pragativadi kavydhara || प्रगतिवाद काव्यधारा विशेषताएँ || हिंदी साहित्य

आज की पोस्ट में हिंदी साहित्य के आधुनिक काल के अंतर्गत प्रगतिवाद की विशेषताएँ(pragativadi kavydhara) पढेंगे जिससे हम इस युग के बारे में अच्छे से जान पाएंगे |

जैसा कि आपको विदित होगा कि प्रगतिवाद समयकाल  (1936-43 ई.) रहा है

pragativadi kavydhara

 

(क) संवेदना(pragativadi kavydhara)

(1) मार्क्सवाद में विश्वास:

प्रगतिवादी चिन्तन मार्क्सवादी है। प्रगतिवादी कवि साम्यवाद के आदर्श में पूरा विश्वास रखते हैं। मार्क्स के अनुसार पूँजीवादी व्यवस्था हिंसक क्रांति के साथ समाप्त होगी जिसके परिणामस्वरूप पहले समाजवादी तथा अंततः साम्यवादी व्यवस्था आएगी जिसमें कोई शोषक और शोषित नहीं होगा। ये कवि सोवियत संघ में क्रांति का परचम फैलाने वाले मजदूर सेना को आदर के भाव से देखते हैं –

’’लाल क्रान्ति की लङने वाली, मजदूर सेना आम,
उनको, उनके स्त्री पुरुषों को, मेरा लाल सलाम।’’
(मुक्तिबोध)

ध्यान देवें : छायावाद के कवियों ने कल्पनाशीलता को अधिक महत्त्व दिया ,जबकि प्रगतिवादी कवियों ने यथार्थ(वास्तविकता) को अधिक महत्त्व दिया |

(2 ) समाजवादी यथार्थवाद:

प्रगतिवादी कवि यथार्थवाद में विश्वास रखते हैं, ’आदर्शवाद’ या ’अध्यात्मवाद’ में नहीं। इनका यथार्थवाद ’समाजवादी’ मान्यताओं पर आधारित है जिसके अनुसार मानव के यथार्थ को निर्धारित करने वाली सबसे ताकतवर शक्ति अर्थव्यवस्था या उत्पादन प्रणाली है। मार्क्स ने कहा भी है कि सारा चिंतन, सारी संस्कृति पेट भरने के बाद ही अस्तित्व में आती है। यही भाव इन कवियों का भी है –

’’दाने आए घर के अंदर, कई दिनों के बाद,
चमक उठी घर भर की आँखें, कई दिनों के बाद।’’
(नागार्जुन)

(3 ) पूँजीवादी व्यवस्था से घृणा:

प्रगतिवादी साहित्य के आक्रोश का केन्द्र पूँजीवादी व्यवस्था एवं पूँजीपति वर्ग है। मार्क्स के अनुसार पूँजीपतियों द्वारा स्थापित उद्योगों में उत्पादन का कार्य मजदूर करते हैं किन्तु उससे पैदा होने वाले धन को पूँजीपति हङप कर जाते हैं। इस अधिशेष मूल्य को हस्तगत करके वे मजदूर का शोषण करते हैं। इसलिए प्रगतिवादी कवि पूंजीवाद के प्रति विरोध का भाव रखते हैं।

’’तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ,
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।’’ (मुक्तिबोध)

(4) शोषितों के प्रति सहानुभूति और आस्था:

प्रगतिवादी कविता में शोषण व अन्याय की चक्की में पिसते हुए मजदूर एवं किसान वर्गों के प्रति करुणा व आस्था का भाव है। कवियों को गहरा विश्वास है कि मजदूर व किसान वर्ग के वंचित लोग ही अंततः समाज की नियति बदलने की शक्ति रखते हैं –

’’मैंने उसको जब जब देखा, लोहा देखा,
लोहा जैसे तपते देखा, गलते देख, ढलते देखा,
मैंने उसको गोली जैसे चलते देखा।’ (केदारनाथ अग्रवाल)

(5) सामाजिक व्यवस्था का परिवर्तन:

प्रगतिवादी कवि सामाजिक संरचना में क्रांतिकारी परिवर्तन चाहता है। यह परिवर्तन हृदय-परिवर्तन जैसी कल्पनाओं से नहीं, वरन् वर्ग-संघर्ष के माध्यम से होगा। यह परिवर्तन आमूलचूल होगा, ’व्यवस्था में’ नहीं, ’व्यवस्था का’ होगा –

’’सदियों की ठंडी बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है।
दो राह, समय के रथ का घर्घर नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।’’ (दिनकर)

प्रगतिवादियों की स्पष्ट धारणा है कि वर्ग-संघर्ष में बीच का कोई रास्ता नहीं होता। जो शोषित वर्ग के पक्ष में नहीं है, वह शोषक के पक्ष में है। ’तटस्थता’ की चादर ओढ़ने वाले भी अंततः इतिहास में अपराधी ही माने जाएंगे –

’’समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध,
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।’’

(6) राष्ट्रीय चेतना:

प्रगतिवादी कवि भी राष्ट्रीयता की चेतना से युक्त हैं पर उनके लिए ’राष्ट्रीयता’ का अर्थ छायावादी कवियों से भिन्न है। ये कवि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के समर्थक नहीं है, न ही इन्हें राष्ट्र के गौरवमयी अतीत या महान दर्शन के प्रति भावुक होना पसंद है। ये तो राष्ट्र का महत्त्व राष्ट्र के वंचित नागरिकों के आधार पर तय करते हैं –

’’जहाँ न भरता पेट, देश वह कैसा भी हो, महानरक है।’’
(नागार्जुन)
’’कागज की आजादी मिलती, ले लो दो-दो आने में।’’
(नागार्जुन)

(7) राजनीतिक चेतना:

प्रगतिवादी कवि कई अन्य कवियों की तरह राजनीति से दूर नहीं भागते बल्कि राजनीति को यथार्थ की पहचान का प्रतीक और यथार्थ बदलने की सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में देखते हैं। ये ’उदारवादी लोकतंत्र’ किस प्रकार शोषक वर्ग के हितों की ही सुरक्षा व अभिवृद्धि करता है –

’’खादी ने मलमल से चुपचुप साँठगाँठ कर डाली है,
बिङला-टाटा-डालमिया की तीसों दिन दीवाली है।’’
(नागार्जुन)

(8) ग्राम्य प्रकृति:

प्रगतिवादी कवि प्रकृति को सैलानी की नहीं, किसान की आँखों से देखते हैं क्योंकि ये कवि ’जन’ के प्रतिनिधि है, अभिजात वर्ग के नहीं। इनके यहाँ ’गुलाब’ के सौंदर्य का स्थान बने के सौंदर्य ने लिया है क्योंकि वह जनसामान्य के जीवन से जुङा है –

’’एक बीते के बराबर
यह हरा ठिगना चना
बाँधे मुरेठा शीश पर
छोटे गुलाबी फूल का
सजकर खङा हो।’’

प्रगतिवादियों का प्रकृति-चित्रण वर्ग संघर्ष की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति भी है। छायावाद में जो प्रकृति कवि को अपनी गोद में आश्रय देती थी। वह प्रगतिवाद में आकर क्रान्ति का संकेत देने लगी हैं –

’’तेज धार का कर्मठ पानी, चट्टानों के ऊपर चढ़ कर,
मार रहा है घूँसे कस कर, तोङ रहा है तट चट्टानी।’’

(9) प्रेम वर्णनः

प्रेम साहित्य के प्रत्येक युग का एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। प्रगतिवाद भी इससे अछूता नहीं है। यहाँ प्रेम साहचर्य एवं सहजीवन से उत्पन्न होता है। प्रेम के लिए इन कवियों को प्रकृति की गोद में जाने की आवश्यकता महसूस नहीं होती, वह तो श्रम करते समय भी महसूस किया जा सकता है। प्रेम साधारण जीवन का सहज अंग है, यह किसी विशेष परिस्थिति की मांग नहीं करता। प्रेम समाज से काटता भी नहीं है बल्कि यह तो व्यक्ति के सामाजिक होने की भावभूति है –

’’मिलकर वे दोनों प्राणी, दे रहे खते में पानी।’’ (त्रिलोचन)
’’मुझे जगत जीवन का प्रेमी, बना रहा है प्रेम तुम्हारा’’ (त्रिलोचन)

(ख) शिल्प(pragativadi kavydhara)

प्रगतिवादी आन्दोलन मूलतः कथ्य का आंदोलन था, शिल्प का नहीं। उसके अनुसार शिल्प कथ्य का उपोत्पाद होता है। प्रगतिवादी कविता सर्वहारा व श्रमिक की पक्षधर होने के नाते इस दायित्व-बोध से युक्त है कि कविता शिल्प की चमक-दमक से लदी हुई नहीं बल्कि आम आदमी के लिए बोधगम्य होनी चाहिए। इन्हें कविता में उसी जन-प्रभाव की तलाश है जो पोस्टरों में दिखाई देती है।

मुक्तिबोध ने कहा भी है कि –

’चंद्र है, सविता है/पोस्टर ही कविता है।’’

(1 ) काव्यरूप:

प्रगतिवादी काव्य में प्रबन्धात्मकता का अभाव है क्योंकि यह कविता संघर्ष की कविता है। ऐसी कविता में प्रबंध के अनुशासन की उपस्थिति संभव नहीं है।

(2 ) भाषा:

प्रगतिवादी कवि सहज भाषा का प्रयोग करते हैं जो जनसाधारण के जीवन की भाषा है। छायावाद ने जीवन की भाषा और काव्य की भाषा में जो अंतराल पैदा कर दिया था, उसे प्रगतिवाद ने समाप्त किया। मुक्तिबोध जैसे एकाध कवि को छोङ दें तो सभी प्रगतिवादी कवि जनभाषा का ही सहज प्रयोग करते हैं।

(3) लोकधुन:

इस काव्य में लोक धुनों पर विशेष बल दिया गया है। प्रगतिवादी कविता जिस संघर्ष-चेतना का प्रसार करना चाहती है, उसकी सहज अभिव्यक्ति लोक-धुनों में ही संभव है। कहीं-कहीं इसमें लय व तुक के नियमों से मुक्ति भी दिखाई पङती है।

(4) बिम्ब:

बिम्ब प्रायः सामान्य जीवन से लिए गए है। छायावादी बिम्बों से भिन्न ये बिम्ब लोक जीवन के साधारण अनुभवों से सम्बन्धित है, जैसे ’गीत गाकर घर लौटते मजदूर’, ’पसीने में भीगा किसान’ आदि। एक उदाहरण दृष्टव्य है-

’’धूप चमकती है चाँदी की साङी पहने,
मायके में आई बेटी की तरह मगन है।’’

(5) प्रतीक:

प्रगतिवादी कवि बात को साफ-साफ कहने के पक्षधर है। इन्हें सामान्यतः प्रतीकों का मोह नहीं है क्योंकि प्रतीक बात को छिपाते हैं। कहीं-कहीं कुछ प्रतीकों के प्रयोग से इन्होंने वर्ग संघर्ष की चेतना को व्यक्त किया है, जैसे-

’’तेज धार का कर्मठ पानी, चट्टानों के ऊपर चढ़कर,
मार रहा है घूँसे कसकर, तोङ रहा है तट चट्टानी।’’

ये पंक्तियाँ वर्ग-संघर्ष को व्यक्त करती हैं। पानी वंचित वर्ग को व्यक्त करती है। पानी वंचित वर्ग को व्यक्त करता है जबकि चट्टान शोषक वर्ग की मजबूत स्थिति को व्यक्त करती है।

(6) व्यंग्य :

प्रगतिवादी कवियों में व्यंग्य क्षमता की अत्यंत प्रभावशील उपस्थिति है। समाज के मूल हितों के प्रति गहराई से प्रतिबद्ध होने के कारण ये कवि स्वार्थी व व्यक्तिवादी तत्त्वों को सहन नहीं कर पाते और तिलमिलाहट पैदा करने वाले तीखे व्यंग्यों का प्रयोग करते हैं। उदाहरण के लिए –

’’दस हजार दस लाख मरें,
पर झंडा ऊँचा रहे हमारा।’’

दोस्तो आज के आर्टिकल में हमने प्रगतिवाद काव्यधारा विशेषताओं (Pragativadi Kavydhara) के बारे में अच्छे से पढ़ा ,हम आशा करतें है कि आपको ये विषयवस्तु अच्छे से समझ में आ गई होगी ।

pragativadi kavydhara

2 thoughts on “pragativadi kavydhara || प्रगतिवाद काव्यधारा विशेषताएँ || हिंदी साहित्य”

  1. Pooja singh saini

    बहुत ही शानदार सार संग्रह। अच्छी तरह से समझ आ जाता है एक बार पढ़ते ही। साधुवाद। तेह दिल से धन्यवाद नतमस्तक।

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