भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय, रचनाएँ और नाटक | Bhartendu Harishchandra

अंतिम संशोधित (Last Updated): September 3, 2026

भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय, रचनाएँ और साहित्यिक योगदान (Bhartendu Harishchandra Jivan Parichay)

आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य के जन्मदाता और युग-प्रवर्तक साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र का हिंदी जगत में अत्यंत गौरवशाली स्थान है। उनके नाम पर ही हिंदी साहित्य के एक संपूर्ण युग का नाम ‘भारतेंदु युग’ पड़ा है। मात्र 35 वर्ष के अल्पकालिक जीवन में उन्होंने हिंदी गद्य, पद्य, नाटक, पत्रकारिता और निबंध के क्षेत्र में जो अभूतपूर्व योगदान दिया, उसने हिंदी साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की। UGC NET/JRF, KVS, NVS, EMRS, UP/MP TGT-PGT, RPSC, BPSC, DSSSB तथा देश भर की विभिन्न हिंदी साहित्य प्रतियोगी परीक्षाओं और अकादमिक अध्ययन की दृष्टि से भारतेन्दु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय, उनकी रचनाएँ और महत्वपूर्ण तथ्य अत्यंत उपयोगी हैं। इस विस्तृत आलेख में बिना किसी डेटा को छोड़े संपूर्ण सामग्री का एसईओ-अनुकूल संकलन प्रस्तुत है।

📌 भारतेन्दु हरिश्चंद्र का संक्षिप्त जीवन परिचय (Quick Facts)

  • पूरा नाम: भारतेन्दु हरिश्चंद्र

  • मूल नाम: हरिश्चन्द्र

  • उपाधि: ‘भारतेन्दु’ (डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, उस समय के पत्रकारों एवं साहित्यकारों द्वारा 1880 ई. में इन्हें इस उपाधि से सम्मानित किया गया था।)

  • जन्मतिथि: 9 सितम्बर 1850 ई. (1907 विक्रमी)

  • जन्मस्थान: काशी (एक संपन्न वैश्य परिवार में)

  • पिता का नाम: बाबू गोपालचन्द्र ‘गिरिधरदास’ (ये इतिहास प्रसिद्ध सेठ अमीचंद की वंश परंपरा में उत्पन्न हुए माने जाते हैं।)

  • मुख्य व्यवसाय: पत्रकारिता

  • निधन: 6 जनवरी 1885 ई. (1942 विक्रमी) — नोट: मात्र 35 वर्ष की अल्पायु में इनका निधन हो गया था।

📰 संपादन कार्य और पत्रकारिता

भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा निम्नलिखित तीन प्रसिद्ध पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया गया था (ये तीनों पत्रिकाएँ ‘काशी/बनारस’ से प्रकाशित होती थीं):

  1. कवि-वचन सुधा — 1868 ई. (मासिक, पाक्षिक, साप्ताहिक)

  2. हरिश्चन्द्र चन्द्रिका — 1873 ई. (मासिक)

    • नोट: शुरुआती आठ अंकों तक यह पत्रिका ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ नाम से प्रकाशित हुई थी। नौवें अंक में इसका नाम बदलकर ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ रखा गया था। हिंदी गद्य का ठीक परिष्कृत रूप सर्वप्रथम इसी ‘चन्द्रिका’ में प्रकट हुआ था।

  3. बाल-बोधिनी — 1874 ई. (मासिक)

📚 प्रमुख रचनाएँ एवं साहित्यिक योगदान

अपने पैंतीस वर्ष के अल्पकालिक जीवन में भारतेन्दु हरिश्चंद्र जी के द्वारा हिन्दी साहित्य की लगभग प्रत्येक विधा पर अपनी लेखनी चलाई गई, जिसके लिए हिन्दी साहित्य जगत् सदैव उनका आभारी रहेगा। इनकी समस्त रचनाओं की संख्या 175 के लगभग है।

1. नाट्य रचनाएँ (मौलिक एवं अनूदित)

भारतेन्दु जी के द्वारा अनूदित एवं मौलिक सब मिलाकर कुल 17 (सत्रह) नाटक लिखे गए थे, जिनमें से आठ अनूदित एवं नौ मौलिक नाटक माने जाते हैं।

  • (क) अनूदित नाटक (आठ):

    1. विद्यासुंदर (1868 ई.) — यह संस्कृत नाटक ‘चौर पंचाशिका’ के बंगला संस्करण का हिन्दी अनुवाद है।

    2. रत्नावली (1868 ई.) — यह संस्कृत नाटिका ‘रत्नावली’ का हिन्दी अनुवाद है।

    3. पाखंड-विखंडन (1872 ई.) — यह संस्कृत में ‘कृष्णमिश्र’ द्वारा रचित ‘प्रबोधचन्द्रोदय’ नाटक के तीसरे अंक का अनुवाद है।

    4. धनंजय विजय (1873 ई.) — यह संस्कृत के ‘कांचन’ कवि द्वारा रचित ‘धनंजय विजय’ नाटक का हिन्दी अनुवाद है।

    5. कर्पूरमंजरी (1875 ई.) — यह ‘सट्टक’ श्रेणी का नाटक संस्कृत के कवि द्वारा रचित नाटक का अनुवाद है।

    6. भारत जननी (1877 ई.) — यह इनका गीतिनाट्य है जो संस्कृत से हिन्दी में अनूदित है।

    7. मुद्राराक्षस (1878 ई.) — यह विशाखदत्त के संस्कृत नाटक का हिन्दी अनुवाद है।

    8. दुर्लभबंधु (1880 ई.) — यह अंग्रेजी नाटककार ‘शेक्सपियर’ के ‘मर्चेंट ऑव वेनिस’ का हिन्दी अनुवाद है।

  • (ख) मौलिक नाटक (नौ):

    1. वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (1873 ई.) — प्रहसन (इसमें पशुबलि प्रथा का विरोध किया गया है।)

    2. सत्य हरिश्चन्द्र (1875 ई.) — इसमें असत्य पर सत्य की विजय का वर्णन किया गया है।

    3. श्री चन्द्रावली नाटिका (1876 ई.) — इसमें प्रेम भक्ति का आदर्श प्रस्तुत किया गया है।

    4. विषस्य विषमौषधम् (1876 ई.) — भाण (यह देशी राजाओं की कुचक्रपूर्ण परिस्थिति दिखाने के लिए रचा गया था।)

    5. भारतदुर्दशा (1880 ई.) — नाट्यरासक (इसमें अंग्रेजी राज्य में भारत की दशा का चित्रण किया गया है। यह नाटक ‘प्रबोध-चन्द्रोदय’ की प्रतीकात्मक शैली से प्रभावित है।)

    6. नीलदेवी (1881 ई.) — गीतिरूपक (यह पंजाब के एक हिन्दू राजा पर मुसलमानों की चढ़ाई का ऐतिहासिक वृत्त लेकर लिखा गया है। इसमें भारतीय नारी के आदर्शों की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है।)

    7. अंधेर नगरी (1881 ई.) — प्रहसन (छह दृश्य) (इसमें भ्रष्ट शासन तंत्र पर व्यंग्य किया गया है।)

    8. प्रेम जोगिनी (1875 ई.) — नाटिका (इसमें तीर्थस्थानों पर होने वाले कुकृत्यों का चित्रण किया गया है।)

    9. सती प्रताप (1883 ई.) — गीतिरूपक (यह इनका ‘अधूरा नाटक’ माना जाता है। इस नाटक को बाद में ‘राधाकृष्णदास’ द्वारा पूरा किया गया था।)

2. काव्यात्मक रचनाएँ

इनके द्वारा रचित काव्य रचनाओं की कुल संख्या 70 मानी जाती है, जिनमें से कुछ प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं:

  • प्रेम प्रलाप, बकरी विलाप, प्रबोधिनी, दैन्य प्रलाप, विजय-वल्लरी (1881), विजयिनी विजय वैजयंती (1882), दशरथ विलाप, प्रातःसमीरन, वैशाख माहात्म्य, रिपनाष्टक, वर्षा-विनोद (1880), फूलों का गुच्छा (1882), भक्त सर्वस्व, उर्दू का स्यापा, बन्दरसभा।

  • काव्य से जुड़े विशेष तथ्य:

    1. इनकी ‘प्रबोधिनी’ रचना विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की प्रत्यक्ष प्रेरणा देने वाली रचना है।

    2. ‘दशरथ विलाप’ एवं ‘फूलों का गुच्छा’ रचनाओं में ‘ब्रज’ के स्थान पर ‘खड़ी बोली हिन्दी’ का प्रयोग हुआ है।

    3. इनकी सभी काव्य रचनाओं को ‘भारतेंदु ग्रंथावली’ के प्रथम भाग में संकलित किया गया है।

    4. ‘भक्त सर्वस्व’, ‘कार्तिक-स्नान’, ‘वैशाख माहात्म्य’ एवं ‘उत्तरार्द्ध भक्तमाल’ आदि ग्रंथ इनके विशुद्ध भक्ति भाव से ओत-प्रोत ग्रंथ माने जाते हैं।

    5. ‘देवी छद्म लीला’, ‘तन्मय लीला’ आदि में कृष्ण के विभिन्न रूपों को प्रस्तुत किया गया है।

3. उपन्यास, निबंध एवं इतिहास ग्रंथ

  • उपन्यास: हमीर हठ, सुलोचना, रामलीला, सीलवती, सावित्री चरित्र।

  • निबंध: 1. कुछ आप बीती कुछ जग बीती, 2. सबै जाति गोपाल की, 3. मित्रता, 4. सूर्योदय, 5. जयदेव, 6. बंग भाषा की कविता।

  • इतिहास ग्रंथ: 1. कश्मीर कुसुम, 2. बादशाह दर्पण।

🔍 भारतेन्दु हरिश्चंद्र के बारे में विशेष तथ्य

  1. ये हिन्दी गद्य साहित्य के जन्मदाता माने जाते हैं।

  2. इनके द्वारा हिन्दी लेखकों की समस्याओं का समाधान करने के लिए (समस्या पूर्ति के लिए) ‘कविता वर्धिनी सभा’ की स्थापना की गई थी।

  3. इनके द्वारा 1873 ई. में ‘तदीय समाज’ की स्थापना भी की गयी थी।

  4. इन्होंने हिन्दी साहित्य के सर्वप्रथम अभिनीत नाटक ‘जानकी मंगल’ (लेखक- शीतला प्रसाद त्रिपाठी) में ‘लक्ष्मण’ पात्र की भूमिका निभायी थी।

  5. ये ‘रसा’ उपनाम से भी लेखन कार्य करते थे।

  6. वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित ‘पुष्टिमार्ग’ में दीक्षा ग्रहण की थी।

  7. इन्होंने मातृभाषा (राष्ट्रभाषा) की प्रशंसा करते हुए लिखा है:

    ’’निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।’’

  8. ये ग्यारह वर्ष की अल्पायु में ही कविताएँ लिखने लग गए थे।

  9. पन्द्रह वर्ष की अवस्था में वे अपने परिवार के साथ जगन्नाथजी गए थे, उसी यात्रा में उनका परिचय बंगला साहित्य की नवीन प्रवृत्तियों से हुआ था।

  10. अपनी अति उदारता के कारण ही वे अपने पूर्वजों की संपत्ति लुटाकर दरिद्र हो गए। जीवन के अन्तिम दिनों तक वे साहित्यकारों, कवियों व दीन-दुःखियों की सहायता करते रहे।

📜 भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के बारे में प्रमुख आलोचनात्मक कथन

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल:

    “ये केवल नर प्रकृति के कवि माने गए हैं। इनमें बाह्य प्रकृति की अनेक रूपता के साथ उनके हृदय का सामंजस्य नहीं पाया जाता।”

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल:

    “हमारे जीवन और साहित्य के बीच जो विच्छेद बढ़ रहा था, उसे उन्होंने दूर किया। हमारे साहित्य को नए-नए विषयों की ओर प्रवृत्त करने वाले हरिश्चन्द्र ही हुए।”

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल:

    “प्राचीन और नवीन का ही सुंदर सामंजस्य भारतेंदु की कला का विशेष माधुर्य है।”

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल:

    “वे सिद्ध वाणी के अत्यंत सरल हृदय कवि थे। इससे एक ओर तो उनकी लेखनी से शृंगार रस के ऐसे रसपूर्ण और मार्मिक कवित्त सवैये निकले कि उनके जीवनकाल में ही चारों ओर लोगों के मुँह से सुनाई पड़ने लगे और दूसरी ओर स्वदेश प्रेम से भरी हुई उनकी कविताएँ चारों ओर देश के मंगल का मंत्र सा फूँकने लगीं।”

  • डॉ. नगेन्द्र:

    “अपनी अनेक रचनाओं में जहाँ वे प्राचीन काव्य प्रवृत्तियों के अनुवर्ती रहे, वहीं नवीन काव्यधारा के प्रवर्तन का श्रेय भी उन्हीं को प्राप्त है।”

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी:

    “भारतेंदु का पूर्ववर्ती काव्य साहित्य संतों की कुटिया से निकलकर राजाओं और रईसों के दरबार में पहुँच गया था। उन्होंने एक तरफ तो काव्य को फिर से भक्ति की पवित्र मंदाकिनी में स्नान कराया और दूसरी ओर उसे दरबारीपन से निकालकर लोक जीवन के आमने-सामने खड़ा कर दिया।”

  • रामविलास शर्मा:

    “भारतेंदु युग का साहित्य जनवादी इस अर्थ में है कि वह भारतीय समाज के पुराने ढांचे से संतुष्ट न रहकर उसमें सुधार भी चाहता है। वह केवल राजनीतिक स्वाधीनता का साहित्य न होकर मनुष्य की एकता, समानता और भाईचारे का भी साहित्य है। भारतेंदु स्वदेशी आंदोलन के ही अग्रदूत न थे, वे समाज सुधारकों में भी प्रमुख थे। स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, विदेश यात्रा आदि के वे समर्थक थे।”

FAQ ( प्रश्नोत्तर)

भारतेन्दु हरिश्चंद्र को 'भारतेन्दु' की उपाधि कब और किसने दी थी?
डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, उस समय के पत्रकारों एवं साहित्यकारों ने 1880 ई. में इन्हें ‘भारतेंदु’ की उपाधि से सम्मानित किया था।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा संपादित प्रमुख पत्रिकाएँ कौन सी थीं?
इन्होंने ‘कवि-वचन सुधा’ (1868), ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका/मैगजीन’ (1873) और ‘बाल-बोधिनी’ (1874) नामक तीन प्रसिद्ध पत्रिकाओं का संपादन किया था।
भारतेन्दु जी का अधूरा नाटक कौन सा है जिसे बाद में पूरा किया गया?
‘सती प्रताप’ (1883 ई.) उनका अधूरा नाटक माना जाता है, जिसे बाद में राधाकृष्णदास द्वारा पूरा किया गया था।

निष्कर्ष

संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी साहित्य के सूर्य थे जिन्होंने रूढ़ियों और दरबारी संस्कृति से निकालकर साहित्य को जन-जीवन के करीब पहुँचाया। उनका संपूर्ण जीवन और कृत्य हिंदी भाषा, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक नवजागरण का एक स्वर्णिम अध्याय है।

🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि

क्र.सं.लेखक / कवि का नाममुख्य विशेषता / कालइंटरनल लिंक (URL)
1.भारतेंदु हरिश्चंद्रआधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युगलिंक देखें
2.महावीर प्रसाद द्विवेदीद्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकारलिंक देखें
3.जयशंकर प्रसादछायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककारलिंक देखें
4.सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेतालिंक देखें
5.सुमित्रानंदन पंतप्रकृति के सुकुमार कवि / छायावादलिंक देखें
6.महादेवी वर्माआधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्रीलिंक देखें
7.प्रेमचंद (धनपत राय)उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुषलिंक देखें
8.अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तकलिंक देखें
9.रामधारी सिंह ‘दिनकर’राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कविलिंक देखें
10.कृष्णा सोबतीआधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षरलिंक देखें

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