अंतिम संशोधित (Last Updated): September 1, 2026
रीतिकाल के सिरमौर कवि बिहारीलाल का जीवन परिचय, रचनाएँ और काव्यगत विशेषताएँ (Kavi Biharilal ka Jivan Parichay)
Table of Contents
हिंदी साहित्य के रीतिकाल के अंतर्गत ‘रीतिसिद्ध काव्यधारा’ के सर्वाधिक प्रसिद्ध, लोकप्रिय और अप्रतिम रचनाकार कवि बिहारीलाल (Kavi Biharilal) का हिंदी कविता के इतिहास में अत्यंत विशिष्ट स्थान है। उनके द्वारा रचित एकमात्र ग्रंथ ‘बिहारी सतसई’ ने हिंदी को गागर में सागर भरने की कला का अद्भुत उदाहरण दिया है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से कवि बिहारीलाल का जीवन परिचय, उनकी रचनाएँ, टीकाएँ, आलोचकीय कथन और महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस विस्तृत आलेख में हम उनके संपूर्ण जीवन और कृतित्व का अध्ययन करेंगे।

📌 कवि बिहारीलाल का संक्षिप्त जीवन परिचय (Quick Facts)
कवि बिहारीलाल के जीवन-वृत्त को निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं और पंक्तियों के माध्यम से समझा जा सकता है:
जीवनकाल: 1595 – 1663 ईस्वी
मृत्यु: 1663 ईस्वी
जन्म स्थल: ग्राम – वसुवा गोविंदपुर (ग्वालियर, मध्य प्रदेश)
जाति: माथुर चतुर्वेदी ब्राह्मण परिवार
पिता का नाम: केशवराय
भक्ति संप्रदाय: निम्बार्क संप्रदाय
काव्य संप्रदाय: आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार ‘रसवादी’, जबकि डॉ. नगेंद्र के अनुसार ‘ध्वनिवादी’
भाषा: शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा
छंद/दोहा: कुल 713 (या 719) दोहे
काव्य स्वरूप: मुक्तक काव्य
आश्रयदाता: जयपुर नरेश मिर्जा राजा जयसिंह
प्रसिद्ध ऐतिहासिक प्रसंग:
“जन्म ग्वालियर जानिये, खण्ड बुँदेले बाल।
तरुनाई आई सुखद, मथुरा बसी ससुराल।।”
सन 1645 ई. में बिहारी ने सर्वप्रथम जयपुर नरेश मिर्जा राजा जयसिंह को निम्नलिखित प्रसिद्ध दोहा लिखकर भेजा था:
“नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल।
अलि कलि ही sों बंध्यो आगे कौन हवाल।।”
इस दोहे से अत्यधिक प्रसन्न होकर जयसिंह ने इन्हें ‘काली पहाड़ी’ गाँव पुरस्कार में दिया और अपने दरबार में आश्रय प्रदान किया।
📚 कवि बिहारी की रचनाएँ
बिहारी सतसई: यह इनकी एकमात्र और अमर कृति है, जिसका रचनाकाल 1662 ईस्वी माना जाता है। इसमें लगभग 713/719 दोहों की मुक्तक रचना संकलित है। ब्रजभाषा में प्रयुक्त इस सतसई का मुख्य आधार प्राकृत की ‘गाहा सप्तशती’, संस्कृत की ‘आर्यासप्तशती’ एवं ‘अमरुक शतक’ को माना जाता है।
📖 कवि बिहारी सतसई की प्रमुख टीकाएँ एवं अनुवाद
बिहारी सतसई पर हिंदी और अन्य भाषाओं में अनेक टीकाएँ लिखी गई हैं, जो इस प्रकार हैं:
कृष्णलाल कवि: बिहारी के दत्तक पुत्र, जिन्होंने ‘सर्वप्रथम टीका’ लिखी और दोहे को सवैया छंद में बदला।
सुरति मिश्र: ‘अमरचंद्रिका’ (1737 ईस्वी)
कर्ण कवि: ‘साहित्य चंद्रिका’ (1737 ईस्वी)
प्रभुदयाल पाण्डेय: आधुनिक खड़ी बोली टीका (1896 ईस्वी)
अंबिकादत्ता व्यास: ‘बिहारी बिहार’ (रोला छंद में भावानुवाद)
जगन्नाथ दास रत्नाकर: ‘बिहारी रत्नाकर’ (1921 ईस्वी) — इसे सतसई की सर्वश्रेष्ठ टीका माना जाता है, जिसमें खड़ी बोली में 713 दोहे दिए गए हैं।
परमानंद: ‘शृंगार सप्तशती’ (संस्कृत अनुवाद)
आनंदीलाल शर्मा: ‘फिरंगे सतसई’ (फारसी अनुवाद)
मुंशी देवी प्रसाद ‘प्रीतम’: उर्दू शेरों में भावानुवाद – ‘गुलदस्त-ए-बिहारी’
पद्मसिंह शर्मा: ‘संजीवनी भाष्य’
لल्लूलाल (लल्लूलाल): ‘लालचंद्रिका’
बिहारी से संबंधित प्रमुख आलोचना ग्रंथ
बिहारी और सादी (1907 ई.) — पद्मसिंह शर्मा
बिहारी सतसई: तुलनात्मक अध्ययन (1918 ई.) — पद्मसिंह शर्मा
देव और बिहारी — कृष्णबिहारी मिश्र
बिहारी और देव — लाला भगवानदीन
बिहारी — विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
बिहारी की वाग्विभूति — विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
💬 बिहारी के संबंध में विद्वानों के प्रमुख कथन
जॉर्ज ग्रियर्सन: “सम्पूर्ण यूरोप में बिहारी सतसई के समकक्ष कोई रचना प्राप्त नहीं होती है।”
पद्मसिंह शर्मा: “बिहारी सतसई शक्कर की रोटी है।”
हजारी प्रसाद द्विवेदी: “बिहारी सतसई रसिकों के हृदय का घर है।” और “बिहारी सतसई सैकड़ों वर्षों से रसिकों का मन मोह रही है। यह उनके हृदय का हार बनी हुई है और बनी रहेगी।”
राधाचरण गोस्वामी: “बिहारी ऐसे पीयूषवर्षी ब्रजश्याम हैं, जिनके उदय होते ही सूर और तुलसी आच्छादित हो जाते हैं।”
रामस्वरूप चतुर्वेदी: “ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक दोनों स्तरों पर कविता की यह भाषिक तराश रीतिकालीन मनोवृत्ति और मुगलकालीन कला की बारीक पसंदी के समानांतर चलती है। इस संदर्भ में बिहारी की रीतिकालीन काव्यभाषा को प्रतिनिधि कहा जा सकता है।” और “उर्दू शायरी में जो सादगी का चमत्कार मिलता है, उसी को टक्कर देता हुआ चमत्कार बिहारी ने शब्दों की तराश से पैदा किया है।”
बच्चन सिंह: “बिहारी का मन क्रीड़ापरक प्रेम में बहुत अच्छी तरह रमा था। यही कारण है कि इनके काव्य में सुरति चित्रों का अत्यधिक उल्लेख हुआ है। जिस हाव-योजना या भंगिमा वर्णन के लिए बिहारी की अत्यधिक प्रशंसा की जाती है, उसके मूल में यही प्रवृत्ति समझनी चाहिए।”
रामचंद्र शुक्ल के महत्वपूर्ण कथन:
“बिहारी की भाषा चलती होने पर भी साहित्यिक है। वाक्य रचना व्यवस्थित है और शब्दों के रूपों का व्यवहार एक निश्चित प्रणाली पर है। यह बात बहुत कम कवियों में पायी जाती है।”
“शृंगार रस के ग्रंथों में जितनी ख्याति और जितना मान ‘बिहारी सतसई’ का हुआ, उतना और किसी का नहीं। इसका एक-एक दोहा हिन्दी साहित्य में एक-एक रत्न माना जाता है।”
“मुक्तक में प्रबंध के समान रस की धारा नहीं रहती जिसमें कथा प्रसंग की परिस्थिति में अपने को भूला हुआ पाठक मग्न हो जाता है और हृदय में एक स्थायी प्रभाव ग्रहण करता है। इसमें तो रस के ऐसे छींटे पड़ते हैं जिनसे हृदय कलि का थोड़ी देर के लिए खिल उठती है। यदि प्रबंधकाव्य एक विस्तृत वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता है।”
“जिस कवि में कल्पना की समाहारशक्ति के साथ भाषा की समास शक्ति जितनी अधिक होगी उतनी ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा। यह क्षमता बिहारी में पूर्ण रूप से विद्यमान थी।”
“जो हृदय के अंतस्तल पर मार्मिक प्रभाव चाहते हैं, उनका संतोष बिहारी से नहीं हो सकता। बिहारी का काव्य हृदय में किसी ऐसी लय या संगीत का संचार नहीं करता जिसकी स्वरधारा कुछ काल तक गूँजती रहे।”
“भावों का बहुत उत्कृष्ट और उदात्त स्वरूप बिहारी में नहीं मिलता। कविता उनकी शृंगारी है, पर प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँचती, नीचे ही रह जाती है।”
शुक्ल ने बिहारी सतसई के वियोग वर्णन पक्ष का उपहास किया है।
रामधारी सिंह ‘दिनकर’: “बिहारी के दोहों में न तो कोई बड़ी अनुभूति है न कोई ऊँची बात, सिर्फ लड़कियों की कुछ अदाएँ हैं, मगर कवि ने उन्हें कुछ ऐसे ढंग से चित्रित किया है कि आज तक रसिकों का मन कचोट खाकर रह जाता है। जो लोग कविता में ऊँची अनुभूति या ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातों की तलाश में रहते हैं, बिहारी की कविताओं में उन्हें अपने लिए चुनौती मिलेगी।”
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र: “बिहारी का भाषा पर वास्तविक अधिकार था। भाषा की दृष्टि से बिहारी की समता करने वाला, भाषा का वैसा अधिकार रखने वाला कोई मुक्तककार दिखाई नहीं देता है।”
राधाकृष्ण दास: “मुहावरे और उत्प्रेक्षा के तो बिहारीलाल बादशाह थे।”
श्यामसुंदर दास: “बिहारी ने शब्दों के साथ बलात्कार बहुत कम किया है। व्याकरण व नियमों का व्यतिक्रम उनकी रचनाओं में बहुत कम पाया जाता है। कहीं-कहीं पर जो उनके कुछ शब्द अजनबी से लगते हैं, वे इस कारण कि इनका प्रयोग बहुत कम होता है।”
भगीरथ मिश्र: “बिहारी की रचना में कहीं कोई कच्चापन नहीं झलकता है। प्रत्येक दोहा कलात्मक पूर्णता का एक रूप है। हिन्दी के कला प्रधान कवियों में बिहारी अग्रगण्य हैं।”
🌟 विशेष तथ्य
बिहारी रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।
इन्होंने जीवन में कभी आचार्यत्व स्वीकार नहीं किया (आचार्यत्व न स्वीकार करने वाले कवि)।
ये जयपुर नरेश महाराजा जयसिंह के विशेष कृपापात्र थे।
हिंदी में समास पद्धति की शक्ति का परिचय सबसे अधिक बिहारी ने दिया है।
- इनकी रचना ‘सतसैया’ के रूप में बिहारी सतसई के नाम से संकलित और प्रचलित है।
📝 कवि बिहारी से संबंधित महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)
1- बिहारी सतसई की प्रथम टीका लिखी ?
अ) कृष्ण कवि ✔️
ब) अंबिकादत्त व्यास
स) परमानंद
द) लल्लू लाल
2- बिहारी सतसई की टीका सवैया छंद में लिखी ?
अ) कृष्ण कवि ✔️
ब) अंबिकादत्त व्यास
स) परमानंद
द) लल्लू लाल
3- बिहारी सतसई के दोहों का पल्लवन रोला छंद में किया ?
अ) कृष्ण कवि
ब) अंबिकादत्त व्यास ✔️
स) परमानंद
द) लल्लू लाल
4- बिहारी सतसई के प्रत्येक दोहे पर छंद बनाया ?
अ) कृष्ण कवि ✔️
ब) अंबिकादत्त व्यास
स) परमानंद
द) लल्लू लाल
5- बिहारी सतसई के दोहों का संस्कृत में अनुवाद किया ?
अ) कृष्ण कवि
ब) अंबिकादत्त व्यास
स) परमानंद ✔️
द) लल्लू लाल
6- परमानंददास ने बिहारी सतसई का संस्कृत में अनुवाद किस नाम से किया ?
अ) आर्यासप्तशती
ब) गाथासप्तशती
स) रतनहजारा
द) शृंगारसप्तशती ✔️
7- बिहारी सतसई की टीका “लाल चन्द्रिका” नाम से लिखी ?
अ) कृष्ण कवि
ब) अंबिकादत्त व्यास
स) परमानंद
द) लल्लू लाल ✔️
8- बिहारी सतसई को शक्कर की रोटी कहा है ?
अ) आ. शुक्ल
ब) ह. प्र. द्विवेदी
स) पद्मसिंह शर्मा ✔️
द) म. प्र. द्विवेदी
9- बिहारी सतसई को “रसिकों के हृदय का घर” कहा है ?
अ) आ. शुक्ल
ब) ह. प्र. द्विवेदी ✔️
स) पद्मसिंह शर्मा
द) म. प्र. द्विवेदी
10- “फिरंगी सतसई” नाम से टीका लिखी ?
अ) आनंदीलाल शर्मा ✔️
ब) आसीफ अली
स) राधाकृष्णदास
द) जफर खाँ
11- “यदि सूर सूर है ————– तो बिहारी उस मेघ के समान है जिसके उदय होते ही सबका प्रकाश आछन्न हो जाता है।” कथन है ?
अ) आ. शुक्ल
ब) ह. प्र. द्विवेदी
स) राधाकृष्णदास ✔️
द) पद्मसिंह शर्मा
12- बिहारी सतसई है ?
अ) लक्षण ग्रंथ
ब) लक्ष्य ग्रंथ ✔️
स) दोनों
द) दोनों ही नहीं
13- “इनके दोहे क्या है, रस के छोटे छोटे छीटें है” कथन है ?
अ) आ. शुक्ल ✔️
ब) ह. प्र. द्विवेदी
स) राधाकृष्णदास
द) पद्मसिंह शर्मा
14- बिहारी सतसई की टीका “अमर चन्द्रिका” नाम से लिखी ?
अ) सूरति मिश्र ✔️
ब) अंबिकादत्त व्यास
स) मुंशी देवी प्रसाद
द) लल्लू लाल
15- बिहारी सतसई को रामचरितमानस के बाद सबसे अधिक प्रचारित कृति माना है ?
अ) ग्रियर्सन
ब) शिवसिंह सेंगर
स) श्यामसुंदर दास ✔️
द) आ. शुक्ल
16- बिहारी को हिन्दी साहित्य का चौथा रत्न माना है ?
अ) आ. शुक्ल ने
ब) श्यामसुंदर दास ने
स) विश्वनाथ सिंह ने
द) लाला भगवानदीन ने ✔️
17- बिहारी को हिन्दी मुक्तक साहित्य का बेजोड़ कवि माना है ?
अ) आ. शुक्ल ने
ब) श्यामसुंदर दास ने
स) विश्वनाथ सिंह ने ✔️
द) लाला भगवानदीन ने
18- बिहारी को रीतिकाल का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि माना है ?
अ) आ. शुक्ल ने
ब) श्यामसुंदर दास ने
स) विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने
द) हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ✔️
19- “बिहारी की वाग्विभूति” के लेखक है ?
अ) आ. शुक्ल ने
ब) श्यामसुंदर दास ने
स) विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने ✔️
द) हजारी प्रसाद द्विवेदी ने
20- शुक्ल ने बिहारी सतसई के किस पक्ष का उपहास किया ?
अ) जयसिंह के वर्णन का
ब) संयोग वर्णन का
स) वियोग वर्णन का ✔️
द) प्रकृति चित्रण का
21- “बिहारी की भाषा चलती होने पर भी साहित्यिक है” कथन है ?
अ) आ. शुक्ल ✔️
ब) ह. प्र. द्विवेदी
स) राधाकृष्णदास
द) पद्मसिंह शर्मा
22- “इनकी कविता शृंगारी है परन्तु प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँचती, नीचे रह जाती है” कथन है ?
अ) आ. शुक्ल ✔️
ब) ह. प्र. द्विवेदी
स) रामविलास शर्मा
द) नंददुलारे वाजपेयी
23- रामसहाय दास ने किस नाम से टीका लिखी ?
अ) बिहारी बिहार
ब) राम सतसई ✔️
स) श्रृंगार सतसई
द) रस सतसई
24- “सतसई बरनार्थ” नाम से टीका लिखी ?
अ) वृंद
ब) सबलसिंह चौहान
स) ठाकुर ✔️
द) गुमान मिश्र
25- बिहारी सतसई में सर्वाधिक दोहे है ?
अ) जयसिंह के
ब) श्रृंगार के ✔️
स) नीति के
द) प्रकृति के
26- बिहारी सतसई को ‘शक्कर की रोटी’ कहा-
[अ] हजारी प्रसाद द्विवेदी
[ब] रामचंद्र शुक्ल
[स] पद्मसिंह शर्मा ✔️
[द] बच्चन सिंह
27- बिहारी के दोहे पर प्रसन्न होकर राजा जयसिंह ने इनको कौनसा गाँव पुरस्कार में दिया-
[अ] काली पहाड़ी ✔️
[ब] पीली पहाड़ी
[स] लाल पहाड़ी
[द] जयपुरी पहाड़ी
28- किसने बिहारी को ऐसा पीयूषवर्षी घनश्याम कहा है जिसके उदय होते ही सूर और तुलसी आच्छादित हो जाते हैं-
[अ] राधाचरण दास
[ब] राधाचरण गोस्वामी ✔️
[स] लाला भगवान दीन
[द] पद्मसिंह शर्मा
29- बिहारी सतसई को ‘रसिकों के हृदय का घर’ कहा-
[अ] हजारी प्रसाद द्विवेदी ✔️
[ब] रामचंद्र शुक्ल
[स] पद्मसिंह शर्मा
[द] बच्चन सिंह
निष्कर्ष
कवि बिहारीलाल हिंदी साहित्य के उन अद्वितीय हस्ताक्षर, कलात्मकता के चितेरे और शब्द-शिल्पी हैं जिन्होंने अपनी एक छोटी सी रचना ‘बिहारी सतसई’ के माध्यम से संपूर्ण रीतिकाल में अप्रतिम यश प्राप्त किया। उनकी कल्पना की समाहारशक्ति और भाषा की समास-शक्ति का सामंजस्य हिंदी काव्य जगत में अद्वितीय है। उनका यह छोटा सा मुक्तक काव्य आज भी हिंदी पाठकों और शोधार्थियों के लिए अध्ययन और आनंद का एक सर्वोच्च केंद्र बना हुआ है।
🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि
| क्र.सं. | लेखक / कवि का नाम | मुख्य विशेषता / काल | इंटरनल लिंक (URL) |
| 1. | भारतेंदु हरिश्चंद्र | आधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युग | लिंक देखें |
| 2. | महावीर प्रसाद द्विवेदी | द्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकार | लिंक देखें |
| 3. | जयशंकर प्रसाद | छायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककार | लिंक देखें |
| 4. | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ | छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेता | लिंक देखें |
| 5. | सुमित्रानंदन पंत | प्रकृति के सुकुमार कवि / छायावाद | लिंक देखें |
| 6. | महादेवी वर्मा | आधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्री | लिंक देखें |
| 7. | प्रेमचंद (धनपत राय) | उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुष | लिंक देखें |
| 8. | अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) | प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक | लिंक देखें |
| 9. | रामधारी सिंह ‘दिनकर’ | राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कवि | लिंक देखें |
| 10. | कृष्णा सोबती | आधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर | लिंक देखें |


