अंतिम संशोधित (Last Updated): September 1, 2026
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय, रचनाएँ और काव्यगत विशेषताएँ (Maithili Sharan Gupt ka Jivan Parichay)
Table of Contents
हिंदी साहित्य के द्विवेदी युग के सर्वाधिक लोकप्रिय, राष्ट्रीय चेतना के अमर गायक और ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि से विभूषित मैथिलीशरण गुप्त (Maithili Sharan Gupt) का हिंदी कविता के इतिहास में अत्यंत गौरवशाली स्थान है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जिन्हें ‘सामंजस्यवादी कवि’ कहा है, वे आधुनिक काल के तुलसी के रूप में सम्मानित किए जाते हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय, उनकी कृतियाँ, साकेत महाकाव्य, और महत्वपूर्ण तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस विस्तृत आलेख में हम उनके संपूर्ण जीवन और कृतित्व का अध्ययन करेंगे।
📌 मैथिलीशरण गुप्त का संक्षिप्त जीवन परिचय (Quick Facts)
मैथिलीशरण गुप्त के जीवन-वृत्त को निम्नलिखित तालिका में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है:
| विवरण | तथ्य / जानकारी |
| नाम | मैथिलीशरण गुप्त (उपनाम – दद्दा, मधुप) |
| जन्मतिथि | 3 अगस्त, 1886 ईस्वी |
| जन्म स्थान | चिरगाँव, जिला – झाँसी (उत्तर प्रदेश) |
| मूल नाम | मिथिलाधिप नन्दिनी शरण |
| पिता का नाम | सेठ रामचरण (जो स्वयं रामभक्त और कवि थे) |
| माता का नाम | श्रीमती काशीबाई |
| काव्य गुरु / सलाहकार | आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी |
| प्रथम कविता | ‘हेमन्त’ (सन् 1905 ईस्वी, ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित) |
| प्रथम काव्य संग्रह | ‘रंग में भंग’ (सन् 1909 ईस्वी) |
| मृत्युकाल | सन् 1964 ईस्वी |
| प्रमुख सम्मान | राष्ट्रकवि की उपाधि (महात्मा गांधी द्वारा 1936 ईस्वी में प्रदत्त), पद्म विभूषण, राज्यसभा के मनोनीत सदस्य |
गुप्तजी का जन्म उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के चिरगाँव में एक वैश्य परिवार में हुआ था। इनको रामभक्ति और काव्य की प्रेरणा विरासत में अपने पिताजी से मिली थी। बचपन में उन्हें स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए उनके पिताजी ने घर पर ही पढ़ाई की व्यवस्था कर दी। बाल्यावस्था में इन्होंने अंग्रेजी, संस्कृत और बंगाली का गहन अभ्यास किया था। गुप्तजी की प्रारंभिक रचनाएँ कोलकाता से निकलने वाले ‘वेश्योपकारक’ पत्र में छपती थीं, किंतु आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आने के बाद इनकी कविताएँ ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित होने लगीं।
📚 मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएँ
गुप्तजी द्वारा रचित मौलिक काव्य ग्रंथों की संख्या लगभग चालीस मानी जाती है, जिन्हें विषयवस्तु और विधा के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है। उनकी प्रमुख रचनाओं का विवरण नीचे दी गई तालिका में है:
| प्रमुख रचनाएँ | प्रकाशन वर्ष |
| रंग में भंग | 1909 ई. |
| जयद्रथवध | 1910 ई. |
| भारत-भारती | 1912 ई. |
| किसान | 1917 ई. |
| शकुन्तला | 1923 ई. |
| पंचवटी | 1925 ई. |
| अनघ | 1925 ई. |
| हिन्दू | 1927 ई. |
| त्रिपथगा | 1928 ई. |
| शक्ति | 1928 ई. |
| गुरुकुल | 1929 ई. |
| विकट भट | 1929 ई. |
| झंकार | 1929 ई. |
| साकेत | 1931 ई. |
| यशोधरा | 1933 ई. |
| द्वापर | 1936 ई. |
| सिद्धराज | 1936 ई. |
| नहुष | 1940 ई. |
| कुणालगीत | 1942 ई. |
| काबा और कर्बला | 1942 ई. |
| अर्जन और विसर्जन | 1942 ई. |
| नकुल | 1946 ई. |
| नोआखली | 1946 ई. |
| जयभारत | 1952 ई. |
| विष्णुप्रिया | 1957 ई. |
| पृथ्वीपुत्र | 1950 ई. |
| प्रदक्षिणा | 1950 ई. |
🔍 विषयवस्तु की दृष्टि से रचनाओं का वर्गीकरण
‘राम’ संबंधी काव्य: साकेत, पंचवटी, प्रदक्षिणा
‘कृष्ण’ संबंधी काव्य: द्वापर
‘वैष्णव’ भक्ति संबंधी काव्य: विष्णुप्रिया (चैतन्य महाप्रभु से संबंधित)
‘बौद्ध मत’ संबंधी काव्य: यशोधरा, अनघ (गीतिनाट्य)
‘सिक्ख’ धर्म संबंधी काव्य: गुरुकुल
‘इस्लाम’ धर्म संबंधी काव्य: काबा और कर्बला
‘महाभारत’ के पात्रों/प्रसंगों पर आश्रित काव्य: जयद्रथ वध, वक-संहार, वन-वैभव, नहुष, हिडिम्बा, शकुन्तला, तिलोत्तमा, जय-भारत
‘ऐतिहासिक वीर पुरुषों’ से संबंधित काव्य: रंग में भंग, सिद्धराज, पत्रावली, विकट भट
‘महात्मा गाँधी’ से संबंधित काव्य: अंजलि और अर्घ्य
काल्पनिक एवं विचारात्मक विषयवस्तु पर आधारित काव्य: भारत-भारती, वैतालिक, हिन्दू, अजित
✍️ रचनाशैली की दृष्टि से वर्गीकरण
मुक्तक काव्य: पद्य-प्रबंध, स्वदेश संगीत, मंगलघट
गीति शैली: झंकार, विश्ववेदना, अंजलि तथा साकेत, यशोधरा व कुणालगीत के कुछ अंश
नाट्य शैली (नाटक): तिलोत्तमा, चंद्रहास
गीति नाट्य शैली (रूपक): अनघ, तिलोत्तमा, चंद्रहास
पत्र-शैली (नूतन काव्य शैली): पत्रावली
प्रबंध काव्य शैली: यह इनकी सर्वप्रिय शैली है। ‘साकेत’, ‘जयद्रथवध’, ‘यशोधरा’, ‘पंचवटी’ इत्यादि इसी शैली में रचित हैं।
📖 प्रमुख रचनाओं से जुड़े विशेष तथ्य
गुप्तजी द्वारा रचित खंडकाव्यों की कुल संख्या 19 मानी जाती है, जबकि महाकाव्य 2 हैं।
‘यशोधरा’ रचना गौतम बुद्ध के गृहत्याग पर आधारित है। नारी जीवन की मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण कुछ लोग इस रचना को साकेत से भी बढ़कर मानते हैं। इसमें नारी सम्मान की प्रतिष्ठा स्थापित की गई है।
‘रंग में भंग’ में चित्तौड़ और बूंदी के राजघरानों से संबंध रखने वाली राजपूती आन-बान का वर्णन किया गया है।
‘मंगलघट’ इनका कविता संग्रह है, जिसमें ‘केशों की कथा’, ‘स्वर्गसहोदर’ इत्यादि बहुत सी फुटकल रचनाएँ संकलित हैं।
‘पंचवटी’ रचना में लक्ष्मण के चरित्र का उत्कर्ष वर्णित किया गया है। यह रामायण के लक्ष्मण व शूर्पणखा प्रसंग पर आधारित खंडकाव्य है।
‘विकटभट’ रचना में जोधपुर के एक सरदार की तीन पीढ़ियों द्वारा वचन निभाने का वर्णन किया गया है।
‘मेघनाथ वध’ इनकी अतुकांत रचना है।
‘विष्णुप्रिया’ में चैतन्य महाप्रभु की वियुक्ता पत्नी के त्याग और तप को प्रदर्शित किया गया है।
‘अर्जन और विसर्जन’ में मुस्लिम संस्कृति की झाँकी प्रस्तुत की गई है। यह एक जिल्द में प्रकाशित दो लघु खंडकाव्य हैं।
‘जयद्रथवध’ का आधार महाभारत है, जिसमें अभिमन्यु के शौर्य और राष्ट्र की वेदी पर प्राण न्योछावर करने वाले युवक का वर्णन है।
‘भारत-भारती’ राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित वह प्रसिद्ध काव्य है, जिसके कारण इन्हें ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि मिली और इसके लिए इन्हें जेल भी जाना पड़ा था। यह रचना ‘मुसद्दे हाली’ एवं ‘मुसद्दे कैफी’ (लेखक-ब्रजमोहन दत्तात्रेय कैफी) से प्रभावित मानी जाती है। महात्मा गांधी ने 1936 ई. में काशी में इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि दी थी।
‘तिलोत्तमा’ और ‘चंद्रहास’ इनके पौराणिक नाटक हैं, जिसमें चंद्रहास भाग्यवाद पर आधारित नाटक है।
‘किसान’ भारतीय किसानों की करुण गाथा पर आधारित खंडकाव्य है।
‘वैतालिक’ राष्ट्रीय और पुनर्जागरण से संबंधित गीतिकाव्य है।
‘शकुंतला’ कालिदास के ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’ का अनुवाद है।
‘हिंदू’ जातीय एकता के आदर्शों से प्रेरित निबंध काव्य है।
‘शक्ति’ माँ दुर्गा के शौर्य तथा देव-दानव संग्राम पर आधारित खंडकाव्य है।
‘गुरुकुल’ सिक्ख गुरुओं पर आधारित इतिवृत्तात्मक निबंधकाव्य है।
‘झंकार’ एक आध्यात्मिक गीतिकाव्य है।
‘उच्छ्वास’ में गुप्तजी ने शोक गीतों का संग्रहण किया है।
‘नहुष’ नहुष के चरित्र पर आधारित खंडकाव्य है।
‘सिद्धराज’ 5 सर्गों में लिखा गया राजा जयसिंह की गाथा पर आधारित खंडकाव्य है।
‘कुणालगीत’ कुणाल के व्यक्तित्व पर आधारित गेयता की दृष्टि से उत्कृष्ट खंडकाव्य है।
‘विश्व वेदना’ महायुद्ध की वेदना की करुण अभिव्यक्ति है।
‘प्रदक्षिणा’ रामकथा से संबंधित निबंध काव्य है।
‘पृथ्वीपुत्र’ पद्यनाटक, दिवोदास, नायिनी तथा पृथ्वीपुत्र तीनों का संग्रह है।
‘हिडिम्बा’ महाभारत की भीम-हिडिम्बा कथा पर आधारित खंडकाव्य है।
‘जयभारत’ 47 खंडों का महाभारत कथा पर आधारित प्रबंधकाव्य है, जिसे ‘प्राचीन भारत की हिन्दू संस्कृति का स्वच्छ दर्पण’ कहा जाता है। इसमें कौरवों-पांडवों के पारस्परिक कलह और महायुद्ध का वर्णन है।
‘रत्नावली’ महाकवि तुलसीदास की पत्नी पर आधारित खंडकाव्य है।
‘कविता कलाप’ 27 कविताओं का संग्रह है।
🏛️ महाकाव्य ‘साकेत’ से संबंधित महत्त्वपूर्ण तथ्य
रचनाकाल: 1931 ईस्वी
कुल सर्ग: बारह (12)
प्रेरणास्रोत:
रवींद्रनाथ टैगोर का लेख – ‘काव्य की उपेक्षिताएँ’
महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा 1908 ई. में ‘सरस्वती’ पत्रिका में ‘भुजंगभूषण भट्टाचार्य’ नाम से प्रकाशित लेख – ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’।
पुरस्कार: मंगला प्रसाद पारितोषिक
यह तुलसी के ‘रामचरितमानस’ के बाद हिंदी का दूसरा बड़ा रामकाव्य माना जाता है।
इस रचना पर आर्य समाज का प्रभाव दिखाई पड़ता है।
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के अनुसार: “साकेत महाकाव्य ही नहीं आधुनिक हिंदी का युग प्रवर्तक महाकाव्य है।”
डॉ. नगेंद्र ने इसे ‘जनवादी काव्य’ कहा है।
सबसे बड़ा एवं महत्त्वपूर्ण सर्ग: नवाँ सर्ग (यह सर्ग लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला के वियोग वर्णन को समर्पित है। दसवें सर्ग में भी उर्मिला का वियोग वर्णन है)। साकेत के प्रथम, अष्टम और द्वादश सर्ग के उत्तरार्ध में भी उर्मिला-लक्ष्मण के मिलन का वर्णन है।
इस रचना में कुल 15 वर्ष का समय लगा (इसका प्रारंभ 1916 ई. में हो गया था, जबकि प्रकाशन 1931 ई. में हुआ)।
🌟 अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ
इन्होंने माइकेल मधुसूदन दत्त की रचनाओं का अनुवाद ‘मधुप’ उपनाम से किया था।
स्वतंत्रता के बाद ये भारतीय संसद में ‘राज्यसभा’ के सदस्य भी मनोनीत किए गए थे।
इन्होंने अपनी रचनाओं में ‘हरिगीतिका’ छंद का सर्वाधिक प्रयोग किया है।
गुप्तजी ने स्वयं को ‘कौटुंबिक कवि मात्र’ कहा है।
📜 प्रमुख पंक्तियाँ
‘यशोधरा’ से:
“अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आँखों में पानी।।”
“सखि वे मुझसे कहकर जाते।”
‘पंचवटी’ से:
“चारु चंद्र की चंचल किरणें, खेल रही हैं जल-थल में। स्वच्छ चाँदनी छिटक रही है अवनी और अम्बर तल में।।”
‘भारत-भारती’ से:
“भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ? फैला मनोहर गिरि हिमालय और गंगाजल जहाँ। सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है? उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन? भारतवर्ष है।।”
“केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।।”
“हम कौन थे, क्या हो गये और क्या होंगे अभी। आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी।।”
“क्षत्रिय! सुनो अब तो कुयश की कालिमा को मेट दो। निज देश को जीवन सहित तन मन और धन भेंट दो। वैश्यो! सुनो व्यापार सारा मिट चुका है देश का। सब धन विदेशी हर रहे है, पार है क्या क्लेश का।।”
‘साकेत’ से:
“नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है, सूर्य-चंद्र युग मुकुट-मेखला रत्नाकर है। नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल-तारे मंडन हैं, बन्दीजन खगवृन्द, शेष फन सिंहासन है। करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की, हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की।।”
“सखि, नील नभस्सर से उतरा, यह हंस अहा! तरता-तरता। अब तारक-मौक्तिक शेष नहीं, निकला जिनको चरता-चरता…”
“राम, तुम मानव हो? ईश्वर नहीं हो क्या? विश्व में रमे हुए नहीं सभी कहीं हो क्या? तब मैं निरीश्वर हूँ, ईश्वर क्षमा करे, तुम न रमो तो मन तुममें रमा करे।।”
“भव में नव वैभव व्याप्त कराने आया, नर को ईश्वरता प्राप्त कराने आया। संदेश यहाँ मैं नहीं स्वर्ग का लाया, इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आया।।”
“पहले आँखों में थे, मानस में कूद मगन प्रिय अब थे। छींटे वही उड़े थे, बड़े-बड़े अश्रु वे कब थे?।”
“घटना हो चाहे घटा, उठ नीचे से नित्य। आती है ऊपर, सखी! छा कर चंद्रादित्य।।”
“वेदने! तू भी भली बनी। पाई मैंने आज तुझी में अपनी चाह धनी।।”
“हा! मेरे कुंजों का कूजन रोकर, निराश होकर सोया। वह चन्द्रोदय उसका उड़ा रहा है धवल वसन-सा धोया।।”
“मेरे चपल यौवन-बाल! अचल अंचल में पड़ा सो, मचल कर मत साल।।”
“सखि, निरख नदी की धारा, ढलमल ढलमल चंचल अंचल, झलमल झलमल तारा।।”
“आ मेरे मानस के हास। खिल सहस्रदल, सरस सुवास।।”
“सजनि, रोता है मेरा गान। प्रिय तक नहीं पहुँच पाती है उसकी कोई तान।।”
“बस इसी प्रिय-काननकुंज में, मिलन भाषण के स्मृतिपुंज में- अभय छोड़ मुझे तुम दीजियो, हासन रोदन से न पसीजियो।।”
निष्कर्ष
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का संपूर्ण साहित्य भारतीय संस्कृति, राष्ट्रीय स्वाभिमान, मानवीय संवेदनाओं और नैतिक मूल्यों का एक ऐसा महाकुंभ है, जो हर युग के पाठक को राष्ट्रप्रेम और मानवता की प्रेरणा देता है। ‘भारत-भारती’ के हुंकार से लेकर ‘साकेत’ की आर्त उर्मिला के त्याग और ‘यशोधरा’ के आत्मसम्मान तक, उनका एक-एक काव्य ग्रंथ हिंदी साहित्य की थाती को समृद्ध करता है। वे सच्चे अर्थों में राष्ट्र की आत्मा को वाणी देने वाले जन-कवि थे, जिनका कृतित्व भारतीय मानस में सदैव अमर रहेगा।
🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि
| क्र.सं. | लेखक / कवि का नाम | मुख्य विशेषता / काल | इंटरनल लिंक (URL) |
| 1. | भारतेंदु हरिश्चंद्र | आधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युग | लिंक देखें |
| 2. | महावीर प्रसाद द्विवेदी | द्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकार | लिंक देखें |
| 3. | जयशंकर प्रसाद | छायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककार | लिंक देखें |
| 4. | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ | छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेता | लिंक देखें |
| 5. | सुमित्रानंदन पंत | प्रकृति के सुकुमार कवि / छायावाद | लिंक देखें |
| 6. | महादेवी वर्मा | आधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्री | लिंक देखें |
| 7. | प्रेमचंद (धनपत राय) | उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुष | लिंक देखें |
| 8. | अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) | प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक | लिंक देखें |
| 9. | रामधारी सिंह ‘दिनकर’ | राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कवि | लिंक देखें |
| 10. | कृष्णा सोबती | आधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर | लिंक देखें |
❓ FAQ (महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर)



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जी धन्यवाद
Supr
Very very important to me and all the person who preparing Hindi competition exam.
बहुत ही शानदार जीवन परिचय।। व सार।
धन्यवाद।
K k घोडेला साब
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Matrabhumi Kavita ki sandharb sahit vyakhya
बहुत अच्छा जीवन परिचय है सर
धन्यवाद