अंतिम संशोधित (Last Updated): August 31, 2026
मैथिली कोकिल विद्यापति: जीवन परिचय, रचनाएँ, पदावली और आलोचनात्मक नोट्स (Vidyapati Jivan Parichay)
Table of Contents
हिंदी साहित्य के आदिकाल और भक्तिकालीन संक्रमण के सबसे प्रखर, लोकप्रीय और बहुमुखी प्रतिभा के धनी मैथिली कवि विद्यापति (Vidyapati) का भारतीय साहित्य में अत्यंत विशिष्ट और गौरवशाली स्थान है। वे मिथिला के राजा कीर्तिसिंह और शिवसिंह के दरबारी कवि थे तथा संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली—तीनों भाषाओं के प्रकांड विद्वान थे। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से विद्यापति का जीवन परिचय, उनकी रचनाएँ, दार्शनिक प्रवृत्तियाँ और विद्वानों के मत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
📌 विद्यापति का संक्षिप्त परिचय (Introduction of Vidyapati)
जन्म: 1360-1448 ई. (अनुमानित काल)
जन्म स्थल: ग्राम विसपी, जिला दरभंगा (बिहार)
पिता का नाम: गणपति
गुरु: पंडित हरि मिश्र (तथा चैतन्य संप्रदाय के जीव गोस्वामी से भी दीक्षा)
आश्रयदाता: तिरहुत के राजा गणेश्वर, कीर्तिसिंह एवं शिवसिंह
प्रमुख उपाधियाँ: स्वयं को ‘खेलन कवि’ कहा। अन्य प्रमुख उपाधियाँ—मैथिली कोकिल, अभिनव जयदेव, नवकवि शेखर, कवि कष्ठहार, दशावधान, पंचानन, और सुमित्रानंदन पंत द्वारा प्रदत्त ‘मरुस्थल की मंदाकिनी’।
’’गोरक्ष विजय नाटक’’ एक अंक का नाटक जिसमें संवाद संस्कृत व प्राकृत में तथा गीत मैथिली भाषा में है।
विद्यापति को अलग-अलग विद्वानों ने शृंगारी , भक्त या रहस्यवादी कवि माना है – विद्यापति मूलतः शृंगारी कवि है।
- शृंगारी – रामचंद्र शुक्ल, हरप्रसाद शास्त्री, रामकुमार वर्मा, रामवृक्षबेनीपुरी, सुभद्रा झा
- भक्त – बाबू ब्रजनंदन सहाय, श्यामसुंदर दास, हजारी प्रसाद द्विवेदी
- रहस्यवादी – ग्रियर्सन, जनार्दन मिश्र, नागेन्द्रनाथ गुप्त

📚 विद्यापति की प्रमुख रचनाएँ (Vidyapati Rachnaye in Hindi)
भाषा की दृष्टि से विद्यापति द्वारा रचित ग्रंथ निम्नलिखित वर्गों में विभाजित हैं:
1. संस्कृत भाषा में रचित रचनाएँ:
शैव सर्वस्वसार
गंगावाक्यावली
दुर्गाभक्तितरंगिणी
भूपरिक्रमा
दानवाक्यावली
पुरुष परीक्षा
लिखनावली
विभागसार
गया पत्तलक-वर्ण कृत्य
2. अवहट्ट भाषा में रचित रचनाएँ:
कीर्तिलता (1403 ई.) — इसमें राजा कीर्तिसिंह की वीरता और उदारता का चित्रण है। इसे हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ‘भृंग-भृंगी संवाद’ कहा है।
कीर्तिपताका (1403 ई.) — इसमें शिवसिंह की वीरता और उदारता का चित्रण है (यह ग्रंथ अप्राप्य है)।
3. मैथिली (देशभाषा) में रचित रचनाएँ:
पदावली — यह इनकी अत्यंत प्रसिद्ध रचना है जो मुख्य रूप से राधा-कृष्ण की प्रेमलीलाओं पर आधारित है।
गोरख विजय नाटक — यह एक अंक का नाटक है जिसका गद्य भाग संस्कृत में तथा पद्य भाग मैथिली भाषा में है, जिसमें संवाद संस्कृत व प्राकृत में तथा गीत मैथिली भाषा में रचे गए हैं।
🎭 विद्यापति का स्वरूप: शृंगारी, भक्त या रहस्यवादी?
विद्यापति को अलग-अलग विद्वानों ने शृंगारी, भक्त या रहस्यवादी कवि माना है। मूल रूप से वे शृंगारी कवि माने जाते हैं:
शृंगारी कवि मानने वाले विद्वान: रामचंद्र शुक्ल, हरप्रसाद शास्त्री, रामकुमार वर्मा, रामवृक्ष बेनीपुरी, सुभद्रा झा।
भक्त कवि मानने वाले विद्वान: बाबू ब्रजनंदन सहाय, श्यामसुंदर दास, हजारीप्रसाद द्विवेदी।
रहस्यवादी कवि मानने वाले विद्वान: जॉर्ज ग्रियर्सन, जनार्दन मिश्र, नागेन्द्रनाथ गुप्त।
🌟 विद्यापति के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य और विशेषताएँ
मैथिली कवि विद्यापति ने हिंदी साहित्य में सर्वप्रथम ‘कृष्ण’ को काव्य का विषय बनाया।
हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ‘शृंगार रस के सिद्ध वाक् कवि’ माना।
डॉ. बच्चन सिंह ने विद्यापति को ‘जातीय कवि’ की संज्ञा दी तथा ‘पदावली’ को देशभाषा की प्रथम रचना मानते हुए विद्यापति को ‘हिन्दी का पहला कवि’ माना।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने पदावली के शृंगारिक पदों की मादकता को ‘नागिन की लहर’ कहा।
भगवान शिव की भक्ति में रचे गए वे पद जो नृत्य के साथ गाए जाते हैं, ‘नचारी’ कहलाते हैं।
पदावली में प्रार्थना और नचारी के अंतर्गत दुर्गा, गंगा, जानकी, शिव और कृष्ण के आराधना-गीत हैं, अतः बहुत से विद्वानों ने इन्हें भक्त कवि माना। मिथिला में इन्हें कोई वैष्णव भक्त कवि नहीं मानता, जबकि बंगाल में इन्हें वैष्णव भक्त कवि के रूप में मान्यता प्राप्त है।
इनका संबंध मुख्य रूप से शैव संप्रदाय से था। हरप्रसाद शास्त्री ने इन्हें ‘पंचदेवोपासक’ माना है।
🗣️ विद्यापति के संबंध में प्रमुख आलोचकीय कथन
आचार्य रामचंद्र शुक्ल:
’’आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं, उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ’गीत गोविन्द’ को आध्यात्मिक संकेत बताया है वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी।’’
आचार्य रामचंद्र शुक्ल:
’’जयदेव की दिव्य वाणी की स्निग्ध धारा जो कि काल की कठोरता में दब गयी थी, अवकाश पाते ही मिथिला की अमराइयों में प्रकट होकर विद्यापति के कोकिल कंठ से फूट पड़ी।’’
शान्तिस्वरूप गुप्त:
’’विद्यापति पदावली ने साहित्य के प्रांगण में जिस अभिनव बसंत की स्थापना की है, उसके सुख-सौरभ से आज भी पाठक मुग्ध है क्योंकि उनके गीतों में जो संगीत धारा प्रवाहित होती है वह अपनी लय सुर ताल से पाठक या श्रोता को गद्गद् कर देती है।’’
श्याम सुंदर दास:
’’हिन्दी में वैष्णव साहित्य के प्रथम कवि प्रसिद्ध मैथिली कोकिल विद्यापति हुए। उनकी रचनाएँ राधा और कृष्ण के पवित्र प्रेम से ओत-प्रोत हैं।’’
रामकुमार वर्मा:
’’राधा का प्रेम भौतिक और वासनामय प्रेम है। आनंद ही उसका उद्देश्य है और सौन्दर्य ही उसका कार्य कलाप।’’
डॉ. बच्चन सिंह के शब्दों में:
’’विद्यापति की कविता का स्थापत्य शृंगारिक है, उसे आध्यात्मिक कहना खजुराहो के मंदिर को आध्यात्मिक कहना है, उनके शृंगार में यौवनोन्माद का शारीरिक आमंत्रण है, संभोग का सुख है, विलास की विह्वलताबोध, वियोग में स्मृतियों का संबल और भावुकतापूर्ण तन्मयता है।’’
📜 विद्यापति की प्रमुख काव्य पंक्तियाँ
’’देसिल बअना सब जन मिट्ठा। तें तैं सन जंपओ अवहट्ठा।।’’ — (कीर्तिलता)
जय जय भैरवि असुर भयाउनि, पसुपति भामिनि माया।
नंदक नंदन कदम्बक तरु तर, धिरे-धिरे मुरलि बजाव।
सहज सुन्दर गौर कलेवर पीन पयोधर सिरी।
खने-खने नयन कोन अनुसरई। खने-खने बसन धूलि तनु भरई।
पीन पयोधर इबरि गता। मेरु उपजल कनकलता।
जहाँ जहाँ पद जुग धरई। तहिं तहिं सरोरुह झरई।
सरस वसंत समय भल पाओलि, दखिन पवन बहु धीरे।
सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोय। सोइ पिरिति अनुराग बखानिअ, तिल-तिल नूतन होय।
सैसव जोवन दुहु मिलि गेल।
’’रज्ज लुद्ध असलान बुद्धि बिक्कम बले हारल। पास बइसि बिसवासि राय गयनेसर मारल।।’’
’’कतहुँ तुरुक बरकर। बार जाए ते बेगार धर।। धरि आनय बाभन बरुआ। मथा चढ़ाव इ गाय का चरुआ।। हिन्दू बोले दूरहि निकार। छोटउ तुरुका भभकी मार।।’’
’’जइ सुरसा होसइ मम भाषा। जो जो बुन्झिहिसो करिहि पसंसा।।’’
’’जाति अजाति विवाह अधम उत्तम का पारक।’’
’’पुरुष कहाणी हौं कहौं जसु पंत्थावै पुन्नु।’’
’’बालचंद विज्जावहू भाषा। दुहु नहि लग्गइ दुज्जन हासा।।’’
पदावली से:
’’खने खने नयन कोन अनुसरई। खने खने वसत धूलि तनु भरई।।’’
’’सुधामुख के विहि निरमल बाला। अपरूप रूप मनोभव-मंगल, त्रिभुवन विजयी माला।।’’
’’सरस बसंत समय भला पावलि दछिन पवन वह धीरे, सपनहु रूप बचन इक भाषिय मुख से दूरि करु चीरे।।’’
❓ अभ्यास प्रश्न (पाठकों के लिए)
विद्यापति के गुरु कौन थे?
विद्यापति किस प्रकार के कवि माने जाते हैं?
विद्यापति की मृत्यु कब हुई?
विद्यापति किस काल के कवि माने जाते हैं?
विद्यापति कहाँ के रहने वाले थे?
विद्यापति पदावली की भाषा क्या है?
विद्यापति का जन्म और मृत्यु वर्ष बताएँ।
विद्यापति की काव्य भाषा क्या है?
विद्यापति की प्रमुख रचनाओं के नाम लिखें।
विद्यापति के पिता का नाम क्या था?
🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि
क्र.सं. लेखक / कवि का नाम मुख्य विशेषता / काल इंटरनल लिंक (URL) 1. भारतेंदु हरिश्चंद्र आधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युग लिंक देखें(उदाहरण यूआरएल) 2. महावीर प्रसाद द्विवेदी द्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकार लिंक देखें 3. जयशंकर प्रसाद छायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककार लिंक देखें 4. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेता लिंक देखें 5. सुमित्रानंदन पंत प्रकृति के सुकुमार कवि / छायावाद लिंक देखें 6. महादेवी वर्मा आधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्री लिंक देखें 7. प्रेमचंद (धनपत राय) उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुष लिंक देखें 8. अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक लिंक देखें 9. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कवि लिंक देखें 10. कृष्णा सोबती आधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर लिंक देखें



नमस्ते सर जी
क्या हिन्दी 1ग्रेड के मेटर की पी डी एफ उपलब्ध हो सकती है
Mo.9784455072
आपको इस सहयोग के लिए आभार
प्रणाम गुरुवर इस तरह हिन्दी भाषा प्रेमियों का मार्गदर्शन करने के लिए और हिन्दी भाषा के प्रति आपके इस सराहनीय प्रयास एव योगदान के लिए तह दिल से कोटि कोटि धन्यवाद और आभार
आभार
श्रीमान ,
आपके द्वारा किया गया कार्य अनुपम अद्वितीय है, तहे दिल से कोटि कोटि साभार।
जी धन्यवाद
M a Hindi third semester ke liye objective questions answers pdf chahiy.