अंतिम संशोधित (Last Updated): August 30, 2026
हिंदी निबंध और निबंधकारों के महत्वपूर्ण तथ्य, मत एवं रचनाएँ (Important Facts & Quotes on Hindi Nibandh)
Table of Contents
हिंदी गद्य साहित्य और व्याकरण में निबंध विधा का इतिहास अत्यंत समृद्ध है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, और कॉलेज लेक्चरर परीक्षा) की दृष्टि से निबंधकारों के आपसी मत, उनके उपनाम, प्रसिद्ध पंक्तियाँ और महत्वपूर्ण कृतियाँ बार-없이 पूछी जाती हैं। इस आलेख में हम हिंदी निबंध से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों और आलोचकों के मतों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
📌 1. निबंध एवं निबंधकारों के विषय में विविध मत (Critical Quotes)
“हिंदी का स्टील” — बालकृष्ण भट्ट (कथनकर्ता: रामचंद्र शुक्ल)
“हिंदी निबंध का एडीसन” — प्रतापनारायण मिश्र (कथनकर्ता: रामचंद्र शुक्ल)
“प्रेमघन गद्य-रचना को एक कला के रूप में ग्रहण करने वाले तथा कलम की कारीगरी समझने वाले लेखक थे।” — रामचंद्र शुक्ल
“कविता में उनका (भारतेन्दु) संस्कार है, गद्य में विचार।” — रामस्वरूप चतुर्वेदी
“महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध बातों का संग्रह हैं।” — रामचंद्र शुक्ल
“अच्छी हिंदी बस एक व्यक्ति लिखता है— बालमुकुन्द गुप्त।” — महावीर प्रसाद द्विवेदी
“गोविन्द नारायण मिश्र का गद्य-विधान ‘सायास अनुप्रास में गुँथे शब्द-गुच्छों का अटाला’ है।” — रामचंद्र शुक्ल
“निबंध व्यक्ति की स्वाधीनता की उपज है।” — हजारी प्रसाद द्विवेदी
“बेचन शर्मा ‘उग्र’ के ललित निबंध, निबंध न होकर जोशीले भाषण हैं।” — गोपाल राय
“हिंदी के प्रारंभिक निबंध गद्य-प्रबंध हैं।” — रामचंद्र शुक्ल
“पं. गोविन्द नारायण मिश्र के भाषण तथा ‘कवि और चित्रकार’ नामक लेख से इनकी लेखन-शैली का पता लगता है। गद्य के संबंध में इनकी धारणा प्राचीनों के गद्यकाव्य-सी थी। लिखते समय बाण और दण्डी इनके ध्यान में रहा करते थे।”
“ललित निबंध वस्तुतः आत्मनिबंध हैं।” — रमेशचंद्र शाह
📖 2. हिंदी निबंधों के विकास से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
प्रथम निबंध: हिंदी के प्रथम निबंध के रूप में ‘राजा भोज का सपना’ (1839 ई.) का उल्लेख मिलता है।
प्रथम निबंधकार: सदासुखलाल के ‘सुरासुरनिर्णय’ के आधार पर इन्हें हिंदी का प्रथम निबंधकार माना जाता है।
शुक्ल जी का मत: रामचंद्र शुक्ल ने बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र को क्रमशः हिंदी का ‘स्टील’ और ‘एडीसन’ कहा है।
बालकृष्ण भट्ट: ये भारतेंदु-युग के सर्वाधिक समर्थ निबंधकार थे, जिन्होंने सामयिक समस्याओं, मनोभावों तथा साहित्य-संबंधी विषयों पर निबंध लिखे। हिंदी में मनोविकार संबंधी निबंध का सूत्रपात बालकृष्ण भट्ट से ही माना जाता है।
प्रतापनारायण मिश्र: ‘ब्राह्मण’ पत्र के संपादक प्रतापनारायण मिश्र के निबंध परिमाण की दृष्टि से बालकृष्ण भट्ट से कम हैं, किंतु विषय-चयन एवं रचनात्मकता की दृष्टि से अधिक श्रेष्ठ हैं। ‘प्रतापनारायण-ग्रंथावली’ में इनके कुल 191 निबंध संकलित हैं। उनके निबंधों में हास्य, व्यंग्य, चुहलबाजी, चुटकी, आक्षेप और फक्कड़पन का अद्भुत पुट विद्यमान है।
बद्रीप्रसाद चौधरी ‘प्रेमघन’: ‘आनंद कादंबिनी’ और ‘नागरी नीरद’ के संपादक प्रेमघन अपनी आलंकारिक एवं कलात्मक गद्यशैली के लिए विख्यात हैं। इनके सामाजिक निबंध ‘आनंद कादम्बिनी’ में प्रकाशित हुए थे।
बालमुकुन्द गुप्त: यह भारतेंदु और द्विवेदी युग के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इनके पत्रात्मक-शैली के निबंधों में व्यंग्य की प्रखर मार मिलती है। ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ ‘भारतमित्र’ में 1904-05 ई. में प्रकाशित हुए थे, जो लॉर्ड कर्जन के शासन को आधार बनाकर लिखे गए थे।
चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’: इन्होंने इतिहास, संस्कृति, पुरातत्त्व और भाषा आदि विषयों पर गंभीर एवं गवेषणात्मक निबंध लिखे हैं।
शिवपूजन सहाय: इन्हें ‘भाषा का जादूगर’ कहा जाता है। इनका ‘कुछ’ नामक निबंध-संग्रह हिंदी साहित्य जगत में अत्यंत प्रसिद्ध है।
द्विवेदीयुगीन भौगोलिक निबंधकार: महावीर प्रसाद द्विवेदी (नेपाल), संतराम (चारकंद), और गोपालराम गहमरी (चीन देश का विवरण) इस शैली के उल्लेखनीय हस्ताक्षर हैं।
ऐतिहासिक विवाद: बालमुकुन्द गुप्त ने महावीर प्रसाद द्विवेदी के निबंध ‘भाषा और व्याकरण’ में ‘अनस्थिरता’ शब्द के प्रयोग को लेकर उनकी हँसी-ठिठोली ‘आत्माराम की टें टें’ नाम से की थी। इसके उत्तर में द्विवेदी जी ने ‘सरगौ नरक ठेकाना नाहिं’ शीर्षक निबंध ‘कल्लू अल्हइत’ उपनाम से लिखा था।
🎭 3. निबंधों से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण तथ्य व मत
नारायण चतुर्वेदी ने विनोद शर्मा के छद्म नाम से निबंध लिखे थे।
अज्ञेय ने ‘कुट्ठीचातन’ उपनाम से ‘सबरंग और कुछ राग’ शीर्षक निबंध-संग्रह लिखा था।
विद्यानिवास मिश्र ‘भ्रमरानंद’ उपनाम से ‘सरस्वती’ के संपादक नारायण चतुर्वेदी को पत्र लिखा करते थे, जिनमें चीनी आक्रमण, अंग्रेजी भाषा के प्रभुत्व एवं सामयिक समस्याओं पर चर्चा होती थी।
वियोगी हरि का वास्तविक नाम हरिप्रसाद द्विवेदी है, जिनके निबंध भाव-प्रधान हैं और उन्होंने गद्य-गीत अधिक लिखे हैं।
भारतेंदु-युग के चर्चित व्यंग्यात्मक/रूपक निबंध:
कालिदास की सभा (बालकृष्ण भट्ट)
स्वर्ग की विचार सभा (भारतेंदु हरिश्चंद्र)
यमलोक की यात्रा (स्वप्न-शैली में राधाचरण गोस्वामी द्वारा रचित)
भारतखंड की समृद्धि (लाला श्रीनिवास दास)
गोविन्द नारायण मिश्र: इनकी कृति ‘विभक्ति-विचार’ में हिंदी की विभक्तियों को शुद्ध बताकर उनके प्रयोग की विधि पर प्रकाश डाला गया है। इनके लेख ‘सारसुधानिधि’ में छपते थे। प्राकृत विचार और कवि और चित्रकार इनकी अन्य रचनाएँ हैं।
धर्मवीर भारती: ‘ठेले पर हिमालय’ इनकी बहुप्रशंसित कृति है, जिसमें गद्य की अनेक विधाओं (यात्रा वृत्तांत, संस्मरण, व्यंग्य रूपक, शब्दचित्र और श्रद्धांजलि) की रचनाएँ संगृहीत हैं।
महादेवी वर्मा: इनकी रचना ‘शृंखला की कड़ियाँ’ में स्त्री-विमर्श तथा ‘क्षणदा’ में यात्रा-वृत्तांत के अतिरिक्त विविध वैचारिक पक्ष मिलते हैं।
रामधारी सिंह दिनकर: ‘संस्कृति के चार अध्याय’ (1959 ई.) इनकी प्रसिद्ध वैचारिक कृति है, जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
कुबेरनाथ राय: इनका ‘कजरीवन में राजहंस’ एक मशहूर निबंधात्मक कृति है, जो रिपोर्ताज-शैली में रचित है।
विद्यानिवास मिश्र: अज्ञेय की जीवनी पर आधारित इनका ‘भाई’ शीर्षक संस्मरणात्मक निबंध खूब चर्चित रहा है। इनका प्रथम निबंध-संग्रह ‘छितवन की छांह’ है।
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