साधारणीकरण का सिद्धांत ,परिभाषा -आसान शब्दों में || हिंदी काव्यशास्त्र

आज के आर्टिकल में हम काव्यशास्त्र के अंतर्गत साधारणीकरण का सिद्धांत (Sadharanikaran ka Siddhant) सरल तरीके से पढेंगे ताकि आप यह विषयवस्तु अच्छे से समझ पाओ।

साधारणीकरण का सिद्धांत

साधारणीकरण क्या होता है ?

असाधारण का साधारण और विशेष से सामान्य हो जाना ।

कवि और पाठक की चित्तवृत्तियों का एकलय हो जाना।

ध्यान दें : अपने पराए की भावना समाप्त होने से ही साधारणीकरण होता है

इस सिद्धान्त के अनुुसार साहित्य के पठन, श्रवण अथवा दर्शन द्वारा सामाजिक सहृदय रससिक्त हो साहित्य भूमि में लीन हो जाता है, वह अपनी भौतिक स्थिति से शून्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह रंगमंच पर स्थित नायिका या किसी पात्र को देखकर कथा के अनुरूप भावों से तादात्म्य स्थापित कर लेता है।

रंगमंच पर हो रहे उद्योग उसे सहज और सामान्य लगने लग जाते हैं – बालकृष्ण की चेष्टाओं में उसे अपने संतान की क्रीङाएँ नजर आने लगती है। ऐसी स्थिति में रंगमंच पर स्थित पात्रों का विशेषत्व समाप्त हो वे सामान्य के धरातल पर आ पहुँचते है, यही साधारणीकरण है।

काव्यशास्त्र में ‘साधारणीकरण’ शब्द का प्रयोग ‘रसनिष्पत्ति’ के सन्दर्भ में हुआ है। इसका सर्वप्रथम प्रयोग भट्टनायक (10वीं शती ई. पूर्व) ने रस निष्पत्ति सम्बन्धी भरतमुनि के रस सूत्र की व्याख्या के अन्तर्गत किया है। (भट्टनायक का भुक्तिवाद का रस निष्पत्ति का सिद्धान्त)

साधारणीकरण में हमें यह समझना है कि साधारणीकरण किसका होता  है ?

  • स्थायी भाव का
  • विभाव का
  • अनुभाव का
  • संचारी भाव का
  • पाठक /श्रोता के चित्त का
  • कवि की अनुभूति का

कुछ विद्ववानों के मत दिए जा रहें है।

Sadharanikaran ka Siddhant

भट्टनायक के अनुसार,

‘भावकत्वम् साधारणीकरण, तेन हि व्यापारेण विभावदायः
स्थायी च साधारणीकरण क्रियन्ते।’’
अर्थात भावकत्व साधारणीकरण है। इस व्यापार से विभावादि और स्थायी भावों का साधारणीकरण होता है। इस प्रकार भट्टनायक ने ‘भावकत्व’ नामक व्यापार के माध्यम से साधारणीकरण का उल्लेख किया है।
विशेषः भट्टनायक ने काव्य के तीन व्यापार बताए है-

  • अभिधा (पाठ का वाच्यार्थ,भाषा ,आलंकारिक योजना)
  • भावकत्व (काव्य रसों से संबंध)
  • भोजकत्व (सहृदय सामाजिक से संबंध)

डाॅ. नगेन्द्र के अनुसार, ‘‘साधारणीकरण का अर्थ है काव्य के पठन द्वारा पाठक या श्रोता का भाव सामान्य भूमि पर पहुँच जाना। अर्थात इन्होने कवि की अनुभूति को साधारणीकरण माना ’’

अभिनवगुप्त के अनुसार,‘‘ साधारणीकरण दो स्तर पर सम्पन्न होता है। पहले स्तर पर विभावादि देशकाल के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं, दूसरे स्तर पर प्रमाता/पाठक /श्रोता  स्व-पर (अपने-पराए) की चेतना से मुक्त हो जाता है।’’
इनके अनुसार विभावादि के स्थायी भाव के साथ-साथ सामाजिक की अनुभूति का साधारणीकरण होता है।

ध्यान दें : विभावादि में विभाव,अनुभाव और संचारी भाव आते है

आचार्य विश्वनाथ के अनुसार,‘‘ साधारणीकरण द्वारा ही प्रमाता और विभावादि में पूर्ण तादात्म्य की स्थिति को सम्भव मानते हैं।‘‘

अर्थात इनके अनुसार विभावादि का अपने – पराए की भावना से मुक्त हो जाना है।

रामचंद्र शुक्ल का साधारणीकरण(साधारणीकरण और व्यक्ति वैचित्र्यवाद)

रामचन्द्र शुक्ल ने साधारणीकरण पर विस्तृत विचार किया है। उनकी पहली स्थापना यह है कि ‘‘साधारणीकरण आलम्बनत्व धर्म का होता है।’’ दूसरा यह है कि ‘‘जब तक भाव का कोई विषय इस रूप में नहीं लाया जाता कि वह सामान्यतः सबके उसी भाव को आलम्बन हो सके, तब तक उसमें रसोद्बोधन की पूर्ण शक्ति नहीं आती। विषय का इसी रूप में लाया जाना हमारे यहाँ साधारणीकरण कहलाता है।’’

शुक्लजी ने आलम्बन धर्म का साधारणीकरण माना है। इस प्रकार रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार साधारणीकरण का भाव है- (1) वर्णित अथवा प्रदर्शित आलम्बन का सबके भाव का आलम्बन बनाना, (2) आश्रय के समान आलम्बन के प्रति पाठक अथवा दर्शक का भाव हो जाना।

शुक्लजी के मत की कई विचारकों ने आलोचना की है। राम दहिन मिश्र ने विभावादि के साधारणीकरण को केवल आलम्बनत्व धर्म में सीमित किये जाने पर आपत्ति की है। उन्होंने रसकोटियों के विभाजन को रस की प्रकृति के विपरीत कहा है और साधारणीकरण तथा तादाम्य का एक ही अर्थ में प्रयोग भ्रामक माना है।’’

बाबू गुलाबराय ने कवि, पाठक और भाव तीनों के साधारणीकरण पर विचार किया है(नाटकीय प्रपंच,नाटककार,प्रेक्षक का साधारणीकरण) ,उनके मतानुसार साधारणीकरण की स्थिति में-
(1) कवि अपने व्यक्तित्व से ऊँचा उठकर साधारणीकृत हो जाता है। अतः वह लोक प्रतिनिधि होकर भावाभिव्यक्ति करता है।
(2) पाठक का साधारणीकरण इस अर्थ में होता है कि वह अपने व्यक्तित्व के बन्धनों को तोड़कर लोक सामान्य की भाव भूमि में आता है।
(3) भावों का साधारणीकरण इस अर्थ में होता है कि इनमें भी ‘अयं निजः परोवा’ की भावना जाती रहती है।

आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के अनुसार,

‘‘ साधारणीकरण में कवि कल्पित समस्त क्रिया व्यापारों का साधारणीकरण होता है।’’

केशव प्रसाद मिश्र के अनुसार,‘‘ सहृदय की चेतना का साधारणीकरण होता है। इन्होनें साधारणीकरण का संबंध योग की ‘मधुमति की भूमिका’ से जोङा।’’

श्यामसुन्दर दास का मत-
श्यामसुन्दर दास ने केशवसेन की ‘मधुमति भूमिका’ के संबंध में साधारणीकरण की व्याख्या कर साधारणीकरण की स्थिति में पँहुचे सहृदय की समानता समाधि में पँहुचे योगी से बताई है। साधारणीकरण की समाप्ति पर सहृदय सामाजिक पुनः वास्तविक स्थिति में लोट आता है। सहृदय के चित्त का साधारणीकरण होता है।

‘मधुमति की भूमिका’ क्या है ?

‘मधुमति की भूमिका’ : इस धारणा को सर्वप्रथम केशवप्रसाद मिश्र ने प्रस्तुत किया। इस धारणा का प्रभाव श्यामसुंदर दास पर भी पड़ा । ‘मधुमति की भूमिका’ में व्यक्ति का चित्त निवितर्क की स्थिति में पहुँच जाता है ,उसे वस्तु ,वस्तु की स्थिति और वस्तु के संबंधी में से केवल वस्तु का ही ध्यान रहता है ।
ध्यान दें : आचार्य जगन्नाथ ने साधारणीकरण के स्थान पर दोष -दर्शन/दर्शन दोष की स्थापना की

दोस्तो आज हमनें काव्यशास्त्र के अंतर्गत साधारणीकरण का सिद्धांत (Sadharanikaran ka Siddhant) सरल तरीके से पढ़ा ,हम आशा करतें है कि आप इस आर्टिकल से इस विषयवस्तु को अच्छे से समझ गए होंगे ….धन्यवाद

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