अंतिम संशोधित (Last Updated): October 22, 2026
गोस्वामी तुलसीदास का संपूर्ण जीवन परिचय, रचनाएँ, काव्य-सौंदर्य और साहित्यिक अवदान (Tulsidas Ka Jivan Parichay)
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हिंदी साहित्य के भक्ति आंदोलन की सगुण धारा के रामभक्ति शाखा के सिरमौर, लोकनायक और महान कवि गोस्वामी तुलसीदास का भारतीय संस्कृति, साहित्य और जन-मानस पर अतुलनीय प्रभाव है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से तुलसीदास का जीवन परिचय, उनके ग्रंथ, भाषा-शैली और आलोचकों के कथन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस आलेख में हम तुलसीदास जी के संपूर्ण जीवन और कृतित्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

तुलसीदास का सम्पूर्ण परिचय – Tulsidas Ka Jivan Parichay

गोस्वामी तुलसीदास का संपूर्ण जीवन परिचय, रचनाएँ, काव्य-सौंदर्य और साहित्यिक अवदान (Tulsidas Ka Jivan Parichay)
हिंदी साहित्य के भक्ति आंदोलन की सगुण धारा के रामभक्ति शाखा के सिरमौर, लोकनायक और महान कवि गोस्वामी तुलसीदास का भारतीय संस्कृति, साहित्य और जन-मानस पर अतुलनीय प्रभाव है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से तुलसीदास का जीवन परिचय, उनके ग्रंथ, भाषा-शैली और आलोचकों के कथन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस आलेख में हम तुलसीदास जी के संपूर्ण जीवन और कृतित्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
📌 तुलसीदास का संक्षिप्त परिचय (Tulsidas Ka Jivan Parichay)
| विवरण | तथ्य / विवरण |
| नाम | तुलसीदास |
| बचपन का नाम | रामबोला |
| जन्मतिथि | 1532 ई. |
| जन्म स्थान | सोरों, शूकरक्षेत्र (उत्तर प्रदेश) |
| पिता का नाम | आत्माराम दुबे |
| माता का नाम | हुलसी |
| पत्नी | रत्नावली |
| दीक्षा गुरु | नरहर्यानन्द (नरहरिदास) |
| शिक्षा गुरु | शेष सनातन |
| प्रसिद्ध ग्रंथ | रामचरितमानस, दोहावली, कवितावली, हनुमान चालीसा, जानकी मंगल, विनयपत्रिका |
| दर्शन | वैष्णव (विशिष्टाद्वैतवाद / रामानुजाचार्य के ‘श्री संप्रदाय’ से प्रभावित) |
| भक्ति भावना | दास्य भाव |
| मृत्यु | 1623 ई. (संवत 1680 वि.) |
🌍 जन्म स्थान संबंधी विद्वानों के मत
तुलसीदास के जन्म स्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है, जो निम्नलिखित हैं:
सूकर खेत (सोरों) (जिला एटा): लाला सीताराम, गौरीशंकर द्विवेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामनरेश त्रिपाठी, रामदत्त भारद्वाज, गणपतिचंद्र गुप्त।
राजापुर (जिला बाँदा): बेनीमाधव दास, महात्मा रघुवर दास, शिवसिंह सेंगर, रामगुलाम द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल तुलसीदास को ‘स्मार्त वैष्णव’ मानते हैं। शुक्ल जी के अनुसार, “हिंदी काव्य की प्रौढ़ता के युग का आरंभ गोस्वामी तुलसीदास द्वारा हुआ।”
👥 तुलसीदास की गुरु परंपरा
राघवानन्द $\Rightarrow$ रामानन्द $\Rightarrow$ अनन्तानन्द $\Rightarrow$ नरहर्यानंद (नरहरिदास) $\Rightarrow$ तुलसीदास
💍 वैवाहिक जीवन और वैराग्य
तुलसीदास का विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली के साथ हुआ था। एक बार तुलसीदास की अनुपस्थिति में जब रत्नावली अपने भाई के साथ अपने पीहर चली गईं, तो तुलसीदास भी उनके पीछे-पीछे वहाँ पहुँच गए। वहाँ रत्नावली ने उन्हें बुरी तरह फटकारा। रत्नावली की वह फटकार दो दोहों के रूप में अत्यंत प्रसिद्ध है:
’’लाज न लागत आपको दौरे आयहु साथ।
धिक धिक ऐसे प्रेम को कहा कहौं मैं नाथ।।
अस्थि चर्म मय देह मम तामे जैसी प्रीति।
तैसी जौ श्री राम महँ होति न तौ भवभीति।।’’
विशेष: रत्नावली की इस फटकार ने तुलसीदास को संन्यासी बना दिया।
🤝 स्नेही मित्र एवं संस्मरण
गोस्वामी तुलसीदास के स्नेही मित्रों में नवाब अब्दुर्रहीम खानखाना, महाराज मानसिंह, नाभादास, मधुसूदन सरस्वती और टोडरमल का नाम प्रसिद्ध है। टोडरमल की मृत्यु पर तुलसीदास ने कई दोहे लिखे थे:
’’चार गाँव को ठाकुरो मन को महामहीप।
तुलसी या कलिकाल में अथए टोडर दीप।।
रामधाम टोडर गए, तुलसी भए असोच।
जियबी गीत पुनीत बिनु, यहै जानि संकोच।।’’
रहीमदास ने तुलसी के संदर्भ में लिखा है:
सुरतिय, नरतिय, नागतिय, सब चाहति अस होय। — तुलसीदास
गोद लिए हुलसी फिरैं, तुलसी सो सुत होय।। — रहीमदास
📚 तुलसीदास की प्रामाणिक रचनाएँ
गोस्वामी तुलसीकृत 12 ग्रंथों को ही प्रामाणिक माना जाता है, जिसमें 5 बड़े और 7 छोटे ग्रंथ हैं।
पंचरत्न: तुलसीदास की पाँच लघु कृतियों — ‘वैराग्य संदीपनी’, ‘रामलला नहछू’, ‘जानकी मंगल’, ‘पार्वती मंगल’ और ‘बरवै रामायण’ को ‘पंचरत्न’ कहा जाता है।
कृष्णदत्त मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘गौतम चंद्रिका’ में तुलसीदास की रचनाओं के ‘अष्टांगयोग’ (आठ अंग: रामगीतावली, पदावली, कृष्ण गीतावली, बरवै, दोहावली, सुगुनमाला, कवितावली, सोहिलोमंगल) का उल्लेख किया है।
तुलसीदास की प्रथम रचना ‘वैराग्य संदीपनी’ तथा अंतिम रचना ‘कवितावली’ को माना जाता है (‘कवितावली’ के परिशिष्ट में ‘हनुमानबाहुक’ भी संलग्न है)। किंतु अधिकांश विद्वान ‘रामलला नहछू’ को प्रथम कृति मानते हैं।
💡 रचनाओं को याद रखने की ट्रिक:
जिन रचनाओं में राम व मंगल शब्द आते हैं, वे अवधी में हैं, शेष ब्रजभाषा में हैं।
1. अवधी भाषा में रचित रचनाएँ:
| क्र. | रचना का नाम | प्रकाशन वर्ष / विवरण |
| 1. | रामचरितमानस | 1574 ई. (सात कांड) |
| 2. | पार्वती मंगल | 1586 ई. (164 हरिगीतिका छंद) |
| 3. | जानकी मंगल | 1586 ई. (216 छंद) |
| 4. | रामलला नहछू | 1586 ई. (20 सोहर छंद) |
| 5. | बरवै रामायण | 1612 ई. (69 बरवै छंद) |
| 6. | रामाज्ञा प्रश्नावली | 1612 ई. (49-49 दोहों के सात सर्ग) |
2. ब्रजभाषा में रचित रचनाएँ:
| क्र. | रचना का नाम | प्रकाशन वर्ष / विवरण |
| 1. | गीतावली | 1578 ई. (330 छंद) |
| 2. | दोहावली | 1583 ई. (573 दोहे) |
| 3. | विनय पत्रिका | 1583 ई. (276 पद) |
| 4. | कृष्ण गीतावली | 1589 ई. (61 पद) |
| 5. | कवितावली | 1612 ई. (335 छंद) |
| 6. | वैराग्य संदीपनी | 1612 ई. (62 छंद) |
🏛️ ‘रामचरितमानस’ और अन्य प्रमुख कृतियों की विशेषताएँ
‘रामचरितमानस’ की रचना संवत 1631 में चैत्र शुक्ल रामनवमी (मंगलवार) को हुई। इसकी रचना में कुल 2 वर्ष 7 महीने 26 दिन लगे।
‘रामाज्ञा प्रश्न’ एक ज्योतिष ग्रंथ है।
‘कृष्ण गीतावली’ में गोस्वामी जी ने कृष्ण से संबंधी पदों की रचना की तथा ‘पार्वती मंगल’ में पार्वती और शिव के विवाह का वर्णन किया।
‘रामचरितमानस’ और ‘कवितावली’ में गोस्वामी जी ने ‘कलिकाल’ का वर्णन किया है।
‘कवितावली’ में बनारस (काशी) के तत्कालीन समय में फैले ‘महामारी’ का वर्णन ‘उत्तराकांड’ में किया गया है।
तुलसीदास ने अपने बाहु रोग से मुक्ति के लिए ‘हनुमानबाहुक’ की रचना की।
“बरवै रामायण” की रचना रहीम के आग्रह पर की थी।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘रामचरितमानस’ को ‘लोकमंगल की साधनावस्था’ का काव्य माना है।
‘मानस’ के सात कांड:
बालकांड
अयोध्याकांड
अरण्यकांड
किष्किंधकांड
सुंदरकांड
लंकाकांड
उत्तरकांड
‘अयोध्याकांड’ को ‘रामचरितमानस’ का हृदयस्थल कहा जाता है। इस कांड की ‘चित्रकूट सभा’ को आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘एक आध्यात्मिक घटना’ की संज्ञा प्रदान की है। चित्रकूट सभा में ‘वेदनीति’, ‘लोकनीति’ एवं ‘राजनीति’ तीनों का समन्वय दिखाई देता है।
‘रामचरितमानस’ की रचना गोस्वामी जी ने ‘स्वान्तः सुखाय’ के साथ-साथ ‘लोकहित’ एवं ‘लोकमंगल’ के लिए की है।
तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ की कल्पना ‘मानसरोवर’ के रूपक के रूप में की है, जिसमें 7 कांड के रूप में सात सोपान तथा चार वक्ता के रूप में चार घाट हैं।
👑 विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई उपाधियाँ
रूपकों का बादशाह: लाला भगवानदीन और बच्चन सिंह
अनुप्रास का बादशाह: आचार्य रामचंद्र शुक्ल
उत्प्रेक्षाओं का बादशाह: डॉ. उदयभानु सिंह
सुमेरू कवि गोस्वामी तुलसीदास: बाबू गुलाबराय
🗣️ विद्वानों के महत्वपूर्ण कथन
नाभादास: कलिकाल का वाल्मीकि
स्मिथ: मुगलकाल का सबसे महान व्यक्ति
ग्रियर्सन: बुद्धदेव के बाद सबसे बड़ा लोक-नायक
मधुसूदन सरस्वती:
आनंदकानने कश्चिज्जंगमस्तुलसी तरुः। कवितामंजरी यस्य रामभ्रमर भूषिता।।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल:
’’इनकी वाणी की पहुँच मनुष्य के सारे भावों व्यवहारों तक है। एक ओर तो वह व्यक्तिगत साधना के मार्ग में विरागपूर्ण शुद्ध भगवदभजन का उपदेश करती है दूसरी ओर लोक पक्ष में आकर पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्यों का सौंदर्य दिखाकर मुग्ध करती है।’’
’’यह एक कवि ही हिंदी को प्रौढ़ साहित्यिक भाषा सिद्ध करने के लिए काफी है।’’
हजारीप्रसाद द्विवेदी:
’’तुलसीदास जी उत्तरी भारत की समग्र जनता के हृदय मंदिर में पूर्ण प्रेम-प्रतिष्ठा के साथ विराज रहे हैं।’’
’’भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।’’
’’तुलसी का संपूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।’’
रामविलास शर्मा: जातीय कवि। (उन्होंने लिखा— “भक्ति आंदोलन और तुलसी काव्य का राष्ट्रीय महत्त्व यह है कि इनसे भारतीय जनता की भावात्मक एकता दृढ़ हुई।”)
अमृतलाल नागर: मानस का हंस।
भिखारीदास:
’’तुलसी गंग दुवौ भए सुकविन के सरदार। इनके काव्यन में मिली भाषा विविध प्रकार।।’’
अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’:
’’कविता करके तुलसी न लसे, कविता पा लसी तुलसी की कला’’
🌸 तुलसीदास के काव्य की विशेषताएँ
1. भावपक्षीय विशेषताएँ
काव्य में समन्वय की विराट चेष्टा: तुलसीदास के युग में विभिन्न विरोधी संप्रदाय, धर्म, जातियाँ, उपासना-पद्धतियाँ और दर्शन वातावरण को विषाक्त कर रहे थे। तुलसीदास ने विरोधी ध्रुवों में समन्वय के तत्त्व निकाले। उन्होंने संन्यासी, वैरागी, लोक और शास्त्र, समाज और संस्कृति, राजा और प्रजा के बीच समन्वय स्थापित किया।
रस चित्रण एवं भक्ति: तुलसीदास के काव्य में सभी रसों की परिपूर्णता है, किंतु विशेष रूप से भक्ति, वीर और श्रृंगार रस की सिद्धि उन्हें प्राप्त थी। उनकी भक्ति दास्य भाव की है, जिसमें इष्टदेव के सामने पूर्ण आत्मविसर्जन होता है।
वीर, वात्सल्य और करुण रस: राम और लक्ष्मण, हनुमान आदि के चरित्रों में वीर भाव का अद्भुत उत्कर्ष है। कौशल्या के साथ बाल राम की क्रीड़ाओं में वात्सल्य तथा दशरथ-मरण और लक्ष्मण शक्ति के प्रसंगों में करुण रस की पराकाष्ठा दिखाई देती है।
2. कलापक्षीय विशेषताएँ
प्रबंध-निपुणता और भाषा: रामचरितमानस महाकाव्य प्रबंध की दृष्टि से एक उत्तम रचना है। तुलसी ने अवधी (परिष्कृत और साहित्यिक अवधी) तथा ब्रजभाषा (विनय पत्रिका, कवितावली आदि) दोनों पर समान अधिकार के साथ रचना की है। उनकी भाषा में संस्कृत की कोमलकांत पदावली का सुंदर प्रयोग हुआ है।
छंद और अलंकार: तुलसीदास काव्य-शास्त्र के पारंगत विद्वान थे। उन्होंने दोहा, सोरठा, चौपाई, गीतिका, कवित्त, सवैया, छप्पय, बरवै आदि सभी छंदों का सफल प्रयोग किया है। उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा उनके प्रिय अलंकार हैं।
❓ अभ्यास प्रश्न
तुलसीदास का जन्म कब हुआ था?
तुलसीदास के गुरु कौन थे?
तुलसीदास की पत्नी का क्या नाम था?
तुलसीदास की माता का क्या नाम था?
🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि
क्र.सं. लेखक / कवि का नाम मुख्य विशेषता / काल इंटरनल लिंक (URL) 1. भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युग लिंक देखें(उदाहरण यूआरएल) 2. महावीर प्रसाद द्विवेदी द्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकार लिंक देखें 3. जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककार लिंक देखें 4. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेता लिंक देखें 5. सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि / छायावाद लिंक देखें 6. महादेवी वर्मा आधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्री लिंक देखें 7. प्रेमचंद (धनपत राय) उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुष लिंक देखें 8. अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक लिंक देखें 9. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कवि लिंक देखें 10. कृष्णा सोबती आधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर लिंक देखें



बहुत ही सारगर्भित वर्णन है वीडियो मे वक़्त ज्यादा लगता है लेकिन इसमे कम समय में ज्यादा चीजें कवर हो जाती है बहुत बहुत धन्यवाद साधुवाद, पूजा देवडा बीकानेर Rajasthan
जी धन्यवाद
वहुत खूब महोदय जी
जी धन्यवाद
Very nice
आपके मन मे हिंदी के प्रति जो प्रेम ,स्नेह आदर और आदर्श हैं उससे हम हिंदी विद्यार्थियों को सदा लाभ मिलता रहेगा । आपको कोटि -कोटि प्रणाम
धन्यवाद सर्
जी आपका धन्यवाद
हिंदी साहित्य को उचित आदर और सम्मान मिलता रहे ।इस दिशा में आपका प्रयास अत्यंत सराहनीय और शिक्षाप्रद है ।निश्चित रूप से आपका यह प्रयास हिंदी के विद्यार्थियों
के लिए लाभदायक है ।
जी धन्यवाद ,आपका यही स्नेह हमें कुछ नया लिखने को प्रेरित करता है
अति सुन्दर संकलन
जी धन्यवाद
बेहतरीन /विरल