अंतिम संशोधित (Last Updated): September 5, 2026
कोलरिज़ का कल्पना सिद्धांत (Coleridge’s Theory of Imagination): अर्थ, स्वरूप और मान्यताएँ
Table of Contents
पाश्चात्य काव्यशास्त्र और आलोचना जगत में एस.टी. कोलरिज़ (Samuel Taylor Coleridge – 1772–1834 ई.) के कल्पना सिद्धांत (Theory of Imagination) का अत्यंत महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी स्थान है। आज के इस आलेख में हम कोलरिज़ के कल्पना संबंधी विचारों, उसकी कोटियों और महत्वपूर्ण तथ्यों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
📌 इस लेख में आप आगे क्या-क्या पढ़ने वाले हैं? (Quick Overview):
कोलरिज़ के अनुसार कल्पना का अर्थ और महत्त्व
कल्पना (Imagination) और ललित कल्पना / फैंटेसी (Fantasy) में अंतर
कल्पना की दो प्रमुख कोटियाँ: प्राथमिक कल्पना और विशिष्ट (द्वितीयक) कल्पना
काव्य सृजन, प्रकृति की अनुकृति और उद्देश्य-भेद
विद्वानों के मत (डॉ. भागीरथ दीक्षित और डॉ. शांतिस्वरूप गुप्त)
अन्त में: प्रतियोगी परीक्षाओं (UGC NET/TGT/PGT) के लिए विशेष टिप्स और महत्वपूर्ण FAQ
कल्पना से तात्पर्य और कोलरिज़ के विचार
कोलरिज़ ने कल्पना की विस्तृत विवेचना की है। उनके अनुसार कवि को भौतिक तथा आध्यात्मिक तथ्यों का ज्ञान होना चाहिए। इसका संबंध उसकी कला से होता है। कोलरिज़ मानते थे कि कवि को सद्बुद्धि से प्रेरित होना चाहिए जिससे कि वह पाठकों में रुचि उत्पन्न कर सके। उसे क्रुद्ध तथा ईर्ष्यालु लोगों के शब्दों की नकल करने के लिए उनकी खोज में, उनके अशिक्षित समाज के इर्द-गिर्द चक्कर काटने की आवश्यकता नहीं है।
उसमें विवेक-बुद्धि को उत्पन्न करने वाला सहज बोध होना चाहिए, जिससे कि वह अपनी सर्जनात्मक शक्ति की सहायता से अपनी काव्य-रचना द्वारा उत्पन्न की हुई उत्तेजना की मात्रा और उसके प्रकारों को हृदयंगम करने में समर्थ हो सके। कोलरिज़ का कथन है कि यदि बाह्य नियमों के आधार पर काव्य-रचना का प्रयत्न किया जाता है, तो कविता कविता न रहकर एक यांत्रिक कला का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार की कविता की उपमा कोलरिज़ ने संगमरमर के बने उन ठण्डे और वजनदार आभूषणों से दी है जिनमें बच्चे केवल अपना मुँह ही मार सकते हैं।
इस प्रकार कोलरिज़ ने काव्य-सृजन के सिद्धांतों पर जोर दिया है। वह जिस रूप में कविता मौजूद हैं, उसका विश्लेषण न करते हुए सर्जनात्मक शक्ति का विवेचन करने के पक्ष में थे। कोलरिज़ के अनुसार कल्पना दो प्रकार की होती है – प्राथमिक और विशिष्ट। वे मानते हैं कि कल्पना द्वारा ही काव्य हृदयग्राही, मर्मस्पर्शी और सजीव बनता है। अतः कल्पना की क्षमता और महत्त्व सर्वोपरि होता है।
काव्य और कल्पना का स्वरूप
कल्पना-प्रयोग की अंतःशक्ति कवि का सर्वश्रेष्ठ गुण है और उसका समुचित प्रयोग काव्योत्कर्ष के क्षणों की समुचित देन है। वे इस ढंग से अपनी बात को स्पष्ट करते हैं कि ’’कल्पना वह शक्ति है जिसका प्रयोग कलाकार अपने सर्वोत्तम भावात्मक क्षणों में करता है।’’
कोलरिज़ के कल्पना-सिद्धांत को पर्याप्त ख्याति मिली। वास्तव में उसके अन्य सिद्धांतों की तुलना में कोलरिज़ की प्रसिद्धि का मूल कारण कल्पना-सिद्धांत ही है। प्रायः कल्पना को वह शक्ति या प्रक्रिया कहा गया है, जिससे प्रतिच्छवि का सर्जन संभव हो पाता है अथवा जिसके सहारे प्रतिच्छवि को ग्रहण या प्रत्यक्ष किया जाता है। अमूर्त धारणाओं और प्रत्ययों को कलाकार इसी के सहारे मूर्त रूप देता है।
मनुष्य इसी के सहारे सृजन में समर्थ होता है। एक शब्द में कह सकते हैं कि यदि कल्पना न हो तो किसी प्रतिच्छवि को प्रत्यक्ष करना संभव नहीं है। यही कलात्मकता जिसमें कल्पना का समावेश होता है, सृजन के लिए उपयोगी होती है। कल्पना का अंग्रेजी शब्द ’इमेजिनेशन’ लैटिन के ’इमेजीनेटिव’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ है – मानसिक चित्र की सृष्टि।
कल्पना और ललित कल्पना / फैंटेसी (Fantasy) में अंतर
कल्पना के साथ ही एक अन्य शब्द का प्रयोग भी किया जाता है — ’फैंटेसी’ / ललित कल्पना (Fantasy) जिसका अर्थ है — हल्की या यांत्रिक कल्पना। इस शब्द का मूल जर्मन शब्द ’फैंटेसिया’ है जो अंग्रेजी तक पहुँचते-पहुँचते फैंसी/फैंटेसी रह गया। अरस्तू से लेकर आधुनिक काल तक के विचारकों ने कल्पना पर विचार किया है। वर्ड्सवर्थ की एक कविता को सुनकर कोलरिज़ के मन में एक विशेष आकर्षण उत्पन्न हुआ। उसने अनुभव किया कि अपनी कविता में वर्ड्सवर्थ ने उन्हीं शब्दों, अलंकारों और बिम्बों का प्रयोग किया है जो दीर्घकाल से प्रयुक्त होते आ रहे हैं, किंतु फिर भी कवि ने उन सबका ऐसा सामंजस्य बिठाया है कि उसमें एक अतिरिक्त आकर्षण आ गया है। अतः वह आम कविता होकर भी विशिष्ट बन गयी है।
इस कविता में हृदयस्पर्शिता है, सुबोधिता है और हमारी बौद्धिक क्षमता को भी संतुष्ट करती है। कोलरिज़ ने घोषित किया कि जिस शक्ति के कारण यह कविता आकर्षित करती है, वह शक्ति कल्पना है। अतः उसने स्वीकार किया कि कल्पना में ही वह क्षमता है कि वह विरोधी और एक-दूसरे से असंबद्धित-से दिखने वाले तत्त्वों को अंगीकृत करती है और काव्य को उत्कर्ष, चारुता और रमणीयता प्रदान करती है।
कल्पना की कोटियाँ (प्राथमिक और विशिष्ट कल्पना)
कोलरिज़ ने कल्पना की दो कोटियाँ मानी हैं — प्राथमिक कल्पना (Primary Imagination) और विशिष्ट / द्वितीयक कल्पना (Secondary Imagination)।
उन्होंने बताया है कि ’’प्राथमिक कल्पना जीवन्त शक्ति है और सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान का मूल हेतु है। विशिष्ट कल्पना प्राथमिक कल्पना की प्रतिध्वनि मात्र है। इसका अस्तित्व इच्छा के अस्तित्व के साथ ही रहता है। इन दोनों कल्पनाओं के प्रकार-भेद नहीं है, केवल कोटि-भेद है। दोनों की कार्य-पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं।’’
कोलरिज़ ने ब्रह्मवादियों की भाँति आत्मा और जगत् दोनों को एक ही सत्ता के दो रूप स्वीकार किया है, किन्तु ब्रह्मवादियों ने आत्मा और जगत् के भिन्न-भिन्न प्रतीत होने के कारण माया को माना है। वहाँ कोलरिज़ ने उसका कारण कल्पना को स्वीकार किया है। यही कारण है कि एक ही चेतना खंड-खंड रूप में दिखाई देती है। ब्रह्म इसी कल्पना-शक्ति के माध्यम से सृष्टि के निर्माण में प्रवृत्त होता है। यह समस्त मानव-ज्ञान की एक सजीव शक्ति है और सम्पूर्ण मानव प्रत्यक्षीकरण का प्रमुख साधन है। प्राथमिक कल्पना सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान का मूल कारण तो है ही, क्योंकि इसके अभाव में उसे मानवीय ज्ञान का अनुभव और उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती है।
1. प्राथमिक कल्पना (Primary Imagination)
इन्द्रियों के सहारे हम जो भी अनुभव करते हैं, वह सबका सब अनुभव इसी ज्ञान का मूल हेतु है। प्राप्त ज्ञान को व्यवस्था देने का कार्य भी यही कल्पना करती है। यह प्राथमिक कल्पना उन सभी बिम्बों को एक-एक करके हमारे अस्तित्व-बोध को ज्ञान में बदल देती है। इस प्रकार प्राथमिक कल्पना एक महान सिद्धांत है जो व्यवस्थापिका वृत्ति का परिचायक है। सरल शब्दों में, यह प्राथमिक कल्पना हमारे अव्यवस्थित इन्द्रिय बोधों में एक संश्लिष्टता या व्यवस्था लाती है। अव्यवस्था में व्यवस्था का कार्य इसी कल्पना का प्रमुख कार्य है।
2. विशिष्ट या द्वितीयक कल्पना (Secondary Imagination)
यह प्राथमिक कल्पना का सजग मानवीय प्रयोग है। भाव यह है कि जब हम अपनी इच्छा से प्राथमिक कल्पना-शक्ति का प्रयोग करते हैं तो उस अवसर पर उसका जो रूप हो जाता है, उसे विशिष्ट कल्पना कहते हैं। प्राथमिक कल्पना जिस प्रकार इन्द्रिय-बोधों को एक संतुलन और व्यवस्था देती है, किन्तु महत्त्व की बात यह है कि यह व्यवस्था-कार्य प्राथमिक कल्पना के बिना किसी दबाव के – सहज रूप से करती है।
इसके विपरीत जब इस व्यवस्थापिका कल्पना का प्रयोग जानबूझकर या प्रयत्नपूर्वक किया जाता है, तब इसका मूल तो सुरक्षित रहता है, किन्तु कार्य-पद्धति में अन्तर हो जाता है। फलतः इसका श्रेणी-भेद भी बदल जाता है। कार्य-पद्धति में भेद का कारण हमारी स्वयं की इच्छा है। यह विशिष्ट कल्पना कलाकारों या चित्रकारों में पायी जाती है। जनसाधारण में इसका प्रसार और प्रभाव नहीं देखा जाता है।
यह कल्पना प्राथमिक या आद्य कल्पना शक्ति की प्रतिध्वनि है, उसका सजग मानवी प्रयोग है। वह कलाकार को इस बाह्य संसार का प्रस्तुतीकरण तथा पुनःसृजन करने में सहयोग देती है। उसी की सहायता से कलाकार इस बाह्य जगत् को अधिक पूर्ण रूप में प्रस्तुत करता है। वह अनेक विषयों में एकसूत्रता लाती है, विषय और विषयी का समन्वय करती है, अनेक रूपों और व्यापारों को एक संबद्ध एवं अखंड रूप में प्रस्तुत करती हुई भिन्न-भिन्न बिम्बों को व्यवस्थित करती है।
प्राथमिक कल्पना और विशिष्ट कल्पना में अन्तर यह है कि प्राथमिक कल्पना सहज रूप में बोधों को व्यवस्थित करती है और विशिष्ट कल्पना का प्रयोग सजग रूप में स्वेच्छा से किया जाता है। महत्त्व दोनों कल्पनाओं का है। कोलरिज़ के कल्पना विषयक विचार मौलिक हैं। उनकी कल्पना विषयक धारणा जर्मन विचारक कांट से भी भिन्न है। कांट ने कल्पना को काव्य-रचना का गुण नहीं स्वीकार किया है। उन्होंने तो कल्पना को केवल संश्लेषणात्मक शक्ति माना है। कोलरिज़ की स्थिति इससे भिन्न है। उनकी कल्पना रचनात्मक क्षमता से युक्त है और वह सक्रिय है।
कोलरिज़ मानते थे कि कला प्रकृति की अनुकृति नहीं है। कारण, अनुकृति का कार्य व्यर्थ की प्रतिद्वन्द्विता है। प्रकृति असल है और उसकी नकल की क्षमता किसी भी कलाकार में नहीं होती है। अतः कलाकार कल्पना के सहारे पुनः सृजन करता है और यह सृजन उसकी भावना के आधार पर होता है। इसमें उसे आनन्द भी मिलता है। इस प्रकार के सृजन में कल्पना ही उसका सर्वाधिक साथ देती है।
कल्पना और ललित कल्पना / फैंटेसी (Fantasy) का भेद
कोलरिज़ के अनुसार कल्पना (प्राथमिक कल्पना अथवा इमेजीनेशन) जीवन्त शक्ति है। इसी कल्पना के आधार पर मनुष्य ज्ञानार्जन में समर्थ होता है। यही व्यवस्थापिका भी है। यही हमें ज्ञान भी देती है। फैंटेसी / ललित कल्पना (Fantasy) वह शक्ति है जिसे ’सैकण्डरी इमेजीनेशन’ से इतर मानकर समझा जाता है। यह प्राथमिक कल्पना-शक्ति का वह रूप है जो मौलिक सृजन न करके केवल पूर्व-निर्मित बिम्बों और स्मृतियों के यांत्रिक संयोजन का कार्य करती है।
प्राथमिक कल्पना अव्यवस्थित इन्द्रियबोधों को व्यवस्थित करती है, किन्तु फैंटेसी या ललित कल्पना केवल बिम्बों की जोड़-तोड़ और सजावट करती है। इस विशिष्ट अथवा ललित-कल्पना-शक्ति का प्रयोग अपनी सीमा के भीतर अन्य कलाओं में भी देखा जाता है।
काव्य और अकाव्य का अंतर: उद्देश्य और विषय-वस्तु
यहाँ यह शंका उत्पन्न हो सकती है कि जब चित्रकार, कवि, दार्शनिक और इतिहासकार सभी इसी विशिष्ट अथवा ललित कल्पना-शक्ति के द्वारा सृजन करते हैं, तो उनकी कृतियों में अन्तर क्यों और किस कारण से आता है।
वास्तव में ये सभी अपनी अभिव्यक्ति में भाषा अथवा रंगों का प्रयोग करते हैं। इस अर्थ में सबके माध्यम एक जैसे हैं। छन्दबद्ध होने के कारण दार्शनिक और इतिहास-ग्रंथ काव्य नहीं कहे जा सकते और न छन्दरहित होने के कारण कोई रचना काव्य-जगत् से बहिष्कृत की जा सकती है। स्पष्ट है कि काव्य और अकाव्य का अन्तर छन्द नहीं हो सकते हैं। कोलरिज़ ने कविता तथा कल्पना की अन्य विधियों में अन्तर स्पष्ट करते हुए अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया है— ’’किसी भी भाषा-सृष्टि का कोई न कोई उद्देश्य होता है। दार्शनिक, इतिहासकार, उपदेशक, वैज्ञानिक और कवि विभिन्न उद्देश्यों को लेकर अपनी-अपनी कृतियों की सर्जना करते हैं। इनकी कृतियों में अन्तर समझने के लिए उनके उद्देश्य-भेद को जान लेना आवश्यक है।’’
इस प्रकार स्पष्ट है कि छन्दोबद्ध और छन्दरहित होने को ही यदि कोई विभिन्न भाषात्मक कृतियों के अन्तर को एक आधार स्वीकार करें तो कोलरिज़ को कोई आपत्ति नहीं है। कोलरिज़ तो उद्देश्य और विषय-वस्तु के अन्तर को ही विभिन्न कृतियों की विभिन्नता का कारण मानते हैं। अभिप्राय यह है कि उद्देश्य और विषय-वस्तु में भेद होने से कृतियों में अन्तर आ जाता है।
विद्वानों के मत
डॉ. भागीरथ दीक्षित: ने स्वीकार किया है कि कोलरिज़ ने कल्पना की विस्तृत व्याख्या की है। उन्होंने अपने ढंग से कोलरिज़ की कल्पना को समझाने का प्रयत्न किया है। उन्होंने लिखा है कि ’’प्राथमिक कल्पना के द्वारा हमें वस्तुओं का प्राथमिक ज्ञान प्राप्त होता है। यह सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान का मूल हेतु है। यदि यह शक्ति मनुष्य में न रहती, तो उसे व्यवस्थित ज्ञान न होता।….. विशिष्ट कल्पना उस प्राथमिक कल्पना-शक्ति का सजग मानवीय प्रयोग है। तात्पर्य यह है कि जब हम अपनी इच्छा से प्राथमिक कल्पना-शक्ति का प्रयोग करते हैं, तो उस अवसर पर उसका जो रूप हो जाता है, उसे विशिष्ट कल्पना कहते हैं।’’
डॉ. शांतिस्वरूप गुप्त: ने भी अपनी भाषा में इन्हीं तथ्यों को व्यक्त किया है।
प्रतियोगी परीक्षा (UGC NET / TGT / PGT) विशेष टिप्स
🎯 परीक्षा के लिए ब्रह्मास्त्र टिप्स:
कल्पना के भेद: कोलरिज़ ने कल्पना के दो प्रकार माने हैं— प्राथमिक (Primary) और विशिष्ट/द्वितीयक (Secondary)। परीक्षाओं में अक्सर इनके अंतर को लेकर सवाल पूछा जाता है।
फैंटेसी / ललित कल्पना (Fantasy): कोलरिज़ ने फैंटेसी (ललित कल्पना) को उच्च कोटि की सर्जनात्मक कल्पना से भिन्न माना है क्योंकि यह मौलिक सृजन करने के बजाय केवल पूर्व-निर्मित बिम्बों और स्मृतियों के संयोजन या जोड़-तोड़ का कार्य करती है।
यांत्रिक कला की उपमा: कोलरिज़ ने बाह्य नियमों के आधार पर की गई काव्य-रचना को ‘संगमरमर के ठंडे और वजनदार आभूषणों’ जैसी यांत्रिक कला कहा है। इसे याद रखें।
निष्कर्ष
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि कोलरिज़ की कल्पना सम्बन्धी मान्यता अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि कल्पना के द्वारा ही सर्जक कलाकार प्रतिबोधन और अवबोधन के बीच की खाई को पाटने में सफल हो पाता है। बुद्धि अनुशासित कर सकती है, नियंत्रित कर सकती है, किन्तु कल्पना वह जीवन्त शक्ति है, जिसके सहारे रिक्तता को पूर्णता में बदला जा सकता है। कल्पना की इसी क्षमता और इसी विशिष्टता को कोलरिज़ ने बार-बार रेखांकित किया है।


