मिथक || हिंदी साहित्य || काव्यशास्त्र || hindi sahitya

आज हम काव्यशास्त्र का महत्वपूर्ण विषय मिथक(mithak) के बारें में अध्ययन करेंगे ,जो आपके लिए उपयोगी साबित होगा 

मिथक(mithak)(mithak)

पश्चिम में विशेष रूप से अमेरिका में मिथक(mithak) आलोचना का प्रसार हो रहा है, इसे एक सार्वभौम तथा वैज्ञानिक पद्धति माना जाता है। साहित्य ही नहीं, मनोविज्ञान, सामाजिक विज्ञान के क्षेत्र में भी मिथक(mithak) पर महत्त्वपूर्ण कार्य किए गए हैं, किए जा रहे हैं।

’मिथक’ शब्द अंग्रेजी के ’मिथ’ के हिन्दी रूपांतरण से निर्मित हुआ है। मूलतः यह शब्द यूनानी के ’माइथोस’, लैटिन के ’मिथस’ और जर्मनी के ’मिथोस’ का ऋणी है। वस्तुतः ’मिथक(mithak)’ और जर्मनी के ’मिथोस’ का ऋणी है।

वस्तुतः ’मिथक(mithak)’ परंपरागत या अनुश्रुत कथा है जो किसी अतिमानवीय तथाकथित प्राणी या घटना से संबंध रखती है। विशेषतः इसका संबंध देवताओं, विश्व की उत्पत्ति तथा विश्ववासियों से है, यह एक ऐसा विश्वास है जो बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लिया जाता है।

सामान्यतः मिथ एक मिथ्या कथा है जिसकी सच्चाई की परीक्षा नहीं की जाती है। फ्रेजर, हेरिसन, एम.एम. कार्नेफोर्ड आदि ने मिथक(mithak) के सर्जनात्मक पहलुओं को आगे बढ़ाया है।

फ्रायड और उनके मतानुयायी मिथक(mithak) को स्वप्न का सजातीय मानते हुए उसे इच्छापूर्ति का एक विधान स्वीकारते हैं। जिस प्रकार हमारा अवचेतन मन सदैव अपनी दमित कामनाओं को दिवास्वप्नों के द्वारा पूरा करता है उसी प्रकार आदिमकाल से ही मानव अपनी रागद्वेषजन्य इच्छाओं, वासनाओं तथा मृत्युजन्य संत्रास की भावनाओं को मिथक(mithak) के रूप में प्रतिफलित करता था। ग्राहम हफ के अनुसार – ’मिथक(mithak) की विभिन्न भाषिक अभिव्यक्तियाँ हो सकती हैं।’’

अधिकांश मिथक(mithak) अर्थ – मिथक होते हैं तथा प्राकृतिक व्यवस्था तथा ब्रह्माण्ड की आदिम व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं। शास्त्रीय लेखकों के पास एक बना बनाया मिथक-शास्त्र होता था।

आज लेखकों ने अपना मिथक-शास्त्र स्वयं तैयार किया है ताकि उन्हें अपने विश्वासों का संवाहक बना सके। मिथक को आदिम मनुष्य की चेतना का प्राथमिक सर्जनात्मक बिम्ब कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति के संबंध में भी विवाद है कि भाषा पहले अस्तित्व में आई अथवा मिथक।

मिथक के संदर्भ में विभिन्न विचारकों के मत इस प्रकार हैं

विको – ’’भाषा की उत्पत्ति सांकेतिक अभिव्यक्ति से हुई, मिथक भाषा-विकास की मंजिल है।’’

हरडर – ’’भाषा का आविर्भाव मिथक से हुआ है।’’

मैक्समूलर – ’’मिथक की उत्पत्ति भाषा से हुई एवं ये भाषा के रोग के समान हैं।’’

कैसिरर – ने भाषा और मिथक की उत्पत्ति एक साथा मानी है।

युग – ’’मिथक सामूहिक आद्य बिम्ब होते हैं, अतः इस आधार पर इसे ’डीपस्ट्रक्चर’ कह सकते हैं, जिसकी अभिव्यक्ति मिथक है।’’

दुर्खिम – (फ्रांसीसी समाजशास्त्री) ’’मिथक का संबंध प्रकृति से न होकर समाज से है।’’

मलिनोव्स्की – ’’मिथक न प्रकृति के प्रति चामत्कारिक प्रतिक्रिया है न विगत का आलेख।

उसका प्रयोजन सामाजिक व्यवस्था का संरक्षण और संचालन है।’’

रेनेवेलेक – ’’मिथक शब्द का अर्थ निश्चित कर पाना आसान नहीं है, यह एक अर्थ क्षेत्र का संकेत है।’’

रिचर्ड चेज – ’’काव्य ही मिथक और मिथक ही काव्य है। काव्य और मिथक एक ही मानवीय आवश्यकता से उद्भूत होते हैं।

उनमें एक ही प्रकार की प्रतीकात्मक संरचनाएँ होती हैं।’’ मिथक के प्रति इस पक्षधरता से चेज को कुछ समालोचक ’मिथक का दीवाना’ भी कहते हैं।

⇒ श्रीमती लैंगर – ’परी कथाएँ आदि स्वयं में कला नहीं हैं, वे कला के लिए कच्चा माल हैं। मिथक की प्रकृति ऐसी है

कि उसे विशिष्ट शब्दों या भाषा में बाँधना आवश्यक नहीं हैं, इसका अनुवाद हो सकता है।’’

⇒ डाॅ. रमेश कुंतल ’मेघ’ – ’’मिथक मानवजाति का सामूहिक स्वप्न एवं सामूहिक अनुभव है और स्वप्न एक व्यक्ति की सुप्त आकांक्षा।’’

⇒ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी – ’’मिथक तत्त्व वस्तुतः भाषा का पूरक है। सारी भाषा ही इसके बल पर खङी है,

साहित्य में मिथक अनंत अनुभवों का विश्लेषण है।’’

⇒ डाॅ. नगेन्द्र – ’’साहित्य के अनन्त विस्तार को देखते हुए मिथक की दुनिया बङी छोटी है।

नये कवि वर्तमान के अतीतत्व और अतीत के वर्तमानता में विश्वास करते हैं।

समसामयिक अव्यवस्था के ठोस और गहरे रंग में चरितार्थ करने हेतु कवियों ने पुराकथाओं और

मिथकों का भरपूर इस्तेमाल किया है।’’

वस्तुतः मिथक आदिम मनुष्य का यर्थाथ है, जबकि साहित्य सभ्य मनुष्य का यथार्थवाद है जिसमें उसका अपना उद्देश्य और दृष्टिकोण भी समाहित है। साहित्य मिथक नहीं है परंतु साहित्य में मिथका का साभिप्राय प्रयोग होता है।

साहित्यकार मिथकीय बिम्बों द्वारा आदिम विश्वासों को नया रूप देता है और सम्प्रेषण की समस्या का समाधान करता है। लेखक एक प्रकार का ’मिथमेकर’ है, वह अवचेतन में से एक आद्य सत्य को भाषा देता है।

उदाहरणार्थ, मुक्तिबोध की कविताओं में मिथकीय प्रतीकों, सपनों का अधिकांश प्रयोेग किया गया है। उनकी प्रत्येक कविता भूतप्रेत, ब्रह्मराक्षस, भैसें, पशु-पक्षी, पेङ-पौधों आदि से विन्यस्त नया मिथक रचती है। मुक्तिबोध के मिथक छोटी-छोटी इकाइयों में विभक्त रहते हैं, फिर उनकी टकराहट एक व्यापक यथार्थ की अभिव्यक्ति करती है।

मिथकों में असंभव के स्थान पर संभव का, यथार्थ के स्थान पर अयथार्थ का तथा अविरोधी के स्थान पर विरोधी का चयन, शेक्सपियर का पैटर्न रहा है, जिसमें अस्तित्व का संकट झाँकता रहता है।

रचनाकार अपने युगीन सत्य के उद्घाटन और जटिल मानसिकता के रेखांकन में मिथकों को सहारा लेता है, और रचनाकार के मूल्यांकन के लिए समीक्षक को उसी तत्त्व को हथियार के रूप में इस्तेमाल करना पङता है।

हाँ, यह अवश्य है कि यह प्रवृत्ति बौद्धिक विचार-विश्लेषण प्रधान तथा मनोवैज्ञानिक अधिक है। इसके अतिरिक्त यह अनेक विचारधाराओं से प्रभावित भी है।

’कामायनी’ के मूल्यांकन से ही मिथक पर विचार हिन्दी-साहित्य में किया जाने लगा है, जिसके आधार पर यह कहा गया है कि कामायनी का मनु वेदकालीन मनु न होकर प्रसादकालीन है।

वह उस संक्रमण काल का मनु है जिसमें भारतीय समाज सांस्कृतिक जीवन-मूल्यों से कटकर औद्योगिक तथा संयान्त्रिक होने की दिशा में अग्रसर है। केदारनाथ मिश्र की ’प्रभात की कैकेयी’ रचना में दशरथ और कैकेयी दोनों ही समकालीन षड्यन्त्र-प्रधान राजनीति की विडम्बनाओं के संवाहक है।

दिनकर के ’कुरूक्षेत्र’ का युधिष्ठिर भयानक महायुद्धों के दुष्परिणामों से आतंकित होकर ’इतिहास के अध्याय’ पर रोता है और रसेल की मानवतावादी चेतना का प्रसार करता है।

धर्मवीर भारती का ’अंधायुग’, ’कनुप्रिया’, नरेश मेहता का संशय की एक रात’, नागार्जुन का ’भस्मासुर’, दुष्यंत कुमार का ’एक कंठ विषपायी’ जैसे रचनाएँ मिथक के कलेवर में कई प्रकार की समकालीन समस्याओं की जटिलता का विश्लेषण करती है।

नाटकों में जगदीश चंद्र माथुरा का ’पहला राजा’, सुरेन्द्र वर्मा का ’द्रौपदी’, डाॅ. शंकर शेष का ’अरे मायावी सरोवर’ मिथकीय प्रयोग की नवता के सुंदर उदाहरण हैं। उपन्यासों में आचार्य चतुरसेन शास्त्री का ’वयं रक्षामः’, हजारी प्रसाद द्विवेदी का ’पुनर्नवा’, नरेन्द्र कोहली का ’अवसर’ मिथक प्रयोग की दृष्टि से उल्लेखनीय हैं।

वस्तुतः इन रचनाओं में मिथकीय पात्रों, मिथकीय घटनाओं, मिथकीय मूल्य तथा विचारों को एक नया आयाम मिला है वे समसामयिक परिवेश के कटु यथार्थ बन गए हैं।

इन रचनाओं की मिथक चेतना में संतुलन तथा प्रयोगशीलता का अद्भुत कलात्मक समन्वय है।मिथकीय समीक्षा में मूल प्रतीकात्मक अर्थ या आद्य बिम्ब और उनसे जुङे मिथकों के अर्थ को जानने का प्रयत्न किया जाता हैं, क्योंकि साहित्य में अन्तर्निहित मिथक अनन्त अनुभावों का विश्लेषण हुआ करता है।

मिथकीय आलोचना भाषिक आद्यसत्य को जो अवचेतन में निहित है, खोज निकालती है। वस्तुतः मानव की एक मूलभूत आवश्यकता है वह मिथकों का निर्माण करे।

मिथक मात्र सृजनशील रचनाकार को ही प्रभावित नहीं करता वरन् वह संकल्पनाएँ व शैली-शिल्प भी प्रस्तुत करता है, जिनकी सहायता से मिथकीय आलोचना के लिए किसी साहित्यिक कृति की आलोचना संभव हो पाती है।

⇒ मिथकीय आलोचना साहित्य की स्वायत्तता की पक्षधर है किन्तु आलोचक को सीमित दायरे में नहीं बाँधती, अपितु दूसरे ज्ञान-विज्ञान से भी सम्बद्ध होने को कहती हैं जिससे यथार्थ के प्रति उसकी दृष्टि एवं उस यथार्थ की अनुभूति के तरीके में विस्तार हो सके। मिथक के अनेक अर्थस्तर होते हैं जो रचनाकार के बोध के द्वारा प्रक्षेपित होते हैं।

अप्रस्तुत के प्रस्तुतीकरण के लिए भाषिक स्तर पर भी अनेक रचनाकार मिथकीय शब्दों का प्रयोग करते हैं। ऐसे शब्द बहुत सार्थक होते हैं, क्योंकि वे स्थितियों, समग्र अनुभवों, मनोदशाओं, मूल्यों, जीवन दृष्टियों, वास्तविकताओं, घटनाओं आदि के संक्षिप्त एवं सरलीकृत पर्याय बनकर आते हैं।

 

निष्कर्षत:  मिथकीय व्याकरण से परिचित समीक्षक के लिए साहित्य की भाषा को समझने में अधिक सुनिश्चितता तथा क्षमता आ जाती है। साहित्य में गंभीरता का आधार मिथक ही है। इसमें अन्तर्मुक्त रहस्य जिज्ञासा को सींचता रहता है। वास्तव में लेखन मूलतः एक मिथकीय प्रक्रिया है।

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