गीत-फरोश || भवानीप्रसाद मिश्र || नयी कविता || आधुनिक काल

अंतिम संशोधित (Last Updated): September 3, 2026

‘गीत-फरोश’: भवानीप्रसाद मिश्र की प्रसिद्ध कविता का परिचय और संपूर्ण अध्ययन

हिंदी साहित्य में सहजता, आत्मीयता, गांधीवादी विचारों और मानवीय सरोकारों को अपनी कविताओं का प्राण बनाने वाले प्रख्यात कवि भवानीप्रसाद मिश्र का आधुनिक हिंदी साहित्य में अत्यंत विशिष्ट और गौरवशाली स्थान है। उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर जीवन के प्रति अगाध प्रेम और सादगी का संदेश मिलता है, वहीं दूसरी ओर पूँजीवादी व्यवस्था, बाजारवाद और साहित्यिक जीवन की विडंबनाओं पर बहुत ही तीखा और कलात्मक व्यंग्य भी देखने को मिलता है। UGC NET/JRF, KVS, NVS, EMRS, UP/MP TGT-PGT, RPSC, BPSC, DSSSB तथा देश भर की विभिन्न हिंदी साहित्य प्रतियोगी परीक्षाओं और अकादमिक अध्ययन की दृष्टि से भवानीप्रसाद मिश्र की प्रसिद्ध कविता ‘गीत-फरोश’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस आलेख में हम इस प्रतीकात्मक और व्यंग्य-प्रधान कविता की पृष्ठभूमि, विस्तृत व्याख्या और मुख्य बिंदुओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

गीत-फरोश मिश्र जी का प्रथम काव्य संकलन है। इसकी अधिकांश कविताएँ प्रकृति के रूप वर्णन से सम्बन्धित हैं। इसके अतिरिक्त सामाजिकता और राष्ट्रीय भावना से युक्त कविताएँ भी हैं। ’गीतफरोश’ इस संकलन की प्रतिनिधि कविता है।

गीत-फरोश –  Geet Farosh (भवानीप्रसाद मिश्र)

जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं है, काम बताऊँगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत, सख्त सरदर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा!

जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको,
पर बाद-बाद में अक्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान,
जी, आप न हों सुन कर ज्यादा हैरान,
मैं सोच-समझकर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ,
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

यह गीत सुबह का है, गाकर देखें,
⋅यह गीत गजब का है, ढाकर देखे,
यह गीत जरा सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था,
यह गीत पहाङी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है!

⋅यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
जी, यह मसान में भूख जगाता है,
यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर,
यह गीत तपेदिक की है दवा हुजूर,
जी, और गीत भी हैं, दिखलाता हूँ,
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ!

⋅जी, छंद और बे-छंद पसंद करें,
जी, अमर गीत और ये जो तुरंत मरें!
ना, बुरा मानने की इसमें क्या बात,
मैं पास रखे हूँ कलम और दावात
इनमें से भाएँ नहीं, नए लिख दूँ,
मैं नए पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ,
जी हाँ, हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

जी गीत जनम का लिखूँ, मरण का लिखूँ,
जी, गीत जीत का लिखूँ, शरण का लिखूँ,
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का!
कुछ और डिजायन भी हैं, यह इल्मी,
यह लीजे चलती चीज नई, फिल्मी,
यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत!
यह दुकान से घर जाने का गीत!
जी नहीं दिल्लगी की इस में क्या बात,
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात,
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
जी रूठ-रूठ कर मन जाते है गीत,
जी बहुत ढेर लग गया हटाता हूँ,
गाहक की मर्जी, अच्छा, जाता हूँ,
मैं बिलकुल अंतिम और दिखाता हूँ,
या भीतर जा कर पूछ आइए, आप,
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप
क्या करूँ मगर लाचार हार कर
गीत बेचता हूँ।
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

📌 कविता की पृष्ठभूमि और रचना का उद्देश्य

इस संकलन से पहले सन 1951 में ‘प्रतीक’ नामक पत्रिका में प्रकाशित ‘गीत-फरोश’ कविता नए भावबोध की आरंभिक हिंदी कविताओं में महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।

‘गीत-फरोश’ कविता की पृष्ठभूमि के विषय में स्वयं कवि का कहना है:

“गीत-फरोश शीर्षक हँसाने वाली कविता मैंने बड़ी तकलीफ में लिखी थी। मैं पैसे को कोई महत्त्व नहीं देता, लेकिन पैसा बीच-बीच में अपना महत्त्व स्वयं प्रतिष्ठित करा लेता है।

मुझे अपनी बहन की शादी करनी थी। पैसा मेरे पास था नहीं, तो मैंने कलकत्ते में बन रही फिल्म के लिए गीत लिखे। गीत अच्छे लिखे गए, लेकिन मुझे इस बात का दुख था कि मैंने पैसे लेकर गीत लिखे।

मैं कुछ लिखूँ, इसका पैसा मिल जाए, यह अलग बात है, लेकिन कोई मुझसे कहे कि इतने पैसे देता हूँ, तुम गीत लिख दो—यह स्थिति मुझे बहुत नापसंद है।

क्योंकि मैं ऐसा मानता हूँ कि आदमी की जो साधना का विषय है, वह उसकी जीविका का विषय नहीं होना चाहिए। फिर, कविता तो अपनी इच्छा से लिखी जाने वाली चीज़ है।”

इस तकलीफदेह पृष्ठभूमि में लिखी गई ‘गीत-फरोश’ कविता कविकर्म के प्रति समाज और स्वयं कवि के बदलते हुए दृष्टिकोण को उजागर करती है। व्यंग्य के साथ-साथ इसमें वस्तुस्थिति का मार्मिक निरूपण भी है।

📖 ‘गीत-फरोश’ कविता का केंद्रीय भाव एवं मुख्य विशेषताएँ

  • कविकर्म और बाज़ारवाद का संघर्ष: इस कविता में कवि ने उस विडंबना को उजागर किया है जहाँ एक रचनाकार को अपनी कला, अपने गीत और अपनी संवेदना को बाज़ार में बेचने के लिए विवश होना पड़ता है। ‘गीत-फरोश’ का अर्थ ही है— ‘गीत बेचने वाला’।

  • कला की पवित्रता: भवानीप्रसाद मिश्र का मानना था कि कविता आत्मा की पुकार है, कोई बिकाऊ वस्तु नहीं। जब आजीविका की मजबूरी के कारण साधना का विषय व्यापार बन जाता है, तब कवि की अंतरात्मा किस प्रकार की पीड़ा से गुजरती है, इसका सजीव चित्रण इस रचना में मिलता है।

  • तीखा व्यंग्य और सहज शिल्प: कविता में जहाँ एक ओर गहरा मनोवैज्ञानिक द्वंद्व है, वहीं दूसरी ओर समाज और व्यवस्था की व्यावसायिक मानसिकता पर करारा व्यंग्य भी है। मिश्र जी की सहज और आत्मीय भाषा शैली इस रचना को पाठकों के हृदय के बहुत निकट ले आती है।

    🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि

    क्र.सं.लेखक / कवि का नाममुख्य विशेषता / कालइंटरनल लिंक (URL)
    1.भारतेंदु हरिश्चंद्रआधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युगलिंक देखें
    2.महावीर प्रसाद द्विवेदीद्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकारलिंक देखें
    3.जयशंकर प्रसादछायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककारलिंक देखें
    4.सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेतालिंक देखें
    5.सुमित्रानंदन पंतप्रकृति के सुकुमार कवि / छायावादलिंक देखें
    6.महादेवी वर्माआधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्रीलिंक देखें
    7.प्रेमचंद (धनपत राय)उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुषलिंक देखें
    8.अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तकलिंक देखें
    9.रामधारी सिंह ‘दिनकर’राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कविलिंक देखें
    10.कृष्णा सोबतीआधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षरलिंक देखें

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