाप के मूल में भाषा है। मनुष्य का आन्तरिक और बाह्य, वैयक्तिक और सामाजिक, चिन्तन और अभिव्यंजन सबका सब भाषा का परिणाम है। भर्तृहरि ने तो लौकिक कर्तव्यबोध का ज्ञान भाषा पर ही आश्रित स्वीकार किया है। ‘वाक्यपदीय’ में समस्त ज्ञान को भाषा से संबंधित मानकर उसकी सर्वव्यापकता प्रकाशित की गयी है जिसके अनुसार संसार में ऐसा कोई प्रत्यय नहीं है जो भाषा के अभाव में सम्भव दिखाई देता है।

12. हर भाषा का ढाँचा अलग और स्वतंत्र होता है: कैसे?

प्रत्येक भाषा का ढाँचा और उसकी बनावट पृथक् और स्वतन्त्र होती है। इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है, अनेक कारण हैं जो इस स्वातंत्र्य और पार्थक्य को स्पष्ट करते हैं। हिन्दी, संस्कृत, गुजराती, अंग्रेजी सभी में लिंग, वचन और काल के संदर्भ में जो अंतर है, उसी से प्रत्येक भाषा का ढाँचा पृथक और स्वतन्त्र होता है। रूसी में ‘ह’ नहीं होता है, ‘ख’ ही होता है। अतः ‘नेहरू’ को ‘नेखरू’ और ‘हर्ष’ को ‘खर्ष’ ही लिखते हैं।

13. क्या भाषा कठिनता से सरलता की ओर बढ़ती है?

मनुष्य कम से कम श्रम में अधिक से अधिक कार्य करना चाहता है। मनुष्य की यही प्रवृत्ति भाषा की इस प्रवृत्ति के लिए उत्तरदायी है। इस बात को एक शब्द ‘रेफ्रीजरेटर’ से स्पष्ट किया जा सकता है। आज इसे केवल ‘फ्रिज’ कहकर काम चलाया जाता है। पूरा शब्द बोलने में कठिन लगता है, इसलिए सरलीकरण करके ‘फ्रिज’ बना लिया गया है। व्याकरण में भी यही नियम लागू होता है।

14. भाषा के विविध रूप कौन-कौन से हैं?

भाषा विविधात्मक होती है, इसलिए उसके अनेक रूप देखने को मिलते हैं। उसके प्रमुख रूप हैं: परिनिष्ठित (मानक) भाषा, विभाषा, अपभाषा, विशिष्ट भाषा, कूट भाषा, कृत्रिम भाषा और मिश्रित भाषा। ये सभी रूप आज भी व्यवहार में देखे जा सकते हैं, क्योंकि भाषा का निरंतर विकास होता रहता है।

भाषा और बोली में अंतर

15. भाषा और बोली में क्या अंतर है?

भाषा और बोली में ये प्रमुख अंतर हैं:

आधारभाषाबोली
क्षेत्रव्यापकसीमित (स्थानीय)
परस्पर बोधगम्यताअलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले एक-दूसरे को प्रायः नहीं समझ पातेएक भाषा की विभिन्न बोलियाँ बोलने वाले एक-दूसरे को समझ लेते हैं
प्रयोगशिक्षा, शासन, साहित्य और गंभीर विचार-विनिमयघरेलू और स्थानीय बातचीत
व्याकरण और मानक रूपनिश्चित व्याकरण और मानक रूपप्रायः मानक रूप नहीं
उदाहरणहिंदी, बांग्ला, मराठीब्रज, अवधी, भोजपुरी

16. बोली किसे कहते हैं?

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने बोली को परिभाषित करते हुए कहा है कि “बोली किसी एक भाषा के एक ऐसे क्षेत्रीय रूप को कहते हैं जिसमें ध्वनि रूप, वाक्यगठन, अर्थ, शब्द समूह तथा मुहावरे आदि की दृष्टि से वह भाषा के परिनिष्ठित और अन्य क्षेत्रीय रूपों से भिन्न होती है, किन्तु इतनी भिन्न नहीं कि अन्य रूपों को बोलने वाले उसे समझ न सकें। साथ ही जिसके अपने क्षेत्र में कहीं भी बोलने वालों को उच्चारण, रूप-रचना, वाक्यगठन, अर्थ, शब्द समूह तथा मुहावरों आदि में कोई बहुत ही स्पष्ट भिन्नता नहीं होती है।”

भाषा विज्ञान क्या है? परिभाषा और अन्य शास्त्रों से संबंध

17. भाषा विज्ञान किसे कहते हैं?

भाषा विज्ञान दो शब्दों का मेल है- भाषा और विज्ञान। इस आधार पर भाषा विज्ञान भाषा का विज्ञान है। ज्ञान में ‘वि’ उपसर्ग लग जाने से विज्ञान शब्द का निर्माण हुआ है जिसका अर्थ है विशिष्ट ज्ञान। इस आधार पर भाषा विज्ञान का विशिष्ट ज्ञान कहलाता है। भाषा के विज्ञान के अंतर्गत भाषा के अनेक पक्षों तथा अनेक रूपों और प्रकारों का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाता है। इसी वैज्ञानिक अध्ययन के कारण भाषाओं का विशिष्ट अध्ययन भाषा विज्ञान कहलाता है।

18. भाषा विज्ञान की परिभाषाओं से क्या निष्कर्ष निकलते हैं?

भाषा-विज्ञान की विविध परिभाषाओं से प्रमुख रूप से तीन निष्कर्ष होते हैं-
1. भाषा-विज्ञान भाषा का विशिष्ट एवं वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करता है। उसमें भाषा के सभी अंगों और उपांगों का विवेचन भी शामिल है।
2. भाषा-विज्ञान व्यवस्थित एवं विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करने वाली महत्वपूर्ण विधि है।
3. भाषा-विज्ञान में भाषा के विविध रूपों के संबंध मे सुनिश्चित नियमों का अन्वेषण और प्रस्तुतीकरण किया जाता है।

19. भाषा का भौतिक आधार क्या है?

विचार यदि भाषा की आत्मा है तो भौतिक आधार भाषा का शरीर है। विचार को अभिव्यक्त करने के लिए इस शरीर रूपी वाहन का सहारा लेना पड़ता है। भाषा के भौतिक आधार के अंतर्गत मुख और नासिका के सभी अवयव आ जाते हैं। इससे ध्वनि के उच्चारण में सहायता मिलती है। वक्ता की दृष्टि से भाषा के भौतिक आधार मुख, जिह्वा, दाँत, ओष्ठ, तालू, कण्ठ और नासिका है। श्रोता की दृष्टि से भाषा का भौतिक आधार कान है जिसके सहारे ध्वनि को ग्रहण किया जाता है।

20. मानव विज्ञान और भाषा विज्ञान में क्या संबंध है?

भाषा के बोलने में बोलने वाले की वागेन्द्रियाँ और सुनने वाले की श्रवणेंद्रियाँ सहायक हैं। मानव विज्ञान आदिम विकास से लेकर वर्तमान तक शरीर की बनावट के संबंध में विचार करता है। मनुष्य की शारीरिक संरचना से भाषा प्रभावित होती है, इसी से भाषा विज्ञान के साथ मानव-विज्ञान सहायक है। प्रजातियों के साथ भाषाओं के संबंध, प्रजातियों के सम्मिश्रण, सम्मिश्रण के बाद भाषा-परिवर्तन और एक भाषा के रूप-विकास का दूसरी भाषा के रूप-विकास में प्रजातियों के आधार पर सहयोग मानव विज्ञान के द्वारा जाने जाते हैं।

21. भाषा विज्ञान और तर्कशास्त्र में क्या संबंध है?

प्रत्यक्षतः तो भाषा विज्ञान और तर्कशास्त्र में कोई गहरा संबंध नहीं है, किन्तु गहराई से विचार करें तो स्पष्ट होता है कि इन दोनों में संबंध तो आवश्यक है। तर्कशास्त्र जिस तर्क प्रणाली को अपनाता है, वही भाषा विज्ञान में भी व्यवहृत होती है।

‘यास्क’ के ‘निरुक्त’ में जिस तर्क पद्धति को स्वीकार किया गया है, वह भी यही प्रमाणित करती है कि तर्कशास्त्र और भाषा-विज्ञान में संबंध है। यों भी भाषा विज्ञान में जो वैज्ञानिकता है वह तर्काधारित ही मानी गयी है। “भारतीय तर्कशास्त्र वस्तुतः भाषा के चरम अवयव वाक्य ही का विज्ञान है। यह भाषा के सहारे ही चलता है।” अतः भाषा विज्ञान और तर्कशास्त्र का संबंध स्पष्ट है।

ध्वनि विज्ञान: वाग्यंत्र, स्वर और व्यंजन के प्रश्न

ध्वनि कैसे बनती है, कौन-से अंग बोलने में मदद करते हैं और स्वर-व्यंजनों का वर्गीकरण कैसे होता है।

22. ध्वनि के कितने पक्ष हैं?

भाषा की रचना ध्वनियों से होती है। इसी से सार्थक ध्वनि भाषा की मूल इकाई है। भाषा विज्ञान ध्वन्यात्मक भाषा का विवेचन करता है। ध्वनि कैसे उत्पन्न होती है, बोलने वाले से सुनने वाले तक कैसे पहुँचती है और सुनने वाला उस ध्वनि को सुनकर उसका आशय किस तरह समझता है? आदि स्थितियाँ ही ध्वनि के पक्षों को व्यक्त करती हैं। इसी आधार पर ध्वनि के तीन पक्ष स्पष्ट हो जाते हैं- पहला उत्पादन, दूसरा संवहन और तीसरा ग्रहण।

23. ध्वनि के उत्पादन और ग्रहण में शरीर के कौन-से अंग सहायक हैं?

ध्वनि के उत्पादन और ग्रहण का संबंध बोलने वाले और सुनने वाले से है। बोलने वाला वाग्यंत्रों (फेफड़े, स्वर-यंत्र, मुख, जीभ, तालु, दाँत, ओष्ठ, नासिका) की सहायता से ध्वनि उत्पन्न करता है और सुनने वाला श्रवणेंद्रिय (कान) से उसे ग्रहण करता है; फिर तंत्रिका-तंत्र उसे मस्तिष्क तक पहुँचाकर अर्थ समझने में मदद करता है। दोनों के बीच वायु के माध्यम से ध्वनि का संवहन होता है।

शरीर-विज्ञान में नौ तंत्र माने गए हैं: अस्थि, पेशी, श्वसन, पाचन, परिसंचरण, उत्सर्जन, तंत्रिका, अंतःस्रावी और जनन तंत्र। इनमें से भाषण से सीधा संबंध श्वसन और पाचन तंत्र का है (अगला प्रश्न देखें), और ग्रहण से तंत्रिका-तंत्र का।

24. शरीर के कौन-से तंत्र भाषण से संबंधित हैं और क्यों?

मानव शरीर से संबंधित इन तंत्रों के कार्य जीवन में सहायक होते हैं। इन तंत्रों में श्वसन-तंत्र और पाचन-तंत्र का संबंध भाषण से है। ये दोनों तंत्र कण्ठ के पास मिले हुए है। नाक के द्वारा जो हवा फेफड़ों के लिए जाती है और मुँह से खाया जाने वाला भोजन आमाशय तक जाता है। इन दोनों का कुछ दूरी तक मार्ग एक ही है।

गले के नीचे ये मार्ग श्वासनली और भोजननली में बँट जाते हैं। श्वासनली हवा को फेफड़ों तक लाने-ले-जाने का काम करती है और भोजननली भोजन को आमाशय तक पहुँचाती है। भोजननली के द्वार पर ऐसी व्यवस्था है कि भोजन निगलते समय श्वासनली का मुख कुछ देर के लिए बन्द हो जाता है। इसलिए इन दोनों तंत्रों का ही संबंध भाषण से है।

25. बोलने में फेफड़ों का क्या कार्य है?

जीवन की अन्तिम साँस तक साँसों का आना-जाना लगातार बना रहता है। भीतर खींची गयी हवा से हमारे शरीर के खून की सफाई होती है और बाहर फेंकी गयी हवा के द्वारा दूषित तत्व शरीर से बाहर कर दिए जाते हैं। फेफड़ों का मुख्य कार्य हवा को खींचना और बाहर निकालना है। बातचीत करने में, सार्थक ध्वनियों की रचना में फेफड़े मदद करते हैं और यह मदद मुख्य कार्य न होकर फेफड़ों का सहयोगी कार्य है।

26. स्वर-यंत्र क्या कार्य करता है?

श्वास-नली के ऊपरी हिस्से में स्वर-यंत्र होता है, जिससे होकर फेफड़ों से निकली हवा बाहर आती है। स्वर-यंत्र के बीच होठों के आकार की दो लचीली मांसल झिल्लियाँ होती हैं, जिन्हें स्वर-तंत्रियाँ कहा जाता है। इन स्वर-तंत्रियों के बीच के खुले भाग को कंठ-द्वार या काकल कहते हैं। स्वर-तंत्रियों के कंपन से ही घोष ध्वनियाँ बनती हैं।

27. ध्वनियों के उच्चारण में सबसे सहयोगी अंग कौन-सा है?

ध्वनियों के उच्चारण में मुख सबसे अधिक सहयोगी होता है। मुख के ऊपर छत (तालु) है और नीचे जीभ। छत में सबसे पीछे कोमल तालु है, जिसके सिरे पर मांस का छोटा पिंड लटकता है; इसे अलिजिह्वा (कौआ) कहते हैं। कोमल तालु ऊपर उठकर नासिका-मार्ग बंद कर देता है और नीचे आने पर नासिका-मार्ग खुल जाता है (अनुनासिक ध्वनियाँ इसी से बनती हैं)।

कोमल तालु के आगे कठोर तालु है, जिसका सबसे ऊँचा भाग मूर्धा कहलाता है। उसके आगे, दाँतों के ठीक पीछे का खुरदरा उभार वर्त्स (दंतमूल) है। फिर दाँत और सबसे आगे दोनों होंठ हैं। इन सब अवयवों का सहयोग ध्वनियों के उच्चारण में लिया जाता है।

28. उच्चारण की दृष्टि से जीभ के कितने भाग हैं?

जीभ ध्वनियों के उच्चारण में सबसे सहायक अंग है। उच्चारण की दृष्टि से जीभ के चार भाग माने जाते हैं:

  1. जिह्वा-पश्च (जिह्वामूल): जीभ का पिछला भाग, कोमल तालु के सामने।
  2. जिह्वा-मध्य (पृष्ठ): कठोर तालु के सामने का भाग।
  3. जिह्वाग्र: वर्त्स और दाँतों के सामने का भाग।
  4. जिह्वानोक: जीभ का सबसे आगे का छोर।

ध्वनियों के अलग-अलग रूप मुख-विवर की आकृति, कोमल तालु, जीभ और ओष्ठों की अलग-अलग स्थितियों से बनते हैं।

29. ध्वनियों का वर्गीकरण किन आधारों पर किया जाता है?

भाषा के निमित्त उपयोगी ध्वनियों का वर्गीकरण अनेक विद्वानों ने किया है, किन्तु सभी विद्वानों का मत इस विषय में एक जैसा ही है। भाषा के लिए उपयोगी ध्वनियों का वर्गीकरण बोलने के स्थान, बोलने में सहयोग देने वाले अवयवों और बोलते समय किये जाने वाले प्रयत्नों के आधार पर किया जाता है। इन आधारों को- 1. स्थान, 2. करण और 3. प्रयत्न नाम से जाना जाता है।

30. ध्वनि के कितने भेद हैं?

ध्वनि के सामान्य रूप से दो भेद हैं-
1. स्वर और
2. व्यंजन

स्वर का उच्चारण अपने आप हो जाता है और व्यंजन बोलते समय किसी न किसी स्वर की सहायता लेनी पड़ती है। ध्वनि के उच्चारण में श्वासाघात मूल रूप से सहायक है। इस दृष्टि से जिन ध्वनियों का उच्चारण करते समय निःश्वास में कहीं कोई अवरोध नहीं होता, वे स्वर हैं। जिन ध्वनियों के उच्चारण करते समय निःश्वास में कहीं न कहीं अवरोध होता है, वे व्यंजन हैं।

31. ध्वनि विवेचन में स्थान का क्या महत्व है?

ध्वनियों के उच्चारण करते समय जिन स्थानों पर निःश्वास वायु रुकती है अथवा उसके आने-जाने में रुकावट आती है, उन्हें स्थान कहा जाता है। स्थान अचल है, काकल, कंठ, तालु, मूर्धा, वर्त्स्य, दन्त और ओष्ठ स्थान है। इन स्थानों से बोली जाने वाली ध्वनियाँ- 1. काकल्य, 2. कंठ्य, 3. तालव्य, 4. मूर्धन्य, 5. वर्त्स्य, 6. दन्त्य, 7. ओष्ठ्य कहलाती हैं।

32. स्वरों के उच्चारण में जीभ की ऊँचाई का क्या महत्व है?

स्वरों को बोलते समय जीभ की ऊँचाई, जीभ का उठना-गिरना और होठों का भिन्न-भिन्न आकार में बदलना सहयोग देता है। इन्हीं आधारों पर स्वर के भेद है। इन भेदों के कारण है- 1. जिह्वा की ऊँचाई, 2. जिह्वा का उत्थापित भाग और 3. ओष्ठों की स्थिति। स्वर-ध्वनियों के उच्चारण के समय निःश्वास वायु मुख विवर से बिना किसी बाधा के बाहर निकलती है, लेकिन साँस बाहर निकलने के रास्ते को सँकरा कर दिया जाता है। निःश्वास के निर्गम-मार्ग को संकीर्ण करने का काम जीभ ऊपर उठकर करती है। संकीर्णता कहीं कम होती है और कहीं-कहीं अधिक।

33. अग्र स्वर, केंद्रीय स्वर और पश्च स्वर कौन-से हैं?

अग्र स्वर- इ, ई, ए, ऐ का उच्चारण करते समय जीभ का अग्रभाग ऊपर उठता है, इसी से उन्हें अग्र स्वर कहा जाता है।

केंद्रीय स्वर- ‘अ’ को बोलते समय जीभ के बीच का भाग ऊपर उठता है।

पश्च स्वर- आ, उ, ऊ, ओ, औ का उच्चारण करते समय जीभ के पिछले भाग को उठाया जाता है।

34. मुख-विवर के आधार पर स्वरों के कितने भेद हैं?

मुख-विवर के खुलने की मात्रा (जीभ और तालु के बीच की दूरी) के आधार पर स्वर चार भेदों में बँटते हैं:

➡️ विवृत: जीभ और तालु के बीच अधिकतम दूरी, मुख पूरा खुला; जैसे ‘आ’। विवृत का अर्थ है खुला।

➡️ अर्धविवृत: दूरी कुछ कम; जैसे ‘ऐ’, ‘औ’।

➡️ अर्धसंवृत: दूरी और कम; जैसे ‘ए’, ‘ओ’।

➡️ संवृत: जीभ और तालु के बीच न्यूनतम दूरी, मुख लगभग बंद; जैसे ‘इ’, ‘ई’, ‘उ’, ‘ऊ’।

35. ओष्ठों की स्थिति के आधार पर स्वरों के भेद बताइए।

बोलने में होठों का महत्व जीभ से कम नहीं है। भीतर जीभ और बाहर ओष्ठ मिलकर साँस को ध्वनि का रूप देते हैं। ओष्ठों की स्थिति के अनुसार स्वर तीन प्रकार के हैं:

➡️ प्रसृत (अवृत्तमुखी): होंठ फैले रहते हैं; इ, ई, ए, ऐ।

➡️ वर्तुल (वृत्तमुखी): होंठ आगे निकलकर गोल हो जाते हैं; उ, ऊ, ओ, औ।

➡️ अर्धवर्तुल: होंठ आधे गोल रहते हैं; ‘आ’।

36. व्यंजनों का वर्गीकरण कैसे किया जाता है?

व्यंजनों के वर्गीकरण के आधार हैं: स्थान, करण और प्रयत्न। स्थान के आधार पर व्यंजन काकल्य, कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, वर्त्स्य, दंत्य और ओष्ठ्य हैं। आभ्यंतर प्रयत्न के आधार पर इनके भेद हैं: स्पर्श, स्पर्श-संघर्षी, संघर्षी, अनुनासिक, पार्श्विक, लुंठित (लोटित), उत्क्षिप्त और अर्धस्वर। बाह्य प्रयत्न के आधार पर घोष-अघोष और अल्पप्राण-महाप्राण भेद किए जाते हैं।

37. ध्वनि में मात्रा का अर्थ और महत्व क्या है?

मात्रा का सामान्य अर्थ वजन है। वजन तौल का आशय देता है और ध्वनि के लिए यह काल की सीमा बतलाता है। इसी से मात्रा का ध्वनि से सीधा-सीधा संबंध काल की सीमा से है। जिस ध्वनि के उच्चारण में जितना समय लगता है, वह समय ही मात्रा के नाम से पुकारा जाता है। सामान्य रूप से मात्राएँ ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत हैं। मात्राओं की गणना करते समय ह्रस्व को एक मात्रिक, दीर्घ को द्विमात्रिक और प्लुत को त्रिमात्रिक मान लिया जाता है। समय की सीमा अथवा काल के अनुसार जितना समय ह्रस्व में लगता है, उससे दुगुना समय दीर्घ में और तिगुना समय प्लुत के उच्चारण में लगता है।

सुर, बलाघात और ध्वनि-आगम

38. सुर किसे कहते हैं? इसका महत्व क्या है?

किसी ध्वनि का उच्चारण करते समय कंपन की आवृत्ति को सुर कहा जाता है। कंपन जितना अधिक होता है, सुर उतना ही उच्च माना जाता है और कंपन की मात्रा कम होने की दशा में सुर को निम्न कहा जाता है। कंप स्वर तंत्रियों के फैलाव से उत्पन्न होता है। सुर के उच्च, निम्न और सम वर्ग है जिन्हें उदात्त, अनुदात्त और स्वरित नाम से पुकारा जाता है। घृणा, क्रोध, आश्चर्य, स्नेह आदि मनोभावों को व्यक्त करने में सुर सहायता करता है। सुर के कारण शब्द के साथ वाक्य का भी अर्थ परिवर्तित हो जाता है।

39. आघात का क्या अर्थ है?

सामान्य रूप से आघात का अर्थ चोट है। ध्वनि के धरातल पर आघात के दो भेद हैं। एक में स्वर अथवा तान का उपयोग किया जाता है और दूसरे में बल अथवा श्वास-वायु का उपयोग किया जाता है। इन्हें स्वराघात और बलाघात नाम से जाना जाता है। आघात किसी ध्वनि, शब्द, पद, वाक्यांश अथवा वाक्य पर होता है। इस स्थिति में श्वास वायु का धक्का किसी एक पद पर दिया जाता है।

40. बलाघात किसे कहते हैं?

बलाघात शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘बल’ और ‘आघात’। आघात शब्द अंग्रेजी के एक्सेंट के लिए हिन्दी में प्रयोग किया जाता है। भाषा-विज्ञान में एक्सेंट के तीन अर्थ हैं: कुछ विद्वान इसको विस्तृत अर्थ में ग्रहण करते हैं तो दूसरे कुछ ऐसे विद्वान है जो इसे सीमित अर्थ में ग्रहण करते हैं और इसी आधार पर उसे मात्रा बलाघात ही मानते हैं। तीसरे अर्थ में आघात इन दोनों अर्थों के बीच में पड़ता है। उसमें बलाघात और स्वराघात केवल दो ही चीजें शामिल है। भाषा-विज्ञान में यही अर्थ प्रचलित और मान्य है।

41. बलाघात कितने प्रकार का होता है?

सामान्यतः विद्वानों ने बलाघात के दो भेद किए है- शब्द बलाघात और वाक्य बलाघात। डॉ. भोलानाथ तिवारी के द्वारा किए गये बलाघात के भेद भाषा विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए अधिक उचित एवं ग्राह्य प्रतीत होते हैं। बलाघात का अर्थ स्पष्ट करते समय बताया गया है कि उच्चारण करते समय बल या आघात कभी तो किसी शब्द पर पड़ता है, कभी वाक्य पर, कभी ध्वनि पर और कभी अक्षर पर। ऐसी स्थिति में बल पड़ने की इसी प्रक्रिया के आधार पर बलाघात के चार भेद किए जा सकते हैं- ध्वनि बलाघात, अक्षर बलाघात, शब्द बलाघात और वाक्य बलाघात।

42. अक्षर बलाघात से क्या तात्पर्य है?

स्वतन्त्र शब्दों अथवा वाक्यों के अक्षरों पर बल कभी-भी समान नहीं होता है। उन अक्षरों में से किसी एक पर बलाघात होता है। अंग्रेजी का अपोरच्युनिटी शब्द लें तो स्पष्ट है कि इसमें पाँच अक्षर हैं। तुलनात्मक दृष्टि से प्रथम बलाघात तीसरे अक्षर पर, दूसरा बलाघात पहले पर, तीसरा पाँचवे पर और चौथा दूसरे पर व पाँचवा चौथे पर है। यही अक्षर बलाघात है। कुछ लोगों की मान्यता है कि अक्षर बलाघात और शब्द बलाघात में कोई अंतर नहीं है।

43. स्वरागम किसे कहते हैं?

उच्चारण की सुविधा के लिए शब्द में कोई नया स्वर आ जाना स्वरागम कहलाता है। यह आदि, मध्य और अंत, तीन स्थितियों में होता है:

➡️ आदि स्वरागम: स्कूल → इस्कूल, स्थान → अस्थान, स्टेशन → इस्टेशन।

➡️ मध्य स्वरागम: धर्म → धरम, कर्म → करम, शर्म → शरम, पूर्व → पूरब, स्वर्ण → सुवरन।

➡️ अंत्य स्वरागम: दवा → दवाई, हवा → हवाई, पूर्वा → पुरवाई।

कुछ विद्वान समस्वरागम की चौथी स्थिति भी मानते हैं, जिसमें पहले से मौजूद स्वर के सादृश्य पर वैसा ही दूसरा स्वर आ जाता है।

44. अक्षरागम किसे कहते हैं?

अक्षरागम के उदाहरण बहुत कम पाये जाते हैं। आदि अक्षरागम के उदाहरणस्वरूप फजूल-बेफिजूल, मध्य अक्षरागम के उदाहरणस्वरूप आलसी-आलकसी, कमी-कमताई आदि को लिया जा सकता है। अन्त्य अक्षरागम के उदाहरणस्वरूप आंख-आंखड़ी, मुख-मुखड़ा और बला-बलाय आदि को लिया जा सकता है।

शब्द और पद-रचना (रूप विज्ञान)

45. शब्द के विषय में जैन मत क्या है?

जैन मत मुख्य रूप से दो तत्वों को स्वीकार करता है- चेतन और जड़। जड़ के दो रूप हैं- एक मूर्त और दूसरा अमूर्त। पुद्गल मूर्त कोटि का जड़ कहलाता है और आकाश अमूर्त कोटि का। शब्द मूर्तिमान है, इसलिए जड़ पुद्गल का विशेष प्रकार का परिणाम है। शब्द और आकाश में गुण-गुणी अथवा कार्य-कारण संबंध को जैन दृष्टि स्वीकार नहीं करती है। भाषा की शब्द की वर्गणाएँ, लोकाकाश में प्रसूत है। ‘वर्गणा’ का तात्पर्य ‘परमाणु’ शब्द से अभिव्यक्त हो सकता है।

46. शब्द के विषय में कपिल, गौतम और कणाद के मत क्या हैं?

सांख्य दर्शन के आदि आचार्य कपिल मुनि के अनुसार शब्द प्रकृति का विकार है। प्रकृति जड़ और व्यापक है; आकाश की उत्पत्ति शब्द-तन्मात्रा से हुई है (तन्मात्रा को ‘सूक्ष्म परमाणु’ जैसा समझा जा सकता है)।

न्याय दर्शन के प्रवर्तक गौतम और वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक कणाद ने शब्द को आकाश का गुण माना है। उनके अनुसार शब्द वीचि-तरंग न्याय (पानी की लहरों की तरह) और कदंब-मुकुल न्याय (कदंब की कलियों की तरह चारों ओर) से आकाश में फैलता है।

47. पद किसे कहते हैं?

शब्द के उस रूप को ‘पद’ कहते हैं जो विभक्ति प्रत्यय या परसर्ग का संयोग ग्रहण कर तथा किसी वाक्य में प्रयुक्त होकर अर्थ बोध एवं भाव बोध में सर्वथा समर्थ होता है। इस दृष्टि से ‘हाथी’, ‘सरोवर’, ‘कमल’ तथा ‘तोड़ना’ केवल शब्द है, जबकि ‘हाथी ने’, ‘सरोवर में’, ‘कमलों को’, ‘तोड़ा’ ये चारों पद है क्योंकि ‘ने’, ‘में’, ‘को’ विभक्तियाँ तथा ‘आ’ प्रत्यय का संयोग हुआ है और इन विभक्तियों एवं प्रत्यय ने उक्त शब्दों को ‘पद’ की योग्यता प्रदान की है।

48. पद-रचना की पद्धति क्या है?

पद-रचना की अनेक प्रक्रियाएँ हैं। प्रमुख रूप से पद-रचना के लिए प्रकृति और प्रत्यय की आवश्यकता होती है। प्रकृति और प्रत्यय के योग से निष्पन्न शब्दों के आरम्भ में उपसर्ग और अन्त में विभक्ति लगाकर अर्थ-भेद किया जाता है।

इसी तथ्य को यों भी कह सकते हैं कि

“अर्थ-तत्व में रचना-तत्त्व के योग से पद की निष्पत्ति होती है।”

योगात्मक भाषाओं में भी सर्वत्र रचना-तत्व ही हो, यह आवश्यक नहीं है।

49. संबंध तत्व के कितने प्रकार हैं?

पद-रचना के अंतर्गत संबंध तत्वों को देखने से ज्ञात होता है कि संबंध तत्व अनेक प्रकार के होते हैं। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार ये दस प्रकार के होते हैं-
1. शब्द स्थान
2. शून्य संबंध तत्व
3. स्वतन्त्र शब्द
4. ध्वनि प्रतिस्थापन
5. ध्वनि द्विरावृत्ति
6. ध्वनि वियोजन
7. पूर्व सर्ग
8. मध्य सर्ग
9. अन्त सर्ग अथवा विभक्ति अथवा प्रत्यय
10. ध्वनिगुण अथवा बलाघात।

इनके अतिरिक्त भी अनेक प्रकार के संबंध तत्व पाए जाते हैं परन्तु अधिक प्रचलित केवल ये ही है।

50. पद-रचना में संबंध तत्व की क्या भूमिका है?

पद रचना में संबंध तत्त्व का प्रमुख कार्य होता है वाक्य में अर्थ तत्वों का पारस्परिक संबंध निर्देश। उदाहरण के लिए यह वाक्य ले सकते हैं- “कृष्ण ने दुशासन को चक्र से मारा”। इस वाक्य में ‘कृष्ण’, ‘दुशासन’, ‘चक्र’ और ‘मारना’ शब्द अर्थ तत्व है और ‘ने’, ‘को’, ‘से’ प्रत्यक्षात्मक संबंध तत्त्व है। ‘मारा’ में संबंध तत्त्व घुलमिल गया है। ‘ने’ संबंध तत्त्व कृष्ण का संबंध बतलाता है, ‘को’ और ‘से’ क्रमशः दुःशासन तथा चक्र का संबंध स्थापित करते हैं।

अर्थ विज्ञान: अर्थ परिवर्तन और अर्थबोध

51. अर्थ विज्ञान क्या है?

अर्थ-विज्ञान में दो शब्द हैं: अर्थ और विज्ञान, अर्थात् अर्थ का विज्ञान। यह भाषा-विज्ञान की वह शाखा है जिसमें शब्दों और वाक्यों के अर्थ-पक्ष का वैज्ञानिक अध्ययन, विवेचन और विश्लेषण किया जाता है; अर्थ कैसे बनता है, कैसे बदलता है और क्यों बदलता है। अध्ययन-पद्धति के आधार पर अर्थ-विज्ञान तीन प्रकार का है: वर्णनात्मक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक।

52. क्या अर्थ विज्ञान भाषा विज्ञान के क्षेत्र में आता है?

कुछ विद्वानों के अनुसार अर्थ-विज्ञान एक स्वतन्त्र सत्ता वाला स्वतंत्र विज्ञान है, किन्तु इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि अर्थ भाषा की आत्मा है। भाषा में शब्द प्रमुख होते हैं और शब्दों की प्रमुखता इस बात को सूचित करती है कि उनका कोई अर्थ भी होता या होना चाहिए। जब ऐसी स्थिति है तो अर्थ-विज्ञान भाषा से अलग नहीं है। जब वह अलग नहीं है तो भाषा-विज्ञान के क्षेत्र से उसे बहिष्कृत करना कैसे उचित है?

53. अर्थ परिवर्तन की प्रमुख दिशाएँ कौन-सी हैं?

शब्दों के अर्थ में विकास होता रहता है। विकास की एक निश्चित दिशा नहीं होती है। अर्थ विकास, अर्थ परिवर्तन का ही पर्याय है। उदाहरणार्थ- गँवार शब्द का अर्थ था गाँव का रहने वाला, परन्तु आज इसका प्रयोग ‘असभ्य’ अर्थ के लिए होने लग गया है। इस अर्थ परिवर्तन में यह देखना पड़ता है कि अर्थ संकुचित हुआ है या विस्तृत, बुरा हो गया या अच्छा या कि उसका पुराना अर्थ ही लुप्त होकर नया अर्थ प्रयोग में आने लगा है। इन बातों को देखकर अर्थ परिवर्तन की तीन दिशाएँ मान ली गई हैं- 1. अर्थ-विस्तार, 2. अर्थ-संकोच और 3. अर्थादेश। अर्थादेश के अंतर्गत अर्थोत्कर्ष (अर्थ अच्छा होना) और अर्थापकर्ष (अर्थ बुरा होना; जैसे ‘गँवार’) आते हैं।

54. अर्थोत्कर्ष किसे कहते हैं?

जब शब्दों का प्रयोग बुरे या भद्दे अर्थ से हटकर अच्छे अर्थ में होने लगता है, तब हम उसे अर्थोत्कर्ष कहते हैं। वस्तुतः अर्थोत्कर्ष में अर्थ का उत्कर्ष अथवा शुभ अर्थ आता है। उदाहरण के लिए ‘कर्पट’ शब्द को लीजिए। पहले यह शब्द चिथड़े के रूप में प्रयुक्त होता था, किन्तु अब अर्थ के उत्कर्ष के कारण यह कीमती से कीमती अथवा उच्चकोटि के कपड़े के लिए प्रयुक्त होने लगा है।

55. प्रयत्नलाघव से होने वाले अर्थ परिवर्तन के उदाहरण दीजिए।

अर्थ विज्ञान में प्रयत्न लाघव के कारण भी शब्द के वर्ण कम हो जाते हैं और इस प्रकार अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। जैसे ‘रेलगाड़ी’ का अर्थ है जो रेल पटरी पर चलती है। प्रयत्न लाघव के कारण मात्र ‘रेल’ शब्द ही प्रयोग में आने लगा तथा वह ‘रेलगाड़ी’ का बोधक हो गया। इस प्रकार रेल का मूल अर्थ ‘पटरी’ न रहकर ‘ट्रेन’ हो गया। ऐसे ही राजकीय मुहर के स्थान पर ‘मुहर’ और ‘पोस्टल स्टाम्प’ के स्थान पर ‘स्टाम्प’ रह गया।

56. क्या वातावरण में परिवर्तन अर्थ परिवर्तन का कारण बनता है?

वातावरण का प्रभाव उसके परिवर्तन का प्रभाव शब्द के अर्थ पर अवश्य पड़ता है। बाह्य वातावरण का प्रभाव मानसिक विचारों और भावों पर पड़ता है और उस मानसिकता में परिवर्तन आते ही अर्थ परिवर्तन भी होने लगता है। वातावरण भौगोलिक, सामाजिक या रीति-रिवाज संबंधी कैसा भी हो, उसके परिवर्तन से भाषा में अर्थ परिवर्तन होता है।

57. संकेत ग्रहण किसे कहते हैं? इसके साधन बताइए।

शब्द और अर्थ के बीच जो संबंध है, उसके ग्रहण या ज्ञान को संकेत-ग्रह (शक्ति-ग्रह) कहते हैं; यही अर्थ-बोध का आधार है। प्राचीन आचार्यों ने संकेत-ग्रह के आठ साधन माने हैं:

शक्तिग्रहं व्याकरणोपमानकोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च।
वाक्यस्य शेषाद् विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः॥

अर्थात्: 1. व्याकरण, 2. उपमान, 3. कोश, 4. आप्त वाक्य, 5. व्यवहार, 6. वाक्य-शेष, 7. विवृति (व्याख्या) और 8. सिद्ध पद का सान्निध्य। इनमें व्यवहार सबसे प्रमुख साधन माना गया है।

58. अर्थबोध में उपमान की क्या उपयोगिता है?

जिस वस्तु का संकेत ग्रहण सादृश्य से होता है, उसे उपमान कहा जाता है। अनेक शब्द ऐसे है जिनका अर्थ साक्षात् नहीं मालूम होता है, बल्कि उसके अर्थ का बोध सादृश्य से होता है। उदाहरणार्थ ‘नीलगाय’ शब्द को लीजिए। नीलगाय गाय के समान होती है, किन्तु नीला रंग उसकी अतिरिक्त विशेषता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि संसार की बहुत सारी वस्तुओं का परिचय हमें उपमानों में ही प्राप्त होता है। यही कारण है कि अर्थ बोध में उसकी उपयोगिता सदैव बनी रहती है।

59. आप्त वाक्य अर्थबोध का महत्वपूर्ण साधन है: स्पष्ट कीजिए।

आप्त वाक्य भी अर्थबोध का महत्वपूर्ण साधन है। आप्त वाक्य में बोलने वालों के माता-पिता, गुरुवर्ग एवं अन्य अधिकारी व्यक्तियों को शामिल किया जाता है। पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान भी आप्त वाक्यों की विधि से ही प्राप्त होता है। ऐसे शब्दों का ज्ञान व्यवहार से नहीं हो सकता है। यथा- ईश्वर, आत्मा, स्वर्ग, धर्म, पाप, पुण्य आदि शब्दों को लिया जा सकता है। अतः स्पष्ट है कि आप्त वाक्य अर्थबोध का महत्वपूर्ण साधन है।

संसार के भाषा परिवार और भाषाओं का वर्गीकरण

आकृतिमूलक और पारिवारिक वर्गीकरण, विश्व के भाषा परिवार और भारोपीय परिवार।

60. डॉ. भोलानाथ तिवारी ने भाषाओं के वर्गीकरण के कौन-से आधार माने हैं?

संसार की भाषाओं के वर्गीकरण के लिए डॉ. भोलानाथ तिवारी ने सात आधार माने जो इस प्रकार हैं-
1. महाद्वीप के आधार पर
2. देश के आधार पर
3. धर्म के आधार पर
4. काल के आधार पर
5. आकृति के आधार पर
6. परिवार के आधार पर
7. प्रभाव के आधार पर।

61. आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा ने भाषाओं के वर्गीकरण के कौन-से आधार माने हैं?

आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा ने संसार की भाषाओं को भाषा विज्ञान की दृष्टि से दो आधारों पर वर्गीकृत किया है- 1. आकृतिमूलक और 2. पारिवारिक। डॉ. भोलानाथ तिवारी ने वर्गीकरण के अपने सात आधारों में भाषा विज्ञान की दृष्टि से 1. आकृति का आधार, 2. परिवार का आधार, को विशेष महत्वपूर्ण माना है। इन्हीं दोनों आधारों को भाषा विज्ञान की दृष्टि से आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा ने संसार की भाषाओं के वर्गीकरण का आधार स्वीकार किया है।

62. आकृतिमूलक और पारिवारिक वर्गीकरण किसे कहते हैं?

जिस वर्गीकरण में पद-रचना और वाक्य-रचना को आधार बनाया जाता है, उसे आकृतिमूलक वर्गीकरण कहते हैं; इसमें आने वाली भाषाओं में पदों और वाक्यों की रचना का ढंग समान होता है, भले ही उनका उद्गम अलग हो।

जिस वर्गीकरण में भाषाओं को उनके समान उद्गम के आधार पर एक परिवार में रखा जाता है (जिसमें ध्वनि, व्याकरण, मूल शब्दावली और अर्थ की समानता देखी जाती है), उसे पारिवारिक वर्गीकरण कहते हैं। इसे ऐतिहासिक या वंशानुक्रमिक वर्गीकरण भी कहा जाता है।

63. आकृतिमूलक वर्गीकरण से क्या तात्पर्य है?

प्रमुख रूप से भाषाओं में दो प्रकार की समानताएँ मिलती हैं। बाह्य या रचना की समानता और आन्तरिक या प्रकृति की समानता। इन्हीं दो समानताओं के आधार पर संसार की भाषाओं का वर्गीकरण किया गया है। जब भाषाओं को उनकी बाहरी आकृति के आधार पर अनेक वर्गों में विभाजित किया जाता है तो उस वर्गीकरण को आकृतिमूलक वर्गीकरण कहते हैं। स्पष्ट ही आकृतिमूलक वर्गीकरण का आधार भाषाओं की रचनागत समानता से है। यह समानता प्रमुख रूप से उन भाषाओं की पद-क्रियाओं में देखी जा सकती है।

64. आकृतिमूलक वर्गीकरण के कितने भेद हैं? अयोगात्मक भाषाएँ किसे कहते हैं?

आकृतिमूलक वर्गीकरण के दो भेद हैं- 1. अयोगात्मक और 2. योगात्मक। अयोगात्मक भाषाओं में प्रकृति-प्रत्यय नहीं होते। इसी से शब्दों में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं होता। अयोगात्मक भाषाओं के शब्द स्वतन्त्र होते हैं और वाक्य में सम्मिलित हो जाने के बाद भी वे शब्द जैसे के तैसे बने रहते हैं। व्याकरण की दृष्टि से अयोगात्मक भाषाओं के शब्दों को संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया-विशेषण आदि कोटियों में विभाजित नहीं किया जाता। वाक्य में स्थान-भेद से शब्द संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, का रूप ले लेता है।

65. योगात्मक भाषाओं के कितने भेद हैं?

योगात्मक वर्ग की भाषाओं के तीन भेद हैं- 1. अश्लिष्ट योगात्मक 2. श्लिष्ट योगात्मक और 3. प्रश्लिष्ट योगात्मक। प्रथम वर्ग की भाषाओं में अर्थ तत्त्व के साथ प्रत्यय अथवा विभक्ति का योग स्पष्ट दिखाई देता है। श्लिष्ट योगात्मक दशा में अर्थ तत्व में परिवर्तन आता है। देह से दैहिक, मधुर से माधुर्य, इसी क्रम में आते हैं। प्रश्लिष्ट में अर्थ तत्त्व और रचना तत्व घुल-मिल जाते हैं और उनमें मूल को ढूँढना सरल नहीं होता। ऋतु से आर्तव और ऋजु से आर्जव इस स्थिति के उदाहरण है।

66. श्लिष्ट योगात्मक भाषाएँ किसे कहते हैं?

श्लिष्ट योगात्मक वर्ग में आने वाली भाषाओं में रचना तत्त्व के योग से अर्थ तत्त्व में कुछ बदलाव आ जाता है। खाट, कटोरी, लोटा, भाजी, गिलास में ‘इया’ प्रत्यय का योग इन्हें खटिया, कटुरिया, लुटिया, भजिया और गिलसिया में परिवर्तित कर देता है। अर्थ की लघुता दर्शाने वाले इन व्यवहारों में रचना तत्त्व पहचाना जा सकता है। श्लिष्ट योगात्मक भाषाएँ धीरे-धीरे वियोगात्मक हो रही हैं।

67. प्रश्लिष्ट योगात्मक भाषाएँ किसे कहते हैं?

प्रश्लिष्ट योगात्मक भाषाओं में रचना तत्व और अर्थ तत्व घुल-मिल जाते हैं और उन्हें अलग करना कठिन हो जाता है। ऐसी स्थिति में अर्थ तत्व शब्द के साथ न रहकर पूरे वाक्य के आशय का बोध करा देता है। संस्कृत के निम्नांकित पद इसी स्थिति में है-

जिगमिषति = वह जाना चाहता है।

पिपठिषामि = मैं पढ़ना चाहता हूँ।

68. आकृतिमूलक वर्गीकरण का महत्व आज कम क्यों हो रहा है?

आकृतिमूलक वर्गीकरण का महत्व आधुनिक संदर्भों में दो कारणों से कम हो रहा है- 1. श्लिष्ट के साथ प्रश्लिष्ट में निर्णय देने वाली विभाजक रेखा खींचना मुश्किल है। 2. संसार की भाषाओं का सही-सही अध्ययन नहीं हो पाया है, इसी से आकृतिमूलक भाषाओं की सभी विशेषताओं का विश्लेषण नहीं हो पाया है। इसी आधार पर आकृतिमूलक वर्गीकरण के महत्व से पारिवारिक वर्गीकरण का महत्व अधिक है।

69. पारिवारिक वर्गीकरण के प्रमुख आधार क्या हैं?

पारिवारिक वर्गीकरण में यह देखा जाता है कि भाषाओं की समानता किसी समान उद्गम के कारण है या नहीं। इसके प्रमुख आधार हैं:

  1. व्याकरणिक (रूप-रचना की) समानता: सबसे महत्वपूर्ण आधार।
  2. मूल शब्दावली की समानता: संख्यावाचक, संबंधवाचक (माता, पिता, भाई) और शरीर-अंगों के शब्द।
  3. ध्वनि-साम्य और नियमित ध्वनि-परिवर्तन।
  4. अर्थ-साम्य।
  5. स्थानिक निकटता।

ध्यान रहे: आकस्मिक समानता, शिशु-शब्दावली (जैसे माँ, पापा) और उधार लिए गए शब्दों की समानता को आधार नहीं माना जाता, क्योंकि ये समान उद्गम सिद्ध नहीं करतीं।

70. संसार के प्रमुख भाषा परिवार कौन-कौन से हैं?

संसार की भाषाओं को विद्वानों ने अनेक भाषा परिवारों में विभाजित किया है। इन परिवारों की संख्या अनिश्चित है। यही कारण है कि विद्वानों ने 12 से लेकर 100 परिवारों तक की कल्पना की गयी है। इनमें से प्रमुख भाषा परिवार ये हैं- भारोपीय परिवार, द्रविड़ परिवार, सैमेटिक परिवार, हैमेटिक परिवार, बाँटू परिवार, चीन-तिब्बती परिवार, यूराल-अलटाई परिवार, काकेशी परिवार, अमेरिकी परिवार, जापान-कोरियाई परिवार, मलय परिवार, बुशमैन परिवार, सूडानी परिवार, अत्युत्तरी परिवार और पापुई परिवार।

71. डॉ. भोलानाथ तिवारी ने संसार की भाषाओं को किन परिवारों में बाँटा है?

डॉ. भोलानाथ तिवारी ने संसार की प्रमुख भाषाओं को निम्न परिवारों में रखकर उन पर विचार करना सुविधाजनक माना है- 1. भारोपीय, 2. सैमेटिक, 3. हैमेटिक, 4. यूराल-अलटाई, 5. चीनी या एकाक्षरी, 6. द्रविड़, 7. मलय-पालिनीशियन, 8. बाँटू, 9. बुशमैन, 10. सूडानी, 11. आस्ट्रेलियन पापुवन, 12. रेड-इण्डियन, 13. काकेशी, 14. जापानी-कोरियाई।

72. आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा ने संसार के कितने प्रमुख भाषा परिवार माने हैं?

आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा ने संसार के भाषा परिवारों की अनिश्चित संख्या 12 से लेकर 100 मानी है और उनमें से निर्विवाद के साथ प्रमुख परिवार 18 माने है जो इस प्रकार हैं- 1. भारत-यूरोपीय परिवार, 2. द्रविड़ परिवार, 3. बुरुशस्की परिवार, 4. उराल अल्ताई परिवार, 5. काकेशी परिवार, 6. चीनी परिवार, 7. जापानी-कोरियाई परिवार, 8. अत्युत्तरी परिवार, 9. बास्क परिवार, 10. सामी-हामी परिवार, 11. सूडानी परिवार, 12. बन्तू परिवार, 13. होतेन्तोत-बुशमैनी, 14. मलय-बहुद्वीपीय परिवार, 15. पापुई परिवार, 16. आस्ट्रेलियाई परिवार, 17. दक्षिण पूर्व एशियाई परिवार और 18. अमेरिकी परिवार।

73. भारोपीय (भारत-यूरोपीय) भाषा परिवार का महत्व क्यों अधिक है?

संसार के भाषा परिवारों में यूरोप से लेकर भारत तक जिस भाषा परिवार का व्यवहार होता है, वह भारत-यूरोपीय परिवार है। व्यवहार क्षेत्र की दृष्टि से यूरोप से लेकर एशिया तक फैले इस भू-भाग को ‘यूरेशिया’ कहा जाता है। ऐसे कई कारण हैं जिनके आधार पर इस भाषा परिवार का महत्व अन्य भाषा परिवारों से अधिक है। व्यवहार करने वालों की संख्या, व्यवहार क्षेत्र का विस्तार, साहित्य, रचना, सभ्यता के साथ संस्कृति के प्रति आग्रह, वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान के योगदान, राजनैतिक प्रभाव और भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण के आधारों पर विचार करने से भारत-यूरोपीय परिवार अन्य परिवारों से आगे है।

74. भारोपीय परिवार को ‘इंडो-जर्मनिक’ नाम किसने और क्यों दिया?

जर्मन भाषाविदों ने सबसे पहले भाषा विज्ञान पर कार्य किए और भारत से लेकर इंग्लैण्ड के साथ जर्मनी तक में बोली जाने वाली इन भाषाओं के परिवारों को इण्डो-जर्मनिक अर्थात् भारत-जर्मनिक नाम दिया। यूरोप के अन्य देशों के भाषाविदों को यह नाम सीमित दिखलाई दिया। उनकी दृष्टि में इंग्लैण्ड, इटली, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, रूमानिया आदि की भाषाएँ इस नाम से नहीं आ रही थी, इसी से यह नाम मान्य नहीं हो सका। जर्मन भाषाविद् अभी भी इस परिवार को इसी नाम से पुकारते हैं।

75. बाँटू भाषा परिवार के बारे में आप क्या जानते हैं?

‘बाँटू’ (बंटू) शब्द का अर्थ है मनुष्य; इस परिवार की भाषाओं में मनुष्य के लिए इससे मिलता-जुलता शब्द ही प्रयोग में आता है। बाँटू अफ्रीका महाद्वीप का एक प्रमुख भाषा-परिवार है, जिसका मुख्य क्षेत्र मध्य और दक्षिणी अफ्रीका है। इसमें बहुत-सी भाषाएँ आती हैं (पुराने विद्वानों ने लगभग डेढ़ सौ गिनाई थीं); इन्हें पूर्वी, मध्यवर्ती और पश्चिमी वर्गों में बाँटा जाता है। स्वाहिली इस परिवार की प्रसिद्ध भाषा है।

76. सैमेटिक (सामी) भाषा परिवार की विशेषताएँ क्या हैं?

सैमेटिक (सामी) परिवार की भाषाएँ एशिया और अफ्रीका दोनों महाद्वीपों में बोली जाती हैं। इसकी प्राचीन और प्रमुख भाषा हिब्रू है और प्रसिद्ध भाषा अरबी भी इसी परिवार की है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ:

➡️ भाषाएँ प्रायः श्लिष्ट (अंतर्मुखी) योगात्मक हैं।

➡️ धातुएँ प्रायः तीन व्यंजनों की होती हैं (जैसे अरबी क-त-ब: किताब, कातिब, मकतब)।

➡️ धातु के व्यंजनों के बीच स्वर लगाकर पद बनाए जाते हैं (मध्य-योग)।

➡️ तीन कारक माने गए हैं: कर्ता, कर्म और संबंध।

77. सैमेटिक और हैमेटिक परिवारों की सामान्य विशेषताएँ क्या हैं?

सैमेटिक और हैमेटिक परिवारों की पाँच सामान्य विशेषताएँ हैं:

  1. दोनों में क्रिया के काल से अधिक महत्व क्रिया की पूर्णता और अपूर्णता का है।
  2. दोनों के बहुवचन-बोधक प्रत्यय किसी समान स्रोत से संबंध रखते हैं।
  3. दोनों में स्त्रीलिंग-बोधक प्रत्यय समान रूप से मिलता है।
  4. दोनों में व्याकरणिक लिंग होता है।
  5. दोनों के सर्वनाम प्रायः एक जैसे हैं।

इन्हीं समानताओं के कारण कई विद्वान दोनों को मिलाकर सामी-हामी परिवार कहते हैं।

भारतीय आर्य भाषाएँ: वैदिक संस्कृत से अपभ्रंश तक

78. भारतीय आर्य भाषाओं को कितने कालों में बाँटा जाता है?

समय-सीमा को आधार बनाकर भारतीय आर्य-भाषा समूह को तीन भागों में रखा जा सकता है-

काल-खंडसमय-सीमा
प्राचीन भारतीय आर्य भाषाईसा पूर्व 1500 से 500 ई. पू. तक।
मध्य भारतीय आर्य भाषा500 ई. पू. से 1000 ई. तक।
आधुनिक भारतीय आर्य भाषा1000 ई. से वर्तमान तक।

79. वैदिक संस्कृत किसे कहते हैं?

प्राचीन आर्य भाषाओं में वैदिक भाषा का विशेष महत्व है। यह वह भाषा है जिसमें वेद लिखे गए और इसी से आगे चलकर लौकिक संस्कृत का विकास हुआ। ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों तक का विशाल ज्ञान-भंडार इसी भाषा में है। छंदोबद्ध होने के कारण इसे ‘छांदस’ भाषा भी कहते हैं। वैदिक साहित्य को चार भागों में बाँटा जाता है: संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्।

80. वैदिक भाषा की विशेषताएँ कौन-सी हैं?

वैदिक भाषा की प्रमुख विशेषताएँ:

  1. वैदिक भाषा योगात्मक (श्लिष्ट) है।
  2. इसकी रूप-रचना में विविधता और जटिलता है; एक ही शब्द के अनेक वैकल्पिक रूप मिलते हैं।
  3. इसमें संगीतात्मक स्वराघात (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) की प्रधानता थी, जबकि लौकिक संस्कृत में बलाघात प्रधान हो गया।
  4. इसमें तीन लिंग और तीन वचन हैं।
  5. इसमें उपसर्ग धातु से अलग भी प्रयुक्त हो सकते थे, जबकि लौकिक संस्कृत में ऐसा नहीं होता।

81. लौकिक संस्कृत किसे कहते हैं?

लौकिक संस्कृत को सामान्यतः केवल संस्कृत कहा जाता है। इसका उद्भव वैदिक संस्कृत से हुआ। लगभग पाँचवीं-चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में गांधार क्षेत्र (तक्षशिला के निकट शलातुर) के महान वैयाकरण पाणिनि ने अपनी ‘अष्टाध्यायी’ में इसे व्याकरण के नियमों में बाँधकर परिष्कृत और स्थिर किया। इसके अन्य नाम हैं: लौकिक संस्कृत, क्लासिकल संस्कृत और पाणिनीय संस्कृत। रामायण, महाभारत और कालिदास आदि का साहित्य इसी भाषा में है।

82. अपभ्रंश किसे कहते हैं?

अपभ्रंश शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में किया जाता है, वह ‘बिगड़ी हुई’ या ‘अशुद्ध’ भाषा का सूचक है। इस संबंध में डॉ. धीरेन्द्र वर्मा ने लिखा है कि साहित्य में प्रयुक्त होने पर वैयाकरणों ने प्राकृत भाषाओं को कठिन, अस्वाभाविक और अव्यावहारिक नियमों में बाँध दिया था, परन्तु जिन बोलियों के आधार पर उसकी रचना हुई थी, वे बाँधी नहीं जा सकती थी। अपभ्रंश अर्थात् बिगड़ी हुई भाषा नाम उन भाषाओं को मिला जो नयी बोलियों के रूप में विकसित हुई थी और जो व्याकरण के बन्धन में बँधी हुई नहीं है।

83. प्रमुख आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ कौन-सी हैं?

आर्य भाषाओं की जननी के रूप में अपभ्रंश की उल्लेखनीय बोलियों में शौरसेनी, पैशाची, ब्राचड़, महाराष्ट्री, अर्द्धमागधी और मागधी का नाम लिया जा सकता है। इन्हीं से आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का विकास हुआ है। प्रमुख आर्य भाषाएँ ये हैं- सिन्धी, गुजराती, लहँदा, पंजाबी, मराठी, उड़ीया, बंगाली, असमिया और हिन्दी। कुछ विद्वानों ने आधुनिक आर्य भाषाओं में कश्मीरी और नेपाली को भी स्थान दिया है।

84. ग्रियर्सन ने आधुनिक आर्य भाषाओं का संशोधित वर्गीकरण कैसे किया?

डॉ. ग्रियर्सन ने आधुनिक आर्य भाषाओं का पहला वर्गीकरण अंतरंग और बहिरंग के आधार पर किया था, जो सदोष माना गया। इसलिए उन्होंने संशोधित वर्गीकरण प्रस्तुत किया:

वर्गभाषाएँ
(क) मध्यदेशीय भाषापश्चिमी हिंदी
(ख) अंतर्वर्ती भाषाएँ(1) पश्चिमी हिंदी से अधिक घनिष्ठ: पंजाबी, राजस्थानी, गुजराती, पहाड़ी (पूर्वी, मध्य, पश्चिमी)
(2) बहिरंग से अधिक घनिष्ठ: पूर्वी हिंदी
(ग) बहिरंग भाषाएँ(1) पश्चिमोत्तरी: लहँदा, सिंधी
(2) दक्षिणी: मराठी
(3) पूर्वी: बिहारी, उड़िया, बांग्ला, असमिया

85. डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं का वर्गीकरण कैसे किया?

पश्चिमी हिन्दी को केन्द्रीय भाषा मानकर डॉ. सुनीतिकुमार चटर्जी ने अपना निम्नलिखित वर्गीकरण प्रस्तुत किया है-
1. उदीच्य (सिन्धी, लहँदा, पंजाबी)
2. प्रतीच्य (गुजराती और राजस्थानी)
3. मध्यदेशीय (पश्चिमी हिन्दी)
4. प्राच्य (पूर्वी हिन्दी, बिहारी, उड़ीया, असमिया और बंगाली)
5. दाक्षिणात्य (मराठी)

डॉ. चटर्जी ने पहाड़ी को राजस्थानी भाषा का ही एक रूप स्वीकार किया है। यही कारण है कि उन्होंने पहाड़ी को अपने वर्गीकरण में अलग से स्थान नहीं दिया है।

हिंदी की बोलियाँ: अवधी, कन्नौजी और दक्खिनी हिंदी

86. हिंदी की प्रमुख बोलियाँ कौन-कौन सी हैं?

भाषाशास्त्री (ग्रियर्सन के आधार पर) सीमित अर्थ में हिंदी के दो रूप मानते हैं: पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी।

➡️ पश्चिमी हिंदी का संबंध शौरसेनी अपभ्रंश से है और यह प्राचीन मध्यदेश की भाषा है। इसकी पाँच बोलियाँ हैं: खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली और बाँगरू (हरियाणवी)। भाषाशास्त्र की दृष्टि से इसे ही मुख्य ‘हिंदी’ कहा जाता है।

➡️ पूर्वी हिंदी का संबंध अर्धमागधी अपभ्रंश से है। इसकी तीन बोलियाँ हैं: अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी।

व्यापक अर्थ में हिंदी की पाँच उपभाषाएँ मानी जाती हैं (ऊपर ‘हिंदी की उपभाषाएँ और बोलियाँ’ वाली तालिका देखें)।

87. अवधी बोली के बारे में आप क्या जानते हैं?

हरदोई ज़िले को छोड़कर अवध के शेष भागों में बोली जाने वाली बोली को अवधी कहते हैं। लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, खीरी, फ़ैज़ाबाद (अयोध्या), गोंडा, बहराइच, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और बाराबंकी इसके प्रमुख केंद्र हैं। गंगापार प्रयागराज (इलाहाबाद), फतेहपुर, मिर्ज़ापुर और जौनपुर के कुछ भागों में भी यह बोली जाती है। यह पूर्वी हिंदी की प्रमुख बोली है, जिसका संबंध अर्धमागधी अपभ्रंश से है।

भक्तिकाल में अवधी में कालजयी साहित्य रचा गया: तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ और जायसी का ‘पद्मावत’ इसी भाषा में हैं।

88. कन्नौजी बोली के बारे में आप क्या जानते हैं?

कन्नौजी सामान्यतः ब्रज और अवधी के मध्यवर्ती रूप को कहा जाता है। इसकी भी उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से हुई है। इसका प्रमुख केन्द्र फर्रुखाबाद है, किन्तु यह हरदोई, शाहजहाँपुर, पीलीभीत, इटावा और कानपुर के पार्श्ववर्ती विविध क्षेत्रों में भी बोली जाती है। कुछ विद्वान इसे ब्रजभाषा का ही एक उपरूप कह सकते हैं, क्योंकि इसमें स्वतंत्र रूप से बहुत ही कम रचनाएँ हुई हैं और जो हुई भी है वे ब्रजभाषा की प्रकृति में ही पनपी है।

89. दक्खिनी हिंदी किसे कहते हैं?

भारत आने के बाद फ़ारसी बोलने वाले मुसलमान जब यहाँ की जनता के संपर्क में आए, तो दिल्ली के आसपास की बोली से एक नई भाषा विकसित हुई; यही आरंभिक हिंदी या हिंदवी थी। तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में जब दिल्ली के सुल्तानों ने दक्षिण पर अभियान किए, तो बहुत से लोग वहीं बस गए। उनके साथ गई यह भाषा दक्षिण के बहमनी, बीजापुर और गोलकुंडा जैसे राज्यों में राजकाज और साहित्य की भाषा बनी, क्योंकि फ़ारसी की अपेक्षा यह जनता के अधिक निकट थी। यही भाषा दक्खिनी हिंदी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

90. “दक्खिनी हिंदी खड़ी बोली का पूर्व रूप है”: स्पष्ट कीजिए।

आधुनिक काल के आरंभ तक ‘हिंदी’ या ‘हिंदवी’ का अर्थ था: हिंद (भारत) की जनसाधारण की भाषा। दक्षिण में बसे मुसलमान लेखकों ने इसी भाषा को ‘दक्खिनी’ कहा। अर्थात् हिंदी, हिंदवी और दक्खिनी, तीनों नाम लगभग एक ही भाषा के लिए प्रयुक्त होते थे। इंशा अल्ला खाँ ने ‘रानी केतकी की कहानी’ में अपनी भाषा के विषय में लिखा: “हिंदवीपन भी न निकले और भाखापन भी न हो।” वस्तुतः हिंदवी या दक्खिनी ही आगे चलकर खड़ी बोली के रूप में विकसित हुई और हिंदी साहित्य की प्रधान भाषा बनी। इसलिए दक्खिनी को खड़ी बोली का पूर्व रूप कहा जाता है।

91. हिंदी के व्याकरणिक रूप कौन-कौन से हैं?

हिंदी के व्याकरणिक रूप (कोटियाँ) प्रमुख रूप से ये माने गए हैं: संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, क्रिया-विशेषण (विकारी-अविकारी शब्द-भेद) तथा लिंग, वचन, कारक, काल, पुरुष और वाच्य (व्याकरणिक कोटियाँ)। इन्हीं के आधार पर हिंदी की वाक्य-संरचना तैयार होती है।

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लिपि: अर्थ, विकास और हिंदी की लिपि देवनागरी

92. लिपि किसे कहते हैं?

भाषा का स्वरूप विकसित हो जाने पर मानव ने अपने विचारों को नेत्र-ग्राह्य बनाने की बात सोची होगी। दूरस्थ व्यक्ति को अपनी भावनाओं और विचारों से परिचित कराने तथा भावी पीढ़ी तक ज्ञान-राशि की स्मृति सुरक्षित रखने के विचार से उसने विविध प्रयत्न किए होंगे। लिपि इन्हीं प्रयत्नों का परिणाम है। इस प्रकार लिपि की उत्पत्ति के मूल में अभिव्यक्ति की इच्छा निहित है।

93. लिपि का जन्म क्यों हुआ और लिपि व भाषा का क्या संबंध है?

डॉ. भोलानाथ तिवारी का मत है कि काल और स्थान की सीमा के बंधन से भाषा को निकालने के लिए लिपि का जन्म हुआ। सामान्यतः कुछ लोग भ्रमवश लिपि और भाषा को एक ही मान लेते हैं, किन्तु ये अलग-अलग है। इतने पर भी ये संबंधित है। भाषा और लिपि एक-दूसरे पर निर्भर करती है, किन्तु पार्थक्य को भी स्पष्ट करती है। भाषा ध्वनि-प्रतीकों की व्यवस्था है और लिपि लिखित चिह्नों की संरचना।

94. लिपि के विकास-क्रम में कौन-सी लिपियाँ आती हैं?

लिपि के विकासक्रम में प्रमुख रूप से छः लिपियों को स्थान प्राप्त है। ये छः लिपियाँ इस प्रकार हैं- चित्र लिपि, सूत्र लिपि, प्रतीकात्मक लिपि, भावमूलक लिपि, भाव-ध्वनिमूलक लिपि और ध्वनिमूलक लिपि।

95. भारत की प्राचीन लिपियाँ कौन-कौन सी हैं?

भारत के पुराने शिलालेखों और सिक्कों पर मुख्य रूप से ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियाँ मिलती हैं। ब्राह्मी बाएँ से दाएँ और खरोष्ठी दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। डॉ. भोलानाथ तिवारी के अनुसार प्राचीन ग्रंथों में अनेक लिपियों का उल्लेख है: जैनों के पन्नवणा (प्रज्ञापना) सूत्र में 18 लिपियों का और बौद्धों के ललितविस्तर में 64 लिपियों का उल्लेख मिलता है।

96. हिंदी भाषा की लिपि कौन-सी है?

हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। देवनागरी का विकास प्राचीन ब्राह्मी लिपि से हुआ है (ब्राह्मी → गुप्त लिपि → कुटिल लिपि → नागरी/देवनागरी)। यह बाएँ से दाएँ लिखी जाती है, इसके अक्षरों के ऊपर शिरोरेखा होती है और इसमें जैसा बोला जाता है, लगभग वैसा ही लिखा जाता है, इसलिए इसे वैज्ञानिक लिपि माना जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी है। संस्कृत, मराठी, नेपाली और कोंकणी भी देवनागरी में लिखी जाती हैं।

हिंदी भाषा और भाषा विज्ञान: एक नज़र में महत्वपूर्ण तथ्य

प्रश्नउत्तर
हिंदी किस भाषा परिवार की भाषा है?भारोपीय (भारत-यूरोपीय)
हिंदी की लिपिदेवनागरी (ब्राह्मी से विकसित)
हिंदी का उद्भवलगभग 1000 ई., अपभ्रंश से
खड़ी बोली का संबंधशौरसेनी अपभ्रंश
अवधी का संबंधअर्धमागधी अपभ्रंश
हिंदी की उपभाषाएँ / बोलियाँ5 / 17
राजभाषा के रूप में स्वीकृति14 सितंबर 1949, अनुच्छेद 343
भाषा के व्यक्तिगत पक्ष को ‘पारोल’ किसने कहा?सोस्यूर (सोसूर)
ध्वनि के तीन पक्षउत्पादन, संवहन, ग्रहण
ध्वनि-वर्गीकरण के आधारस्थान, करण, प्रयत्न
अर्थ परिवर्तन की दिशाएँअर्थ-विस्तार, अर्थ-संकोच, अर्थादेश
आकृतिमूलक वर्गीकरण के भेदअयोगात्मक, योगात्मक
संस्कृत को व्याकरणबद्ध करने वालेपाणिनि (अष्टाध्यायी)
आधुनिक आर्य भाषाओं का वर्गीकरणग्रियर्सन; सुनीति कुमार चटर्जी
ललितविस्तर में कितनी लिपियाँ?64

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

❓ हिंदी भाषा का विकास कब हुआ?
हिंदी का विकास लगभग 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश से हुआ। इसके पहले की कड़ियाँ वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और अवहट्ट हैं।
❓ हिंदी भाषा की उत्पत्ति किस अपभ्रंश से हुई?
मानक हिंदी (खड़ी बोली) और पश्चिमी हिंदी की उत्पत्ति शौरसेनी अपभ्रंश से मानी जाती है, जबकि पूर्वी हिंदी (अवधी आदि) का संबंध अर्धमागधी अपभ्रंश से है।
❓ हिंदी की कितनी बोलियाँ हैं?
व्यापक अर्थ में हिंदी की 5 उपभाषाएँ (पश्चिमी हिंदी, पूर्वी हिंदी, राजस्थानी, बिहारी, पहाड़ी) और 17 प्रमुख बोलियाँ मानी जाती हैं।
❓ हिंदी भाषा की लिपि क्या है?
हिंदी की लिपि देवनागरी है, जो प्राचीन ब्राह्मी लिपि से विकसित हुई है और बाएँ से दाएँ लिखी जाती है।
❓ भाषा और बोली में मुख्य अंतर क्या है?
भाषा का क्षेत्र व्यापक होता है और वह शिक्षा, शासन व साहित्य की माध्यम होती है; बोली का क्षेत्र सीमित होता है और वह मुख्यतः स्थानीय बातचीत में प्रयुक्त होती है।
❓ भाषा विज्ञान किसे कहते हैं?
भाषा के ध्वनि, शब्द, पद, वाक्य और अर्थ आदि सभी पक्षों के वैज्ञानिक और व्यवस्थित अध्ययन को भाषा विज्ञान कहते हैं।
❓ हिंदी किस भाषा परिवार की भाषा है?
हिंदी भारोपीय (भारत-यूरोपीय) भाषा परिवार की भारतीय आर्य शाखा की आधुनिक भाषा है।

निष्कर्ष

हिंदी भाषा को गहराई से समझने के लिए भाषा विज्ञान की चारों शाखाएँ (ध्वनि, रूप, वाक्य और अर्थ) और भारतीय आर्य भाषाओं का विकास-क्रम, दोनों जानना ज़रूरी है। ऊपर दिए 96 प्रश्नों को विषयवार दोहराएँ और तालिकाओं को परीक्षा से पहले एक बार ज़रूर देख लें।

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केवल कृष्ण घोड़ेला
✍️ लेखक परिचय
केवल कृष्ण घोड़ेला
एम.ए., बी.एड. (नेट हिंदी) • कॉलेज व्याख्याता
📍 श्रीगंगानगर (राजस्थान)
यह लेख केवल कृष्ण घोड़ेला की देखरेख में तैयार किया गया है और उन्होंने ही इसकी जाँच की है। वे hindisahity.com, store.hindisahity.com और यूट्यूब चैनल Hindi Sahitya Channel के ज़रिए NET/JRF और प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों को हिंदी साहित्य की तैयारी करवाते हैं।

 

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