व्यतिरेक अलंकार – Vyatirek Alankar || काव्यशास्त्र

अंतिम संशोधित (Last Updated): October 22, 2026

आज की पोस्ट में हम हिंदी काव्यशास्त्र में अलंकारों के अंतर्गत व्यतिरेक अलंकार(Vyatirek Alankar) को महत्त्वपूर्ण उदाहरणों की सहायता से समझेंगे।

व्यतिरेक अलंकार – Vyatirek Alankar

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व्यतिरेक अलंकार की परिभाषा – Vyatirek Alankar ki paribhasha

‘व्यतिरेक’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘आधिक्य’। व्यतिरेक अलंकार में कारण का होना अनिवार्य है।

जब किसी पद में उपमान की अपेक्षा उपमेय को अधिक बढा-चढाकर प्रस्तुत किया जाता है अर्थात् उपमेय का उत्कर्षपूर्ण वर्णन किया जाता है या आप यूँ समझें कि बड़ी वस्तु के बजाय छोटी वस्तु  को अधिक महत्त्व देना |  तो वहाँ व्यतिरेक अलंकार माना जाता है।

व्यतिरेक अलंकार
व्यतिरेक अलंकार

व्यतिरेक अलंकार उदाहरण – Vyatirek Alankar ke udaharan

1. जनम सिंधु पुनि बंधु विष, दिन मलीन सकलंक।
सिय मुख समता पाव किमि, चंद बापुरो रंक।।

स्पष्टीकरण – प्रस्तुत पद में उपमान (चन्द्र) की अपेक्षा उपमेय (सिय मुख) की शोभा का उत्कर्षपूर्ण वर्णन किया गया है, अतः यहाँ व्यतिरेक अलंकार है।

2. सम सुबरन सुखमाकर सुखद न थोर।
सीय अंग सखि कोमल कनक कठोर।।

स्पष्टीकरण – यहाँ उपमेय (सीय अंग) को कोमल तथा उपमान (कनक) को कठोर बताया गया है। अतः उपमेय की उत्कृष्टता होने से यहाँ व्यतिरेक अलंकार है।

3. जिनके यश प्रताप के आगे।
ससि मलीन रवि सीतल लागे।।

स्पष्टीकरण – यहाँ उपमेय (यश,प्रताप) के समक्ष उपमान (चन्द्रमा व सूर्य) को भी मलीन व शीतल (तेजरहित) बताया गया है, अतः यहाँ व्यतिरेक अलंकार है।

इसके अलावा अन्य उदाहरण देखें 

4. राधा मुख चन्द्र सा कहते हैं मतिरंक।
निष्कलंक है वह सदा, उसमें प्रकट कलंक।।

5. नयन नीरज में सखि, समता सब दरसात।
बंक विलोकन दृगन में, यह गुन अधिक दिखात।।

6. सिय मुख सरद- कमल जिमि किमि कहि जाय।
निसि मलीन वह, निसि दिन यह विगसाय।।

निष्कर्ष :

अब हम व्यतिरेक अलंकार (Vyatirek Alankar) को पढ़कर इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि इस अलंकार में उपमान की अपेक्षा उपमेय को अधिक महत्त्व दिया जाता है |

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