व्याजस्तुति अलंकार की परिभाषा, भेद और उदाहरण | Byajstuti Alankar

व्याजस्तुति अलंकार (Byajstuti Alankar): परिभाषा, भेद और बेहतरीन उदाहरण

हिंदी व्याकरण में अलंकारों का बहुत बड़ा महत्व है। काव्य की शोभा बढ़ाने वाले धर्मों को अलंकार कहते हैं, और अर्थालंकारों में ‘व्याजस्तुति अलंकार’ का एक विशेष स्थान है। इस लेख में हम व्याजस्तुति अलंकार की परिभाषा, इसके चारों भेदों और सभी प्रसिद्ध उदाहरणों को विस्तार से समझेंगे।

व्याजस्तुति अलंकार की परिभाषा

जहाँ पर स्तुति (प्रशंसा) के वाक्यों द्वारा निन्दा और निन्दा के वाक्यों द्वारा स्तुति प्रकट होती है, वहाँ पर व्याजस्तुति अलंकार होता है।

दूसरे शब्दों में कहें तो:

  • जब किसी कथन को पढ़ने या सुनने से निन्दा का आभास हो, किन्तु वास्तव में प्रशंसा की जा रही हो, तो वहाँ व्याजस्तुति अलंकार होता है।

  • जहाँ किसी व्यक्ति या वस्तु की प्रत्यक्ष में निंदा और परोक्ष में उसकी प्रशंसा की जाए, वहाँ भी व्याजस्तुति अलंकार होता है।

सरल उदाहरण:

’’निशदिन पूजा करत रहत श्याम बूढ़ि तब रंग।

जनम-जनम की देह को छीनत हौं एक संग।।’’

  • स्पष्टीकरण: इस कथन को पढ़ने या सुनने में ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीकृष्ण की निन्दा की जा रही है, लेकिन वास्तव में सराहना (प्रशंसा) की जा रही है। इस कथन का तात्पर्य है कि भगवान श्रीकृष्ण जन्म-जन्मान्तरों के बन्धनों के पाश से अपने भक्तों को छुटकारा दिलवाकर उन्हें स्वयं से निरोहित कर लेते हैं।

व्याजस्तुति अलंकार के चार भेद/रूप

व्याजस्तुति अलंकार मुख्य रूप से चार प्रकार का होता है:

1. निन्दा से स्तुति

जब ऊपर से निंदा जैसी लगे लेकिन भीतर से प्रशंसा हो।

उदाहरण:

’’कुजनपाल गुनवर्जित अकुल अनाथ।

कहौं कृपानिधि, राउर कस गनगाथ।।’’

अन्य उदाहरण:

’’नाँगो फिरै कहैं माँगतो देखि न खाँगो कछू जनि माँगिये थोरो।

राँकनि नाकप रीझि करै जग में जुरै जो जन जाचक जोरो।

नाक सँवारत आयौ हौं नाकहि पिनाकिहिं नेकु निहोरो।

ब्रह्म कहैं गिरिजा सिखवौ प्रभु रावरो दानि है बावरो भोरो।।’’

2. स्तुति से निन्दा

जहाँ प्रशंसा के माध्यम से वास्तव में व्यंग्य या निंदा की जाए।

उदाहरण:

“बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला।।”

“राम साधु तुम साधु सुजाना। राम मातु तुम भलि पहिचाना।”

3. एक की निन्दा से किसी दूसरे की निन्दा

जहाँ एक के बहाने दूसरे की बुराई की जाए।

उदाहरण:

“दई निरदई सो भई, ’दास’ बड़ीयै भूल।

कमलमुखी के जिन कियो, हिय कठिनई अतूल।।” (यहाँ दैव और कमलमुखी दोनों की क्रूरता का वर्णन है)

4. एक की स्तुति से किसी दूसरे की स्तुति

जहाँ एक की प्रशंसा के साथ-साथ दूसरे की भी प्रशंसा जुड़ जाए।

उदाहरण:

’’जाको ऐसा दूत सो साहेब अबै आवनो।’’

व्याजस्तुति अलंकार के महत्वपूर्ण उदाहरण

प्रतियोगी परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षाओं के लिए व्याजस्तुति अलंकार के प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:

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  • ’’या वृन्दावन बिपिन में, बड़भागी मम कान।

    जिन मुरली की तान सुनि, किय हर्षित मन आन।।’’

  • ’’रसिक शिरोमणि, छलिया ग्वाला,

    माखनचोर, मुरारी।

    वस्त्र-चोर, रणछोड़, हठीला

    मोह रहा गिरधारी।’’

  • ’’गंगा क्यों टेढ़ी चलती हो, दुष्टों को शिव कर देती हो।’’

  • ’’क्यों यह बुरा कर्म करती हो।

    नर्क रिक्त कर दिवि भरती हो।’’

  • ’’भष्म जटा विष अहि सहित, गंग कियो तैं मोहि।

    भोगी तैं जोगी कियो, कहा कहाँ अब तोहि।।’’

  • ’’काशी पुरी की कुरीति महा,

    जहाँ देह देख, पुनि देह न पाइए।’’

  • ’’तुम तो सखा श्याम सुन्दर के सकल जोग के ईस।’’

  • ’’जमुना तुम अविवेकनी, कौन लियो यह ढंग।

    पापिन सो जिन बंधु को, मान करावति भंग।।’’

  • ’’नाक-कान बिनु समिति बिहारी।

    क्षमा कीन्ह तुम धरम-बिचारी।।’’

  • ’’राम साधु तुम साधु सयाने।

    राम मातु भलि मैं पहिचाने।।’’

  • ’’उधौ तुम अति चतुर सुजान,

    जे पहिले रंग, रंगी, श्याम रंग,

    तिन्ह न चढ़ै रंग आन।।’’

  • ’’समर तेरो भाग्य यह कहा सराहयो जाय।

    पक्षी करि फल आस जो, तुहि सेवत नित आय।’’

  • ’’नाक कान बिन भगिनी निहारी।

    क्षमा कीन्ह तुम धरम विचारी।’’

निष्कर्ष

इस प्रकार, व्याजस्तुति अलंकार काव्य में वक्रोक्ति और चमत्कार उत्पन्न करने का एक बेहतरीन माध्यम है, जहाँ शब्दों के ऊपरी अर्थ (निंदा या स्तुति) कुछ और होते हैं और उनका वास्तविक निहितार्थ उससे विपरीत होता है।

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