Kabir Das ka Jivan Parichay | कबीर दास का जीवन परिचय

अंतिम संशोधित (Last Updated): September 1, 2026

आज के इस आर्टिकल में हम भक्तिकाल के चर्चित कवि संत कबीरदास के संपूर्ण जीवन परिचय (Kabir Das ka Jivan Parichay), उनकी दार्शनिक विचारधारा, भाषा-शैली और उनके काव्यगत सौंदर्य को विस्तार से पढ़ेंगे। हिंदी साहित्य की निर्गुण ज्ञानमार्गी शाखा के प्रमुख प्रतिनिधि कवि के रूप में कबीर का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।

📌 संत कबीर दास का जीवन परिचय (Quick Facts)

Table of Contents

विवरणतथ्य / विवरण
पूरा नामसंत कबीरदास
जन्मसन् 1398 ई. (अनुमानित), ज्येष्ठ मास पूर्णिमा
निधनसन् 1518 ई. (अनुमानित)
जन्म स्थानलहरतारा, काशी, उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु स्थानमगहर, उत्तर प्रदेश
गुरुस्वामी रामानंद
प्रमुख साहित्यसाखी, सबद, रमैनी (इनका संग्रह ‘बीजक’ है)
दार्शनिक विचारनिर्गुण ब्रह्म / अद्वैतवाद
पिता का नामनीरू (पालक पिता)
माता का नामनीमा (पालक माता)
पत्नी का नामलोई
पुत्र / पुत्रीकमाल, कमाली

भारतीय धर्म साधना के इतिहास में कबीर ऐसे महान् विचारक एवं प्रतिभाशाली महाकवि हैं. इनका जन्म 1398 ई. में हुआ था और वे दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी के समकालीन थे। कबीर मूल रूप से एक महान समाज-सुधारक और क्रांतिकारी कवि थे, जिन्होंने बाह्य आडंबरों, जाति-पाँति और संप्रदायवाद का कड़ा विरोध किया।

📚 कबीर की रचनाएँ और ‘बीजक’

कबीर निरक्षर थे, उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था— “मसि कागद छूयौं नहीं कलम गह्यौ नहिं हाथ।” उनके शिष्यों ने उनकी वाणियों और पदों को संकलित किया।

  • कबीर की समस्त रचनाओं का मुख्य प्रामाणिक संग्रह ‘बीजक’ है।

  • इस बीजक ग्रंथ के संकलनकर्ता उनके प्रिय शिष्य धर्मदास हैं (जिन्होंने इसे 1464 ई. में संकलित किया)।

  • बीजक के प्रमुख तीन भाग हैं: साखी, सबद और रमैनी

🗣️ कबीर की भाषा के विषय में विद्वानों के विभिन्न मत

कबीर की भाषा को लेकर हिंदी साहित्य के विभिन्न इतिहासकारों और आलोचकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से अलग-अलग नाम दिए हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

विद्वान / आलोचकभाषा के संबंध में दिया गया मत / नाम
डॉ. श्यामसुंदर दासपंचमेल खिचड़ी
गोविंद त्रिगुणायतसधुक्कड़ी
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीवाणी के डिक्टेटर (भाषा पर जबरदस्त अधिकार)
सुनीति कुमार चटर्जीब्रज भाषा
डॉ. बच्चन सिंहसंत भाषा
बाबू राम सक्सेनाअवधी भाषा
आचार्य रामचंद्र शुक्लसधुक्कड़ी (राजस्थानी-पंजाबी मिली खड़ी बोली)

💡 कबीर दास से जुड़े कुछ अन्य महत्वपूर्ण तथ्य

  • गुरुदीक्षा: कबीर ने स्वामी रामानंद से रामभक्ति का मंत्र प्राप्त किया था, किंतु उनके राम दशरथ के पुत्र न होकर ‘निर्गुण ब्रह्म’ के प्रतीक थे।

  • क्रांतिकारी दृष्टिकोण: डॉ. बच्चन सिंह ने कबीर के संबंध में लिखा है कि “हिंदी भक्ति काव्य का प्रथम क्रांतिकारी पुरस्कर्ता कबीर हैं।”

  • व्यक्तित्व: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उनके फक्कड़ और मस्तमौला स्वभाव का वर्णन करते हुए उन्हें सिर से पैर तक मस्तमौला कहा है और भाषा का ‘डिक्टेटर’ माना है, क्योंकि शब्दों पर उनका असीम नियंत्रण था।

Kabir Das
Kabir Das

📌 कबीर का संक्षिप्त परिचय और जीवन-वृत्त (Quick Facts)

  • समय-काल: 1398 – 1518 ईस्वी (संवत् 1455-1575)

  • जन्मतिथि व मतैक्य: कबीर की जन्मतिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद है। एक प्रसिद्ध दोहे के अनुसार इनका जन्म संवत् 1455 में माना जाता है—

    चौदह सौ पचपन साल गये, चन्द्रवार एक ठाठ भये।

    जैठ सुदी बरसाइत को, पूरनमासी प्रगट भये।।

  • जन्म स्थान: काशी (लहरतारा ताल)। जन्म व निधन स्थान की प्रसिद्ध ट्रिक है — ‘काम’ (का से काशी, म से मगहर)।

  • निधन: एक जनश्रुति और ‘कबीर चरित्र बोध’ के अनुसार संवत् 1575 (1518 ईस्वी) में माघ सुदी एकादशी के दिन इन्होंने मगहर में शरीर त्याग किया—

    सवंत पन्द्रह सौ पछत्तरा, कियो मगहर को गौन।

    माघ सुदी एकादशी, रलो पौन में पौन।।

  • माता-पिता व पालन-पोषण: किंवदंतियों (भक्तमाल के अनुसार) के अनुसार स्वामी रामानंद के वरदानस्वरूप एक विधवा ब्राह्मण कन्या को पुत्र प्राप्त हुआ, जिसे लोकापवाद के भय से वह लहरतारा के ताल पर छोड़ आई। उधर से गुजरने वाले नीरू जुलाहा और उसकी पत्नी नीमा ने उस बालक को अपने घर लाकर उसका पालन-पोषण किया।

  • पारिवारिक जीवन: कबीर की पत्नी का नाम लोई तथा संतान के रूप में पुत्र कमाल और पुत्री कमाली का उल्लेख मिलता है।

  • गुरु: इनके मुख्य गुरु स्वामी रामानंद थे। वहीं, मुसलमानों के अनुसार इनके गुरु सूफी फकीर शेख तकी (जो सिकंदर लोदी के पीर थे) माने जाते हैं।

  • समकालीन शासक: दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी (1488-1517 / सं. 1545-1574) तथा बघेल राजा नाहरसिंह देव इनके समकालीन थे। सिकंदर लोदी द्वारा कबीर को दी गई यातनाओं का वर्णन अनन्तदास कृत ‘कबीर-परिचई’ और प्रियादास द्वारा रचित ‘भक्तमाल की टीका’ में मिलता है।

📚 कबीर की रचनाएँ और ‘बीजक’

आजकल उपलब्ध रचनाओं में कबीर के पद, साखियाँ, रमैनियाँ आदि सम्मिलित हैं। ‘पंचबानी’, ‘सर्वंगी’ आदि ग्रंथों में अन्य संतों के साथ कबीर की रचनाएँ भी संगृहीत हैं। इसके अलावा ‘कबीर-बीजक’, ‘कबीर-बानी’ तथा ‘सत्य कबीर साखी’ जैसे स्वतंत्र काव्य संग्रह भी उपलब्ध हैं।

कबीर की वाणियों का सबसे पुराना नमूना सिखों के पवित्र ग्रंथ ‘गुरु ग्रन्थ साहिब’ (संकर्ता – गुरु अर्जुन देव, 1661 ई.) में ‘रागू’ व ‘सलोक’ शीर्षक से मिलता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, कबीर की वचनावली की सबसे प्राचीन प्रति सन 1512 ई. की लिखी हुई है।

कबीर-बीजक का परिचय:

कबीर की वाणियों का संग्रह उनके शिष्य धर्मदास ने ‘बीजक’ नाम से सन 1464 ई. में किया था। बीजक के मुख्य तीन भाग हैं:

  1. साखी (साक्षी):

    • इसमें कबीर द्वारा रचित दोहों को शामिल किया गया है।

    • इसमें सांप्रदायिक शिक्षा और सिद्धांत के उपदेश हैं।

    • इसकी भाषा सधुक्कड़ी है।

    • इसका विभाजन कुल 59 अंगों में किया गया है, जिसमें प्रथम अंग ‘गुरुदेव को अंग’ और अंतिम अंग ‘अबिहड़ को अंग’ है।

  2. सबद (शब्द):

    • इस भाग में कबीर द्वारा रचित गेय पदों को शामिल किया गया है।

    • इसकी भाषा ब्रज या पूर्वी बोली है।

    • इस भाग में कबीर के माया संबंधी विचारों की प्रमुख अभिव्यक्ति हुई है।

  3. रमैणी:

    • इस भाग में कबीर द्वारा रचित राम संबंधी पदों व चौपाइयों को शामिल किया गया है।

    • इसकी भाषा भी ब्रज या पूर्वी बोली है।

📊 कबीर की रचनाओं में प्रयुक्त छंद एवं भाषा तालिका

रचनाअर्थप्रयुक्त छंदभाषा
रमैणीरामायणचौपाई + दोहाब्रजभाषा और पूर्वी बोली
सबदशब्दगेय पदब्रजभाषा और पूर्वी बोली
साखीसाक्षीदोहाराजस्थानी, पंजाबी मिली खड़ी बोली

🗣️ विद्वानों के महत्वपूर्ण मत एवं कथन

  • डॉ. बच्चन सिंह: “हिन्दी भक्ति काव्य का प्रथम क्रान्तिकारी पुरस्कर्ता कबीर है।”

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: कबीर को ‘भाषा का डिक्टेटर’ कहा है, क्योंकि भाषा पर उनका जबरदस्त अधिकार था।

  • विद्वानों द्वारा कबीर की भाषा का वर्गीकरण:

विद्वानकबीर की भाषा का नाम / मत
डॉ. श्यामसुंदर दासपंचमेल खिचड़ी
आचार्य रामचंद्र शुक्लसधुक्कड़ी
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदीभाषा के डिक्टेटर

संत कबीर दास के संबंध में विद्वानों के महत्वपूर्ण कथन और समीक्षा (Kabir Das Ji Ka Jivan Parichay)

संत कबीर दास के व्यक्तित्व, दर्शन, भाषा और उनके काव्य पर हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित आलोचकों (जैसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. श्यामसुंदर दास, डॉ. बच्चन सिंह आदि) द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण विचार और कथन प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, और कॉलेज लेक्चरर) की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यहाँ इन सभी विद्वानों के महत्वपूर्ण कथनों को संकलित किया गया है:

📌 आचार्य रामचंद्र शुक्ल के कथन

  • “इसमें कोई सन्देह नहीं कि कबीर ने ठीक मौके पर जनता के उस बङे भाग को सँभाला जो नाथ पंथियों के प्रभाव से प्रेमभाव और भक्ति रस से शून्य शुष्क पङता जा रहा था।”

  • “उन्होंने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खङा किया।”

  • “भाषा बहुत परिष्कृत और परिमार्जित न होने पर भी कबीर की उक्तियों में कहीं-कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें बङी प्रखर थी इसमें सन्देह नहीं है।”

  • “साम्प्रदायिक शिक्षा और सिद्धान्त के उपदेश मुख्यतः ‘साखी’ के भीतर है, जो दोहों में है। इसकी भाषा सधुक्कङी अर्थात् राजस्थानी पंजाबी मिली खङी बोली है।”

  • “निर्गुण पंथ में जो थोङा बहुत ज्ञान पक्ष है वह वेदान्त से लिया हुआ है। जो प्रेत तत्त्व है वह सूफीयों का है। अहिंसा, और प्रप्रति के अतिरिक्त वैष्णवता का और कोई अंश उसमें नहीं है। उसके सुरति और निरति शब्द बौद्ध सिद्धों के है।”

📌 आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कथन

  • “हिन्दी साहित्य के हजार वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। महिमा में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वंद्वी जानता है तुलसीदास।”

  • “कबीर ने ऐसी बहुत बाते कही है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है पर, इसलिए उनको समाज सुधारक समझना गलती है।”

  • “वे सिर से पैर तक मस्तमौला, स्वभाव से फक्कङ फकीर थे।”

  • “भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था वे वाणी के डिक्टेटर थे।”

  • “वे (कबीर) भगवान के नृसिंहावतार के मानो प्रतिमूर्ति थे।”

📌 डॉ. श्यामसुन्दर दास के कथन

  • “जहाँ कबीर की राख को समाधिस्थ किया गया था वह स्थान बनारस में अब तक कबीर चैरा के नाम से प्रसिद्ध है।”

  • “‘कबीर’ की भाषा का निर्णय करना टेढी खीर है, क्योंकि वह खिचङी है।”

📌 डॉ. बच्चन सिंह के कथन

  • “कबीर की भाषा संत भाषा है। भाषा की यह स्वाभाविकता आगे चलकर प्रेमचन्द में ही मिलती है।”

  • “यह कहना कि वे समाज-सुधारक थे गलत है। यह कहना कि वे धर्म-सुधारक थे, और भी गलत है। यदि सुधारक थे तो रैडिकल सुधारक। वे धर्म के माध्यम से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहते थे।”

📌 लक्ष्मी सागर वार्ष्णेय के कथन

  • “कबीर की रचनाओं में भारतीय निर्गुण ब्रह्मवाद, सूफियों का रहस्यवाद, योगियों की साधना, अहिंसा आदि की बातें होते हुए भी स्वामी की दृष्टि से सगुण ब्रह्म का उल्लेख हो गया है।”

  • “कबीर प्रधानतः उपदेशक और समाज सुधारक थे।”

📌 डॉ. नगेन्द्र का कथन

  • “भारतीय धर्मसाधना के इतिहास में कबीरदास ऐसे महान विचारक एवं प्रतिभाशाली महाकवि है।”

📌 डॉ. चन्द्रबली पाण्डेय का कथन

  • “कबीर का रहस्यवाद प्रायः शुष्क और नीरस है।”

📌 डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त का कथन

  • “कबीर की सैद्धांतिक या दार्शनिक मान्यताएँ अद्वैतवाद के अनुकूल है। व्यावहारिक क्षेत्र में कबीर पूर्णतः प्रगतिशील दिखाई पङते है।”

📚 कबीर की विचारधारा (सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्ष)

कबीर की विचारधारा को मुख्य रूप से दो पक्षों में विभाजित किया जा सकता है:

1. सैद्धांतिक पक्ष (दार्शनिक दृष्टिकोण)

सैद्धांतिक दृष्टि से कबीर को किसी एक रूढ़िवादी मत से संबंधित नहीं किया जा सकता। उन्होंने अपने गुरु रामानंद से रामभक्ति का मंत्र जरूर लिया था, किंतु उनके राम दशरथ के पुत्र या ‘दुष्ट दलन रघुनाथ’ नहीं थे। उनके राम ‘निर्गुण’ और ‘ब्रह्म’ के पर्यायवाची थे।

  • अद्वैतवाद का प्रभाव: ब्रह्म, जीव, जगत और माया आदि तत्त्वों का निरूपण उन्होंने भारतीय अद्वैतवाद के अनुसार किया है। उनके अनुसार जगत में जो कुछ भी है, वह सब ब्रह्म ही है और अंत में सब उसी में विलीन हो जाता है—

    “पाणी ही ते हिम भया, हिम हवै गया bिलाय।

    जो कुछ था सोई भया, अब कुछ कहा न जाई।।”

  • माया का स्वरूप: कबीर ने संसार को मिथ्या और माया को भ्रम का आख्यान माना है। माया को उन्होंने जीव और ईश्वर के बीच बाधक बताया है—

    “कबीर माया पापणी हरि सूँ करै हराम।

    मुखि कइियाली कुमति की कहण न देई राम।।”

2. व्यावहारिक पक्ष (सामाजिक सुधार और विरोध)

कबीर मूलतः एक महान समाज-सुधारक थे। भक्ति के प्रसार के साथ-साथ उन्होंने समाज में फैली कुप्रथाओं, रूढ़ियों और पाखंडों का उग्र विरोध किया:

  • तीर्थाटन का विरोध:

    “गंगा नहाए कहो को नर तरिंगे, मछरी न तरी जाको पानी में घर है।।”

  • मूर्तिपूजा का विरोध:

    “पाहन पूजे हरि मिलैं ता मैं पूजू पहार।

    ताते तो चाकी भली पीस खाय संसार।।”

  • हिंसा का विरोध:

    “दिन भर रोजा रखत है रात हनत है गाय।

    यह तो खून वह बन्दगी कैसी खुशी खुदाय।।”

  • जाति-पाँति और छुआछूत का खंडन:

    “एक बूँद ते विश्व रच्यो है को बाम्हन को शुद्रा।

    एकै बूँद, एकै मलमूतर, एकै चाम एक गूदा।।”

  • साम्प्रदायिकता का विरोध: हिंदू और मुसलमानों की संकीर्णता पर प्रहार करते हुए उन्होंने कहा—

    “हिन्दू कहे मोहे राम पियारा और तुरक रहमाना।

    आपस में दोऊ लरि मुए मरम न काहू न जाना।।”

🧘 साधना पद्धति, गुरु महिमा और योग साधना

  • गुरु की महत्ता: कबीर ने सिद्धों की भाँति गुरु को ईश्वर से भी बढ़कर माना है—

    “सतगुरु हम सौं रीझि कर एक कह्या प्रसंग।

    बरस्या बादल प्रेम का भीग गया सब अंग।।”

  • हठयोग और षट्चक्र भेदन: सिद्धों और नाथों की हठयोग साधना का प्रभाव कबीर पर स्पष्ट दिखाई देता है। उन्होंने इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्ना नाड़ियों को क्रमशः गंगा, यमुना और सरस्वती नाम दिया।

  • प्रतीक और उलटबाँसियाँ: प्रतीकों के प्रयोग में कबीर अत्यंत सिद्धहस्त थे। उनकी ‘उलटबाँसियाँ’ सिद्धों से प्रभावित हैं, जो विपरीत कथन के माध्यम से पाठकों को चमत्कृत करती हैं—

    “समुन्दर लागी आग नदियाँ जलि कोइया भई।

    देख कबीरा जाग मंछि रुखा चढ़ि गई।।”

    (यहाँ समुद्र मूलाधार चक्र का, नदियाँ चित्तवृत्तियों का और मछली कुंडलिनी का प्रतीक है।)

  • जीव और ब्रह्म का अभेद:

    “जल में कुम्भ कुम्भ में जल बाहर भीतर पानी।

    फूटा कुम्भ जल जलहि समाना, यह तथ्य कह्यो ज्ञानी।।”

    (यहाँ घड़ा शरीर/माया का प्रतीक है, घड़े का आंतरिक जल जीवात्मा और बाहर का जल परमात्मा का प्रतीक है।)

🎨 कबीर का काव्यगत सौंदर्य (Kavya Saundarya)

कबीर का काव्य कला की दृष्टि से भी उच्च कोटि का है। यद्यपि वे मूलतः उपदेशक, विचारक और समाज-सुधारक थे, किंतु उनके पास अद्भुत कल्पनाशक्ति थी:

  • भाषा-शैली: कबीर की भाषा को लेकर विद्वानों में अलग-अलग मत हैं:

    • आचार्य रामचंद्र शुक्ल: ‘सधुक्कड़ी भाषा’

    • डॉ. श्याम सुंदर दास: ‘पंचमेल खिचड़ी’

    • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: इन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा है।

    • आचार्य विश्वनाथ प्रसाद त्रिपाठी: ‘पूर्वी हिंदी’

  • भावपक्ष: कबीर के काव्य में शांत रस की प्रधानता है। उनके काव्य में जहाँ एक ओर तार्किकता की शुष्कता दिखती है, वहीं दूसरी ओर ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, आत्मनिवेदन और करुणा का अगाध सागर भी बहता है।

  • कलापक्ष: उन्होंने रूपक, दृष्टांत, उपमा, अनुप्रास और विरोधाभास अलंकारों का सहज और प्रभावशाली प्रयोग किया है। उनकी उक्तियों में गागर में सागर भरने की अद्भुत क्षमता है।

कबीर की  काव्य भाषा :

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ कहा है, क्योंकि इसमें विभिन्न बोलियों और भाषाओं के शब्दों का मिश्रण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। कबीर की भाषा को लेकर आलोचकों में कई प्रकार के मत हैं:

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल: कबीर की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ कहा है, जिसमें राजस्थानी और पंजाबी युक्त खड़ी बोली का प्रभाव प्रमुख रूप से मिलता है।

  • डॉ. श्यामसुंदर दास: कबीर की भाषा को ‘पंचमेल खिचड़ी’ की संज्ञा दी है, क्योंकि इसमें अनेक बोलियों के शब्द आपस में घुल-मिल गए हैं।

  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी: कबीर के भाषिक वैविध्य और शब्दों पर उनके अद्वितीय नियंत्रण को देखते हुए उन्हें ‘वाणी का डिक्टेटर’ कहा है।

  • डॉ. गोविन्द त्रिगुणायत: कबीर की भाषा में भोजपुरी, पंजाबी, बंगाली, मैथिली और राजस्थानी जैसी विभिन्न प्रांतीय बोलियों की शब्दावली का व्यापक समावेशन पाया है।

कबीर की भाषा की मुख्य विशेषताएं और स्वरूप:

  • घुमक्कड़ प्रवृत्ति और सर्वग्राही स्वभाव: संत होने के कारण कबीर का घुमक्कड़ स्वभाव और स्थान-स्थान पर उपदेश देना उनकी भाषा के विस्तार का मुख्य कारण रहा।

  • विविध शब्दावली का प्रयोग: उनकी भाषा में संस्कृत (जैसे- गगनमंडल, अमृत), अरबी (जैसे- हक, इश्क), देशज (जैसे- मुंडारा), और पंजाबी (जैसे- बिच) के शब्द सहज रूप से मिल जाते हैं।

  • विषय और भाव के अनुरूप भाषा: कबीर ने अपनी बात कहने के लिए पात्र और प्रसंग के अनुकूल भाषा का चयन किया। उदाहरण के लिए, हिंदुओं और पंडितों को संबोधित करते समय उनकी भाषा में खड़ी बोली का ठेठ रूप दिखता है, तो वहीं मुसलमानों या मुल्लाओं को संबोधित करते समय उसमें तदनुकूल शब्दों की झलक मिलती है।

  • नाथपंथियों का प्रभाव: नाथ संप्रदाय के प्रभाव के कारण उनकी कविताओं और साखियों में ‘उलटबाँसियों’ (जैसे सूर्य, चंद्रमा और नाड़ियों के प्रतीकों का प्रयोग) का अनूठा सौंदर्य देखने को मिलता है।

 

  • 🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि

    क्र.सं.लेखक / कवि का नाममुख्य विशेषता / कालइंटरनल लिंक (URL)
    1.भारतेंदु हरिश्चंद्रआधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युगलिंक देखें(उदाहरण यूआरएल)
    2.महावीर प्रसाद द्विवेदीद्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकारलिंक देखें
    3.जयशंकर प्रसादछायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककारलिंक देखें
    4.सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेतालिंक देखें
    5.सुमित्रानंदन पंतप्रकृति के सुकुमार कवि / छायावादलिंक देखें
    6.महादेवी वर्माआधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्रीलिंक देखें
    7.प्रेमचंद (धनपत राय)उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुषलिंक देखें
    8.अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तकलिंक देखें
    9.रामधारी सिंह ‘दिनकर’राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कविलिंक देखें
    10.कृष्णा सोबतीआधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षरलिंक देखें

FAQ :

 

बीजक किसकी रचना है ?
बीजक संत कबीर दास की रचनाओं का प्रसिद्ध प्रमाणिक संग्रह है, जिसे उनके शिष्य धर्मदास द्वारा संकलित किया गया था।
कबीर के गुरु कौन थे ?
कबीर दास के मुख्य गुरु स्वामी रामानंद थे, जिनसे इन्होंने रामनाम का मंत्र प्राप्त किया था।
कबीर का जन्म कब हुआ था ?
संत कबीर दास का जन्म संवत 1455 (सन् 1398 ईस्वी) में ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को काशी के लहरतारा नामक स्थान पर हुआ था।
कबीर किस काल के कवि थे ?
कबीर दास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के अंतर्गत ‘निर्गुण ज्ञानमार्गी शाखा’ (संत काव्यधारा) के प्रतिनिधि और प्रमुख कवि थे।

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