हिंदी कहानियों की प्रमुख शैलियाँ और उनका स्वरूप | Hindi Kahaniyon ki Pramukh Shailiyan

अंतिम संशोधित (Last Updated): August 20, 2026

आज की पोस्ट में हम हिंदी कहानियों की प्रमुख शैलियाँ (Genre of Story) को विस्तार से समझेंगे। हम आशा करते हैं कि यह जानकारी आपके लिए उपयोगी साबित होगी।

जिस प्रकार कहानी की भाषा के कई रूप हो सकते हैं, उसी प्रकार कहानी की शैली के भी कई रूप हो सकते हैं। वर्तमान आलोच्य युग में अनेक प्रकार की कहानी शैलियाँ प्रचलित हैं:

  1. वर्णनात्मक शैली

  2. विश्लेषणात्मक शैली

  3. आत्मकथात्मक शैली

  4. संवादात्मक शैली

  5. नाटक शैली

  6. डायरी शैली

  7. पत्र शैली

  8. काव्यात्मक शैली

  9. लोक कथात्मक शैली

  10. स्मृतिपरक शैली

  11. स्वप्न शैली

  12. मनोविश्लेषणात्मक शैली

यहाँ कहानी कला की प्रमुख शैलियों का विस्तार से परिचय दिया जा रहा है:

(1) मनोविश्लेषणात्मक शैली

ऐसी कहानियों का आधार फ्रायड का मनोविज्ञान है। इसमें अवचेतन मन को प्रधान मानकर चला जाता है। कहानीकार पात्रों का अन्तर्विश्लेषण करके व्यक्ति की मनःस्थिति को स्पष्ट करता है। इसमें स्थूल घटनाओं की कमी होती है। अज्ञेय के ’विपथगा’ नामक कहानी-संग्रह की सभी कहानियाँ इसी प्रकार की हैं। हिन्दी में जैनेन्द्र, इलाचन्द्र जोशी, यशपाल, कमलेश्वर, मोहन राकेश आदि की कहानियों में मनोविश्लेषण शैली में विवरण अधिक मिलता है।

जैनेन्द्र की ’पत्नी’ श्रेष्ठ मनोविश्लेषणात्मक कहानी है। इसमें व्यक्तित्व के दोहरेपन, यौन सम्बन्धी ग्रंथियों और प्रणयन सम्बन्धी काॅम्पलेक्स के सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत किये गये हैं। जैनेन्द्र की कहानियों में जीवन की असाधारण परिस्थितियों के बीच मानव का मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है, जैसे उनकी ’चलितचित्र’ कहानी। अज्ञेय कृत ’अकलंक’ व ’शत्रु’ नामक कहानियाँ भी मनोविश्लेषणात्मक हैं। ’शत्रु’ में लेखक ने मानव प्रवृत्ति का विश्लेषण करते हुए बतलाया है कि वह सरलता की तरफ आसानी से झुक जाता है। कुछ कहानियाँ अपराध मनोविज्ञान पर भी लिखी गई हैं, यथा – शिवानी की कहानियाँ।

(2) पत्र-शैली

पत्र के रूप में कहानी लिख दी जाए, तो उसे पत्र-शैली में रचित कहानी कहते हैं। नायक-नायिका के परस्पर पत्रों के माध्यम से ही लेखक कहानी का ताना-बाना तैयार कर देता है। इस शैली में हिन्दी की गिनी-चुन्नी कहानियाँ लिखी गई हैं, जैसे- ’कवि की स्त्री’। कमलेश्वर की ’मानसरोवर के हंस’ कहानी भी पत्र-शैली में लिखी गई है।

इसमें कथा का विकास पात्रों के उत्तर-प्रत्युत्तरों के माध्यम से होता है, किन्तु लेखक को तर्कवादिता का आश्रय नहीं लेना चाहिए। इस शैली का प्रचलन प्रेमचन्द जी के जमाने में हो गया था। प्रेमचन्द की ’दो सखियाँ’ तथा प्रसाद कृत ’देवदासी’ भी इसी शैली में लिखी गई हैं। इस शैली में लेखक अधिक स्वतन्त्र नहीं रहता है। प्रत्यक्ष घटनाओं का अभाव रहता है और वर्णनात्मकता बढ़ जाती है। पात्र अपनी बातों व घटनाओं का वर्णन करते हैं, जिसमें संवादों को भी सम्यक् स्थान नहीं मिलता। मूलतः ऐसी कहानियाँ चरित्र प्रधान होती हैं।

(3) आत्मकथात्मक शैली

प्रथम पुरुष (First Person) में कहानी लिखने का तरीका आत्मकथात्मक शैली में आता है। इसमें लेखक ही नायक लगता है और ’मैं’ का प्रयोग होता है। आधुनिक कहानी-साहित्य में इस शैली का अधिक प्रयोग हुआ है। मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, अमरकांत, निर्मल वर्मा आदि ने इस शैली में कहानियाँ लिखी हैं।

प्रायः इसमें एक ही पात्र कथा कहता है। यदि पात्र अधिक हों तो सभी अपनी-अपनी बात अलग-अलग परिच्छेदों में कहते हैं, किन्तु सब एक ही भाव संवेदना की पुष्टि करते हैं। यह शैली चरित्र प्रधान कहानियों के लिए अनुकूल है। इसमें लिखना सुविधाजनक होता है, किन्तु कथा-सूत्र मिलाने में सावधानी बरतनी पड़ती है। इन कहानियों में नाटकीयता व सक्रियता का प्रायः अभाव रहता है। ’चित्र वाले पत्थर’, ’एक घटना’, ’तस्वीर’, ’वह प्रतिमा’, ’खूनी’ व ’अपत्नीक’ ऐसी ही शैली की मुख्य कहानियाँ हैं।

(4) भावात्मक शैली

ऐसी कहानियों में कथा के स्थान पर भावों की उमड़-घुमड़ अधिक होती है। भावुक पात्र व संवेदनशीलता से भरी कथा ही इस शैली की विशेषता है। ’कवि का हृदय’, ’मधूलिका’, ’आकाशदीप’ आदि ऐसी ही कहानियाँ हैं। इनमें कथा-तत्वों को विशेष स्थान नहीं मिलता। वस्तुतः इसमें प्रेम, करुणा, दया आदि भाव ही प्रमुख रहते हैं। राष्ट्रीय प्रेम का उद्वेलन करने वाली कहानियाँ भी इसी श्रेणी में आती हैं।

भावात्मक कहानियाँ वातावरण व चरित्र-प्रधान होती हैं। प्रसाद की ’बिसाती’ इसका श्रेष्ठ उदाहरण है। सुदर्शन जी ने भी ’आशीर्वाद’ और ’हार की जीत’ जैसी कहानियाँ इस शैली में लिखी हैं। अमरकान्त कृत ’एक काली लड़की’ को भी इसका सुंदर उदाहरण माना जा सकता है। ये कहानियाँ कुछ-कुछ गद्य-काव्य जैसी होती हैं।

(5) प्रतीकात्मक शैली

ऐसी कहानियों में शीर्षक सांकेतिक होते हैं और कथा में प्रतीकों का प्रयोग होता है। ये कहानियाँ प्रभावशाली होती हैं, जैसे- ’परिन्दे’, ’बिल और दाना’। प्रतीकात्मक शैली में अर्थ सौन्दर्य अधिक होता है। ’फेंस के इधर और उधर’ भी ऐसी ही कहानी है। इसके दो रूप होते हैं- कलात्मक और भावात्मक।

कलात्मक रूप में प्रतीक विधान का उद्देश्य केवल कलात्मक सौन्दर्य उत्पन्न करना होता है। भावात्मक रूप में प्रतीक प्रेम, घृणा, क्रोध आदि भावों को व्यक्त करते हैं। फ्रायड ने सैंकड़ों काम-प्रतीकों का उल्लेख किया था, जिनका प्रयोग कहानियों में हुआ है। ये प्रतीक मूर्त भी होते हैं और अमूर्त भी। मानसिक संघर्ष को व्यक्त करने में प्रतीक शैली सहायक होती है। जैनेन्द्र कृत ’तत्सत्’ एवं कमलकांत त्रिपाठी कृत ’पगडण्डी’ ऐसी ही कहानियाँ हैं।

(6) स्वप्न शैली

यह शैली केवल भारतेन्दु युग में लिखी गई। इसमें सम्पूर्ण कहानी एक स्वप्न के माध्यम से चलती है। इसके दो प्रकार हैं- या तो सारी कहानी एक स्वप्न में पूर्ण हो जाए अथवा छोटे-छोटे स्वप्न खण्डों के जरिए पूर्ण कथा का संगठन हो। इनमें भावात्मकता व व्यंग्यात्मकता का प्राधान्य होता है। ’राजा भोज का सपना’ ऐसी ही कहानी है। भारतेन्दु युग के बाद यह शैली लुप्त हो गई। स्वप्न शैली में रोमानियत की अधिकता रहती है।

(7) आदर्शवादी कहानी

जिस कहानी में कोई आदर्श प्रस्तुत किया जाता है, उसे आदर्शवादी कहानी कहते हैं। 1936 से पूर्व तथा 1955 तक ऐसी कहानियाँ लिखी जाती रहीं। इनके प्रमुख कहानीकारों में प्रेमचन्द, प्रसाद, सुदर्शन, गुलेरी, रायकृष्णदास, चतुरसेन शास्त्री, विष्णु प्रभाकर आदि शामिल हैं। इन्होंने प्रेम, त्याग, न्याय, ईमानदारी, राष्ट्रप्रेम आदि के अनेक आदर्श प्रस्तुत किए हैं।

प्रसाद की ’आकाशदीप’ व ’पुरस्कार’ में प्रेम व कर्तव्य का आदर्श है। गुलेरी की ’उसने कहा था’ प्रेम व उत्सर्ग का शाश्वत उदाहरण है। प्रेमचन्द कृत ’पंच परमेश्वर’ न्याय का और सुदर्शन की ’हार की जीत’ सरलता व ईमानदारी का आदर्श प्रस्तुत करती है। आदर्शवादी कहानी का उद्देश्य सामाजिक सुधार होता है। यह यथार्थ से दूर रहती है। धीरे-धीरे इस परम्परा का लोप होता गया और प्रेमचन्द ने ’आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ को सामने रखा। वृन्दावनलाल वर्मा ने ऐतिहासिक कथानकों के माध्यम से उत्कृष्ट आदर्श प्रस्तुत किए। विष्णु प्रभाकर ने पारिवारिक आदर्श प्रस्तुत करने वाली कहानियाँ लिखीं।

(8) यथार्थवादी कहानी

आदर्शवाद के समानान्तर यथार्थवाद का विकास हुआ। समाज की वास्तविकता, सामाजिक रूढ़ियों, अन्धविश्वासों, पूँजीपतियों के शोषण, भ्रष्टाचार और राजनीति के खोखलेपन को चित्रित किया जाने लगा। प्रेमचन्द ने ग्रामीण व शहरी समाज की विषमताओं का यथार्थ चित्रण किया। उनका यथार्थवाद आदर्श की तरफ झुका हुआ था।

सियारामशरण गुप्त, भगवती प्रसाद वाजपेयी, भगवतीचरण वर्मा, यशपाल, राहुल सांकृत्यायन, चन्द्रकिरण सोनरिक्सा, प्रभाकर माचवे, अमृतलाल नागर आदि ने अनेक यथार्थवादी कहानियाँ लिखीं। यशपाल की कहानियों में समाज की आर्थिक व राजनीतिक विषमताओं का प्रभावकारी चित्रण मिलता है। रांगेय राघव ने मध्यम व निम्नवर्गीय स्थितियों का वास्तविक चित्रण किया। चन्द्रकिरण सोनरिक्सा की कहानियाँ मजदूर वर्ग का आइना हैं। इनकी मूल संवेदना प्रगतिवादी है। हरिशंकर परसाई कृत ’भोलाराम का जीव’, मोहन राकेश कृत ’परमात्मा का कुत्ता’ व कमलेश्वर कृत ’खोई हुई दिशायें’ भी यथार्थवादी कहानियाँ हैं। यथार्थवादी कहानियों का युग समाप्त नहीं हुआ है।

निष्कर्ष (Conclusion)

निष्कर्षतः, हिंदी कहानी की विकास यात्रा में शैलियों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। भारतेन्दु युग की स्वप्न शैली से शुरू होकर प्रेमचंद के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद और आधुनिक युग के मनोविश्लेषण व प्रतीकात्मक शैलियों तक, कहानीकारों ने अपनी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न माध्यमों का चयन किया है। जहाँ आदर्शवादी कहानियों ने समाज को नैतिकता व सुधार का मार्ग दिखाया, वहीं यथार्थवादी कहानियों ने समाज की कड़वी सच्चाईयों और विषमताओं का आइना प्रस्तुत किया। यद्यपि कुछ शैलियाँ, जैसे स्वप्न शैली या गद्य-काव्य के निकट वाली भावात्मक शैली, समय के साथ कम प्रभावी हो गई हैं, फिर भी ये सभी शैलियाँ हिंदी कहानी की समृद्ध विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। आज भी कहानीकार नए प्रयोगों के साथ कहानी विधा को अधिक सशक्त और प्रासंगिक बना रहे हैं।

आज की जानकारी ‘हिंदी कहानियों की प्रमुख शैलियाँ’ आपको अच्छी लगी होगी।

1. मनोविश्लेषणात्मक शैली की कहानियों का मूल आधार क्या है?
मनोविश्लेषणात्मक कहानियों का मूल आधार फ्रायड का मनोविज्ञान है, जिसमें पात्र के अवचेतन मन का विश्लेषण किया जाता है।
2. हिंदी में 'पत्र-शैली' की कहानियों का प्रचलन कब बढ़ा?
पत्र-शैली की कहानियों का प्रचलन मुख्य रूप से प्रेमचन्द जी के युग से बढ़ा था।
3. 'स्वप्न शैली' का प्रयोग हिंदी में किस युग में अधिक हुआ?
स्वप्न शैली का प्रयोग और प्रचलन मुख्य रूप से ‘भारतेन्दु युग’ में हुआ था।
4. 'आदर्शोन्मुख यथार्थवाद' की अवधारणा किसने दी थी?
आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की अवधारणा मुंशी प्रेमचन्द ने दी थी।
5. यथार्थवादी कहानियों की मूल संवेदना किस प्रकार की होती है?
यथार्थवादी कहानियों की मूल संवेदना प्रायः ‘प्रगतिवादी’ होती है।

 

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