अंतिम संशोधित (Last Updated): August 27, 2026
शिक्षण कौशल: अर्थ, परिभाषा, विशेषताएँ और प्रमुख प्रकार (Teaching Skills in Hindi)
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आज के इस आर्टिकल में हम शिक्षा मनोविज्ञान और शिक्षक प्रशिक्षण के एक बेहद महत्वपूर्ण विषय ‘शिक्षण कौशल’ (Teaching Skills) के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। यदि आप शिक्षक भर्ती परीक्षाओं (जैसे CTET, REET, UPTET, TGT, PGT आदि) की तैयारी कर रहे हैं, तो यह टॉपिक आपके लिए बहुत उपयोगी है। आइए इसे अच्छे से पढ़ते हैं।
📌 शिक्षण कौशल का अर्थ (Teaching Skills Meaning)
शिक्षण कौशल क्या है?
प्रत्यक्ष रूप से अध्यापक द्वारा अधिगम को सरल एवं सहज बनाने के उद्देश्य से किए जाने वाले शिक्षण कार्यों एवं व्यवहारों का समूह शिक्षण कौशल या अध्यापन कौशल कहलाता है।
शिक्षण एक विज्ञान और कला दोनों है। इस आधार पर उचित प्रशिक्षण द्वारा अच्छे शिक्षकों को तैयार किया जा सकता है और उनमें शिक्षण के लिए आवश्यक कौशलों को विकसित किया जा सकता है। इन्हीं कौशलों का उपयोग कर शिक्षक कक्षा में प्रभावी शिक्षण कार्य करते हैं और एक कुशल मार्गदर्शक बनते हैं। अतः शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इन कौशलों का विकास अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
📖 शिक्षण कौशल की परिभाषाएँ (Teaching Skills Definitions)
विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने शिक्षण कौशल को अपने-अपने दृष्टिकोण से परिभाषित किया है:
डॉ. बी.के. पासी के अनुसार:
“शिक्षण कौशल, छात्रों के सीखने के लिए सुगमता प्रदान करने के विचार से संपन्न की गई संबंधित शिक्षण क्रियाओं या व्यावहारिक समूहों का रूप है।”
मेकइंटेयर एवं व्हाइट के अनुसार:
“शिक्षण कौशल, शिक्षण व्यवहार से संबंधित वह स्वरूप है, जो कक्षा की अंतःक्रिया द्वारा उन विशिष्ट परिस्थितियों को जन्म देता है, जो शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक होती हैं और सीखने में सुगमता प्रदान करती हैं।”
डॉ. कुलश्रेष्ठ के अनुसार:
“शिक्षण कौशल शिक्षक के हाथ में वह शस्त्र है, जिसका प्रयोग करके शिक्षक अपने कक्षा-शिक्षण को प्रभावी तथा सक्रिय बनाता है एवं कक्षा की अंतःक्रिया में सुधार लाने का प्रयास करता है।”
🏫 हिन्दी-शिक्षण के लिए शिक्षण-कौशल
सन् 1960 के दशक में ‘शिक्षण और उसकी प्रभावकारिता’ पर अमेरिका में सघन चिंतन और अनुसंधान हुए। फ्लेंडर और उनके साथियों ने कक्षा-शिक्षण का विश्लेषण करके यह स्थापित किया कि कक्षा-शिक्षण वस्तुतः तीन प्रमुख घटकों की अंतःक्रिया का परिणाम है। वे तीन घटक हैं— अध्यापक की सक्रियता, छात्र की सक्रियता और मौन। इस विश्लेषणात्मक उपागम ने कई तरह की अध्यापन-कुशलताओं के विकास का मार्ग प्रशस्त किया।
शिक्षण-कुशलता ऐसे शिक्षण व्यवहारों या क्रियाओं का नाम है जिनका मुख्य लक्ष्य छात्रों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सीखने में मदद करना है।
भारत देश में अध्यापन-कुशलताओं पर कार्य वर्ष 1972 में आरंभ हुआ और कुछ प्रमुख प्रशिक्षण-महाविद्यालयों ने इस पर अनुसंधान किए। वर्ष 1975 तक भारत के अनुकूल निम्नलिखित शिक्षण कुशलताओं की सूची तैयार की गई:
अध्यापन के उद्देश्य लिखने की कुशलता
किसी पाठ की प्रस्तावना करने की कुशलता
प्रश्नों में प्रवाह लाने की कुशलता
उत्खनन करने की कुशलता या खोजी प्रश्न करने की कुशलता
व्याख्या करने की कुशलता या उदाहरणों द्वारा समझाने की कुशलता
उद्दीपनों में विविधता लाने की कुशलता
मौन संप्रेषण की कुशलता
पुनर्बलन की कुशलता
छात्रों का प्रतिभागित्व बढ़ाने की कुशलता
श्यामपट्ट के उपयोग की कुशलता
पाठ के समापन की कुशलता
✨ शिक्षण कौशलों की विशेषताएँ (Characteristics of Teaching Skills)
शिक्षण कौशलों के विधिवत प्रशिक्षण से शिक्षक के व्यावहारिक शिक्षण तौर-तरीकों में सकारात्मक परिवर्तन आता है।
ये कौशल कक्षा में एक अनुकूल और जीवंत शिक्षण परिस्थिति का निर्माण करते हैं।
शिक्षण कौशल पूर्व-निर्धारित शैक्षिक उद्देश्यों और प्रभावी अधिगम की प्राप्ति में प्रत्यक्ष रूप से सहायक होते हैं।
🛠️ शिक्षण कौशल के प्रकार (Types of Teaching Skills)
कक्षा-शिक्षण को सुगम और प्रभावशाली बनाने के लिए निम्नलिखित प्रमुख शिक्षण कौशलों का प्रयोग किया जाता है:
1. प्रस्तावना कौशल (Introduction Skill)
अध्यापक अपने शिक्षण को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अनेक कौशलों का प्रयोग करता है, जिनमें कक्षा में प्रवेश करने के बाद सबसे पहले प्रस्तावना कौशल का उपयोग किया जाता है। छात्रों का ध्यान मूल पाठ या प्रकरण की तरफ ले जाने के लिए जो भी क्रियाकलाप किए जाते हैं, उन्हें ही प्रस्तावना कहा जाता है, जिससे छात्रों का ध्यान मुख्य विषय पर केंद्रित हो सके।
समय और स्वरूप: प्रस्तावना कौशल न तो बहुत लंबी होनी चाहिए और न ही बहुत छोटी। इस कौशल में सामान्यतः 5 से 7 मिनट का समय लगता है। इससे बालक पाठ के अध्ययन के प्रति रुचि लेने लगता है।
प्रमुख उद्देश्य: छात्रों के पूर्व ज्ञान की जाँच करना, पूर्व ज्ञान को नवीन ज्ञान से जोड़ना, विद्यार्थियों में जिज्ञासा जागृत करना और उन्हें मानसिक रूप से तत्पर करना।
प्रयुक्त तकनीकें: इस कौशल में शिक्षक प्रश्न पूछकर, कहानी कहकर, किसी का उदाहरण देकर, निदर्शन से या पाठ का सार बताकर छात्रों को जोड़ता है। इसके लिए मुख्य रूप से तीन प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं:
प्रत्यास्मरण प्रश्न: ऐसे प्रश्न जिनका जवाब बालक अपने पूर्व ज्ञान के आधार पर आसानी से दे सके।
निबंधात्मक प्रश्न: जिसमें शिक्षक स्वयं प्रश्न पूछता है और उसका विस्तार से उत्तर देता है।
आज्ञापालन प्रश्न: जिनका जवाब छात्र ‘हाँ’ या ‘ना’ में दे सकें।
2. प्रश्न सहजता कौशल (Questioning Skill)
कक्षा-शिक्षण में प्रश्न पूछने की प्रक्रिया का बहुत बड़ा महत्व है। प्रश्न के माध्यम से अध्यापक बालक को अधिक चिंतनशील बनाता है तथा विद्यार्थियों के ज्ञान, बोध, रुचि एवं अभिवृत्ति का आकलन करता है। ‘सहज प्रश्न कौशल’ से अभिप्राय यह है कि प्रश्न और शिक्षक की भाषा अत्यंत सरल और सहज होनी चाहिए।
शिक्षण प्रक्रिया के आधार पर प्रश्न तीन प्रकार के होते हैं— (1) प्रस्तावना प्रश्न, (2) शिक्षणात्मक प्रश्न, (3) परीक्षणात्मक प्रश्न।
अध्यापक को प्रश्न पूछते समय धैर्य और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार रखना चाहिए। प्रश्न हमेशा व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध, स्पष्ट और संक्षिप्त होने चाहिए तथा उसमें गति व विराम का भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
3. खोजपूर्ण प्रश्न कौशल (Probing Questions Skill)
शिक्षक अपने विद्यार्थियों से विषय-वस्तु के गहन अध्ययन एवं उसकी तह तक पहुँचने के लिए खोजपूर्ण प्रश्न पूछता है। यह एक ऐसा कौशल है जो विद्यार्थियों को नई खोज, नवीन जानकारी प्राप्त करने और कल्पना करने के लिए प्रेरित करता है।
यदि छात्र शिक्षक द्वारा पूछे गए सामान्य प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थता प्रकट करे, तो शिक्षक विषय-वस्तु से संबंधित आलोचनात्मक सजगता विकसित करने के लिए खोजपूर्ण प्रश्न पूछता है। इसमें छात्रों का ध्यान केंद्रित करना, आगे की सूचना खोजना और गलत उत्तर मिलने पर तार्किक माध्यमों से धीरे-धीरे सही उत्तर की ओर ले जाना शामिल है।
4. प्रदर्शन कौशल (Demonstration Skill)
शिक्षण की संपूर्ण प्रक्रिया केवल मौखिक रूप से प्रभावी नहीं हो सकती, इसलिए किसी विषय-वस्तु को स्पष्ट और रोचक बनाने के उद्देश्य से सहायक सामग्रियों (जैसे चार्ट, चित्र, मॉडल आदि) के माध्यम से प्रदर्शन किया जाता है। किसी पदार्थ या कार्य-प्रणाली के मुख्य गुणों और उपयोगिता पर जोर देना ही प्रदर्शन है। प्रदर्शन कौशल के प्रयोग से पूर्व अध्यापक को उचित योजना और पूर्व-अभ्यास की आवश्यकता होती है।
5. व्याख्या कौशल (Explanation Skill)
उच्च कक्षाओं में गद्य, पद्य या कविता आदि का भाव प्रकट करने, अर्थ बताने या अपने विचारों और सिद्धांतों को शाब्दिक रूप में छात्रों तक पहुँचाने के लिए व्याख्या कौशल का प्रयोग किया जाता है।
थॉमस एम. रिस्क ने अपनी पुस्तक “Principles and Practices of Teaching in Secondary School” में कहा है कि — “व्याख्यान उन तथ्यों, सिद्धांतों या अन्य संबंधों का स्पष्टीकरण है, जिनको शिक्षक चाहता है कि उसके सुनने वाले समझें।”
ध्यान रखने योग्य बातें: व्याख्या की भाषा सरल होनी चाहिए, पाठ की गति प्रारंभ में मंद फिर सतत् होनी चाहिए, दृश्य-श्रव्य सामग्री का प्रयोग किया जाना चाहिए तथा उचित मुहावरों, शब्दों व उदाहरणों के साथ तारतम्यता बनाए रखनी चाहिए।
6. प्रबलन कौशल / पुनर्बलन कौशल (Reinforcement Skill)
इसे प्रतिपुष्टि (Feedback) या सुदृढ़ीकरण कौशल भी कहते हैं। सकारात्मक शब्दों और उचित व्यवहार के माध्यम से छात्र को अधिगम प्रक्रिया से जोड़ना और उसमें रुचि उत्पन्न करना ही पुनर्बलन है। इससे सीखने की गति में तीव्र वृद्धि होती है।
सकारात्मक पुनर्बलन: वे घटनाएँ या शब्द जो अनुक्रिया की संभावना को बढ़ाते हैं।
शाब्दिक सकारात्मक: ‘अच्छा’, ‘बहुत अच्छा’, ‘शाबाश’, ‘उत्तम’ आदि प्रोत्साहन देने वाले शब्द।
सांकेतिक सकारात्मक: सिर हिलाना, मुस्कुराना, बालक की पीठ थपथपाना आदि।
नकारात्मक पुनर्बलन: अशुद्ध या असंतोषजनक उत्तर पर प्रयुक्त नकारात्मक शब्द या संकेत (जैसे गुस्से से देखना आदि)। शिक्षकों को कक्षा में हमेशा सकारात्मक पुनर्बलन का ही प्रयोग करना चाहिए, जिससे छात्र हतोत्साहित न हों।
7. श्यामपट्ट कौशल (Blackboard Skill)
शिक्षण प्रक्रिया में श्यामपट्ट (Blackboard) का विशेष स्थान है। कक्षा में श्यामपट्ट को अध्यापक का सबसे अच्छा मित्र माना जाता है। शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए अध्यापक कार्टून, चित्र, ग्राफ और मुख्य बिंदुओं को श्यामपट्ट के माध्यम से प्रदर्शित करता है।
प्रमुख घटक: लिखावट स्पष्ट, स्वच्छ और सुंदर होनी चाहिए; अक्षरों का आकार उचित हो; मुख्य बिंदुओं को रेखांकित किया जाना चाहिए; शब्दों के बीच उचित अंतराल हो और शिक्षक को लिखते समय श्यामपट्ट के सामने सीधे खड़े होने से बचना चाहिए ताकि लिखा हुआ स्पष्ट दिखाई दे।
📌 निष्कर्ष (Conclusion)
संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिक्षण कौशल वे बुनियादी तकनीकें हैं जिनके उचित ज्ञान और अभ्यास से एक शिक्षक अपनी कक्षा को अत्यधिक प्रभावशाली, अनुशासित और ज्ञानवर्धक बना सकता है। शिक्षा क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रत्येक भावी शिक्षक को इन कौशलों में पारंगत होना अनिवार्य है।
🔗 शिक्षण विधियाँ: महत्वपूर्ण आर्टिकल्स की सूची
| क्र.सं. | शिक्षण विधि का नाम | मुख्य विशेषता / क्षेत्र | डायरेक्ट लिंक (URL) |
| 1. | अभिक्रमित अनुदेशन विधि (Programmed Instruction) | छोटे-छोटे पदों में विभाजित करके स्व-अधिगम कराना | क्लिक करके पढ़ें |
| 2. | अनुकरण शिक्षण विधि (Simulation / Imitation Method) | शिक्षक या आदर्श व्यक्ति के व्यवहार का अनुकरण करके सीखना | क्लिक करके पढ़ें |
| 3. | पर्यवेक्षित अध्ययन विधि (Supervised Study Method) | शिक्षक के मार्गदर्शन और देखरेख में छात्रों द्वारा अध्ययन | क्लिक करके पढ़ें |
| 4. | सूक्ष्म शिक्षण विधि (Micro-Teaching) | शिक्षण कौशलों के विकास की लघु एवं प्रायोगिक विधि | क्लिक करके पढ़ें |
| 5. | इकाई शिक्षण विधि (Unit Approach Method) | संपूर्ण पाठ्यक्रम को सार्थक इकाइयों में बाँटकर पढ़ाना | क्लिक करके पढ़ें |


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