रीतिबद्ध काव्य धारा सम्पूर्ण – कवि, रचनाएँ और नोट्स | Reetibaddha Kavya Dhara

अंतिम संशोधित (Last Updated): August 30, 2026

रीतिकाल के अंतर्गत ‘रीतिबद्ध काव्यधारा’ का हिंदी साहित्य में अत्यंत गौरवशाली और व्यापक स्थान है। इस धारा के कवियों ने लक्षण ग्रंथों की रचना करते हुए काव्यशास्त्र के विभिन्न अंगों—जैसे रस, अलंकार, छंद, नायक-भेद और शब्दशक्ति आदि—का सांगोपांग विवेचन किया है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से रीतिबद्ध कवियों, उनकी रचनाओं, आलोचकों के मतों और महत्वपूर्ण तथ्यों का यह संपूर्ण संकलन प्रस्तुत है:

रीतिबद्ध काव्य धारा सम्पूर्ण – हिंदी साहित्य

1. महाकवि भूषण

  • जीवनकाल: (1613-1705 ई.)। भूषण रीतिकाल के तीन प्रमुख स्तंभों (बिहारी, केशव और भूषण) में से एक हैं।

  • विशेषता: रीतिकाल में जब अधिकांश कवि शृंगार रस में रचना कर रहे थे, तब भूषण ने वीर रस में प्रमुखता से रचना करके अपने आपको सबसे अलग साबित किया।

  • उपाधि का संदर्भ: ‘शिवराज भूषण’ ग्रंथ के निम्न दोहे के अनुसार ‘भूषण’ उनकी वह उपाधि है जो उन्हें चित्रकूट के राजा हृदयराम के पुत्र रुद्रशाह ने प्रदान की थी:

    कुल सुलंकि चित्रकूट-पति साहस सील-समुद्र।

    कवि भूषण पदवी दई, हृदय राम सुत रुद्र॥

  • पारिवारिक पृष्ठभूमि: कहा जाता है कि भूषण कवि मतिराम और चिंतामणि के भाई थे। एक दिन अपनी भाभी के ताने से क्षुब्ध होकर उन्होंने घर छोड़ दिया और कई आश्रमों में गए। अंततः शिवाजी के आश्रय में पहुँचे और जीवन के अंत तक वहीं रहे।

  • आश्रयदाता: पन्ना नरेश छत्रसाल से भी भूषण का गहरा संबंध रहा। वास्तव में भूषण केवल शिवाजी और छत्रसाल—इन दो राजाओं के ही सच्चे प्रशंसक और प्रशस्ति-गायक थे।

भूषण के तीन प्रसिद्ध काव्य ग्रंथ:

  1. शिवराज भूषण: रीति कालीन प्रवृत्ति के अनुसार इसमें अलंकारों का सांगोपांग विवेचन किया गया है। इसमें कुल 384 छंद हैं, जिनमें दोहों में अलंकारों की परिभाषा दी गई है तथा कवित्त एवं सवैया छंदों में उदाहरण दिए गए हैं, जिनमें शिवाजी के कार्य-कलापों का ऐतिहासिक वर्णन मिलता है।

  2. शिवा बावनी: इसमें 52 छंदों में शिवाजी की कीर्ति और वीरता का ओजस्वी वर्णन किया गया है।

  3. छत्रसाल दशक: इसमें महाराज छत्रसाल के वीरतापूर्ण कार्यों का सजीव वर्णन है।

अन्य ग्रंथ व तथ्य:

  • ‘भूषणहजारा’, ‘भूषणउल्लास’, और ‘दूषणउल्लास’ भी भूषण की ही रचनाएँ मानी जाती हैं, किंतु अभी तक वे अप्राप्य हैं।

  • रीतिकाल में निरीह हिंदू जनता मुगलों के अत्याचारों से पीड़ित थी। भूषण ने इस अत्याचार के विरुद्ध मुखर होकर आवाज़ उठाई तथा निराश हिंदू जन-समुदाय को आशा का संबल प्रदान कर उसे संघर्ष के लिए उत्साहित किया।

  • भूषण ने अपने संपूर्ण काव्य की रचना ब्रजभाषा में की। वे हिंदी के सर्वप्रथम ऐसे कवि हैं जिन्होंने ब्रजभाषा को वीर रस की कविता के लिए सफलतापूर्वक अपनाया।

  • वीर रस के वर्णन में भूषण हिंदी साहित्य में अद्वितीय कवि हैं। उनके काव्य में वीर रस के साथ-साथ रौद्र, भयानक और वीभत्स आदि रसों को भी स्थान मिला है। भूषण ने शृंगार रस की भी कुछ कविताएँ लिखी हैं, किंतु उनके शृंगार रस के वर्णन पर भी उनकी वीर रस की स्वाभाविक रुचि का स्पष्ट प्रभाव दिखाई पड़ता है।

  • रीतिकालीन कवियों में वे पहले कवि थे जिन्होंने हास-विलास की विलासी प्रवृत्ति की अपेक्षा राष्ट्रीय-भावना को प्रमुखता प्रदान की।

  • डॉ. नगेंद्र के मतानुसार: ऐसा प्रसिद्ध है कि इन्हें अपनी कविता के एक-एक छंद पर शिवाजी से लाखों रुपए पुरस्कार में मिले थे। रीतिकार के रूप में भूषण को अधिक सफलता नहीं मिली है, पर शुद्ध कवित्व की दृष्टि से इनका हिंदी साहित्य में प्रमुख स्थान है।

  • भूषण की रचनाएँ मुख्य रूप से मुक्तक-पद्धति में लिखी गई हैं।

भूषण की प्रसिद्ध पंक्तियाँ:

  • राखी हिन्दुवानी हिन्दुवान को तिलक राख्यौ…

  • गरुड़ को दावा जैसे नाग के समूह पर…

  • तेरे हीं भुजान पर भूतल को भार…

2. महाकवि पद्माकर

  • मूलतः हिंदीभाषी न होने पर भी पद्माकर जैसे आंध्र के अनगिनत तैलंग-ब्राह्मणों ने हिंदी और संस्कृत साहित्य की श्रीवृद्धि में जितना योगदान दिया है, वैसा अकादमिक उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है।

  • इनके पिता के साथ-साथ इनके कुल के अन्य लोग भी बहुत समादृत कवि थे, अतः इनके कुल/वंश का नाम ही ‘कवीश्वर’ पड़ गया था।

  • जयपुर नरेश महाराज जगत सिंह को पद्माकर ने अपना परिचय कुछ इस तरह दिया था:

    “भट्ट तिलंगाने को, बुंदेलखंड-वासी कवि, सुजस-प्रकासी ‘पद्माकर’ सुनामा हो”

  • सुधाकर पांडेय ने इनके विषय में लिखा है— “पद्माकर ऐसे सरस्वतीपुत्र थे जिन पर लक्ष्मी की कृपा सदा से रही। अतुल संपत्ति उन्होंने अर्जित की और संग-साथ सदा ऐसे लोगों का रहा जो दरबारी-संस्कृति में डूबे हुए थे… कहा जाता है जब वे चलते थे तो राजाओं की तरह (उनका) जुलूस चलता था और उसमें गणिकाएँ तक रहती थीं।”

  • जयपुर नरेश सवाई प्रताप सिंह ने इन्हें एक हाथी, स्वर्ण-पदक, जागीर तथा ‘कवि-शिरोमणि’ की उपाधि से सम्मानित किया था। बाद में जयपुर के राजा जगत सिंह ने भी इन्हें दरबार में धन-संपदा, आदर और कुछ गाँवों की जागीर प्रदान की।

  • कहते हैं कि पद्माकर अपनी उत्तरावस्था में आश्चर्यजनक रूप से इतने धनाढ्य व्यक्ति हो गए थे कि जरूरत पड़ने पर कई राजाओं व राजघरानों तक की ‘आर्थिक सहायता’ स्वयं दरबारी कहे जाने वाले इस महाकवि ने की थी।

  • इनके वंशज गुरु कमलाकर ‘कमल’ और भालचंद्र राव इस दृष्टि से पद्माकर को मुगल-युग के भामा शाह जैसा मानते हैं।

पद्माकर की प्रमुख रचनाएँ:

  • हिम्मतबहादुर-विरूदावली: अजयगढ़ के गुसाईं अनूप गिरी (हिम्मत बहादुर) की काव्यात्मक प्रशंसा में रचित।

  • प्रतापसिंह-विरूदावली: जयपुर नरेश प्रतापसिंह के सम्मान में रचित।

  • जगत्-विनोद: सवाई जगत सिंह के लिए रचित (मतिराम के ‘रसराज’ के समान पद्माकर का ‘जगद्विनोद’ भी काव्यरसिकों और अभ्यासियों दोनों का कंठहार रहा है)।

  • आलीजाप्रकाश: ग्वालियर के शासक दौलतराव सिंधिया के सम्मान में रचित।

  • ईश्वर-पचीसी: जयपुर नरेश ईश्वरी सिंह की प्रशस्ति में रचित।

  • अन्य रचनाएँ: पद्माभरण (जयपुर में निर्मित दोहों में रचित अलंकार ग्रंथ), रामरसायन (वाल्मीकि रामायण के आधार पर दोहा-चौपाइयों में रचित चरितकाव्य/अनुवाद), गंगालहरी, प्रबोध पचासा (विराग और भक्तिरस से पूर्ण ग्रंथ), यमुनालहरी, प्रतापसिंह-सफरनामा, भगवत्पंचाशिका, राजनीति, कलि-पचीसी, रायसा, हितोपदेश भाषा (सिंधिया के दरबार में सरदार ऊदा जी के अनुरोध पर किया गया भाषानुवाद), तथा अश्वमेध आदि।

  • जीवन के अंतिम समय में इन्हें कुष्ठरोग हो गया था, जिससे वे गंगाजल के ओषधिमूलक प्रयोग के बाद अंततः स्वस्थ हो गए। जगन्नाथ पंडितराज की तरह गंगा की स्तुति में अपने जीवन-काल की अंतिम काव्य-रचना “गंगा-لहरी” लिखकर कानपुर में गंगा-किनारे 80 वर्ष की आयु में सन् 1833 में इनका निधन हुआ।

  • ये एक बार उदयपुर के ‘महाराजा भीमसिंह’ के दरबार में भी गए थे जहाँ इनका बहुत आदर-समान हुआ था। महाराणा साहब की आज्ञा से इन्होंने ‘गणगौर’ के मेले का सुंदर वर्णन किया था।

3. महाकवि देव (देवदत्त)

  • इनका पूरा नाम देवदत्त था। इन्होंने मात्र 16 वर्ष की अल्प आयु में ‘भावविलास’ की रचना कर दी थी।

  • यह रीतिकाल में सबसे अधिक राजाओं के दरबार में सेवाएँ देने वाले कवि हैं। इन्हें कोई स्थायी और उदार आश्रयदाता नहीं मिला जिसके यहाँ रहकर ये सुख से काल यापन कर सकें। ये बराबर अनेक रईसों के यहाँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहे, पर कहीं स्थायी रूप से जमे नहीं। इसका कारण या तो इनकी प्रकृति की विचित्रता रही या इनकी उच्च कोटि की कविता के साथ उस काल की जन-रुचि का असामंजस्य।

  • देव ने अपने ‘अष्टयाम’ और ‘भावविलास’ को औरंगजेब के बड़े पुत्र ‘आजमशाह’ को सुनाया था जो हिंदी कविता के बड़े प्रेमी थे।

  • इन्होंने ‘भवानीदत्ता वैश्य’ के नाम पर ‘भवानी विलास’ और ‘कुशलसिंह’ के नाम पर ‘कुशल विलास’ की रचना की। ‘राजा उद्योत सिंह वैश्य’ के लिए इन्होंने ‘प्रेम चंद्रिका’ बनाई।

  • यह लगातार अनेक प्रदेशों में घूमते रहे। इस यात्रा के अनुभवों का इन्होंने अपने ‘जातिविलास’ नामक ग्रंथ में भरपूर उपयोग किया। इस ग्रंथ में देव ने भिन्न-भिन्न जातियों और भिन्न-भिन्न प्रदेशों की सुंदरियों/स्त्रियों का विस्तृत वर्णन किया है।

  • इतना घूमने के बाद इन्हें एक अच्छे आश्रयदाता ‘राजा भोगीलाल’ मिले, जिनके नाम पर संवत 1783 में इन्होंने ‘रसविलास’ नामक ग्रंथ की रचना की।

देव के अन्य प्रमुख ग्रंथ व तथ्य:

  • सुखसागर तरंग: प्रायः अनेक ग्रंथों से लिए हुए कवित्तों का अनुपम संग्रह है।

  • रागरत्नाकर: इसमें विभिन्न राग-रागिनियों के स्वरूप का शास्त्रीय वर्णन है।

  • अष्टयाम: यह रात-दिन के भोग-विलास की दिनचर्या से संबंधित ग्रंथ है।

  • ब्रह्मदर्शन पचीसी और तत्वदर्शन पचीसी: इन ग्रंथों में गूढ़ विरक्ति का भाव झलकता है।

  • देवमाया प्रपंच: देव रचित एक नाटक है जिसमें दार्शनिक धर्म का विवेचन है।

  • देव चरित: इसमें भगवान कृष्ण की कथा का वर्णन है।

  • शब्द-रसायन: इसमें आचार्यत्व और काव्य सिद्धांतों का निरूपण है।

  • भावविलास: इसमें प्रमुख रूप से रीति का कथन किया गया है।

  • वृक्ष विलास: इसमें अन्योक्तिपूर्ण रचनाएँ हैं।

  • काव्य-रसायन: इसमें काव्यशास्त्र के सभी प्रमुख अंगों का विशद वर्णन मिलता है।

  • अन्य प्रमुख ग्रंथ: अष्टयाम, प्रेमतरंग, सुजान विनोद, देव शतक आदि।

  • रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों में संभवतः सबसे अधिक ग्रंथों की रचना देव ने ही की है। इनकी रची पुस्तकों की कुल संख्या विद्वान 52 से लेकर 72 तक बतलाते हैं।

  • इनके वंशज अपने को ‘दुबे’ बतलाते हैं।

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत: ‘भूषण’ और ‘देव’ ने शब्दों का बहुत अंग-भंग किया है और कहीं-कहीं गढ़ंत शब्दों का व्यवहार किया है।

  • देव का प्रसिद्ध काव्य सिद्धांत कथन:

    अभिधा उत्तम काव्य है; मध्य लक्षणा लीन।

    अधम व्यंजना रस विरस, उलटी कहत नवीन।

  • देव और बिहारी विवाद: मिश्रबंधुओं ने देव को बिहारी से भी बड़ा कवि मानकर “देव बड़े कि बिहारी” विवाद को जन्म दिया था। इस संदर्भ में पं. कृष्णबिहारी मिश्र की आलोचनात्मक कृति “देव और बिहारी” प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने लिखा है कि— “बिहारीलाल की कविता यदि जूही या चमेली का फूल है तो देव की कविता गुलाब या कमल का फूल है। दोनों में सुवास है। भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न सुगन्ध के प्रेमी हैं।” इसके उत्तर में लाला भगवानदीन ने “बिहारी और देव” नामक प्रसिद्ध कृति की रचना की थी।

4. आचार्य भिखारीदास और अमीरदास

  • आचार्य भिखारीदास: इनका जन्म प्रतापगढ़ के निकट ‘टेंउगा’ नामक स्थान में सन् 1721 ई० में हुआ था। इन्हें ‘दासजी’ के नाम से भी जाना जाता है।

  • भिखारीदास द्वारा लिखित सात कृतियाँ अत्यंत प्रामाणिक मानी गई हैं:

    1. रस सारांश (इसमें नायक-नायिका भेद का वर्णन है)

    2. काव्य निर्णय

    3. शृंगार निर्णय

    4. छन्दोर्णव पिंगल

    5. अमरकोश या शब्दनाम प्रकाश

    6. विष्णु पुराण भाषा

    7. शतरंज शासिका

  • ‘नाम प्रकाश कोश’ और ‘छंदप्रकाश’ भी इन्हीं की अन्य रचनाएँ मानी जाती हैं।

  • ‘काव्यनिर्णय’ में भिखारीदास जी ने प्रतापगढ़ के सोमवंशी राजा पृथ्वीसिंह के भाई बाबू हिंदूपतिसिंह को अपना आश्रयदाता लिखा है।

  • हिंदी रीतिकाल में काव्यांगों के सर्वांग-निरूपण में भिखारीदास को सर्वप्रधान स्थान दिया जाता है। ‘काव्य-निर्णय’ में इन्होंने सभी काव्यांगों पर बहुत ही विशद विवेचन किया है।

  • अमीरदास की मुख्य रचनाएँ: सभा मंडन, वृत्तचंद्रोदय, ब्रजराजविलास, सतसई, अमीर प्रकाश, वैद्यकल्पतरु, तथा श्रीकृष्ण साहित्य सिंधु (ब्रज भाषा में)।

5. कुलपति मिश्र

  • यह महाकवि बिहारी के भानजे के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके पिता का नाम ‘परशुराम मिश्र’ था।

  • इनका ‘रस रहस्य’ (1727 ई.) ग्रंथ ही सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रकाशित है। इसके अतिरिक्त इनके निम्नलिखित ग्रंथ और खोज में मिले हैं: द्रोणपर्व (संवत् 1737), युक्तितरंगिणी (1743), नखशिख, संग्रहसार, तथा गुण रसरहस्य (1724)।

  • ‘रस रहस्य’ वस्तुतः मम्मट के प्रसिद्ध संस्कृत ग्रंथ ‘काव्य प्रकाश’ का छायानुवाद है।

  • ये जयपुर महाराज रायसिंह के दरबारी कवि थे।

6. श्रीपति

  • इनके प्रमुख ग्रंथ हैं: काव्य-सरोज, कविकल्पद्रुम, रससागर, अनुप्रासविनोद, विक्रमविलास, सरोज कलिका, और अलंकारगंगा।

  • इनकी प्रसिद्धि का प्रमुख आधार इनका ग्रंथ ‘काव्य प्रकाश’ है जो 1777 ई. में लिखा गया था।

  • श्रीपति ने इसमें काव्य के सभी अंगों का निरूपण बहुत ही विशद रीति से किया है। इसमें दोषों के उदाहरणों के रूप में केशवदास के बहुत से पद रखे गए हैं।

  • ऐसा माना जाता है कि भिखारीदास का ‘काव्य-निर्णय’ वस्तुतः श्रीपति के ‘काव्य-सरोज’ की ही एक प्रकार से नकल है। (विशेष नोट: ‘कविकल्पद्रुम’ नाम से एक रचना द्विजदेव की भी मिलती है।)

7. सुरति मिश्र

  • इन्होंने ‘अलंकारमाला’ संवत् 1766 में और बिहारी सतसई की ‘अमरचंद्रिका’ टीका संवत् 1794 में लिखी थी।

  • इन्होंने केशवदास की प्रसिद्ध रचनाओं ‘कविप्रिया’ और ‘रसिकप्रिया’ पर भी विस्तृत टीकाएँ रची हैं।

  • इनके द्वारा रचे गए अन्य रीतिग्रंथ हैं: अलंकारमाला, रसरत्नमाला, रससरस, रसग्राहकचंद्रिका, नखशिख, काव्यसिद्धांत, और रसरत्नाकर।

  • इन्होंने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘वैताल पंचविंशति’ का ब्रजभाषा गद्य में बहुत सुंदर अनुवाद किया है।

8. सोमनाथ

  • इन्होंने संवत् 1794 में ‘रसपीयूषनिधि’ नामक रीति का एक अत्यंत विस्तृत ग्रंथ बनाया, जिसमें पिंगल, काव्यलक्षण, प्रयोजन, भेद, शब्दशक्ति, ध्वनि, भाव, रस, रीति, गुण और दोष इत्यादि सभी विषयों का सांगोपांग निरूपण किया गया है।

  • कविता में ये अपना उपनाम ‘ससिनाथ’ भी रखते थे।

  • इनके तीन और ग्रंथ मिले हैं:

    1. कृष्ण लीलावती पंचाध्यायी (संवत् 1800)

    2. सुजानविलास (सिंहासन बत्तीसी, पद्य में; संवत् 1807)

    3. माधवविनोद नाटक (संवत् 1809 — यह नाटक संभवतः भवभूति के ‘मालतीमाधव’ के आधार पर लिखा गया प्रेमप्रबंध है।)

9. महाराज जसवंत सिंह

  • मारवाड़ के महाराज जसवंत सिंह ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘भाषाभूषण’ की रचना दंडी के संस्कृत ग्रंथ ‘चंद्रालोक’ के आधार पर की थी।

  • ‘भाषाभूषण’ ग्रंथ रीतिकाल में अलंकारों पर एक बहुत ही प्रचलित और प्रामाणिक पाठ्यग्रंथ रहा है।

  • इस ‘भाषाभूषण’ ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्रायः एक ही दोहे के अंतर्गत अलंकार के ‘लक्षण’ और ‘उदाहरण’ दोनों एक साथ रख दिए गए हैं।

10. कालिदास त्रिवेदी

  • संवत् 1749 में इन्होंने ‘वर वधू विनोद’ की रचना की। यह नायिकाभेद और नखशिख वर्णन की एक अत्यंत प्रसिद्ध पुस्तक है।

  • ‘राधा माधव बुधामिलन विनोद’ नाम का एक अन्य ग्रंथ भी इनका खोज में मिला है।

  • इनका बड़ा संग्रह ग्रंथ ‘कालिदास हजारा’ बहुत दिनों से साहित्यिक जगत में प्रसिद्ध चला आ रहा है। इस संग्रह के संबंध में ‘शिवसिंहसरोज’ में लिखा है कि इसमें संवत् 1481 से लेकर संवत् 1776 तक के कुल 212 कवियों के 1000 पद्य संगृहीत हैं। कवियों के रचनाकाल आदि के ऐतिहासिक निर्णय में यह ग्रंथ शोधकर्ताओं के लिए बड़ा ही उपयोगी है।

  • इनके पुत्र कवींद्र और पौत्र दूलह भी आगे चलकर बड़े अच्छे और प्रतिष्ठित कवि हुए।

11. दूलह कवि

  • इनका ‘कविकुलकंठाभरण’ अलंकार-नूपण का एक अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय ग्रंथ है।

  • ‘कविकुलकंठाभरण’ में केवल 85 पद्य हैं, किंतु अपनी संक्षिप्तता और प्रामाणिकता के कारण यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • इनकी काव्य-कुशलता से प्रभावित होकर किसी समकालीन कवि ने इनकी प्रशंसा में यहाँ तक कह दिया था:

    “और बराती सकल कवि, दूलह दूलहराय।”

12. तोष कवि

  • इन्होंने संवत् 1791 में ‘सुधानिधि’ नामक एक अच्छा बड़ा और प्रामाणिक ग्रंथ रसभेद और भावभेद के निरूपण पर बनाया।

  • खोज कार्य के दौरान इनकी दो पुस्तकें और प्राप्त हुई हैं— ‘विनयशतक’ और ‘नखशिख’

13. प्रताप साहि

  • इन्होंने संवत् 1882 में ‘व्यंग्यार्थकौमुदी’ और संवत् 1886 में ‘काव्यविलास’ की रचना की।

  • इन दोनों प्रमुख ग्रंथों के अतिरिक्त इनकी निम्नलिखित पुस्तकें और रची हुई हैं:

    • जयसिंहप्रकाश (संवत् 1882)

    • शृंगारमंजरी (संवत् 1889)

    • शृंगारशिरोमणि (1894)

    • अलंकारचिंतामणि (संवत् 1894)

    • काव्यविनोद (संवत् 1896)

    • रसराज की टीका (संवत् 1896)

    • रत्नचंद्रिका (बिहारी सतसई की टीका, संवत् 1896)

    • जुगल नखशिख (सीता-राम का नखशिख वर्णन)

    • बलभद्र नखशिख की टीका

  • इन्होंने व्यंजना शब्दशक्ति के उदाहरणों की एक बिल्कुल अलग और अनूठी पुस्तक ‘व्यंग्यार्थ कौमुदी’ के नाम से रची। इसमें कवित्त, दोहे और सवैये मिलाकर कुल 130 पद्य संकलित हैं जो सब-के-सब व्यंजना या ध्वनि के अत्यंत सटीक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

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4 thoughts on “रीतिबद्ध काव्य धारा सम्पूर्ण – कवि, रचनाएँ और नोट्स | Reetibaddha Kavya Dhara”

  1. श्रीपति की रचना का नाम काव्य सरोज है काव्यप्रकाश नहीं कृपया इसमें सुधार करें

    1. केवल कृष्ण घोड़ेला

      जी धन्यवाद ,सुधार कर दिया गया है

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