अंतिम संशोधित (Last Updated): October 22, 2026
नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना 16 जुलाई 1893 को काशी (वाराणसी) में श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने की। यह संस्था हिंदी भाषा, देवनागरी लिपि और हिंदी साहित्य के प्रचार का बड़ा केंद्र बनी। इसी ने हस्तलिखित ग्रंथों की खोज, नागरी प्रचारिणी पत्रिका और हिंदी शब्दसागर जैसे बड़े काम किए।
हिंदी साहित्य के इतिहास में यह सभा इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि इसके कामों से आधुनिक हिंदी को संस्थागत आधार मिला। परीक्षा में स्थापना-वर्ष, संस्थापक और उसके प्रमुख कार्यों से प्रश्न आते हैं।
🏛️ सभा की स्थापना और संस्थापक
Table of Contents
- स्थापना 16 जुलाई 1893 को काशी में हुई।
- संस्थापकों को “राम-श्याम-शिव” के रूप में याद रखें: रामनारायण मिश्र, श्यामसुंदर दास और शिवकुमार सिंह।
- प्रथम सभापति के रूप में प्रायः राधाकृष्ण दास का नाम लिया जाता है (कुछ पाठ्यपुस्तकों में स्रोत भिन्न हो सकते हैं)।
- यह संस्था हिंदी और नागरी लिपि के लिए जनमत बनाने का मंच भी बनी।

🛠️ सभा के प्रमुख कार्य
| कार्य | वर्ष / विवरण |
|---|---|
| नागरी प्रचारिणी पत्रिका | त्रैमासिक पत्रिका, 1896 से |
| आर्यभाषा पुस्तकालय | 1896 में स्थापित |
| हस्तलिखित ग्रंथों की खोज | 1900 से आरंभ; श्यामसुंदर दास के निर्देशन में प्रारंभिक खोज (1900-1908)। बाद में श्यामबिहारी मिश्र और शुकदेव बिहारी मिश्र ने खोज-कार्य आगे बढ़ाया (1908-1916) |
| अदालतों में नागरी लिपि | सभा के प्रयत्नों से 1900 में संयुक्त प्रांत की अदालतों में नागरी लिपि को स्थान मिला |
| हिंदी शब्दसागर | श्यामसुंदर दास के संपादन में तैयार हुआ बृहद् कोश; प्रकाशन 1920 के दशक में |
| हिंदी साहित्य सम्मेलन | 1910 में काशी में आयोजित सम्मेलन से इसकी शुरुआत; मदन मोहन मालवीय पहले सभापति, पुरुषोत्तमदास टंडन इसकी आत्मा माने जाते हैं |
ध्यान दें: शब्दसागर और खोज-कार्य की सटीक तिथियाँ अलग-अलग पुस्तकों में थोड़ी भिन्न मिलती हैं। परीक्षा से पहले अपने पाठ्यक्रम की सूची से मिला लें।
📜 हस्तलिखित ग्रंथों की खोज क्यों महत्त्वपूर्ण?
इस खोज से अनेक पुराने कवियों और ग्रंथों का पता चला, जिससे हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन के लिए प्रामाणिक सामग्री मिली। इसी सामग्री का उपयोग बाद के इतिहासकारों ने किया। इसे हिंदी साहित्य का इतिहास (आधुनिक काल) के संदर्भ में पढ़ना उपयोगी रहेगा।
✍️ हिंदी साहित्य सम्मेलन और मालवीय–टंडन
- मदन मोहन मालवीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के पहले सभापति माने जाते हैं।
- पुरुषोत्तमदास टंडन इसके प्रमुख प्रेरक रहे और उन्हें इसकी आत्मा कहा जाता है।
- दोनों ने वाराणसी और प्रयाग में हिंदी-आंदोलन को बल दिया।
संबंधित विषय: देवनागरी लिपि, प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ और सरस्वती पत्रिका।
📝 अभ्यास प्रश्न (MCQ)
पहले खुद उत्तर सोचिए, फिर “उत्तर देखें” पर क्लिक कीजिए।
(2) काशी
(3) लखनऊ
(4) दिल्ली
👉 उत्तर देखें
सभा की स्थापना 1893 में काशी में हुई।
(A) सभा की स्थापना 1893 में हुई।
(B) नागरी प्रचारिणी पत्रिका 1896 से निकली।
(C) हस्तलिखित ग्रंथों की खोज 1900 से शुरू हुई।
(D) सभा की स्थापना 1930 में हुई।
(2) केवल A, B और C
(3) केवल B, C और D
(4) A, B, C और D सभी
👉 उत्तर देखें
D गलत है। स्थापना 1893 में हुई थी।
| सूची I | सूची II |
|---|---|
| (A) सभा की स्थापना | (I) 1893 |
| (B) आर्यभाषा पुस्तकालय | (II) 1896 |
| (C) हस्तलिखित ग्रंथों की खोज | (III) 1900 |
| (D) हिंदी साहित्य सम्मेलन | (IV) 1910 |
(2) A-II, B-I, C-III, D-IV
(3) A-I, B-III, C-II, D-IV
(4) A-III, B-II, C-IV, D-I
👉 उत्तर देखें
सभा की स्थापना 1893, आर्यभाषा पुस्तकालय 1896, खोज-कार्य 1900, हिंदी साहित्य सम्मेलन 1910।
कारण (R): सभा के प्रयत्नों से 1900 में संयुक्त प्रांत की अदालतों में नागरी लिपि को स्थान मिला।
(2) A और R दोनों सही, पर R, A की सही व्याख्या नहीं है
(3) A सही, R गलत
(4) A गलत, R सही
👉 उत्तर देखें
अदालतों में नागरी लिपि की मान्यता सभा की बड़ी उपलब्धि थी।
(A) हिंदी साहित्य सम्मेलन (B) सभा की स्थापना (C) हस्तलिखित ग्रंथों की खोज (D) आर्यभाषा पुस्तकालय
(2) B, C, D, A
(3) D, B, C, A
(4) B, D, A, C
👉 उत्तर देखें
सभा की स्थापना (1893), आर्यभाषा पुस्तकालय (1896), खोज (1900), हिंदी साहित्य सम्मेलन (1910)।
कथन II: पुरुषोत्तमदास टंडन को सम्मेलन की आत्मा कहा जाता है।
(2) कथन I सही, कथन II गलत
(3) कथन I गलत, कथन II सही
(4) दोनों कथन गलत हैं
👉 उत्तर देखें
दोनों कथन सही हैं।
❓ नागरी प्रचारिणी सभा पर सवाल-जवाब (FAQ)

एम.ए., बी.एड. (नेट हिंदी), कॉलेज व्याख्याता, श्रीगंगानगर (राजस्थान)। हिंदी साहित्य चैनल के संचालक।


बहुत उपयोगी जानकारी सर जी
उपयोगी जानकारी।धन्यवाद।
सम्भव हो तो,नागरी प्रचारिणी सभा का ईमेल देने का कष्ट करें।