अंतिम संशोधित (Last Updated): August 30, 2026
रीतिकाल काव्यधारा: नामकरण, वर्गीकरण, प्रमुख कवि और आचार्यत्व (Ritikaal Kavydhara Notes)
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हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल (1700-1900 ई.) का कालखंड कला, शृंगार और शास्त्रीय विवेचन की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रहा है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, कॉलेज लेक्चरर और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से रीतिकाल की काव्यधारा, उसका वर्गीकरण, कवियों की आचार्यत्व सीमा और प्रमुख रचनाओं से जुड़े प्रश्न बहुतायत से पूछे जाते हैं। इस आलेख में हम रीतिकाल के संपूर्ण स्वरूप और उसकी प्रमुख धाराओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
📌 रीतिकाल (1700-1900 ई. तक) – परिचय एवं नामकरण
हिन्दी साहित्य के ’मध्य युग’ को पूर्व मध्यकाल (भक्तिकाल) तथा उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) के नाम से जाना जाता है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इसका सीमा निर्धारण संवत् 1700-1900 वि. (सन् 1643 से सन् 1843) किया है।
काव्य में विशिष्ट रचना पद्धति को रीति कहा गया। आचार्य वामन ने ’विशिष्ट पद रचना रीति’ कहकर इंगित किया कि रीति काव्य वह काव्य है, जिसकी रचना विशिष्ट पद्धति अथवा नियमों के आधार पर की गई है।
विभिन्न विद्वानों ने रीतिकाल को विभिन्न नामों से पुकारा। यथा-
मिश्रबन्धु (अलंकृत-काल)
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (शृंगार काल)
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (रीतिकाल)
रीतिकाल में ’रीति’ शब्द का प्रयोग ’काव्यांग-निरूपण’ के अर्थ में किया गया है। काव्यांग चर्चा में कविगण वैसा ही आनन्द लेते थे, जैसा भक्तिकाल में ब्रह्मज्ञान चर्चा में। ये कवि ’शिक्षक’ या ’आचार्य’ की भूमिका का निर्वाह करने में अपना गौरव समझते थे।
🌿 रीतिकाल का वर्गीकरण
रीतिकाल के कवियों का वर्गीकरण ’रीति’ को आधार बनाकर इस प्रकार किया जा सकता है-
रीतिबद्ध: इस वर्ग में वे कवि आते हैं, जो ’रीति’ के बन्धन में बंधे हुए हैं अर्थात् जिन्होंने रीति ग्रन्थों की रचना की। लक्षण ग्रन्थ लिखने वाले इन कवियों में प्रमुख हैं- चिन्तामणि, मतिराम, देव, जसवन्तसिंह, कुलपति मिश्र, मण्डन, सुरति मिश्र, सोमनाथ, भिखारीदास, दूलह, रघुनाथ, रसिकगोविन्द, प्रतापसिंह, ग्वाल आदि।
रीतिमुक्त: इस वर्ग में वे कवि आते हैं, जो ’रीति’ के बन्धन से पूर्णतः मुक्त हैं अर्थात् इन्होंने काव्यांग निरूपण करने वाले ग्रन्थों, लक्षण ग्रन्थों की रचना नहीं की तथा हृदय की स्वतन्त्र वृत्तियों के आधार पर काव्य रचना की। इन कवियों में प्रमुख हैं- घनानन्द, बोधा, आलम और ठाकुर।
रीतिसिद्ध: तीसरे वर्ग में वे कवि आते हैं जिन्होंने रीति ग्रन्थ नहीं लिखे, किन्तु ’रीति’ की उन्हें भली-भाँति जानकारी थी। वे रीति में पारंगत थे। इन्होंने इस जानकारी का पूरा-पूरा उपयोग अपने-अपने काव्य ग्रन्थों में किया। इस वर्ग के प्रतिनिधि कवि हैं- बिहारी। उनके एकमात्र ग्रन्थ ’बिहारी-सतसई’ में रीति की जानकारी का पूरा-पूरा उपयोग कवि ने किया है। अनेक प्रकार की नायिकाओं का उसमें समावेश है तथा विशिष्ट अलंकारों की कसौटी पर भी उनके अनेक दोहे खरे उतरते हैं। जब तक किसी पाठक को रीति की जानकारी नहीं होगी तब तक वह ’बिहारी सतसई’ के अनेक दोहों का अर्थ हृदयंगम नहीं कर सकता।
📖 रीतिकालीन प्रमुख कवि एवं उनकी रचनाएँ (Ritikaal Kavydhara)
| रचयिता | रचनाएँ |
| 1. चिन्तामणि | कविकुल कल्पतरु, काव्य विवेक, श्रृंगार मंजरी, काव्य प्रकाश, रस विलास, छन्द विचार। |
| 2. भूषण | शिवराज भूषण, छत्रसाल दशक, शिवाबावनी, अलंकार प्रकाश, छन्दोहृदय प्रकाश। |
| 3. मतिराम | ललित ललाम, मतिराम सतसई, रसराज, अलंकार पंचाशिका, वृत्त कौमुदी। |
| 4. बिहारी | बिहारी-सतसई। |
| 5. रसनिधि | रतन हजारा, विष्णुपद कीर्तन, कवित्त, अरिल्ल, हिण्डोला, सतसई, गीति संग्रह। |
| 6. जसवन्त सिंह | भाषा भूषण, आनन्द विलास, सिद्धान्त बोध, सिद्धान्तसार, अनुभव प्रकाश, अपरोक्ष सिद्धान्त, स्फुट छन्द। |
| 7. कुलपति मिश्र | रस रहस्य, मखशिख, दुर्गाभक्ति, तरंगिणी, मुक्तिरंगिणी, संग्रामसार। |
| 8. मण्डन | रस रत्नावली, रस विलास, नखशिख, जनकपच्चीसी, नैन पचासा, काव्य रत्न। |
| 9. आलम | आलमकेलि। |
| 10. देव | भाव विलास, भवानी विलास, कुशल विलास, रस विलास, जाति विलास, प्रेम तरंग, काव्य रसायन, देव शतक, प्रेमचन्द्रिका, प्रेमदीपिका, राधिका विलास। |
| 11. सुरति मिश्र | अलंकार माला, रस रत्नमाला, नखशिख, काव्य सिद्धान्त, रस रत्नाकर, श्रृंगार सागर, भक्ति विनोद। |
| 12. नृप शम्भू | नायिका भेद, नखशिख। |
| 13. श्रीपति | काव्य सरोज, कविकल्पद्रुम, नखशिख, काव्य सिद्धान्त, रस रत्नाकर, श्रृंगार सागर, भक्ति विनोद। |
| 14. गोप | रामचन्द्र भूषण, रामचन्द्राभरण, रामालंकार। |
| 15. घनानन्द | पदावली, वियोग बेलि, सुजान हित प्रबंध, प्रीति पावस, कृपाकन्द निबन्ध, यमुनायश, प्रकीर्णक छन्द। |
| 16. रसलीन | अंगदर्पण, रसप्रबोध, स्फुट छन्द। |
| 17. सोमनाथ | रसपीयूष निधि, श्रृंगार विलास, प्रेम पच्चीसी। |
| 18. रसिकसुमति | अलंकार चन्द्रोदय। |
| 19. भिखारीदास | काव्य निर्णय, श्रृंगार निर्णय, रस सारांश, छन्द प्रकाश, छन्दार्णव। |
| 20. कृष्ण कवि | अलंकार कलानिधि, गोविन्द विलास। |
| 21. रघुनाथ | काव्य कलाधर, रस रहस्य। |
| 22. दूलह | कविकुल कंठाभरण, स्फुट छन्द। |
| 23. हितवृन्दावनदास | स्फुट पद लगभग 20 हजार। |
| 24. गिरधर कविराय | स्फुट छन्द। |
| 25. सेवादास | नखशिख, रस दर्पण, राधा सुधाशतक, रघुनाथ अलंकार। |
| 26. रामसिंह | अलंकार दर्पण, रस शिरोमणि, रस विनोद। |
| 27. बोधा | विरहवारीश, इश्कनामा। |
| 28. नन्द किशोर | पिंगल प्रकाश। |
| 29. रसिक गोविन्द | रसिक गोविन्दानन्दघन, युगल रस माधुरी, समय प्रबन्ध। |
| 30. पद्माकर | जगद्विनोद, पद्माभरण, गंगालहरी, प्रबोध प्रचासा, कलि पच्चीसी, प्रतापसिंह विरुदावली, स्फुट छन्द। |
| 31. प्रताप साहि | व्यंग्यार्थ कौमुदी, काव्य विलास, श्रृंगार मंजरी, श्रृंगार शिरोमणि, काव्य विनोद, अलंकार चिन्तामणि। |
| 32. बेनी बन्दीजन | रस विलास। |
| 33. बेनी ’प्रवीण’ | नवरसतरंग, श्रृंगार भूषण। |
| 34. जगत सिंह | साहित्य सुधानिधि। |
| 35. गिरधर दास | रस रत्नाकर, भारती भूषण, उत्तरार्द्ध नायिकाभेद। |
| 36. दीनदयाल गिरि | अन्योक्ति कल्पद्रुम, दृष्टान्त तरंगिणी, वैराग्य दिनेश। |
| 37. अमीर दास | सभा मण्डन, वृत्त चन्द्रोदय, ब्रज विलास। |
| 38. ग्वाल | रसिकानन्द, यमुना लहरी, रसरंग, दूषण दर्पण, राधाष्टक, कवि हृदय विनोद, कुब्जाष्टक, अलंकार भ्रमभंजन, रसरूप दृगशतक, कविदर्पण। |
| 39. चन्द्रशेखर वाजपेयी | रसिक विनोद, नखशिख, माधवी बसन्त, वृन्दावन शतक, गुरुपंचाशिका। |
| 40. द्विजदेव | श्रृंगार लतिका, श्रृंगार बत्तीसी, कवि कल्पद्रुम, श्रृंगार चालीसा। |
🔍 रीतिकाल के सम्बन्ध में कुछ स्मरणीय तथ्य
रीति निरूपण की प्रवृत्ति भक्तिकाल में ही प्रारम्भ हो गई थी। सूरदास की साहित्य लहरी, नन्ददास की रस मंजरी और कृपाराम की हित तरंगिणी (1598 वि.) में यह प्रवृत्ति उपलब्ध होती है। चरखारी के मोहन लाल मिश्र ने ’श्रृंगार सागर’ नामक एक ग्रंथ लिखा जिसमें श्रृंगार रस का सांगोपांग विवेचन है। इसी प्रकार करनेस कवि ने ’कर्णाभरण’, ’श्रुतिभूषण’ एवं ’भूपभूषण’ नामक अलंकार ग्रंथों की रचना की।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार हिन्दी में केशवदास को यह श्रेय है कि उन्होंने सभी काव्यांगों का निरूपण सर्वप्रथम शास्त्रीय पद्धति पर किया किन्तु हिन्दी में रीति ग्रंथों की अविरल परम्परा केशव की ’कवि प्रिया’ की रचना के पचास वर्ष बाद प्रारम्भ हुई। केशव का काव्यांग निरूपण भामह और उद्भट की परम्परा का है जबकि परवर्ती रीति आचार्यों का काव्यांग निरूपण आनन्दवर्द्धन, मम्मट एवं विश्वनाथ की परम्परा का है।
हिन्दी के अलंकार ग्रंथ अधिकतर चन्द्रालोक एवं कुवलयानन्द के अनुसार निर्मित हुए। कुछ ग्रंथों में काव्यप्रकाश (मम्मट) एवं साहित्यदर्पण (विश्वनाथ) का भी आधार लिया गया है।
हिन्दी रीति ग्रंथों की अखण्ड परम्परा चिन्तामणि त्रिपाठी से चली, अतः रीतिकाल का प्रारम्भ उन्हीं से मानना चाहिए। उनके गं्रथ काव्यविवेक, कविकुल कल्पतरु, काव्य प्रकाश संवत् 1700 वि. के आस-पास लिखे गए।
कवियों ने कविता लिखने की यह एक प्रणाली ही बना ली कि पहले दोहे में काव्यांग (अलंकार या रस, आदि) का लक्षण लिखना फिर उसके उदाहरण के रूप में कवित्त या सवैया लिखना।
🧐 रीतिकालीन कवियों का आचार्यत्व
’’हिन्दी में लक्षण ग्रन्थों की परिपाटी पर रचना करने वाले जो सैकङों कवि हुए हैं, वे आचार्य कोटि में नहीं आ सकते। वे वास्तव में कवि ही थे।’’ ऐसा कहकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इन रीतिकालीन लक्षण ग्रन्थकारों के आचार्यत्व पर प्रश्न चिह्न लगा दिया है। उनका मत है कि –
आचार्यत्व के लिए जिस सूक्ष्म विवेचन शक्ति एवं पर्यालोचन शक्ति की आवश्यकता होती है, उसका अभाव इन कवियों में था।
काव्यांगों का विस्तृत विवेचन, तर्क द्वारा खण्डन-मण्डन एवं नवीन सिद्धान्तों का प्रतिपादन भी हिन्दी रीतिग्रन्थों में नहीं हुआ।
इन रीति ग्रन्थाकारों का प्रमुख उद्देश्य कविता करना था, शास्त्र विवेचन नहीं, अतः कवि लोग एक ही दोहे में अपर्याप्त लक्षण देकर अपने कवि कर्म में प्रवृत्त हो जाते थे।
काव्यांगों के सुव्यवस्थित एवं तर्कपूर्ण विवेचन के लिए सुविकसित गद्य का होना अनिवार्य है, किन्तु उस समय तक गद्य का विकास न हो सकने के कारण पद्य में ही विवेचन होता था जो पर्याप्त था, परिणामतः विषय का स्पष्टीकरण नहीं हो पाता था।
एक दोहे में अपर्याप्त लक्षण देकर वे उसके उदाहरण देने में प्रवृत्त हो जाते थे, परिणामतः अलंकार, आदि के स्वरूप का ठीक-ठीक बोध नहीं होता। कहीं-कहीं तो उदाहरण भी गलत दिए गए हैं।
अलंकारों के वर्गीकरण एवं विश्लेषण में वैज्ञानिक दृष्टि का अभाव है। काव्यांगों के लक्षण विशेषतः अलंकारों के लक्षण भ्रममूलक, अपर्याप्त और अस्पष्ट हैं।
इन्होंने केवल श्रृंगार रस के विवेचन में ही रुचि ली है, अन्य रसों की प्रायः उपेक्षा की गई है। इस प्रकार इनका रीति विवेचन एकांगी, एकपक्षीय, अधूरा है।
शब्द शक्तियों एवं दृश्य काव्य (नाटक) का विवेचन भी इन लक्षण ग्रन्थकारों ने बहुत कम किया है। भिखारी दास एवं प्रतापसाहि ने शब्द शक्तियों को जो थोङा-बहुत विवेचन किया है। उसमें भी विसंगति दिखाई पङती है।
हिन्दी के इन रीति ग्रन्थकारों में मौलिक दृष्टि का अभाव है। संस्कृत काव्यशास्त्र के अनुकरण पर इन्होंने अपने रीति ग्रन्थों का निर्माण किया। हिन्दी के अधिकतर अलंकार ग्रंथ चन्द्रालोक (जयदेव), कुवलयानन्द (अप्पय दीक्षित) के आधार पर निर्मित हुए। परिणामतः किसी नए सिद्धान्त या वाद की स्थापना हिन्दी के लक्षण ग्रन्थकार नहीं कर सके।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है- ’’इन्होंने शास्त्रीय मत को श्रेष्ठ और अपने मत को गौण मान लिया, इसलिए स्वाधीन चिन्तन के प्रति एक अवज्ञा का भाव आ गया।’’
हिन्दी के इन रीति ग्रन्थकारों का ज्ञान अपरिपक्क था। वे स्वयं अधूरे एवं अधकचरे ज्ञान के आधार पर काव्यांग निरूपण कर रहे थे, अतः विश्लेषण में अस्पष्टता आनी स्वाभाविक थी।
ये लक्षण ग्रन्थकार काव्य मर्मज्ञ तो थे पर विवेचन के लिए अपेक्षित कुशाग्र बुद्धि एवं चिन्तन-मनन का अभाव होने से वे किसी मौलिक उद्भावना का सूत्रपात न कर सके।
डाॅ. नगेन्द्र का मत है- ’’हिन्दी के रीति आचार्य निश्चय ही किसी नवीन सिद्धान्त का आविष्कार नहीं कर सके। किसी ऐसे व्यापक आधारभूत सिद्धान्त का जो काव्य चिन्तन को एक नई दिशा प्रदान करता, सम्पूर्ण रीतिकाल में अभाव है।’’ इस प्रकार हिन्दी रीतिग्रन्थों द्वारा काव्यशास्त्र का कोई महत्त्वपूर्ण विकास नहीं हो सके।
इन लक्षण ग्रन्थकारों का मूल उद्देश्य काव्य रसिकों को काव्यशास्त्र से परिचित करना तथा अपने पांडित्य का सिक्का जमाना था। उनके समक्ष काव्यशास्त्र की कोई गम्भीर समस्या थी ही नहीं जिसका समाधान करने का वे प्रयास करते।
दरबारी परिवेश में तत्कालीन युग की रुचि गम्भीर विषयों की मीमांसा की ओर उतनी नहीं थी जितनी रसिकता की ओर थी, अतः इन कवियों ने काव्यांगों का सतही विवेचन किया है।
भिखारीदास एवं केशव के अलंकार विवेचन एवं वर्गीकरण में अनेक त्रुटियाँ हैं। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इन्हीं न्यूनताओं की ओर इंगित करते हुए कहा है- ’’संस्कृत में अलंकारशास्त्र को लेकर जैसी सूक्ष्म विवेचना हो रही थी, उसकी कुछ भी झलक इसमें नहीं पाई जाती। शास्त्रीय विवेचना तो बहुत कम कवियों को इष्ट थी, वे तो लक्षणों को कविता करने का बहाना भर समझते थे। वे इस बात की परवाह नहीं करते थे कि उनका निर्दिष्ट कोई अलंकार किसी दूसरे में अन्तर्भुक्त हो जाता है या नहीं।’’
रीति ग्रन्थकारों ने नायिका भेद पर अत्यन्त व्यापक एवं विशद विवेचन करते हुए अनेक ग्रंथ वात्स्यायन के कामसूत्र को आधार बनाकर लिखे। इसी के अन्तर्गत श्रृंगार का भी पर्याप्त विवेचन हुआ है।
संस्कृत काव्यशास्त्र में सूत्र, कारिका एवं टीका की जो पद्धति चल रही थी उसका आधार इन रीति ग्रन्थकारों ने ग्रहण नहीं किया, इसीलिए वे विषय का स्पष्टीकरण करने में सफल नहीं हुए।
रीतिकाल के इन लक्षण ग्रन्थकारों ने श्रृंगार रस निरूपण के नाम पर विलासी राजाओं एवं दरबारियों को श्रृंगार रस से लबालब भरे हुए चषकों के साथ-साथ काव्य की सरसता का पान भी कराया।
भले ही हम इन्हें ’आचार्य’ न मानें किन्तु हिन्दी में काव्यशास्त्र का द्वार खोलने का श्रेय इन रीति ग्रन्थकारों को अवश्य दिया जा सकता है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हिन्दी में लक्षण ग्रन्थों की रचना करने वाले ये सैकङों कवि शुद्ध रूप से आचार्य कोटि में नहीं आते, वे कवि ही हैं।
डाॅ. नगेन्द्र ने आचार्यों की तीन कोटियाँ मानी हैं-
उद्भावक आचार्य – जो किसी नवीन सिद्धान्त का प्रतिपादन करे।
व्याख्याता आचार्य – जो स्थापित मत की व्याख्या करे।
कवि शिक्षक आचार्य – जो काव्यशास्त्र को सरस रूप में अवतरित करे।
रीतिकाल महत्वपूर्ण सार संग्रह 2: संपूर्ण नोट्स और वस्तुनिष्ठ तथ्य (Reetikal Sar Sangrah Notes)
हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल का कालखंड शास्त्रीय नियमों, लक्षण-ग्रंथों, आचार्यत्व और शृंगारिकता की प्रधानता के लिए जाना जाता है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, RPSC, TGT, PGT, और हिंदी साहित्य से जुड़ी अन्य परीक्षाओं) की दृष्टि से रीतिकाल से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य, कवियों की रचनाएँ, आलोचकों के कथन और परीक्षापयोगी नोट्स का यह संपूर्ण संकलन प्रस्तुत है:
📌 रीतिकाल: समय-निर्धारण और नामकरण
समय-निर्धारण:
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार: संवत् 1700-1900 वि.
सर्वमान्य मत (डॉ. नगेंद्र के अनुसार): सन् 1650-1850 ई.
रीतिकाल के अन्य नाम:
उत्तरमध्यकाल / रीतिकाल: आचार्य रामचंद्र शुक्ल
अलंकृत काल: मिश्रबंधु
शृंगार काल: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
‘रीति’ का अर्थ: काव्यांग निरूपण (रसों, अलंकारों, छंदों आदि के लक्षण व उदाहरण प्रस्तुत करना)।
रीतिकाल की प्रथम रचना: कृपाराम की ‘हिततरंगिणी’ (तथा हिंदी सतसई परंपरा की भी यह प्रथम रचना है)।
रीतिकाल का प्रवर्तक: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘चिंतामणि’ को रीतिकाल का प्रवर्तक माना है।
रीतिकाल की अंतिम कृति: ‘ग्वाल’ कवि की ‘रसरंग’।
मूलभूत लाक्षणिक अंतिम कवि: ‘पद्माकर’ को माना जाता है।
🌿 रीतिकाल का वर्गीकरण
रीतिबद्ध काव्यधारा:
इस वर्ग के कवियों ने काव्यांग निरूपण को आधार मानकर लक्षण ग्रंथों की रचनाएँ कीं।
प्रमुख कवि: चिंतामणि (प्रथम कवि), मतिराम, देव, ग्वाल, केशवदास, मंडन, भिखारीदास, जसवंतसिंह आदि।
रीतिमुक्त काव्यधारा:
इस वर्ग में वे कवि आते हैं जिन्होंने काव्यांग निरूपण करने वाले ग्रंथों की रचना न करके स्वच्छंद रूप से स्वतंत्र अनुभूतियों के आधार पर रचनाएँ लिखीं।
प्रमुख कवि: घनानंद, बोधा, आलम, ठाकुर।
रीतिसिद्ध काव्यधारा:
इस वर्ग में वे कवि आते हैं जिन्हें रीति की परिपाटी की पूरी जानकारी तो थी, लेकिन उन्होंने स्वतंत्र रूप से लक्षण ग्रंथ नहीं लिखे, बल्कि अपनी कला का प्रयोग काव्य रचना में किया।
प्रमुख कवि: बिहारी, सेनापति, रसनिधि, नेवाज, परजेस आदि।
📖 प्रमुख रचनाएँ एवं उनके रचयिता कवि
चिंतामणि: रसविलास, काव्यप्रकाश, कविकुल कल्पतरु, श्रृंगार मंजरी, काव्य विवेक, छन्द विचार।
भूषण: शिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रशाल दशक, अलंकार प्रकाश, छन्दोहृदय प्रकाश।
मतिराम: रसराज, ललित ललाम, फूल मंजरी, वृतकौमुदी, मतिराम सतसई, अलंकार पंचाशिका।
बिहारी: बिहारी सतसई (एकमात्र ग्रंथ)।
बोधा: इश्कनामा, विरहवारिस।
रसलीन: अंगदर्पण, रसप्रबोध, स्फुट छंद।
घनानंद: वियोगवेलि, सुजानहित प्रबंध, घनानंद पदावली, सुजानसागर, कृपाकंद निबंध, यमुनायश।
पद्माकर: जगतविनोद, पद्माभरण, प्रबोधपचासा, गंगालहरी, हिम्मतबहादुर-विरूदावली, प्रतापसिंह-विरूदावली, यमुनालहरी, कल-पचीसी।
⚖️ रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ / विशेषताएँ
रीति निरूपण (काव्यांग शिक्षण)
शृंगारिकता (संयोग और वियोग का विस्तृत वर्णन)
अलंकारिकता (चमत्कार प्रदर्शन)
बहुज्ञेता एवं चमत्कार प्रदर्शन
लोकमंगल की भावना का अभाव (दरबारी संस्कृति का प्रभाव)
राजप्रशस्ति (आश्रयदाता राजाओं की प्रशंसा)
ब्रजभाषा का प्रधान प्रयोग
प्रकृति चित्रण (विशेषकर उद्दीपन रूप में)
✍️ रीतिकाल के प्रमुख कवि और उनका विस्तृत विवरण
(1) केशवदास
शुक्ल जी ने इन्हें समय की दृष्टि से भक्तिकाल में स्थान दिया तथा प्रवृत्ति की दृष्टि से रीतिकाल के अंतर्गत रखा है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इन्हें ‘‘कठिन काव्य का प्रेत’’ कहा है।
केशव को संवाद योजना में सर्वाधिक सफलता ‘रामचंद्रिका’ से मिली।
आचार्य शुक्ल के कथन:
‘‘केशव को कवि हृदय नहीं मिला।’’
‘‘प्रबंध रचना के योग्य न तो केशव में शक्ति थी और न अनुभूति।’’
प्रमुख रचनाएँ:
रसिकप्रिया (शृंगार और रस विवेचन)
कविप्रिया (आश्रयदाता इंद्रजीतसिंह के सानिध्य में रचित; आचार्यत्व एवं कवित्व की पूर्ण अभिव्यक्ति इसी ग्रंथ में हुई है)
छंदमाला
रामचंद्रिका (रामकथा पर आधारित; इसे ‘छंदों का अजायबघर’ कहा जाता है)
विज्ञानगीता (आध्यात्मिक ग्रंथ)
हिंदी में सर्वप्रथम सर्वांग निरूपण केशवदास ने ही किया था।
उनका प्रसिद्ध कथन: ‘‘भूषण बिनु न विराजइ, कविता वनिता मीत।’’
(2) मतिराम
ये कवि भूषण एवं चिंतामणि के सगे भाई कहे जाते हैं।
इनका प्रसिद्ध कथन/प्रशस्ति: ‘‘कुन्दन को रंग फिको लगे…’’
प्रमुख रचनाएँ: रसराज (शृंगार एवं नायिका भेद का श्रेष्ठ ग्रंथ), ललित ललाम, फूल मंजरी, वृत्तकौमुदी, मतिराम सतसई, अलंकार पंचाशिका।
(3) भूषण
ये शिवाजी एवं छत्रसाल बुंदेला के दरबार में आश्रय पाते रहे।
रीतिकाल के एकमात्र ऐसे प्रतिष्ठित कवि हैं जिन्होंने वीर रस की ओजस्वी कविताएँ लिखकर अपूर्व ख्याति अर्जित की।
राजा रुद्रशाह सोलंकी ने इन्हें ‘‘भूषण’’ की उपाधि प्रदान की थी।
ऐसा जन-विश्वास है कि इनकी पालकी में स्वयं महाराज छत्रसाल ने कंधा लगाया था।
प्रमुख रचनाएँ:
शिवराज भूषण (जयदेव के ‘चंद्रालोक’ पर आधारित अलंकार ग्रंथ; इसमें कुल 384 छंद हैं, जिनमें दोहों में अलंकारों के लक्षण तथा कवित्त/सवैया में शिवाजी के कार्य-कलापों का वर्णन है)
शिवा बावनी (इसमें 52 छंदों में शिवाजी की वीरता का वर्णन है)
छत्रशाल दशक (इसमें छत्रसाल की वीरता का वर्णन है)
इनकी रचनाओं में राष्ट्रीयता और हिंदू जन-जागरण की भावना प्रबल रूप से प्रेरित दिखाई देती है।
डॉ. नगेंद्र के अनुसार, ऐसा प्रसिद्ध है कि इन्हें अपनी कविता के एक-एक छंद पर शिवाजी से लाखों रुपए मिले थे।
(4) बिहारी
जन्म: 1595 ई., ग्वालियर।
ये मिर्जा राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे। राजा इन्हें प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण-मुद्रा पुरस्कार में देते थे (और इनके दोहों पर प्रसन्न होकर इन्हें ‘काली पहाड़ी’ नामक गाँव पुरस्कार में दिया था)।
‘बिहारी सतसई’ मूलतः शृंगार रस से ओत-प्रोत मुक्तक काव्य है। इसे शृंगार, भक्ति और नीति की त्रिवेणी कहा जाता है। इसमें कुल 713 दोहे (कुछ विद्वान 719 भी मानते हैं) संकलित हैं।
आचार्य शुक्ल के कथन:
‘‘जिस कवि की कल्पना की समाहार शक्ति के साथ भाषा की सामासिक शक्ति जितनी अधिक होगी उतना ही वह मुक्तक रचना में सफल होगा, यह क्षमता बिहारी में पूर्णरूप से विद्यमान थी।’’
‘‘यदि प्रबंध काव्य एक विस्तृत वनस्थली है तो मुक्तक एक चुना हुआ गुलदस्ता।’’
‘‘इनके दोहे क्या हैं रस के छोटे-छोटे छींटे हैं।’’
‘‘इनकी कविता शृंगारी है किंतु प्रेम की उच्च भूमि पर नहीं पहुँचती, नीचे रह जाती है।’’
बिहारी की भाषा चलती होने पर भी साहित्यिक है। शुक्ल जी ने बिहारी सतसई के वियोग वर्णन पक्ष का उपहास भी किया है।
(5) देव (देवदत्त)
इनका पूरा नाम देवदत्त था तथा ये इटावा के रहने वाले थे।
इन्हें अनेक राजाओं का आश्रय प्राप्त हुआ क्योंकि इन्हें कोई एक स्थायी और उदार आश्रयदाता नहीं मिला, इसलिए ये बराबर एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहे।
आचार्य शुक्ल का मत: ‘‘रीतिकाल के कवियों में ये बड़े ही प्रतिभासम्पन्न कवि थे।’’
प्रमुख रचनाएँ: भाव विलास (इस रचना को औरंगजेब के पुत्र आजमशाह को सुनाया था), अष्टयाम, देवशतक, रागरत्नाकर, रसविलास (राजा भोगीलाल के आश्रय में रचित), देवचरित, सुखसागर तरंग, शब्द रसायन (महत्वपूर्ण लक्षण ग्रंथ), देवमाया प्रपंच (प्रबोधचंद्रोदय नामक संस्कृत नाटक का पद्य में अनुवाद), भवानीविलास, कुशलविलास, प्रेमचंद्रिका, सुजान विनोद, प्रेमतरंग, जाति विलास आदि।
रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों में संभवतः सबसे अधिक ग्रंथों की रचना देव ने ही की है (इनकी पुस्तकों की संख्या 52 से 72 तक बतलाई जाती है)।
(6) घनानंद
ये रीतिमुक्त धारा के सर्वोच्च शृंगारी और प्रेम के पीर के कवि हैं।
ये दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के यहाँ मीर मुंशी के पद पर कार्यरत थे।
सुजान नामक नर्तकी से प्रेम और दरबार से निष्कासन के बाद ये वृंदावन चले गए और निंबार्क संप्रदाय में दीक्षित हो गए।
आचार्य शुक्ल के कथन:
‘‘भाषा के लक्षक एवं व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है, इसकी पूरी परख इन्हीं को थी।’’
‘‘प्रेम मार्ग का ऐसा प्रवीण और वीर पथिक तथा जबानी का दावा रखने वाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ।’’
‘‘साक्षात् रसमूर्ति’’ (घनानंद के लिए प्रयुक्त विशेष संबोधन)।
उनका प्रसिद्ध काव्य-सिद्धांत वाक्य: ‘‘अति सूधो स्नेह को मार्ग है जहाँ नेकु सयानप बांकी नहीं।’’
प्रमुख रचनाएँ: सुजानसागर, वियोगवेलि, लोकसार, सुजान हित प्रबंध, सुजान विनोद, पदावली आदि।
(7) पद्माकर (पद्याकर)
ये रीतिकाल में बिहारी के बाद सर्वाधिक लोकप्रिय कवियों में गिने जाते हैं।
प्रमुख रचनाएँ: हिम्मत बहादुर विरूदावली (वीर रस प्रधान चरित काव्य), प्रतापसिंह विरूदावली, जगत्विनोद (शृंगार रस का अत्यंत प्रसिद्ध ग्रंथ जो प्रतापसिंह के पुत्र जगतसिंह के संरक्षण में लिखा गया), पद्माभरण (अलंकार ग्रंथ), कलिपचीसी, प्रबोधपचासा (वैराग्य और भक्ति निरूपण), गंगालहरी (गंगा की महानता और स्तुति का ग्रंथ)।
(8) वृंद कवि
इन्होंने लोक जीवन को अपना काव्य विषय बनाया तथा ‘वृंद सतसई’ की रचना की।
इनका एक अत्यंत प्रसिद्ध नीतिपरक दोहा है:
‘‘फीकी पै निकी लगै, कहिए समय विचारि।
सबको मन हर्षित करे, ज्यों विवाह में गारि।।’’
🌟 बिहारी सतसई के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य एवं टीकाएँ
जन्म: 1595 ई. | स्थान: ग्वालियर | मृत्यु: 1663 ई.
रचना काल: 1662 ई. | भाषा: ब्रजभाषा | छंद: दोहा (कुल 713/719)
काव्य स्वरूप: मुक्तक काव्य | प्रमुख रस: संयोग शृंगार रस
विशेष तथ्य:
बिहारी रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ सिद्ध कवि माने जाते हैं।
हिंदी में समास-पद्धति की शक्ति का सर्वाधिक परिचय बिहारी ने दिया है।
प्रथम टीकाकार: कृष्ण कवि (जिन्होंने सवैया छंद में टीका लिखी, तथा प्रत्येक दोहे पर एक नया छंद भी बनाया)।
रोला छंद में अनुवाद: अंबिकादत्त व्यास।
उपाधि / कथन:
बिहारी सतसई को ‘शाक्कर की रोटी’ कहने वाले: पद्मसिंह शर्मा।
संस्कृत में अनुवाद (शृंगार सप्तशती के नाम से): परमानंद।
रसिकों के हृदय का घर कहने वाले: हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी का चौथा रत्न मानने वाले: लाला भगवानदीन।
रीतिकाल का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि मानने वाले: हजारी प्रसाद द्विवेदी।
बिहारी को ऐसा पीयूष-वर्षी मेघ कहने वाले जिसके उदय होते ही सूर और तुलसी आच्छादित हो जाते हैं: राधाचरण गोस्वामी।
‘रामचरितमानस’ के बाद सबसे अधिक प्रचारित कृति मानने वाले: श्यामसुंदर दास।
हिंदी साहित्य का बेजोड़ कवि मानने वाले: विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (इनकी प्रसिद्ध कृति: ‘बिहारी की वागविभूति’)।
संपूर्ण विश्व में बिहारी सतसई के समकक्ष कोई रचना प्राप्त नहीं होती: ग्रियर्सन।
फारसी भाषा में अनुवाद (‘फिरंगे सतसई’): आनंदीलाल शर्मा।
‘अमरचंद्रिका’ नाम से टीका लिखने वाले: सूरति मिश्र।
सरल टीकाकार: लाला भगवानदीन।
‘लाल चंद्रिका’ नाम से प्रसिद्ध टीका लिखने वाले: लल्लू लाल।
‘राम सतसई’: रामसहाय दास।
‘सतसई बरनार्थ’: ठाकुर।
सर्वश्रेष्ठ और प्रामाणिक टीका: जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ की ‘बिहारी रत्नाकर’ (खड़ी बोली में)।
ब्रजभाषा में टीका लिखने वाले: राधाकृष्ण चौबे।
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जी ,धन्यवाद