दोस्तों  आज हम  हिंदी कवियों / लेखकों  की प्रसिद्ध पंक्तियां  व कथनों के बारे में  आपको महत्वपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं  जो आपके लिए किसी भी परीक्षा में  बहुउपयोगी साबित होगी

हिंदी कवियों/ लेखकों की महत्वपूर्ण पंक्तियाँ व कथन

⇒ मैंने मैं शैली अपनाई
देखा एक दुःखी निज भाई। –निराला

⇒ व्यर्थ हो गया जीवन
मैं रण में गया हार। (‘वनवेला’) –निराला

⇒ धन्ये, मैं पिता निरर्थक था
कुछ भी तेरे हित न कर सका।
जाना तो अर्थागमोपाय
पर रहा सदा संकुचित काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ समर। (‘सरोज स्मृति’) –निराला

⇒ छोटे से घर की लघु सीमा में
बंधे है क्षुद्र भाव,
यह सच है प्रिय
प्रेम का पयोनिधि तो उमड़ता है
सदा ही निःसीम भू पर। (‘पंचवटी प्रसंग’) -निराला

⇒ ताल-ताल से रे सदियों के जकड़े हृदय कपाट
खोल दे कर-कर कठिन प्रहार
आए अभ्यन्तर संयत चरणों से नव्य विराट
करे दर्शन पाये आभार। –निराला

⇒ हाँ सखि ! आओ बाँह खोलकर हम
लगकर गले जुड़ा ले प्राण
फिर तुम तम में, मैं प्रियतम में
हो जावें द्रुत अंतर्धान। –पंत

⇒बीती विभावरी जाग री !
अम्बर-पनघट में डूबो रही
तारा-घट-ऊषा-नागरी। –प्रसाद

⇒ दिवसावसान का समय
मेघमय आसमान से उतर रही है
वह संध्या सुंदरी परी-सी
धीरे-धीरे-धीरे। (‘संध्या सुंदरी’) –निराला

⇒ छोड़ द्रुमों की मृदु छाया
तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल-जाल में
कैसे उलझा दूँ लोचन ? –पंत

⇒ नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।
(‘कामायनी’) –प्रसाद

⇒ मैं नीर भरी दुःख की बदली –महादेवी

⇒ तुमको पीड़ा में ढूँढा
तुमको ढूँढेगी पीड़ा –महादेवी

⇒ नील परिधान बीच सुकुमार
खुल रहा मृदुल अधखुला अंग
खिला हो ज्यों बिजली का फूल
मेघ बीच गुलाबी रंग। (‘कामायनी’) –प्रसाद

⇒ तोड़ दो यह झितिज, मैं भी देख लूं उस ओर क्या है ?
जा रहे जिस पंथ से युग कल्प, उसका छोर क्या है ? –महादेवी

⇒ स्तब्ध ज्योत्सना में जब संसार
चकित रहता शिशु सा नादान,
विश्व के पलकों पर सुकुमार
विचरते है स्वप्न अजान !
न जाने, नक्षत्रों से कौन ?
निमंत्रण देता मुझको मौन !! (‘मौन निमंत्रण’) –पंत

⇒ ले चल वहाँ भुलावा देकर
मेरे नाविक ! धीरे-धीरे।
जिस निर्जन में सागर लहरी
अम्बर के कानों में गहरी
निश्छल प्रेम कथा कहती हो
तज कोलाहल की अवनी रे। (‘लहर’) –प्रसाद

⇒ हिमालय के आंगन में जिसे प्रथम किरणों का दे उपहार –प्रसाद

⇒ राजनीति का प्रश्न नहीं रे आज
जगत के सम्मुख एक वृहत सांस्कृतिक समस्या जग के निकट उपस्थित –पंत

⇒ छोड़ो मत ये सुख का कण है। -प्रसाद

⇒ आह ! वेदना मिली विदाई। (‘स्कंदगुप्त’) –प्रसाद

⇒ जिए तो सदा उसी के लिए यही अभिमान रहे यह हर्ष निछावर कर दे हम सर्वस्व हमारा प्यारा भारतवर्ष। (‘स्कंदगुप्त’) –प्रसाद

⇒ अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान झितिज को मिलता एक सहारा।
(‘चन्द्रगुप्त’) –प्रसाद

⇒ हिमाद्रि तुंग श्रृंग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयंप्रभा समुज्जवला
स्वतंत्रता पुकारती
अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़ प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है-बढ़े चलो, बढ़े चलो। (‘चन्द्रगुप्त’) –प्रसाद

⇒ भारत माता ग्रामवासिनी। –पंत

⇒ भारति जय विजय करे। –निराला

⇒ शेरो की माँद में
आया है आज स्यार
जागो फिर एक बार। –निराला

⇒ वह आता
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता। –निराला

⇒ वह तोड़ती पत्थर।
देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर। –निराला

⇒ वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान।
उमड़ कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अनजान।। –पंत

⇒ विजय-वन-वल्लरी पर
सोती थी सुहाग भरी
स्नेह-स्वप्न-मग्न-अमल-कोमल तन तरुणी
जूही की कली
दृग बंद किए, शिथिल पत्रांक में। (‘जूही की कली’) –निराला

⇒ खुल गये छंद के बंध
प्रास के रजत पाश। –पंत

⇒ मुक्त छंद
सहज प्रकाशन वह मन का
निज भावों का प्रकट अकृत्रिम चित्र। –निराला

⇒ तुमुल कोलाहल में
मैं हृदय की बात रे मन। (‘कामायनी’) –प्रसाद

⇒ प्रथम रश्मि का आना रंगिणि ! तूने कैसे पहचाना ? –पंत

⇒ जो घनीभूत पीड़ा थी
मस्तक में स्मृति-सी छाई,
दुर्दिन में आँसू बनकर
वह आज बरसने आई। (‘आँसू’) –प्रसाद

⇒ बाँधों न नाव इस ठाँव, बंधु !
पूछेगा सारा गाँव, बंधु ! –निराला

⇒ हाय ! मृत्यु का ऐसा अमर अपार्थिव पूजन।
जब विषण्ण निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन।
(ताज -‘युगांत’) –पंत

⇒ ‘प्रसाद पढ़ाने योग्य हैं, निराला पढ़े जाने योग्य है और पंतजी से काव्यभाषा सीखने योग्य है’ । –अज्ञेय

⇒ छायावादी कविता का गौरव अक्षय है उसकी समृद्धि की समता केवल भक्ति काव्य ही कर सकता है। –डॉ० नगेन्द्र

⇒ ‘निराला से बढ़कर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है’। –हजारी प्रसाद द्विवेदी

⇒ ‘मैं मजदूर हूँ, मजदूरी किए बिना मुझे भोजन करने का अधिकार नहीं’। –प्रेमचंद्र

⇒ ‘यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है तो मुक्तक चुना हुआ गुलदस्ता’। –रामचन्द्र शुक्ल

⇒ अधिकार सुख कितना मादक और सारहीन है (स्कंदगुप्त’) –प्रसाद

⇒ स्नेह निर्झर बह गया है –निराला

⇒ औ वरुणा की शांत कछार –प्रसाद

⇒ सजनि मधुर निजत्व दे कैसे मिलू अभिमानिनी मैं –महादेवी वर्मा

⇒ प्रिय के हाथ लगाए जागी, ऐसी मैं सो गई अभागी –निराला

⇒ अधरों में राग अमंद पिये, अलकों में मलयज बंद किये तू अब तक सोई है आली, आँखों में भरे विहाग री –प्रसाद

⇒ कहो तुम रूपसि कौन, व्योम से उत्तर रही चुपचाप –पंत

⇒ शैया सैकत पर दुग्ध धवल तन्वंगी गंगा ग्रीष्म विकल –पंत

⇒ ‘साहित्य, राजनीति के पीछे चलनेवाली सच्चाई नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलनेवाली सच्चाई है’।

प्रेमचंद (प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष पद से बोलते हुए, 1936) 

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