अंतिम संशोधित (Last Updated): August 5, 2026
आज के आर्टिकल में आधे-अधूरे नाटक ( Aadhe Adhoore Natak) का परीक्षापयोगी सारांश दिया गया है ,आप इसे अच्छे से पढ़ें
आधे-अधूरे(Aadhe Adhoore Natak)
’आषाढ़ का एक दिन’ (1958) ’लहरों के राजहंस’ (1963) के बाद ’आधे-अधूरे’ (1969) मोहन राकेश का तीसरा नाटक है, इस नाटक को समकालीन जिन्दगी का पहला सार्थक नाटक कहा गया है जो जीवन की विडम्बना के कुछ सघन बिन्दुओं को रेखांकित करता है, यह एक स्तर पर स्त्री-पुरुष के मध्य लगाव और तनाव का दस्तावेज है, तो दूसरे स्तर पर मध्यमवर्गीय विडम्बनाओं के कारण पारिवारिक विघटन की गाथा है, जिसका हर सदस्य एक-दूसरे से कटा रहने को अभिशप्त है, परिवार का प्रत्येक सदस्य आधा-अधूरा रहकर अपने-अपने ढंग का संत्रास भोगता है।
यह नाटक मानवीय सन्तोष के अधूरेपन का सहज-स्वाभाविक चित्रण प्रस्तुत करता है, साथ ही व्यक्ति की विभिन्नताओं के बावजूद मानवीय अनुभव की समानता को रेखांकित करता है, एक ही अभिनेता द्वारा पाँच अलग-अलग भूमिकाएँ निभाना इसका प्रमाण है, नाटक दो अंकों (पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध) में है, नाटक में पात्रों के नाम नहीं दिए गए हैं, काले सूट वाला आदमी, पुरुष दो, पुरुष तीन, पुरुष चार, स्त्री, बङी लङकी, बङा लङका आदि पात्र हैं जो संवादों के द्वारा पहचाने जाते हैं, यह वस्तुतः एक नया प्रयोग है।
महेन्द्रनाथ अपनी पत्नी सावित्री से बहुत प्रेम करता है, किन्तु बेरोजगार होने पर सावित्री की कमाई पर पलता हुआ वह अत्यन्त दयनीय है। उसकी स्थिति अपने परिवार में ’एक ठप्पा एक रबर के टुकङे’ की तरह है। सावित्री अपनी अनन्त और बहुमुखी अपेक्षाओं के कारण महेन्द्रनाथ से वितृष्णा करती है और जगमोहन, जुनेजा और सिंहानिया के सम्पर्क में आती है, किन्तु किसी में भी उसे अपनी भावनाओं की पूर्ण तृप्ति नहीं मिलती, बङी लङकी बिन्नी मनोज के साथ भाग जाती है और लङका भी घर के किसी सदस्य से लगाव नहीं है, वह बदमिजाज और बदजुबान है, उसकी दिलचस्पी केवल यौन सम्बन्धों में है, इस तरह नाटक में सभी पात्र आधे-अधूरे होने की नियति से अभिशप्त है।
आधे-अधूरे(Aadhe Adhoore Natak)
नाटक की भाषा और संवाद संयमित है, ’’इसमें वह सामर्थ्य है जो समकालीन जीवन के तनाव को पकङ सके, शब्दों का चयन, उनका क्रम, उनका संयोजन – जो सम्पूर्णता से अभिप्रेत को अभिव्यक्त करता है, ’’भाषा, संवाद लय और नाटकीय संयम पात्रों के तनाव को गहराते जाते हैं।
रंगमंच की दृष्टि से ’आधे-अधूरे’ नाटक को प्रयोगशील नाटक कहा जा सकता है, इसका प्रथम मंचन ओमपुरी के निर्देशन में सन् 1969 में ’दिशान्तर’ नाट्य-संस्था द्वारा हुआ था। इसमें ओमपुरी उनकी पत्नी सुधा ओमपुरी दिनेश ठाकुर, अनुराधा कपूर और ऋचा व्यास ने विभिन्न पात्रों की भूमिका अभिनीत की थी। पूरे नाटक की अवधारणा के पीछे नाटककार की सूक्ष्म रंगदृष्टि के प्रमाण मिलते हैं, एक अभिनेता द्वारा पाँच अलग-अलग भूमिकाएँ निभाए जाने की कल्पना मौलिक है। नाटक को थियेटर तथा खुले मैदान में दोनों तरह से सफलतापूर्वक मंचित किया जा चुका है।
नाटक में प्रकाश और संगीत सम्बन्धी निर्देश भी प्रभावशाली हैं, पार्श्व संगीत में ध्वनि तरंगों के माध्यम से श्मशान भूमि की संत्रासमयी परिवेश की प्रभावशाली अभिव्यक्ति की गई है। प्रकाश व्यवस्था सादी है। छाया प्रकाश के द्वारा अन्त में सारा वातावरण संवेदना से भीग उठता है। पात्रों का मेकअप न होना नाटक की एक और विशेषता को उजागर करता है।
हिन्दी आलोचना विकास
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सर आप दिये हुए इस नाटक का सारांश से मुझे बहुत ही लाभान्वित हुआ है ।
मुझे अग्निशिखा नाटक का सारांश चाहिए था लेकिन मुझे कहीं नहीं मिल रहा है तो आप कृपया भेजिए सर जी।