हरिवंश राय बच्चन – जीवन परिचय | Harivansh Rai Bachchan ka Jeevan Parichay

अंतिम संशोधित (Last Updated): October 22, 2026

आज के आर्टिकल में हम साहित्य के चर्चित कवि हालावाद के जनक हरिवंश राय बच्चन जी (Harivansh rai Bachchan ka Jeevan Parichay) के सम्पूर्ण जीवन परिचय को पढेंगे ,इनसे जुड़ें महत्त्वपूर्ण तथ्यों का अध्ययन करेंगे ।

हरिवंश राय बच्चन – Harivansh Rai Bachchan ka Jeevan Parichay

Table of Contents

Harivansh Rai Bachchan ka Jeevan Parichay
Harivansh Rai Bachchan

 

हरिवंश राय बच्चन: संपूर्ण जीवन परिचय, रचनाएँ और काव्य-अध्ययन (Harivansh Rai Bachchan Jivan Parichay)

विवरणतथ्य / विवरण
नामहरिवंश राय बच्चन
जन्म27 नवम्बर 1907 ई. (इलाहाबाद से सटे प्रतापगढ़ जिले के बाबूपट्टी गाँव)
निधन18 जनवरी 2003 ई. (मुम्बई)
पूरा नामहरिवंश राय श्रीवास्तव
पिताप्रताप नारायण श्रीवास्तव
मातासरस्वती देवी
उपनामहलावादी, झारखण्डी, खांडे राव, कलाधार
प्रथम रचना‘तेरा हार’ (1932 ई.)
मुख्य धारा / शैलीहिंदी, छायावादोत्तर काल, हालावाद
विशेषताकैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि पाने वाले दूसरे भारतीय

📌 प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

राष्ट्रवादी कवि हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के छोटे से गाँव बाबूपट्टी में हुआ था। इनके पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव एवं माता का नाम सरस्वती देवी था। वे अपने भाइयों में सबसे बड़े थे।

  • इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा म्युनिसिपल स्कूल से की। इसके बाद उर्दू सीखने के लिए कायस्थ स्कूल में प्रवेश लिया।

  • सन् 1938 में इन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक (M.A.) किया और संयोगवश 1952 तक वे इसी यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर भी रहे।

  • कुछ समय तक देश की स्वतंत्रता के लिए वे महात्मा गांधी से भी जुड़े और बनारस यूनिवर्सिटी में भी कार्य किया।

  • सन् 1952 में अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी करने के लिए वे इंग्लैंड की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी गए। वहाँ उन्होंने विशेष उपलब्धि हासिल की; वे दूसरे ऐसे भारतीय थे जिन्हें कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त हुई थी।

  • इसके अतिरिक्त उन्होंने इलाहाबाद में ऑल इंडिया रेडियो (AIR) में भी काम किया तथा 1955 में विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ और राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

👨‍👩‍👧‍👦 पारिवारिक जीवन और विवाह

हरिवंश राय बच्चन का परिवार मूल रूप से उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ का एक कायस्थ परिवार था, जो शिव का उपासक था। बच्चन जी के दो बेटे—अमिताभ बच्चन (प्रसिद्ध अभिनेता) और अजिताभ बच्चन हैं। इनके पोते का नाम अभिषेक बच्चन है।

  • प्रथम विवाह: जब बच्चन जी स्नातक में पढ़ रहे थे, तब उनकी मुलाकात श्यामा से हुई। दोनों में प्रेम हुआ और 1926 ई. में दोनों ने विवाह कर लिया। किंतु, शादी के ठीक 10 साल बाद, वर्ष 1936 में तपेदिक (T.B.) की लंबी बीमारी के कारण श्यामा का निधन हो गया। श्यामा के निधन के बाद बच्चन जी अकेलापन महसूस करने लगे।

  • द्वितीय विवाह: अपने मित्र प्रकाश की सहायता से, 24 जनवरी 1942 को उन्होंने तेजी बच्चन (मनोविज्ञान की प्रोफेसर) से दूसरा विवाह किया।

🏆 सम्मान व पुरस्कार

  • सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार: (1966 ई.)

  • साहित्य अकादमी पुरस्कार: (रचना: दो चट्टानें), 1968 ई. में

  • कमल पुरस्कार (एफ्रो-एशियाई सम्मेलन द्वारा): 1968 ई. में

  • पद्म भूषण (साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में): 1976 ई. में

  • प्रथम सरस्वती सम्मान: (अपने चार आत्मकथात्मक खंडों के लिए), 1991 ई. में

📖 आत्मकथात्मक चार खंड

रचना का नामप्रकाशन वर्ष
क्या भूलूँ क्या याद करूँ1969 ई.
नीड़ का निर्माण फिर1970 ई.
बसेरे से दूर1977 ई.
दशद्वार से सोपान तक1985 ई.

📚 प्रमुख काव्य संग्रह

काव्य संग्रहप्रकाशन वर्ष
मधुशाला1935 ई.
मधुबाला1938 ई.
मधुकलश1938 ई.
निशा निमंत्रण1938 ई.
एकांत संगीत1939 ई.
आकुल अंतर1943 ई.
संतरंगिणी1945 ई.
मिलन यामिनी1950 ई.
हलाहल1950 ई.
धार के इधर-उधर1954 ई.
प्रणय पत्रिका1955 ई.
आरती और अंगारे1958 ई.
त्रिभंगिमा1961 ई.
चार खेमे चौसठ खूंटे1962 ई.
दो चट्टानें1965 ई.
जाल समेटा1973 ई.
  • अन्य काव्य संग्रह: खयाम की मधुशाला (1935 ई.)

  • डायरी: प्रवासी की डायरी

  • संपूर्ण काव्य: बच्चन ग्रन्थावली (1983 ई., 10 खंडों में)

  • निबंध संग्रह: नए पुराने झरोखे, टूटी-फूटी कड़ियाँ

  • अनुवाद कार्य: हैमलैट, मैकबैथ, जनगीता (भगवद्गीता का दोहा-चौपाई में अनुवाद), 64 रूसी कविताएँ

🌟 साहित्यिक विशेषताएँ और महत्वपूर्ण तथ्य

  • हरिवंश राय बच्चन को हिंदी साहित्य में ‘हालावाद का प्रवर्तक’ माना जाता है। उनकी रचनाओं को ‘क्षयी रोमांस का कवि’ और ‘जनता का कवि’ के रूप में भी देखा जाता है।

  • ‘हालावाद के धर्मग्रंथ’: मधुशाला (1935), मधुबाला, और मधुकलश।

  • अंग्रेजी अनुवाद: मधुशाला का अंग्रेजी अनुवाद House of Wine (1938, लंदन) नाम से प्रकाशित हुआ, जिसके अनुवादक मार्जरी बोल्टन और रामस्वरूप व्यास थे।

  • उन्होंने ‘चाँद’ पत्रिका में कार्य किया तथा हास्य पत्रिका ‘मदारी’ के संपादक भी रहे।

  • प्रथम पत्नी श्यामा की मृत्यु के वियोग में उन्होंने प्रसिद्ध काव्य ‘निशा निमंत्रण’ की रचना की थी।

  • सुमित्रानंदन पंत और हरिवंश राय बच्चन द्वारा संयुक्त रूप से ‘खादी के फूल’ रचना रीतबद्ध की गई थी।

✍️ प्रमुख काव्य पंक्तियाँ

  1. ’’पूर्व चले के बटोही, बाट की पहचान कर लो।’’

  2. ’’प्रार्थना मत कर मत कर मत कर, मनुष्य पराजय के स्मारक हैं, मठ-मर्जियों-गिरिजाघर।’’

  3. ’’है चिता की राख कर में माँगनी सिंदूर दुनिया…’’

  4. ’’गाता हूँ अपनी लय भाषा सीख इलाहाबाद नगर से…’’

  5. ’’है अंधेरी रात, पर दीवा जलाना कब माना है…’’

  6. ’’मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूँ, फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ।’’

  7. ’’अग्नि पथ ! अग्नि पथ ! अग्नि पथ! वृक्ष हो भले खड़े, हो घने हो बड़े, एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!’’

हरिवंश राय बच्चन: काव्य यात्रा, ‘हालावाद’ और ‘आत्म-परिचय’ का विस्तृत अध्ययन (Harivansh Rai Bachchan Jivan Parichay & Kavya)

हिंदी साहित्य के छायावादोत्तर काल में जन-मानस को अपनी मस्ती, वैयक्तिक राग और सहज भाषा से झकझोर देने वाले महाकवि हरिवंश राय बच्चन का आधुनिक हिंदी कविता में अत्यंत विशिष्ट स्थान है। उन्हें हिंदी साहित्य में ‘हालावाद’ के प्रवर्तक और ‘जनता के कवि’ के रूप में ख्याति प्राप्त है।

📌 हरिवंश राय बच्चन: साहित्यिक अवदान एवं काव्य-विकास

1. प्रगति-प्रयोग काल और स्वच्छंदतावादोत्तर काव्य

प्रगति-प्रयोग काल के पूर्वाभास के तो वे सर्वाधिक महत्वपूर्ण कवि हैं ही, साथ ही स्वच्छंदतावादोत्तर काल के श्रेष्ठ कवियों में भी उनका शीर्ष स्थान है। स्वच्छंदतावाद-काल की रचनाओं का जो औदात्य और गौरव था, वह स्वच्छंदतावादोत्तर काल के अन्य कवियों में उस रूप में नहीं मिलता।

परंतु इतिहास के विकास क्रम में बच्चन जी ने कविता को कल्पना के आकाश से उतारकर जमीन पर खड़ा किया, उसे इहलोक (सांसारिक जीवन) से संबद्ध किया और उसकी परिधि का विस्तार किया। स्वच्छंदतावादी कवियों ने अपने निजी दुःख को व्यक्त किया है, किंतु सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को छोड़कर शेष कवियों में वह वैयक्तिक दुःख लोक-सीमा का अतिक्रमण कर अत्यधिक वायवीय (निराकार) हो जाता है। इसके विपरीत, बच्चन जी भावनापरक होते हुए भी अपनी अनुभूतियों को धरती और यथार्थ पर ही कायम रखते हैं।

2. ‘हालावाद’ का उदय और ‘मधुशाला’ का प्रभाव

हरिवंश राय बच्चन को सबसे अधिक प्रसिद्धि उनकी अमर कृति ‘मधुशाला’ (1933-1935 ई.) के गायन से मिली, जिसे उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय के एक कवि सम्मेलन (1933) में आद्योपान्त सुनाया था। इसी के आधार पर उन्हें ‘हालावाद’ का प्रवर्तक कहा जाने लगा।

  • यद्यपि हिंदी में इस नाम का कोई औपचारिक ‘वाद’ नहीं चला, तथापि यदि हालावाद नाम देना ही हो तो इस प्रवृत्ति का श्रेय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और भगवतीचरण वर्मा को भी जाता है, जो उस समय ‘साकी भर-भर ला तू अपनी हाला’ और ‘बस मत कह देना अरे पिलाने वाले…’ जैसी रचनाएँ लिख रहे थे।

  • उमरखैयाम का प्रभाव: इसमें कोई संदेह नहीं कि मधुशाला (1933), मधुबाला (1936) और मधुकलश (1937) पर उमरखैयाम की रुबाइयों का गहरा प्रभाव है। खैयाम और बच्चन में मुख्य अंतर यह है कि खैयाम का क्षण-वाद ‘मृत्यु-भीति’ से पीड़ित है, जबकि बच्चन का दर्शन मृत्यु के अंतर्भाव में भी जीवन के उल्लास को खोजता है।

📖 बच्चन जी के प्रमुख काव्य चरण और कृतियाँ

प्रथम चरण (1933 से 1947 ई.):

इस कालखंड में उनकी व्यक्तिवादी और वेदनापरक रचनाएँ सामने आईं।

  • निशा निमंत्रण (1938 ई.): अधिकांश आलोचकों की दृष्टि में यह उनकी सर्वोत्तम रचना है। यह मूलतः उनकी प्रथम पत्नी ‘श्यामा’ के निधन के उपरांत उत्पन्न गंभीर विषाद और अकेलेपन के उद्गार (शोकगीत/एलेजी) हैं। इसमें चिड़ियों के नीड़, संध्या, पतझड़ और अकेलेपन के प्रतीकों के माध्यम से अत्यंत मर्मस्पर्शी दुःखाभिव्यक्ति हुई है।

  • एकांत संगीत (1939 ई.) और आकुल अंतर (1943 ई.) में उनकी वेदना आत्म-अन्वेषण का मार्ग पकड़ती है, जहाँ वे संघर्ष और आंतरिक शक्ति का संदेश देते हैं—

    अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

    वृक्ष हो भले खड़े, हो घने हों बड़े,

    एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!

द्वितीय चरण (1947 के पश्चात्):

  • सतरंगिणी (1945), मिलन यामिनी (1950), और प्रणय पत्रिका (1955) में मिलनोत्सुक गीतों की प्रधानता है। यहीं से वे निराशा के अंधकार से निकलकर जीवन के उजाले की ओर बढ़ते हैं—

    हे अँधेरी रात पर, दीवा जलाना कब मना है!

    जो बीत गई सो बात गई, नीड़ का निर्माण फिर-फिर…

  • धार के इधर-उधर (1957), आरती और अंगारे (1958), और दो चट्टानें (1965): ‘दो चट्टानें’ के लिए उन्हें 1968 का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसमें ‘सिसिफस वरक्स हनुमान’ नामक लंबी रचना में पाश्चात्य मिथक ‘सिसिफस’ के साथ भारतीय मिथक ‘हनुमान’ का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।

📝 ‘आत्म-परिचय’ (व्याख्यात्मक समीक्षा)

हरिवंश राय बच्चन की कविता ‘आत्म-परिचय’ (जो उनके प्रसिद्ध संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ से संकलित है) एक अत्यंत दार्शनिक और वैयक्तिक गीत है। इस कविता का मूल कथ्य यह है कि “अपने को जानना, इस बाहरी दुनिया को जानने से कहीं अधिक कठिन है।”

  • जग-जीवन का भार और स्नेह-सुरा: कवि कहता है कि वह इस सांसारिक जीवन का भार अपने कंधों पर उठाए हुए है, फिर भी उसके जीवन में प्रेम की कमी नहीं है। वह ‘स्नेह-सुरा’ (प्रेम रूपी मदिरा) का पान करके मस्त रहता है और दुनिया की परवाह नहीं करता—

    जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,

    मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!

  • स्वप्नों का संसार और द्वंद्व: कवि को यह अधूरा संसार नहीं भाता, उसके पास अपने सपनों का एक सुंदर संसार है। उसके हृदय में प्रेम की अग्नि जलती है, जिससे वह स्वयं को तपाता है। वह यौवन का उन्माद और उसमें निहित अवसाद (निराशा) दोनों को साथ लेकर चलता है।

  • द्वैत और मस्ती: कवि और संसार के बीच कोई नाता नहीं है, क्योंकि संसार जहाँ धन-दौलत और वैभव जोड़ने में लगा रहता है, वहीं कवि उस भौतिकता को अपने पैरों से ठुकरा देता है। उसकी शीतल और कोमल वाणी में भी प्रेम की तीव्र ऊष्मा और विद्रोह की आग छिपी होती है—

    मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,

    मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;

    क्यों कहकर संसार मुझे अपनाए,

    मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!

⏳ ‘जीवन की आपाधापी में’ (कविता का सार)

इस कविता के माध्यम से कवि ने आधुनिक मानव जीवन की व्यस्तता, यांत्रिकता और अर्थहीन दौड़-भाग पर गहरा व्यंग्य किया है।

  • मनुष्य जब इस दुनिया के मेले में आता है, तो वह माया-मोह और लेन-देन की अंधी दौड़ में इस तरह उलझ जाता है कि उसे कभी यह सोचने का भी समय नहीं मिलता कि उसने जीवन में क्या खोया और क्या पाया।

  • अंततः कवि यह निष्कर्ष निकालता है कि जिसे वह जीवन भर सोना (कीमती वस्तु) समझता रहा, वह अंत में मिट्टी साबित हुआ और जिसे वह आँसू (दुःख) समझता रहा, वही उसके जीवन के सबसे अनमोल मोती निकले।

  • 🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि

    क्र.सं.लेखक / कवि का नाममुख्य विशेषता / कालइंटरनल लिंक (URL)
    1.भारतेंदु हरिश्चंद्रआधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युगलिंक देखें(उदाहरण यूआरएल)
    2.महावीर प्रसाद द्विवेदीद्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकारलिंक देखें
    3.जयशंकर प्रसादछायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककारलिंक देखें
    4.सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेतालिंक देखें
    5.सुमित्रानंदन पंतप्रकृति के सुकुमार कवि / छायावादलिंक देखें
    6.महादेवी वर्माआधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्रीलिंक देखें
    7.प्रेमचंद (धनपत राय)उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुषलिंक देखें
    8.अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तकलिंक देखें
    9.रामधारी सिंह ‘दिनकर’राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कविलिंक देखें
    10.कृष्णा सोबतीआधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षरलिंक देखें

4 thoughts on “हरिवंश राय बच्चन – जीवन परिचय | Harivansh Rai Bachchan ka Jeevan Parichay”

  1. Rajnish Tripathi

    इस उपयोगी जानकारी के लिए आपका बहुत बहुत आभार सर….

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