शृंगार रस की परिभाषा, भेद, उदाहरण और संपूर्ण व्याख्या | Shringar Ras in Hindi
Table of Contents
हिंदी काव्यशास्त्र में ‘शृंगार रस’ को सभी रसों में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है, इसीलिए इसे ‘रसराज’ (रसों का राजा) कहा जाता है। आइए शृंगार रस के स्वरूप, उसके अंगों, भेदों और सुंदर उदाहरणों का विस्तार से अध्ययन करते हैं।
1. शृंगार रस का अर्थ और परिचय
शृंगार शब्द ‘शृंग’ और ‘ार’ के योग से बना है। ‘शृंग’ का अर्थ है कामोद्रेक अर्थात् कामवासना का उठाव और ‘ार’ का अर्थ है उसकी गति वा वृद्धि। कुल मिलाकर शृंगार शब्द कामवासना की संवृद्धि का प्रतीक है, जिसमें नायक-नायिका अथवा प्रेमी-प्रेमिका के हृदय में वासनारूप में स्थित रति भाव जाग्रत होकर अपने अनुरूप विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से ‘शृंगार रस’ को रसराज कहा जाता है।
स्थायी भाव: रति (प्रेम)
आलंबन विभाव: नायक या नायिका
उद्दीपन विभाव: नायिका के कुछ, नितम्बादि अंग, एकान्त, वन-उपवन, चन्द्र-ज्योत्स्ना, वसंत, पुष्प, नायिका अथवा अनुभव के चेष्टाएँ – हावभाव, तिरछी चितवन, मुस्कान।
संचारी भाव: तैंतीस संचारियों में उग्रता, मरण, आलस्य, जुगुप्सा को छोड़कर शेष सभी संचारी भाव, मुख्यतः लज्जा, शर्म, चपलता।
2. शृंगार रस के भेद (Types of Shringar Ras)
शृंगार रस को मुख्य रूप से दो भागों में विभक्त किया गया है:
(I) संयोग शृंगार रस (Sanyog Shringar Ras)
आचार्य धनंजय के अनुसार: “जहाँ अनुकूल विलासी एक-दूसरे के दर्शन-स्पर्श इत्यादि का सेवन करते हैं। वह आनन्द से युक्त संयोग शृंगार कहलाता है।”
आचार्य विश्वनाथ के अनुसार: “जहाँ एक-दूसरे के प्रेम में अनुरक्त नायक-नायिका दर्शन-स्पर्श आदि का सेवन करते हैं वह संयोग शृंगार कहलाता है।”
संयोग शृंगार के प्रसिद्ध उदाहरण:
कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौंन में करत हैं नैनन ही साँैं बात।। (बिहारी)
बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करें भौंहु हँसे देन कहै नटि जाय।। (बिहारी)
(II) वियोग / विप्रलम्भ शृंगार रस (Viyog / Vipralambh Shringar Ras)
आचार्य भोज के अनुसार: “जहाँ रति नामक भाव प्रकर्ष को प्राप्त हो, लेकिन अभीष्ट को न पा सके। वहाँ विप्रलम्भ शृंगार कहा जाता है।”
आचार्य भानुदत्त के अनुसार: “युवा और युवती की परस्पर मुदित पंचेन्द्रियों के पारस्परिक सम्बन्ध का अभाव अथवा अभीष्ट की अप्राप्ति विप्रलम्भ है।”
वियोग शृंगार की 10 दशाएँ निर्धारित हैं:
अभिलाषा
चिंता
स्मरण
गुणकथन
उद्देग
प्रलाप
उन्माद
📚 इस मंच को जीवित रखने में हमारा सहयोग करें
प्रिय पाठकों, हमने हिंदी साहित्य और इतिहास की सामग्री को बिना किसी विज्ञापन (Ads) के आप तक पहुँचाने का निर्णय लिया है ताकि आपकी पढ़ाई में कोई बाधा न आए।
सर्वर और रखरखाव के खर्च को उठाने के लिए हमें आपके छोटे से सहयोग की आवश्यकता है। यदि यह वेबसाइट आपके अध्ययन में मददगार है, तो स्वेच्छा से सहयोग करें।

QR कोड को स्कैन करके स्वेच्छा से सहयोग दें
⚠️ भुगतान करते समय Remark या Note में 'Hindi Sahitya' जरूर लिखें।
व्याधि
जड़ता
मरण।
वियोग शृंगार चार प्रकार के होते हैं:
पूर्वराग: मिलने के पहले का प्रेम अर्थात् आकर्षण पूर्वानुराग कहलाता है।
मान: मिलन अथवा संयोग सुख मिलने के पश्चात जब किसी कारण विशेष से नायक रूठ जाते हैं तो उनका बिछड़ना मानजनित वियोग कहलाता है।
प्रवास: मिलन के पश्चात जब वे किसी कारण विशेष से अन्यत्र गमन कर जाते हैं तो उनका वह बिछड़ना प्रवास वियोग की कोटि में आता है।
अभिशाप या करुणात्मक।
वियोग शृंगार का उदाहरण:
अति मलीन वृषभानु-कुमारी,
अध मुख रहित, उरध नहिं चितवति, ज्यों गथ हारे थकित जुआरी।
छूट चिकुर, बदन कुम्हिलानो, ज्यों नलिनी हिमकर की मारी।।
उपर्युक्त पद में महाकवि सूरदास ने राधा की वियोगदशा का चित्रण इतनी कलात्मकता के साथ किया है कि जिससे विप्रलम्भ (वियोग) शृंगार की सहज अभिव्यक्ति हो जाती है।
विप्रलम्भ (वियोग) शृंगार के अवयव निम्नलिखित हैं:
स्थायी भाव: रति (प्रेम) – वृषभानुपुत्री राधा आश्रय।
आलंबन विभाव: श्रीकृष्ण।
उद्दीपन विभाव: वियोगदशा में पूर्वमिलन की स्मृतियाँ।
अनुभाव: अधोमुख रहना, ऊपर नहीं देखना, बदन का कुम्हिलाना इत्यादि।
संचारी भाव: दैन्य, ग्लानि तथा मरण जैसी स्थिति होना।
निष्कर्ष (Conclusion)
इस प्रकार, शृंगार रस (रसराज) का यह संपूर्ण क्षेत्र संयोग और वियोग दोनों पक्षों के माध्यम से मानव हृदय की भावनाओं को जीवंत करता है। व्याकरण और काव्यशास्त्र के अध्ययन के लिए यह टॉपिक अत्यंत महत्वपूर्ण है।
रस का अर्थ , परिभाषा और व्याख्या विस्तार से पढ़ें


