प्रयोजनमूलक हिंदी क्या है? अर्थ, उद्देश्य, राजभाषा और संपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Prayojanmulak Hindi)

अंतिम संशोधित (Last Updated): October 22, 2026

प्रयोजनमूलक हिंदी: अर्थ, उद्देश्य, संवैधानिक प्रावधान और संपूर्ण प्रश्न-उत्तर (Prayojanmulak Hindi)

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क्या आपने कभी सोचा है कि जब हम किसी सरकारी दफ्तर में जाते हैं, बैंक का कोई फॉर्म भरते हैं, टीवी पर समाचार सुनते हैं या किसी कानूनी दस्तावेज को पढ़ते हैं, तो वहाँ की हिंदी हमारी आम बोलचाल की हिंदी से थोड़ी अलग क्यों लगती है? यही वह खास हिंदी है, जो हमारे जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों और कामकाज को चलाती है—इसे ही हम ‘प्रयोजनमूलक हिंदी’ (Functional Hindi) कहते हैं।

आइए, बहुत ही आसान और दिलचस्प तरीके से समझते हैं कि आखिर प्रयोजनमूलक हिंदी क्या है, इसके क्या-क्या उद्देश्य हैं और संविधान में इसे क्या स्थान मिला है।

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1. प्रयोजनमूलक हिंदी का असल अर्थ क्या है?

‘प्रयोजनमूलक हिंदी’ में ‘प्रयोजन’ शब्द का अर्थ है—’उद्देश्य’। जिस भाषा का प्रयोग किसी विशेष प्रयोजन (उद्देश्य) के लिए किया जाए, उसे ‘प्रयोजनमूलक भाषा’ कहा जाता है।

हिंदी में प्रयोजनमूलक हिंदी शब्द ‘Functional Language’ के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है, जिसका तात्पर्य है—जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपयोग में लाई जाने वाली भाषा। इसका प्रमुख लक्ष्य जीविकोपार्जन का साधन बनना होता है।

यह हिंदी साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रशासन, कार्यालय, मीडिया, बैंक, विधि, कृषि, वाणिज्य, तकनीकी, विज्ञापन, विज्ञान, शैक्षिक आदि विभिन्न क्षेत्रों में प्रयोग में ली जा रही है। विभिन्न व्यवसायों से संबंधित व्यक्तियों जैसे- डॉक्टर, वकील, पत्रकार, मीडियाकर्मी, व्यापारी, किसान, वैज्ञानिक आदि के कार्य-क्षेत्रों में प्रयुक्त भाषा ही ‘प्रयोजनमूलक’ भाषा कहलाती है।

‘प्रयोजनमूलक हिंदी’ का तात्पर्य है—“वह हिंदी जिसका अपना विशेष लक्ष्य, हेतु या प्रयोजन है।” प्रयोजनमूलक हिंदी का व्यक्तिगत अर्थ है—वह हिंदी जिसका प्रयोग प्रयोजन विशेष के लिए किया जाए। साथ ही इस हिंदी के माध्यम से ज्ञान विशेष की प्राप्ति और विशिष्ट सेवात्मक क्षेत्रों में कौशल, निपुणता एवं प्राविण्य प्राप्त करने के लिए किया जाता है। प्रयोजनमूलक भाषा का क्षेत्र सीमित होते हुए भी यह कभी भी साधन से साध्य नहीं बनती है। इसका लक्ष्य सेवा-माध्यम होता है, जो जीविकोपार्जन का साधन बनता है।

2. प्रयोजनमूलक हिंदी के विभिन्न उद्देश्य

विद्वान डॉ. अर्जुन चव्हाण ने प्रयोजनमूलक हिंदी के निम्नलिखित उद्देश्य बताए हैं:

  • हिंदी की व्यावहारिक उपयोगिता से परिचित कराना।

  • स्वयं रोजगार उपलब्ध कराने में युवकों की मदद करना।

  • विविध सेवा-क्षेत्रों में युवक-युवतियों को सेवा के अवसर उपलब्ध करा देना।

  • रोजी-रोटी की समस्या हल करने में छात्र सक्षम हो, इस दृष्टि से उसका पाठ्यक्रम तैयार करना।

  • अनुवाद कार्य को बढ़ावा देना तथा इसके जरिए सफल अनुवादक तैयार करना।

  • कार्यालयों में प्रयुक्त होने वाली हिंदी भाषा का समग्र ज्ञान प्रदान करना।

  • दफ्तरी भाषा की पारिभाषिक शब्दावली बनाना तथा उसमें कौशल हासिल करना।

  • तकनीकी भाषा की परिभाषिक शब्दावली तैयार करना तथा उसमें निपुणता प्राप्त करना।

  • साक्षात्कार, वार्तालाप, संभाषण आदि विषयक ज्ञानात्मक कौशल के विकास हेतु प्रयास करना।

  • शिक्षण-प्रशिक्षण के माध्यम के रूप में हिंदी को सक्षम बनाना।

  • जनसंचार के साधनों के अनुकूल बनाने हेतु हिंदी को विकसित करना।

  • राष्ट्रभाषा के प्रचार एवं प्रसार के दायित्व का निर्वहन करना।

  • राष्ट्र तथा राष्ट्रभाषा के प्रति अपनी अस्मिता जीवित रखना।

  • सामाजिक तथा राष्ट्रीय आवश्यकताओं की संपूर्ति करना।

  • ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में चरम विकास करना।

  • वैश्विक संदर्भ में अपने देश की भाषा का सम्मान करना, उसकी प्रतिष्ठा रखना।

डॉ. चव्हाण ने मीडिया की सबसे अधिक जरूरत भाषा के जानकार की बताई है। उनका कहना है कि “आज आवश्यकता अच्छे संपादक, अनुवादक, संवाददाता, निर्देशक, प्रूफरीडर, डॉक्यूमेंट्री-लेखक, पटकथा लेखक, संवाद लेखक, गीतकार और कमेंटेटर की है, लेकिन योग्य व्यक्ति के अभाव के कारण मीडिया काम निपटा रहा है। अब हिंदी के पाठ्यक्रमों में भी परिवर्तन करना अनिवार्य है। अब मीडिया के लिए उपयुक्त हिंदी अर्थात् प्रयोजनमूलक हिंदी के गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है।”

3. राजभाषा, राष्ट्रभाषा और संपर्क भाषा का सफर

  • सम्पर्क भाषा: इस शब्द का अभिप्राय उस भाषा से है, जिसके माध्यम से एक क्षेत्र के लोग देश के दूसरे क्षेत्र के लोगों से या एक भाषा के बोलने वाले लोग अन्य भाषा-भाषियों से अपने विचारों का आदान-प्रदान करके अपना सम्पर्क बनाए रखते हैं। यह अंग्रेजी के शब्द ‘लिग्ंवा फ्रेंका’ (Lingua Franca) का हिंदी अनुवाद है, जिसे ‘सामान्य बोली’ अथवा ‘लोक बोली’ भी कहा जा सकता है।

  • राष्ट्रभाषा: किसी भी देश की वह भाषा है, जो उस देश के अधिकांश जनसमुदाय द्वारा वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग में लाई जाती हैं, जिसके शब्द-भंडार में देश की विविध बोलियों, उपभाषाओं एवं विभाषाओं के शब्द शामिल होते हैं तथा जिसका विकास स्वतंत्र रूप से होता है। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार सर्वप्रथम बंगाल में उदित हुआ, जहाँ महान समाजसुधारक केशवचन्द्र सेन ने सारे देश के लिए एक राष्ट्रभाषा हिंदी की उदार कल्पना प्रस्तुत की। 1930 के कांग्रेस अधिवेशन में आयोजित राष्ट्रभाषा सम्मेलन में यह स्वीकार किया गया कि देश का अन्तर्प्रांतीय कार्य राष्ट्रभाषा हिंदी में ही होना उचित एवं हितकारी है। इसके प्रचार-प्रसार में काशी नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन (प्रयाग), दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति (वर्धा) आदि संस्थाओं ने अहम् भूमिका निभाई।

  • राजभाषा: राष्ट्रभाषा समूचे राष्ट्र के अधिकांश जन-समुदाय द्वारा प्रयोग में लाई जाती है जबकि राजभाषा का प्रयोग प्रायः राजकीय, प्रशासनिक तथा सरकारी-अर्द्धसरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों द्वारा किया जाता है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा ने 14 सितम्बर, 1949 को राजभाषा संबंधी भाग को स्वीकृति प्रदान की, और इसी दिन से हिंदी भारत की राजभाषा बनी।

4. भारतीय संविधान और राजभाषा संबंधी प्रावधान

भारतीय संविधान के भाग 5, 6 और 17 में राजभाषा संबंधी उपबंध हैं। इसके भाग 17 का शीर्षक ही ‘राजभाषा’ है। इस भाग में चार अध्याय हैं, जो क्रमशः संघ की भाषा, प्रादेशिक भाषाएँ, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की भाषा तथा विशेष निर्देश से संबंधित हैं। ये चारों अध्याय अनुच्छेद 343 से 351 के अन्तर्गत आते हैं।

भारतीय संविधान में राजभाषा संबंधी प्रमुख प्रावधानों एवं उपबंधों को चार वर्गों में बाँटा गया है: (क) संसद में प्रयुक्त होने वाली भाषा। (ख) विधान मण्डल में प्रयुक्त होने वाली भाषा। (ग) संघ की राजभाषा। (घ) विधि-निर्माण और न्यायालयों में प्रयुक्त होने वाली भाषा।

संविधान की आठवीं अनुसूची व अन्य उपबंध:

  • संविधान की आठवीं अनुसूची में पहले केवल चौदह भाषाएँ शामिल की थी, बाद में ‘सिंधी’ भाषा को जोड़ने से पंद्रह भाषाएँ हो गई। अगस्त, 1992 में एक संशोधन द्वारा कोंकणी, नेपाली और मणिपुरी भाषाओं को जोड़कर अठारह भाषाएँ कर दी गई। 2004 में इस सूची में चार भाषाएँ और जोड़ी गई हैं—डोगरी, मैथिली, संथाली और बोडो। वर्तमान में आठवीं अनुसूची में स्वीकृत भाषाओं की संख्या 22 है।

  • संविधान के राजभाषा संबंधी अनुच्छेदों में पहला संशोधन 1956 में हुआ, जब अनुच्छेद 350 में 350 (क) जोड़ा गया और प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराने पर बल दिया गया। दूसरे संशोधन द्वारा 350 (ख) जोड़कर भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रपति द्वारा विशेष अधिकारी नियुक्त करने की बात की गई।

  • राष्ट्रपति ने 7 जून, 1955 को अनुच्छेद 344 (1) के अनुसरण में राजभाषा आयोग के गठन का आदेश जारी किया, जिसके अध्यक्ष श्री बी.जी. खरे थे तथा इसमें संविधान की 8वीं अनुसूची में दर्ज विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीस अन्य सदस्य भी शामिल थे।

  • राजभाषा संसदीय समिति का गठन 1956 में राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 344 (4) और 345 (5) के अनुसरण में किया गया। इसके तीस सदस्यों में से 20 लोकसभा के व 10 राज्यसभा के सदस्य थे। पं. गोविन्दवल्लभ पंत इस समिति के अध्यक्ष बनाये गये।

  • 10 मई, 1963 को संसद ने राजभाषा अधिनियम पारित किया, जिसमें कुल नौ धाराएँ हैं।

  • राजभाषा संकल्प दिसम्बर, 1967 में दोनों सदनों के द्वारा पारित वह संकल्प है जिसे 18 जनवरी, 1968 के राजपत्र में अधिसूचित किया गया।

5. मानक भाषा और देवनागरी लिपि का सुधार

  • मानक भाषा: मानक भाषा से अभिप्राय भाषा के व्याकरणसम्मत, शुद्ध परिनिष्ठित एवं परिमार्जित रूप से है। इसके चार अभिलक्षण हैं—(1) मानकीकरण (कोडीकरण), (2) स्वायत्तता, (3) ऐतिहासिकता, और (4) जीवंतता। डॉ. भोलानाथ तिवारी ने इसके चयन, प्रसार, प्रयोग और जन-स्वीकृति जैसे चरणों की चर्चा की है।

  • देवनागरी लिपि सुधार:

    • 1926: लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 190 टाइपों का एक फांट बनाया, जिसे ‘तिलक फांट’ कहते हैं। सावरकर बंधुओं ने स्वरों की बारहखड़ी तैयार की। डॉ. श्याम सुन्दर दास ने अनुस्वार के प्रयोग का सुझाव दिया।

    • 1935: इन्दौर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में महात्मा गाँधी के सभापतित्व में ‘नागरी लिपि सुधार समिति’ बनाई गई, जिसके संयोजक काका कालेलकर थे।

    • 1947: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में लिपि सुधार समिति का गठन किया गया, जिसने मात्राओं, अनुस्वार और संयुक्त वर्णों के संबंध में महत्वपूर्ण सुधार सुझाए।

    • 1953: डॉ. राधाकृष्णन् की अध्यक्षता में लखनऊ में सम्पन्न हुई परिषद की बैठक में हृस्व ‘इ’ और संयुक्त वर्णों के संबंध में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। आज भी लेखन में दो प्रकार के अक्षरों का प्रचलन, अंकों की द्विरूपता, और मात्राओं में द्विरूपता देवनागरी के मानकीकरण के मार्ग में बाधाएँ हैं।

6. प्रयोजनमूलक हिंदी के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर (FAQs)

मित्रो! प्रयोजनमूलक हिन्दी की अवधारणा और परीक्षा की दृष्टि से सभी 29 महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर नीचे दिए गए हैं:

  1. ‘प्रयोजनमूलक हिंदी’ से आप क्या समझते हैं?

    उत्तर: प्रयोजनमूलक हिंदी से अभिप्राय उस हिंदी से है, जिसका अपना विशेष लक्ष्य, हेतु या प्रयोजन हो। ‘प्रयोजन’ शब्द अंग्रेजी के ‘Functional’ का हिंदी पर्याय है। इसे ‘कामकाजी हिंदी’ भी कहा जाता है।

  2. प्रयोजनमूलक हिंदी के चार प्रमुख उद्देश्य लिखिये?

    उत्तर: प्रयोजनमूलक हिंदी के चार उद्देश्य हैं—हिंदी की व्यावहारिक उपयोगिता से परिचित कराना, स्वयं रोजगार उपलब्ध कराने में युवाओं की मदद करना, अनुवाद कार्य को प्रोत्साहित करना एवं कार्यालयी हिंदी का समग्र ज्ञान प्रदान करना।

  3. कार्यालयी हिंदी किसे कहते हैं?

    उत्तर: कार्यालयी हिंदी से अभिप्राय उस हिंदी से है जो सरकारी, अर्द्धसरकारी तथा निजी कार्यालयों में प्रशासनिक क्षेत्र के प्रयोग में लाई जाती है।

  4. जनसंचार के विविध माध्यमों में प्रयोजनमूलक हिंदी किस रूप में काम में लाई जाती है?

    उत्तर: प्रयोजनमूलक हिंदी जनसंचार माध्यमों के सभी रूपों में, जिनमें मुद्रित माध्यम, श्रव्य माध्यम, दृश्य-श्रव्य माध्यम व क्षेत्रीय प्रचार-प्रसार माध्यम शामिल है, सूचना एवं प्रसारण के कार्य के लिए प्रयोग में लाई जाती है।

  5. प्रयोजनमूलक हिंदी एवं सामान्य हिंदी में क्या अंतर है?

    उत्तर: प्रयोजनमूलक हिंदी एवं सामान्य हिंदी एक ही भाषा के दो रूप हैं, परन्तु उनकी शब्दावली, वाक्य-संरचना आदि भिन्न-भिन्न होती है। सामान्य भाषा मनुष्य की पहली आवश्यकता है लेकिन प्रयोजनमूलक भाषा की आवश्यकता उसके बाद होती है। प्रयोजनमूलक भाषा का क्षेत्र सीमित होता है, किन्तु सामान्य हिंदी का क्षेत्र विस्तृत होता है।

  6. प्रयोजनमूलक हिंदी किन-किन क्षेत्रों में प्रयोग में लाई जाती है?

    उत्तर: प्रयोजनमूलक हिंदी वाणिज्य एवं व्यापार, विज्ञान एवं तकनीकी, कार्यालयों, विधि, सामाजिक विज्ञान, संचार माध्यमों एवं विज्ञापनों में काम में लाई जाती है।

  7. सम्पर्क भाषा किसे कहते हैं?

    उत्तर: सम्पर्क भाषा से अभिप्राय उस भाषा से है, जिस भाषा के माध्यम से एक क्षेत्र के लोग देश के दूसरे क्षेत्र के लोगों से या एक भाषा के बोलने वाले लोग अन्य भाषा-भाषियों से अपने विचारों का आदान-प्रदान करके अपना सम्पर्क बनाए रखते हैं। यह अंग्रेजी के शब्द ‘लिंग्वा फ्रेंका’ का हिंदी अनुवाद है, जिसे ‘सामान्य बोली’ अथवा ‘लोक बोली’ भी कहा जा सकता है।

  8. राष्ट्रभाषा को परिभाषित कीजिए?

    उत्तर: राष्ट्रभाषा से अभिप्राय किसी भी देश की उस भाषा से है, जो उस देश के अधिकांश जनसमुदाय द्वारा वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए प्रयोग में लाई जाती हैं, जिसके शब्द-भंडार में देश की विविध बोलियों, उपभाषाओं एवं विभाषाओं के शब्द शामिल होते हैं तथा जिसका विकास स्वतंत्र रूप से होता है।

  9. राष्ट्रभाषा और राजभाषा में क्या अंतर है?

    उत्तर: राष्ट्रभाषा समूचे राष्ट्र के अधिकांश जन-समुदाय द्वारा प्रयोग में लाई जाती है जबकि राजभाषा का प्रयोग प्रायः राजकीय, प्रशासनिक तथा सरकारी-अर्द्धसरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों द्वारा किया जाता है। राजभाषा विविध प्रकार के राजकीय कार्यकलापों की अभिव्यक्ति का माध्यम होती है एवं राष्ट्रभाषा जनसमुदाय की अभिव्यक्ति का माध्यम होती है।

  10. हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार कहाँ से जन्मा?

    उत्तर: हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार सर्वप्रथम बंगाल में उदित हुआ। बंगाल के मूर्धन्य समाजसुधारक केशवचन्द्र सेन ने सर्वप्रथम सारे देश के लिए एक राष्ट्रभाषा हिंदी की उदार कल्पना प्रस्तुत की।

  11. राष्ट्रभाषा सम्मेलन में क्या निर्णय लिया गया?

    उत्तर: 1930 के कांग्रेस अधिवेशन में आयोजित राष्ट्रभाषा सम्मेलन में स्वीकार किया गया कि देश का अन्तर्प्रांतीय कार्य राष्ट्रभाषा हिंदी में ही होना उचित एवं हितकारी है।

  12. राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार में किन संस्थाओं ने अहम् भूमिका निभाई?

    उत्तर: काशी नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा आदि संस्थाओं ने राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  13. संविधान सभा में राजभाषा संबंधी भाग को कब स्वीकार किया गया?

    उत्तर: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा ने 14 सितम्बर, 1949 को राजभाषा संबंधी भाग को स्वीकृति प्रदान की। इसी दिन से हिंदी भारत की राजभाषा बनी।

  14. राजभाषा संबंधी उपबंध क्या है?

    उत्तर: भारतीय संविधान के भाग 5, 6 और 17 में राजभाषा संबंधी उपबंध हैं। इसके भाग 17 का शीर्षक ही ‘राजभाषा’ है। इस भाग में चार अध्याय हैं, जो क्रमशः संघ की भाषा, प्रादेशिक भाषाएँ, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों की भाषा तथा विशेष निर्देश से संबंधित हैं। ये चारों अध्याय अनुच्छेद 343 से 351 के अन्तर्गत आते हैं।

  15. भारतीय संविधान में राजभाषा-संबंधी प्रमुख प्रावधानों एवं उपबंधों को कितने वर्गों में बाँटा गया है?

    उत्तर: भारतीय संविधान में राजभाषा संबंधी प्रमुख प्रावधानों एवं उपबंधों को चार वर्गों में बाँटा गया है—(क) संसद में प्रयुक्त होने वाली भाषा, (ख) विधान मण्डल में प्रयुक्त होने वाली भाषा, (ग) संघ की राजभाषा, (घ) विधि-निर्माण और न्यायालयों में प्रयुक्त होने वाली भाषा।

  16. संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भारतीय भाषाएँ कौनसी है?

    उत्तर: संविधान की आठवीं अनुसूची में पहले केवल चौदह भाषाएँ शामिल की गई थी, बाद में ‘सिंधी’ भाषा को जोड़ने से पंद्रह भाषाएँ हो गई। अगस्त, 1992 में संशोधन द्वारा कोंकणी, नेपाली और मणिपुरी भाषाएँ जोड़ी गईं और 2004 में डोगरी, मैथिली, संथाली और बोडो जोड़ी गईं। वर्तमान में आठवीं अनुसूची में स्वीकृत भाषाओं की संख्या 22 है।

  17. संविधान के भाषा संबंधी अनुच्छेदों में कौनसे दो महत्वपूर्ण संशोधन हुए?

    उत्तर: संविधान के राजभाषा संबंधी अनुच्छेदों में पहला संशोधन 1956 में हुआ, जब अनुच्छेद 350 में 350(क) जोड़ा गया और प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की सुविधा उपलब्ध कराने पर बल दिया गया। दूसरे संशोधन द्वारा 350(ख) जोड़कर भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए राष्ट्रपति द्वारा विशेष अधिकारी नियुक्त करने की बात की गई।

  18. राजभाषा आयोग का गठन कब किया गया?

    उत्तर: राष्ट्रपति ने 7 जून, 1955 ई. को अनुच्छेद 344(1) के अनुसरण में राजभाषा आयोग के गठन का आदेश जारी किया, जिसके अध्यक्ष श्री बी.जी. खरे थे।

  19. राजभाषा संसदीय समिति का गठन कब और क्यों किया गया?

    उत्तर: राजभाषा संसदीय समिति का गठन 1956 में राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 344(4) के अनुसरण में किया गया। पं. गोविन्दवल्लभ पंत इस समिति के अध्यक्ष बनाये गये। राजभाषा आयोग द्वारा 1956 में प्रस्तुत रिपोर्ट की सिफारिशों की जाँच करने के लिये इसका गठन हुआ था।

  20. राजभाषा अधिनियम कब पारित किया गया?

    उत्तर: 10 मई, 1963 को संसद ने राजभाषा अधिनियम पारित किया, जिसमें कुल नौ धाराएँ हैं।

  21. राजभाषा संकल्प क्या है?

    उत्तर: राजभाषा संकल्प दिसम्बर, 1967 में दोनों सदनों के द्वारा पारित वह संकल्प है जिसे 18 जनवरी, 1968 के राजपत्र में अधिसूचित किया गया। इसमें राजभाषा हिंदी के विकास एवं प्रसार से संबंधित संकल्प किये गये।

  22. मानक भाषा से आप क्या समझते है?

    उत्तर: मानक भाषा से अभिप्राय भाषा के व्याकरणसम्मत, शुद्ध परिनिष्ठित एवं परिमार्जित रूप से है। इस स्थान पर पहुँचने के लिए भाषा को कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है।

  23. मानक भाषा के चार अभिलक्षण कौनसे है?

    उत्तर: मानक भाषा के चार अभिलक्षण हैं—(1) मानकीकरण (कोडीकरण), (2) स्वायत्तता, (3) ऐतिहासिकता, (4) जीवन्तता।

  24. हिंदी के मानकीकरण की आवश्यकता क्यों महसूस की गई?

    उत्तर: हिंदी एक विस्तृत भू-भाग की भाषा है। समय के साथ-साथ इस पर अरबी, फारसी, तुर्की तथा अँग्रेजी भाषाओं का बहुमुखी प्रभाव पड़ा तथा बढ़ते हुए राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय दायित्वों के कारण मानकीकरण की आवश्यकता महसूस हुई।

  25. डाॅ. भोलानाथ तिवारी ने मानकीकरण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए किन चार चरणों की चर्चा की है?

    उत्तर: डॉ. भोलानाथ तिवारी ने मानकीकरण के लिए—(1) भाषा के विविध रूपों में से किसी एक रूप का चयन, (2) प्रसार, (3) प्रयोग, और (4) जन-स्वीकृति की चर्चा की है।

  26. देवनागरी लिपि के सुधार के लिये सर्वप्रथम कौनसा फांट बनाया गया?

    उत्तर: 1926 में सर्वप्रथम लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 190 टाइपों का एक फांट बनाया, जिसे ‘तिलक फांट’ कहते हैं।

  27. स्वरों की बारहखड़ी किसने तैयार की?

    उत्तर: सावरकर बंधुओं ने स्वरों की बारहखड़ी तैयार की।

  28. देवनागरी लिपि सुधार समिति (1935) के बारे में बताइए?

    उत्तर: 1935 में इन्दौर में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में महात्मा गाँधी के सभापतित्व में ‘नागरी लिपि सुधार समिति’ बनाई गई, जिसके संयोजक काका कालेलकर थे।

  29. आचार्य नरेन्द्र देव समिति का गठन कब और क्यों किया गया?

    उत्तर: आचार्य नरेन्द्रदेव समिति का गठन 1947 में उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा आचार्य नरेन्द्रदेव की अध्यक्षता में किया गया ताकि पूर्ववर्ती समितियों के सभी सुझावों का गहन अध्ययन कर अपने सुझाव प्रस्तुत किए जा सकें।

6. निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि प्रयोजनमूलक हिंदी केवल किताबी या सैद्धांतिक भाषा नहीं है, बल्कि यह आज के युग में हमारे रोजगार, प्रशासन, मीडिया, कानून और तकनीकी विकास की रीढ़ है। जहाँ सामान्य हिंदी हमारी संवेदनाओं और आम बोलचाल को व्यक्त करती है, वहीं प्रयोजनमूलक हिंदी हमारे जीवन को व्यावसायिक और व्यावहारिक रूप से सफल बनाने का सबसे बड़ा साधन है। इसके सही अध्ययन और प्रयोग से न केवल युवा पीढ़ी के लिए रोजगार के नए द्वार खुलते हैं, बल्कि राष्ट्रभाषा और राजभाषा के रूप में हिंदी का गौरव भी संपूर्ण विश्व में बढ़ता है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs):

Q1: ‘प्रयोजनमूलक हिंदी’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: प्रयोजनमूलक हिंदी से अभिप्राय उस हिंदी से है, जिसका अपना विशेष लक्ष्य या प्रयोजन हो। इसे ‘कामकाजी हिंदी’ भी कहा जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य जीविकोपार्जन (रोजगार) और कार्यालयी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है।

Q2: प्रयोजनमूलक हिंदी और सामान्य हिंदी में क्या अंतर है?
उत्तर: सामान्य हिंदी मनुष्य की आम बोलचाल की आवश्यकता है जिसका क्षेत्र विस्तृत होता है, जबकि प्रयोजनमूलक हिंदी का क्षेत्र सीमित होता है और इसकी शब्दावली व वाक्य-संरचना विशेष कामकाजी उद्देश्यों के अनुसार भिन्न होती है।

Q3: हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में कब स्वीकार किया गया?
उत्तर: डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा ने 14 सितंबर, 1949 को राजभाषा संबंधी प्रावधानों को स्वीकृति प्रदान की थी।

Q4: प्रथम राजभाषा आयोग का गठन कब और किसकी अध्यक्षता में हुआ था?
उत्तर: राष्ट्रपति ने 7 जून, 1955 को राजभाषा आयोग के गठन का आदेश जारी किया, जिसके अध्यक्ष श्री बी.जी. खरे थे।

Q5: देवनागरी लिपि में सुधार के लिए ‘तिलक फांट’ किसने और कब बनाया था?
उत्तर: सन 1926 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 190 टाइपों का एक फांट तैयार किया था, जिसे ‘तिलक फांट’ कहा जाता है।

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  1. प्रयोजन मूलक हिंदी की उपयोगिताएं क्या है?

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