ध्वनि सिद्धान्त || Dhavni Siddhant || kaavyshastr || Hindi Sahitya

अंतिम संशोधित (Last Updated): August 4, 2026

दोस्तों आज आप काव्यशास्त्र के अंतर्गत महत्वपूर्ण टॉपिक ध्वनि सिद्धान्त (Dhavni Siddhant)को पढेंगे ,इस विषयवस्तु को विस्तार से समझाया गया है          

ध्वनि सिद्धांत: अवधारणा, भेद एवं प्रमुख तथ्य

1. ध्वनि की परिभाषा एवं स्वरूप

ध्वनि संप्रदाय के प्रवर्तक आचार्य आनंदवर्धन ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘ध्वन्यालोक’ में ध्वनि को काव्य का सर्वोत्कृष्ट तत्व स्वीकार किया है।

मूल संस्कृत लक्षण:

प्रतीयमानं पुनरन्यदेव वस्त्वस्ति वाणीषु महाकवीनाम्।

यत्तत्प्रसिद्धावयवातिरिक्तं विभाति लावण्यमिवाङ्गनासु॥

  • अर्थ: जिस प्रकार सुंदर स्त्रियों के शरीर में अलग-अलग अंगों (नाक, कान, आँख आदि) की बनावट से पृथक् ‘लावण्य’ (सौंदर्य) नाम का एक अनूठा और अलौकिक तत्व प्रकाशित होता है, उसी प्रकार महाकवियों की वाणी में वाच्यार्थ और प्रसिद्ध अलंकारों से भिन्न ‘प्रतीयमान अर्थ’ (व्यंग्यार्थ) प्रकाशित होता है।

काव्यगत लक्षण:

यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ।

व्यङ्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः॥

  • अर्थ: जहाँ शब्द और अर्थ अपने मुख्य अर्थ (वाच्यार्थ) को गौण (कम महत्त्वपूर्ण) बनाकर एक विशेष चमत्कारपूर्ण अर्थ (व्यंग्यार्थ) को प्रकट करते हैं, विद्वानों ने उस काव्य-विशेष को ‘ध्वनि’ कहा है।

मुख्य बिंदु:

  1. व्याकरण और काव्य: व्याकरणशास्त्र में ‘व्यंजना’ शब्द पहले से था, किंतु काव्य में इसे सर्वोच्च स्थान आचार्य आनंदवर्धन ने दिया।

  2. चारुत्वयुक्त व्यंग्य: साधारण व्यंग्य काव्य नहीं कहलाता। जो व्यंग्यार्थ वाच्यातिशायी (वाच्य से अधिक रमणीय और चमत्कारयुक्त) हो, वही ध्वनि है।

  3. संक्षिप्त परिभाषा: वाच्य से अधिक रमणीय व्यंग्य ही ‘ध्वनि’ है।

2. ‘ध्वनि’ शब्द के 5 व्युत्पत्यर्थ (लोचनकार अभिनवगुप्त अनुसार)

ध्वनि का प्रयोग मुख्य रूप से पाँच अर्थों में होता है:

विग्रहप्रधानता / रूपअर्थ
1. ध्वनति ध्वनयति इति वा ध्वनिःकर्तृप्रधान (शब्द)जो ध्वनित करे/कराए— वाचक, लक्षक और व्यंजक शब्द।
2. ध्वन्यत इति ध्वनिःकर्मप्रधान (अर्थ)जो स्वयं ध्वनित हो— वस्तु, अलंकार और रसादि व्यंग्यार्थ।
3. ध्वन्यते अनेन इति ध्वनिःकरणप्रधान (व्यापार)जिसके द्वारा ध्वनि निकले— व्यंजना व्यापार या शब्द-शक्ति।
4. ध्वननं ध्वनिःभाववाचक संज्ञाध्वनित होने की क्रिया या प्रक्रिया (अभिव्यंजन/सूचन)।
5. ध्वन्यत अस्मिन्निति ध्वनिःअधिकरणप्रधानजिसमें वस्तु, अलंकार या रस ध्वनित हो— ध्वनि-काव्य

3. ध्वनि के प्रमुख भेद

ध्वनि को मूल रूप से दो भागों में विभाजित किया गया है:

                                ध्वनिकार अनुसार मुख्य भेद
                                           │
             ┌─────────────────────────────┴─────────────────────────────┐
             ▼                                                           ▼
 1. अविवक्षितवाच्य ध्वनि                                     2. विवक्षितवाच्य ध्वनि
    (लक्षणामूला ध्वनि)                                          (अभिधामूला ध्वनि)
             │                                                           │
     ┌───────┴───────┐                                           ┌───────┴───────┐
     ▼               ▼                                           ▼               ▼
अर्थान्तर-संक्रमित  अत्यंत-तिरस्कृत                           असंलक्ष्यक्रम      संलक्ष्यक्रम
    वाच्य           वाच्य                                     (रस ध्वनि)     (वस्तु/अलंकार)

(1) लक्षणामूला (अविवक्षितवाच्य) ध्वनि

यहाँ वाच्यार्थ अविवक्षित (विवक्षित न होना/बाधित होना) रहता है और लक्षणा शक्ति का सहारा लिया जाता है।

(अ) अर्थान्तर-संक्रमित वाच्य ध्वनि

  • विशेषता: इसमें वाच्यार्थ पूरी तरह नष्ट न होकर दूसरे अर्थ में बदल (संक्रमित हो) जाता है।

  • उदाहरण:

    हरी-भरी सी दौड़-धूप,

    ओ जल माया की चल रेखा।

  • व्याख्या: ‘चिंता’ न तो हरी-भरी हो सकती है और न दौड़-धूप। यहाँ मुख्य अर्थ में बाधा है, किंतु ‘दौड़-धूप’ और ‘हरी-भरी’ पद से यह ध्वनित होता है कि चिंता मनुष्य को निरंतर थकाए बिना काम में व्यस्त रखती है।

(आ) अत्यंत-तिरस्कृत वाच्य ध्वनि

  • विशेषता: इसमें वाच्यार्थ पूरी तरह से छोड़ (तिरस्कृत कर) दिया जाता है।

  • उदाहरण:

    अरे कौन-से घनानंद का, चंचल सा तनमन तरसे।

    वा सुजान के गीले अँगना, किसके आँसू जा बरसे॥

  • व्याख्या: यहाँ ‘घनानंद’ और ‘सुजान’ पद अपने ऐतिहासिक नाम रूपी वाच्यार्थ को त्यागकर क्रमशः ‘व्यथित प्रेमी’ और ‘निर्मोही प्रेमिका’ का अर्थ ग्रहण करते हैं।

(2) अभिधामूला (विवक्षितवाच्य) ध्वनि

यहाँ वाच्यार्थ बना रहता है और उसी के आधार पर व्यंग्यार्थ तक पहुँचा जाता है। इसके दो मुख्य भेद हैं:

(अ) असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य ध्वनि (रस ध्वनि)

  • विशेषता: वाच्यार्थ से व्यंग्यार्थ (रस) तक पहुँचने का क्रम इतना त्वरित होता है कि उसका अंतर लक्षित (महसूस) नहीं होता।

  • भेद (8 प्रकार): रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भावशांति, भावोदय, भावशबलता, और भावसंधि।

  • उदाहरण:

    आजा अब तो ओ केवल-पात-चरन, चन्द्रवदन

    साँस हर मेरी अकेली है, दुकेली कर दे।

    सूने सपनों के गले डाल दे, गोरी बाँहें,

    सर्द माथे पै जरा गर्म हथेली धर दे।

  • व्याख्या: ‘तो’ पद और ‘साँस दुकेली कर दे’ से विप्रलंभ श्रृंगार रस और व्याकुलता ध्वनित हो रही है।

(आ) संलक्ष्यक्रम व्यंग्य ध्वनि

  • विशेषता: वाच्यार्थ और व्यंग्यार्थ का क्रम स्पष्ट रूप से लक्षित होता है।

  • उपभेद: (1) शब्दशक्त्युद्भव (2) अर्थशक्त्युद्भव (3) उभयशक्त्युद्भव

उदाहरण एवं भेद:

  1. शब्दशक्त्युद्भव (पदगत अलंकार ध्वनि):

    मोती का पानी था वो आनन्द भवन का वासी था

    मुसलमान का काबा था, तो हिन्दू की वह काशी था।

    • व्याख्या: ‘मोती’ शब्द में श्लेष है (मोतीलाल नेहरू एवं मुक्ता/रत्न)। ‘पानी’ शब्द से दोनों का सौंदर्य/चमक ध्वनित होता है।

  2. अर्थशक्त्युद्भव (स्वतःसंभवी – वस्तु से वस्तु):

    नई फसल बोने का दिन है / ज्योति बीज बिखराओ,

    नया मोड़ इतिहास ले रहा, आगे कदम बढ़ाओ।

    • व्याख्या: ‘फसल’ और ‘बीज’ रूपी वस्तु से ‘नए समाज का निर्माण’ रूपी वस्तु ध्वनित होती है।

  3. कविप्रौढ़ोक्ति सिद्ध (वाक्यगत – वस्तु से वस्तु):

    बड़े-बड़े साम्राज्य क्षणों में फिर तो गारत होते,

    राज अटारी के छज्जे मुण्डों की माल पिरोते।

    • व्याख्या: कवि की उक्ति के द्वारा क्रांति की भयानक विनाशलीला (वस्तु) ध्वनित है।

  4. कविनिबद्ध वक्तृप्रौढ़ोक्ति सिद्ध (वाक्यगत – अलंकार से वस्तु):

    अभी आग की देह जला दूँ / पानी में भी आग लगा दूँ।

    अभी चाँद तारों को नभ से / क्षण में तोड़ यहाँ पर ला दूँ॥

    • व्याख्या: अलाउद्दीन के इस अतिशयोक्तिपूर्ण वाक्य (अलंकार) से उसकी असीम शक्ति और अहंकार (वस्तु) ध्वनित होता है।

4. परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liners)

  • प्रवर्तक आचार्य: आनंदवर्धन (9वीं शताब्दी)।

  • ध्वनि-सिद्धांत का दार्शनिक आधार: व्याकरण का ‘स्फोटवाद’

  • ध्वनि संप्रदाय के प्रमुख समर्थक आचार्य एवं ग्रंथ:

    • आनंदवर्धन: ध्वन्यालोक

    • अभिनवगुप्त: ध्वन्यालोकलोचन

    • मम्मट: काव्यप्रकाश

    • विश्वनाथ: साहित्यदर्पण

  • ध्वनि विरोधी प्रमुख आचार्य एवं ग्रंथ:

    • मुकुल भट्ट: अभिधावृत्तिमातृका

    • भट्ट नायक: हृदयदर्पण

    • महिम भट्ट: व्यक्तिविवेक

    • कुंतक: वक्रोक्तिजीवितम्

    • धनंजय: दशरूपक

  • काव्य के तीन भेद (मम्मट अनुसार):

    1. उत्तम काव्य (ध्वनि काव्य): जहाँ व्यंग्यार्थ, वाच्यार्थ से अधिक चमत्कारिक हो।

    2. मध्यम काव्य (गुणीभूत व्यंग्य): जहाँ व्यंग्यार्थ, वाच्यार्थ के बराबर या कम चमत्कारिक हो।

    3. अधम काव्य (चित्र काव्य): जहाँ केवल शब्द या अर्थ का चमत्कार हो, व्यंग्यार्थ न हो।

  • मम्मट की उक्ति:

    “इदमुत्तममतिशयिनि व्यङ्ग्ये वाच्याद् ध्वनिर्बुधैः कथितः”

    (अर्थात् वाच्यार्थ से व्यंग्यार्थ के अधिक अतिशयित होने पर विद्वानों ने उसे ‘उत्तम ध्वनि काव्य’ कहा है।)

महत्त्वपूर्ण तथ्य –

ध्वनि सम्प्रदाय का विकास करने वाले प्रमुख आचार्य – आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त, मम्मट, विश्वनाथ (ध्वन्यालोक), (ध्वन्यालोकलोचन), (काव्यप्रकाश), (साहित्यदर्पण)

ध्वनि विरोधी आचार्य –

मुकुल भट्टअभिधावृत्ति मातृका
भट्ट नायकहृदय दर्पण
महिम भट्ट व्यक्ति विवेक
कुन्तकवक्रोक्तिजीवितम्
धनंजयदशरूपक
ध्वनि-सिद्धान्त के प्रवर्तक आचार्य आनंदवर्धन (9 वीं शताब्दी) माने जाते हैं।
⇒ ध्वनिसिद्धान्त मूलतः व्याकरण के ’स्फोटवाद’ पर आधारित माना जाता है।
⇒ सामान्यतः जहाँ काव्य में अभिधेयार्थ (मुख्यार्थ या वाच्यार्थ) एवं लक्ष्यार्थ से अधिक रमणीय और चमत्कारपूर्ण अर्थ प्रकट हो रहा हो वहीं ’ध्वनि’ की सत्ता मान्य होती है।
आचार्य मम्मट ने काव्य के उत्तम (ध्वनिकाव्य), मध्यम (गुणी काव्य), अधम (चित्र काव्य) तीन भेद किये हैं और उत्तम काव्य को ही ध्वनि काव्य कहा है –

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