महावीर प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय, रचनाएँ और निबंध | Mahavir Prasad Dwivedi

अंतिम संशोधित (Last Updated): September 1, 2026

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का संपूर्ण जीवन परिचय, रचनाएँ और साहित्यिक योगदान (Mahavir Prasad Dwivedi ka Jivan Parichay)

हिंदी साहित्य के ‘द्विवेदी युग’ के प्रणेता, महान संपादक, भाषा-परिमार्जनकर्ता, आलोचक और युग-निर्माता आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का आधुनिक हिंदी साहित्य में अत्यंत स्वर्णिम और सर्वोच्च स्थान है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जीवन परिचय, उनकी मौलिक व अनूदित रचनाएँ, निबंध, महत्वपूर्ण कथन और परीक्षापयोगी तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस आलेख में हम उनके संपूर्ण जीवन और कृतित्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

📌 महावीर प्रसाद द्विवेदी का संक्षिप्त परिचय (Quick Facts)

  • जन्म: 1864 ई.

  • जन्मस्थान: ग्राम – दौलतपुर, जिला – रायबरेली (उत्तर प्रदेश)

  • निधन: 21 दिसंबर, 1938 ई. (रायबरेली में)

  • पिता का नाम: रामसहाय द्विवेदी (इनके पिता को ‘महावीर’ का इष्ट था, इसी कारण उन्होंने अपने पुत्र का नाम ‘महावीर’ रखा था)

  • संपादक: यह 1903 ई. से लेकर 1920 ई. तक प्रसिद्ध पत्रिका ‘सरस्वती’ के संपादक रहे थे।

  • विशिष्ट पहचान: ये कवि, आलोचक, निबंधकार, अनुवादक तथा संपादकाचार्य थे। आधुनिक काल में हिंदी गद्य एवं पद्य की भाषा के परिमार्जनकर्ता आचार्य द्विवेदीजी ही माने जाते हैं।

📚 महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रमुख रचनाएँ

इनके द्वारा रचित मौलिक और अनूदित गद्य-पद्य रचनाओं की संख्या लगभग 80 मानी जाती है।

(क) मौलिक रचनाएँ (संक्षिप्त सूची)

  • काव्य-मंजूषा

  • सुमन (1923 ई.)

  • कान्य-कुब्ज

  • अबला विलाप

  • संपत्ति शास्त्र (यह इनकी अर्थशास्त्र संबंधी प्रसिद्ध पुस्तक है)

  • महिला मोद

  • कविता कलाप

  • नागरी तेरी यह दशा

(ख) प्रसिद्ध लेख

  • “क्या हिंदी नाम की कोई भाषा ही नहीं” (सरस्वती, 1913 ई.)

  • “आर्य समाज का कोप” (सरस्वती, 1914 ई.)

  • ’भुजंगभूषण भट्टाचार्य’ नाम से प्रकाशित लेख — ’कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ (1908 ई. की सरस्वती में प्रकाशित)

📖 निबंध संग्रह (Nibandh)

क्र.सं.निबंध का नामविवरण / प्रकाशन वर्ष
1.कवि और कविता
2.कवि प्रतिभा
3.कवि कर्तव्य
4.साहित्य की महत्ता
5.लोभ
6.मेघदूत
7.क्या हिन्दी नाम की कोई भाषा नहींसरस्वती, 1913 ई.
8.आर्य समाज का कोपसरस्वती, 1914 ई.
  

🔄 अनूदित गद्य साहित्य (Translated Prose Literature)

वर्षअनूदित कृतिमूल लेखक एवं ग्रंथ
1891 ई.भामिनी विलासपं. जगन्नाथ के ’भामिनी विलास’ का अनुवाद
1896 ई.अमृत लहरीपं. जगन्नाथ के ’यमुना-स्त्रोत’ का भावानुवाद
1901 ई.बेकन विचार रत्नावलीबेकन के निबंधों का अनुवाद
1906 ई.शिक्षाहरबर्ट स्पेंसर के ’एजुकेशन’ का अनुवाद
1907 ई.स्वाधीनताजॉन स्टुअर्ट मिल के ’ऑन लिबर्टी’ का अनुवाद
1907 ई.जल चिकित्साजर्मन लेखक लुई कोने की पुस्तक का अंग्रेजी से अनुवाद
1908 ई.महाभारतमहाभारत की कथा का हिंदी रूपांतरण
1912 ई.रघुवंशकालिदास के ’रघुवंश’ महाकाव्य का भाषानुवाद
1913 ई.वेणी संहारसंस्कृत कवि भट्ट नारायण के नाटक का अनुवाद
1915 ई.कुमार संभवकालिदास कृत ’कुमारसंभव’ का अनुवाद
1917 ई.मेघदूतकालिदास के ’मेघदूत’ का अनुवाद
1917 ई.किरातार्जुनीयम्भारवी कृत ’किरातार्जुनीयम्’ का अनुवाद
1908 ई.प्राचीन पंडित और कविअन्य भाषाओं के लेखों के आधार पर परिचय
1927 ई.आध्यायिका सप्तकअन्य भाषाओं की चुनी हुई सात आख्यायिकों का अनुवाद
  

🎵 अनूदित पद्य साहित्य (Translated Poetry)

वर्षअनूदित पद्य कृतिमूल रचना / विवरण
1889 ई.विनय विनोदभर्तृहरि के ’वैराग्य शतक’ का दोहों में अनुवाद
1890 ई.स्नेह मालाभर्तृहरि के ’शृंगार शतक’ का दोहों में अनुवाद
1890 ई.विहार वाटिकागीत गोविंद का भावानुवाद
1891 ई.श्री महिमन स्रोतसंस्कृत के ’महिमन-स्रोत’ का अनुवाद
1891 ई.गंगालहरीपं. जगन्नाथ की ’गंगा-लहरी’ का सवैयों में अनुवाद
1891 ई.ऋतुतरंगिणीकालिदास के ’ऋतुसंहार’ का छायानुवाद
1902 ई.कुमारसंभवसारकालिदास कृत ’कुमारसंभव’ के प्रथम 5 सर्गों का सारांश
सुहागरातबाइरन के ’ब्राइडल-नाइट’ का छायानुवाद
  

✍️ महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रमुख कथन

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी (कवि-कर्तव्य निबंध में):

    • “कविता का विषय मनोरंजक एवं उपदेशपरक होना चाहिए। यमुना के किनारे केलि-कौतूहल का अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका…….चींटी से लेकर हाथी पर्यंत पशु, भिक्षुक से लेकर राजा पर्यंत मनुष्य, बिंदु से लेकर समुद्र पर्यंत जल, अनंत आकाश, अनंत पृथ्वी—सभी पर कविता हो सकती है।”

    • “किसी पुस्तक या प्रबंध में क्या लिखा गया है, किस ढंग से लिखा गया है, वह विषय उपयोगी है या नहीं, उससे किसी का मनोरंजन हो सकता है या नहीं, उससे किसी को भी लाभ पहुँच सकता है या नहीं, लेखक ने कोई नयी बात लिखी है या नहीं, यही विचारणीय विषय हैं। समालोचक को प्रधानतः इन्हीं बातों पर विचार करना चाहिए।”

    • “अंतःकरण की वृत्तियों के चित्रण का नाम कविता है। नाना प्रकार के योग से उत्पन्न हुए मनोभाव जब मन में नहीं समाते तब वे आप ही आप मुख मार्ग से बाहर निकलने लगते हैं, वही कविता है।”

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल:

    • “यदि द्विवेदी जी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध, और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखाई पड़ी थी, उसकी परंपरा जल्दी न सकती।”

    • “गद्य की भाषा पर द्विवेदी जी के इस शुभ प्रभाव का स्मरण जब तक भाषा के लिए शुद्धता आवश्यक समझी जाएगी, तब तक बना रहेगा।”

  • नंददुलारे वाजपेयी:

    • “साहित्य के क्षेत्र में एक व्यक्ति पर इतना बड़ा उत्तरदायित्व इतिहास की शक्तियों ने कदाचित पहली बार रखा था और पहली ही बार द्विवेदी जी ने इस उत्तरदायित्व के सफल निर्वाह का अनुपम निदर्शन प्रस्तुत किया।”

  • रामविलास शर्मा:

    • “द्विवेदी जी प्रेमचंद की तरह कथा लेखक नहीं थे और मैथिलीशरण गुप्त की तुलना में कवि भी साधारण थे, किंतु वैचारिक स्तर पर वह इन दोनों से आगे हैं। इन दोनों के काव्य संसार और कथा संसार की रूपरेखाएँ उनके गद्य में स्पष्ट दिखाई देती हैं। इस दृष्टि से उन्हें युग निर्माता कहना पूर्णतः संगत है।”

💡 विशेष एवं परीक्षापयोगी तथ्य (Special Facts)

  • छद्म नाम: ये प्रारंभ में ’भुजंगभूषण भट्टाचार्य’ के गुप्त नाम से ’सरस्वती’ पत्रिका में अपनी रचनाएँ छापते थे।

  • साहित्य की परिभाषा: इन्होंने साहित्य को ’ज्ञान की राशि का संचित कोश’ कहकर पुकारा है।

  • समालोचना: हिंदी समालोचना को स्थापित करने का श्रेय इन्हीं को दिया जाता है। इन्होंने हिंदी भाषा को व्याकरण-सम्मत रूप प्रदान किया।

  • करियर: अपनी आजीविका चलाने के लिए इन्होंने रेलवे की नौकरी की, किंतु उच्चाधिकारी से कुछ कहा-सुनी हो जाने के कारण इन्होंने नौकरी से त्यागपत्र देकर शेष जीवन हिंदी भाषा और साहित्य को समर्पित कर दिया।

  • साहित्य समग्र: ’महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली’ के पंद्रह खंडों में इनका संपूर्ण साहित्य समाहित है।

  • डॉ. नगेंद्र के मत: डॉ. नगेंद्र के अनुसार इन्होंने काव्य की सामाजिक उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए साहित्य में ’सरलता, असलियत और जोश’ पर बल दिया, जिनमें से ’असलीयत’ सबसे महत्त्वपूर्ण है।

  • मैथिलीशरण गुप्त का कथन (श्लेष शैली में प्रशंसा):

    ”करते तुलसीदास भी कैसे मानस नाद। महावीर का यदि उन्हें मिलता नहीं प्रसाद।।’’

    (अर्थात् जैसे तुलसीदासजी ने महावीर हनुमानजी की कृपा से ’रामचरितमानस’ की रचना की, वैसे ही गुप्तजी ने महावीर प्रसाद द्विवेदी की कृपा से ’साकेत’ की रचना की)।

🎨 महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रमुख गद्य शैलियाँ

इनकी गद्य रचनाओं में मुख्यतः निम्नलिखित तीन शैलियाँ देखने को मिलती हैं:

  1. व्यंग्यात्मक शैली: इस शैली में लिखे निबंधों की भाषा व्यावहारिक है। इसमें हास्य का पुट भी है। वाक्य रचना सरल है और व्यंग्य अत्यंत स्पष्ट व उभरे हुए हैं।

  2. आलोचनात्मक शैली: आलोचना के लिए सरल, संयत और गंभीर भाषा का प्रयोग किया गया है।

  3. गवेषणात्मक शैली: इस शैली में शुद्ध, संयत एवं संस्कृत शब्दों से अलंकृत भाषा का प्रयोग किया गया है।

 

  • 🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि

    क्र.सं.लेखक / कवि का नाममुख्य विशेषता / कालइंटरनल लिंक (URL)
    1.भारतेंदु हरिश्चंद्रआधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युगलिंक देखें(उदाहरण यूआरएल)
    2.महावीर प्रसाद द्विवेदीद्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकारलिंक देखें
    3.जयशंकर प्रसादछायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककारलिंक देखें
    4.सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेतालिंक देखें
    5.सुमित्रानंदन पंतप्रकृति के सुकुमार कवि / छायावादलिंक देखें
    6.महादेवी वर्माआधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्रीलिंक देखें
    7.प्रेमचंद (धनपत राय)उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुषलिंक देखें
    8.अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तकलिंक देखें
    9.रामधारी सिंह ‘दिनकर’राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कविलिंक देखें
    10.कृष्णा सोबतीआधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षरलिंक देखें
      
 

 

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