कैदी और कोकिला (Kaidi aur Kokila) कविता की सप्रसंग व्याख्या – माखनलाल चतुर्वेदी

अंतिम संशोधित (Last Updated): September 3, 2026

कैदी और कोकिला (Kaidi aur Kokila) – कविता की संपूर्ण व्याख्या

आज की इस पोस्ट में हम हिंदी साहित्य के प्रख्यात कवि माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित अत्यंत प्रसिद्ध कविता ‘कैदी और कोकिला’ (Kaidi aur Kokila) की सम्पूर्ण व्याख्या विस्तार से पढ़ेंगे तथा इस कविता के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे।
यह कविता भारतीय स्वाधीनता सेनानियों के साथ जेल में किए गए अमानवीय दुर्व्यवहारों और यातनाओं का एक मार्मिक और सजीव साक्ष्य प्रस्तुत करती है। जब कारागार के एकाकी एवं उदासी भरे वातावरण में रात्रि के समय कोयल अपने मन का दुःख और असंतोष व्यक्त करती है, तो स्वतंत्रता सेनानियों में अंग्रेजों की अधीनता से मुक्ति पाने की भावना और अधिक प्रबल हो जाती है। ऐसे में कवि कोयल को संबोधित करते हुए अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है।

रचना परिचय: कैदी और कोकिला

माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित ‘कैदी और कोकिला’ एक अत्यंत ओजस्वी और मार्मिक कविता है। स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के कारण कवि को कारागार में बंदी बनना पड़ा था। जेल की कालकोठरी में एकांत और निराशा के बीच जब उन्हें एक कोयल की कूक सुनाई देती है, तब वे कोयल के माध्यम से ब्रिटिश शासन के अत्याचारों और एक कैदी के मन की पीड़ा का अद्भुत चित्रण करते हैं।

कविता पाठ और सप्रसंग व्याख्या

भाग 1: कोयल की रहस्यमयी कूक

क्या गाती हो ?
क्यों रह-रह जाती हो ?
कोकिल बोलो तो!
क्या लाती हो ?
संदेशा किसका है ?
कोकिला बोलो तो !
व्याख्या:
स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के कारण कवि को कारागार में डाल दिया गया था। तब एक रात उसे वहाँ पर कोयल की कूक सुनाई पड़ती है। वह कहता है कि तुम रात में ही क्यों गाती हो? तुम फिर रह-रह अर्थात् कुछ क्षणों के बाद चुप क्यों हो जाती हो? हे कोयल बोलो। तुम क्रान्तिकारी देशभक्तों के लिए किसका सन्देश लाती हो? स्वाधीनता संग्राम के कैदियों को तुम क्या सन्देश देती हो? हे कोयल, तुम स्पष्टतया बोलो।

भाग 2: जेल की नारकीय परिस्थितियाँ

ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के घेरे में,
जीन को नहीं देते पेट-भर खाना,
मरने भी देने नहीं, तड़फ रह जाना।
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है ?
हिमकर निराश कर चला रात भी काली,
इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली ?
व्याख्या:
कवि अपने और जेल में बन्द अन्य कैदियों के सम्बन्ध में कोयल से कहता है कि हम क्रान्तिकारी देशभक्त इस जेल की ऊँची काली दीवारों के घेरे में कैद हैं। वस्तुतः यह स्थान तो उनका निवास है जो डाकू, चोर, लुटेरे जैसे अपराधी हैं। जेल में पेट भरकर भोजन नहीं दिया जाता है, जिससे हमें न तो जीने देते हैं और न मरने देते हैं। हम तो यहाँ तड़फते रहते हैं।
यहाँ पर अंग्रेज सरकार का हम पर रात-दिन कड़ा पहरा रहता है। अंग्रेज शासन का प्रभाव गहरे अंधकार के समान है। चन्द्रमा भी अस्त हो गया है, अब हम निराश होकर काली रात में जी रहे हैं। ऐसे में हे काली कोयल! तुम क्यों जाग रही हो?

भाग 3: आधी रात में कोयल का क्रंदन

क्यों हूक पड़ी ?
वेदना बोझ वाली-सी;
कोकिला बोलो तो !
क्या लूटा ?
मृदुल वैभव की
रखवाली-सी
कोकिल बोलो तो !
क्या हुई बावली ?
अर्द्धरात्रि को चीखी,
कोकिल बोलो तो!
किस दावानल की
ज्वालाएँ हैं दीखी ?
कोकिल बोलो तो ?
व्याख्या:
कवि माखनलाल चतुर्वेदी कोयल से पूछता है कि हे कोयल! इस अँधेरी रात में जब सारा संसार सो रहा है, तब तुम भारी वेदना के बोझ से दर्द के स्वर में क्यों रो पड़ी हो? तुम मधुर वैभव की रखवाली करती-सी कूक रही हो तो बताओ कि असल में उस खजाने से क्या लुट गया है?
तुम आधी रात में चीख रही हो, क्या पगला गयी हो? या तुमने दावानल की तेज लपटें उठती हुई देखी हैं? इसी कारण से तुम चीख रही हो? हे कोयल! तुम अपने चीखने का कारण बताओ।

भाग 4: हथकड़ियाँ और कोल्हू की यातनाएँ

अर्द्धरात्रि को चीखी, क्या ? देख न सकती जंजीरों का गहना ?
हथकड़ियाँ क्यों ? यह ब्रिटिश-राज का गहना,
कोल्हू का चर्रक चूँ ? जीवन की तान,
गिट्टी पर अंगुलियों ने लिखे गान!
हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ,
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कुँआ।
दिन में करुणा क्यों जगे, रुलानेवाली,
इसलिए रात में गजब ढा रही आली ?
इस शान्त समय में,
अंधकार को बेध, रो रही क्यों हो ?
कोकिल बोलो तो!
चुपचाप, मधुर विद्रोह-बीज
इस भाँति बो रही क्यों ?
कोकिल बोलो तो!
व्याख्या:
स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रिय भाग लेने से कवि तथा अन्य क्रान्तिकारी देशभक्तों को अंग्रेज सरकार ने जेलों में डाल दिया था और उन्हें अनेक कठोर यातनाएँ दी गई थीं। फिर भी वे साहसपूर्वक सब कुछ सहन करते रहे। इसी सन्दर्भ में कवि कहता है कि हे कोयल! क्या तुम अर्द्धरात्रि के समय इसलिए क्रन्दन कर रही हो कि हमारे शरीर पर पड़ी ये बेड़ियाँ (जंजीरों के गहने) तुम नहीं देख सकती? ये हम स्वाधीनता सेनानियों के लिए हथकड़ियाँ नहीं हैं, अपितु ये ब्रिटिश राज द्वारा दिये गए गहने हैं।
अर्थात् इन हथकड़ियों व जंजीरों से हम क्रान्तिकारियों की शोभा बढ़ रही है। हमें जेल में कोल्हू खींचना पड़ता है, उसकी चर्रक चूँ की आवाज को हम जीवन का संगीत मानते हैं। पत्थरों को तोड़कर हम गिट्टियों पर मानो हमारी अंगुलियाँ गीत लिखती हैं। जेल में मैं पेट पर जुआ बाँधकर मोट या चरस को खींचता हूँ और कुएँ से पानी निकालता हूँ। कुएँ से पानी निकालने से हम ब्रिटिश राज के अहंकार के कुएँ को खाली कर रहे हैं। इस तरह अब अंग्रेजों की अकड़ धीरे-धीरे कम हो रही है। हे कोयल! तुम्हें पता है कि दिन में हम क्रान्तिकारी को घोर यातनाएँ दी जाती हैं, उस समय अंग्रेजों से किसी करुणा की आशा नहीं की जा सकती है।

इसी कारण तुम दिन की अपेक्षा आधी रात में कूक कर अतीव आश्चर्यजनक कार्य कर रही हो अर्थात् हमारे घावों पर मलहम लगाने का काम करने के लिए तुमने यह उचित समय चुना है। हे कोयल! अगर यह बात नहीं है तो इस अर्द्धरात्रि के शान्त समय में, अंधकार को चीरती हुई क्यों करुणा-क्रन्दन कर रही हो? हे कोयल! तुम्हें पीड़ा हो रही है? तुम इस तरह करुणामयी कूक के द्वारा हमारे हृदय में चुपचाप क्रान्ति और विद्रोह के बीज क्यों बो रही हो, क्यों इस तरह स्वाधीनता-संघर्ष की गुपचुप तैयारी में संलग्न हो रही हो? कोयल, तुम कुछ तो बताओ।

भाग 5: चारों तरफ व्याप्त कालिमा और संकट

काली तू, रजनी भी काली,
शासन की करनी भी काली,
काली लहर कल्पना काली,
मेरी काल-कोठरी काली,
टोपी काली, कमली काली,
मेरी लौह-शृंखला काली,
पहरे की हुँकृति की ब्याली,
तिस पर है गाली, ए आली!
इस काले संकट-सागर पर
मरने की, मदमाती!
कोकिला बोलो तो!
अपने चमकीले गीतों को
क्योंकर हो तैराती!
कोकिल बोलो तो!
व्याख्या:
कैदी के रूप में कवि कोयल से कहता है कि इस समय सब तरह अंधकार की कालिमा छायी हुई है, तुम काली हो, रात भी काली है और अंग्रेजों की करतूतें भी काली हैं। देश में निराशा रूपी काली लहर फैली हुई है और मन में काली (बुरी) कल्पनाएँ उठ रही हैं। हमारी टोपी और कम्बल का रंग भी काला है। हमारी हथकड़ियाँ या बेड़ियाँ भी काले रंग की हैं। जेल के पहरेदारों की हुँकार भी साँपिन की तरह काली-जहरीली है। उस पर ये लोग बात-बात पर गालियाँ देते हैं।

कवि कहता है कि हे कोयल! इस समय अपार संकट सामने खड़ा है, इस मुश्किल की घड़ी में तुम मरने को उद्यत क्यों दिखाई देती हो? तुम यहाँ पर हम क्रान्तिकारियों के मस्ती भरे गीत क्यों सुनती हो? तुम भी तो मस्ती से भरी हुई दिखाई दे रही हो। तुम चमकीले अर्थात् आशा और उत्साह से भरपूर गीतों को क्यों इस कारागार के पास तैरा रही हो? रात्रि में कारागार के समीप क्यों घूम-फिरकर ओज-तेज का संचार कर रही हो? हे कोयल! तुम कुछ स्पष्ट कहो, कुछ तो बोलो।

भाग 6: कैदी और कोयल की दशा में विषमता

तुझे मिली हरियाली डाली,
मुझे नसीब कोठरी काली!
तेरा नभ-नभ में संचार
मेरा दस फुट का संसार!
तेरे गीत कहावें वाह,
रोना भी मुझे गुनाह!
देख विषमता तेरी-मेरी,
बजा रही तिस पर रणभेरी!
इस हुँकृति पर,
अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ ?
कोकिल बोलो तो!
मोहन के व्रत पर,
प्राणों का आसव किसमें भर दूँ!
कोकिल बोलो तो!
व्याख्या:
अपनी तुलना कोयल से करता हुआ कवि कहता है कि हे कोयल! तुझे तो रहने-बैठने के लिए हरी-भरी टहनी मिली है, पर मेरे भाग्य में जेल की यह काल-कोठरी है, तू असीम आकाश में घूमती फिरती है, परन्तु मेरी दुनिया इस दस फुट के कमरे में अर्थात् जेल की छोटी कोठरी में सिमट गयी है। तेरे मधुर गीत को सुनकर लोग प्रशंसा में वाह-वाह करते हैं और मेरे लिए तो रोना भी अपराध या पाप है। हम दोनों में इतनी विषमता है, यह देखकर भी तुम युद्ध का नगाड़ा बजा रही हो अर्थात् हमें स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए संघर्षरत रहने की प्रेरणा दे रही हो, यह आश्चर्यजनक है।
हे कोयल! तुम्हारी इस हुँकार को सुनकर मैं पूछना चाहता हूँ कि अपनी रचना से मैं और क्या कर सकता हूँ? कोयल तुम मुझे बताओ। मोहनदास कर्मचन्द गाँधी अर्थात् महात्मा गाँधी ने देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए जो दृढ़ संकल्प लिया, उसे पूरा करने के लिए मैं अपने प्राणों का आसव किसमें भर दूँ अर्थात् अपनी प्राणशक्ति किसे दे दूँ? हे कोयल! तुम कुछ तो बताओ और कुछ तो इस विषय में बोलो।

निष्कर्ष (Conclusion)

माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा रचित ‘कैदी और कोकिला’ कविता केवल एक पक्षी और कैदी के बीच का संवाद नहीं है, बल्कि यह ब्रिटिश शासन के क्रूर और दमनकारी चेहरे का पर्दाफाश करती है। कविता में कोयल का आधी रात में कूकना स्वतंत्रता के संघर्ष का प्रतीक बन जाता है, जो सोए हुए देशवासियों और क्रांतिकारियों के मन में देशप्रेम की अलख जगाता है। कवि ने कालकोठरी की यंत्रणाओं को सहते हुए भी जिस ओज और राष्ट्रीय चेतना का परिचय दिया है, वह अप्रतिम है। यह कविता आज भी पाठकों के हृदय में देशभक्ति और स्वाभिमान की भावना का संचार करती है।

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