अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ कविता: प्रसंग व्याख्या और महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अंतिम संशोधित (Last Updated): August 20, 2026

असाध्य वीणा (अज्ञेय): कविता की व्याख्या और महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक ‘अज्ञेय’ जी ने अपनी लेखनी से साहित्य के नए प्रतिमान रचे। उनकी चर्चित लंबी कविता “असाध्य वीणा” उनके काव्य-संग्रह ‘आँगन के पार द्वार’ (1961) में संकलित है। यह कविता एक जापानी लोककथा पर आधारित है, जिसे अज्ञेय ने भारतीय दर्शन (बौद्ध धर्म के ‘तथता’ सिद्धांत) के साथ अद्भुत कौशल से पिरोया है।

असाध्य वीणा: संक्षिप्त परिचय

यह कविता एक ऐसी वीणा के बारे में है जिसे बड़े-बड़े कलाकार भी नहीं बजा सके। अंततः केशकम्बली ‘प्रियंवद’ नामक साधक ने इसे साध्य किया। यह वीणा ‘किरीट तरु’ से बनी है।

  • प्रमुख प्रतीक: ‘किरीट तरु’ परम सत्ता का और ‘प्रियंवद’ व्यक्ति सत्ता का प्रतीक है।

  • मूल संवेदना: आत्म-विसर्जन और अहं का विलोपन।

असाध्य वीणा (अज्ञेय)

परीक्षापयोगी व्याख्या

व्याख्या 1

लघु संकेत समझ राजा का
गण दौड़े। लाए असाध्य वीणा
साधक के आगे रख उसको, हट गए।
सभी की उत्सুক आँखें
एक बार वीणा को लख, टिक गईं,
प्रियंवद के चेहरे पर।
प्रसंग सहित व्याख्या: ‘असाध्य वीणा’ अज्ञेय की एक महत्वपूर्ण कलाकृति है। यह उनकी लम्बी कविता है जो सर्जना के गहन व विशिष्ट स्तरों का संकेत देती है। इसकी कथा प्रख्यात प्राचीन चीनी कथा पर आधारित है। इस कविता पर बौद्ध दर्शन का प्रभाव भी माना जाता है। असाध्य वीणा की कथा किसी राजा और कलाकार की साधना से बनी है। वीणा का निर्माण उत्तराखण्ड के गिरिप्रान्तर के घने वनों में उगे हुए किरीटी तरु से हुआ है। वज्रकीर्ति ने इस वीणा को बनाया है। वज्रकीर्ति वीणा बनाकर राजा को भेंट कर देता है।
वीणा तो बन गई, पर वज्रकीर्ति का जीवन समाप्त हो गया। अब वीणा को बजाने वाला कोई नहीं रहा। अतः वह वीणा असाध्य वीणा होकर रह गई। यद्यपि राजा के दरबार में अनेक कलाकार थे, लेकिन कोई भी कलावंत उस वीणा को न बजा सका। एक दिन राजा के आमंत्रण पर प्रियंवद नाम का एक महान तपस्वी साधक वहाँ आया और उसने अपनी साधना से वीणा के असाध्य तारों को झंकृत कर दिया।
इसी प्रसंग में कवि कह रहा है कि वह असाध्य वीणा, जिसे अनेक साधक साधने में असफल रहे, उसे झंकृत करने के लिए जब प्रियंवद केशकम्बली का आगमन राजा के दरबार में हुआ तब राजा ने प्रियंवद को उस असाध्य वीणा के इतिहास से परिचित कराया। प्रियंवद के साथ राजा के वार्तालाप से ही वीणा लाने का संकेत पाकर सेवकजन उस असाध्य वीणा को दरबार में ले आए।
यह वीणा कोई साधारण वीणा न थी, अपितु इसे तो अनेक अनुभवी, ज्ञानी, साधक भी साधने में असफल रहे थे, इसीलिए संभवतः इसे ‘असाध्य वीणा’ की संज्ञा दी गई। सेवकों ने वह वीणा साधक अर्थात् प्रियंवद के सम्मुख रख दी। वस्तुतः एक सच्ची साधना लक्ष्याभिमुख पर ही आधारित होती है। इस सच्ची साधना के अभाव में ही अनेक साधक इस वीणा को झंकृत करने में असफल रहे। अब समस्त सभाजनों की उत्सुक आँखों ने पहले उस अद्भुत वीणा को देखा और फिर उसे साधने का प्रयास करने वाले साधक प्रियंवद को देखा।

व्याख्या 2

यह वीणा उत्तराखण्ड के गिरि-प्रान्तर से
घने वनों में जहाँ तपस्या करते हैं व्रतचारी-
बहुत समय पहले आई थी।
पूरा तो इतिहास न जान सके हमः
किन्तु सुना है
वज्रकीर्ति ने मन्त्रपूत जिस
प्राचीन किरीटी-तरु से इसे गढ़ा था-
प्रसंग सहित व्याख्या: ‘असाध्य वीणा’ शीर्षक लम्बी कविता से अवतरित इस अंश के पूर्वोक्त प्रसंग में ही राजा प्रियंवद को वीणा के इतिहास से परिचित कराते हुए कहता है कि असाध्य वीणा उत्तराखण्ड में विशाल पर्वतों के मध्य स्थित सघन वनों वाले ऐसे स्थल से बहुत समय पूर्व आई थी, जहाँ सदैव तपस्वी जन योग आदि में रत रहते हैं। अर्थात् जिस वन प्रान्तर का वातावरण मन्त्रोच्चारण, यज्ञादि की अग्नि से तथा तप के उज्ज्वल, शुभ्र आलोक से पवित्र रहता है, उसी वन के किरीटी तरु के काष्ठ से इस अद्भुत वीणा का निर्माण हुआ है।
राजा कहता है कि इस अति प्राचीन वीणा के सम्पूर्ण इतिहास से तो हम भी अनभिज्ञ हैं, किन्तु सुनने में यही आया है कि इस अतिविशिष्ट वीणा का निर्माण वज्रकीर्ति द्वारा संपन्न हुआ है। वज्रकीर्ति ने दैवी मन्त्रों से शुद्धित, अनायास प्रदत्त अलौकिक गुणों के अखंड कोष, अति प्राचीन किरीट तरु के काष्ठ से इसे गढ़ा था।

व्याख्या 3

पर उस स्पन्दित सन्नाटे में
मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा-
नहीं, स्वयं अपने को शोध रहा था।
सघन निविड़ में वह अपने को
सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को।
कौन प्रियंवद है कि दम्भ कर
इस अभिमंत्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?
कौन बजावे
यह वीणा जो स्वयं एक जीवन-भर साधना रही?
प्रसंग सहित व्याख्या: प्रस्तुत पद्यावतरण अज्ञेय कृत ‘असाध्य वीणा’ शीर्षक लम्बी कविता से लिया गया है। प्रियंवद को वीणा के समक्ष नतमस्तक देखकर संपूर्ण सभा हतप्रभ सी थी। सभी के हृदय में प्रियंवद की सफलता के प्रति शंका उत्पन्न हो रही थी, परंतु प्रियंवद वस्तुतः अपनी अंतश्चेतना से संपृक्त होता हुआ बाह्य संसार से पूर्णतया कट चुका था। इस प्रकार वह आत्मनिर्वासित-सा होकर उस असाध्य वीणा व अतिप्राचीन किरीटी तरु से अपना तादात्म्य स्थापित कर रहा था।
इस भाव को इन पंक्तियों में प्रस्तुत करते हुए कवि कह रहा है कि प्रियंवद को वीणा पर नतमस्तक होता हुआ देखकर सभा के हृदय में सहज आशंका ने जन्म ले लिया। प्रियंवद की सफलता-असफलता, विजय-पराजय के प्रति अनेक शंकाएँ व नाना प्रश्न सभाजनों के अंतर्मन को व्यथित करने लगे, परंतु वातावरण शब्दरहित, नीरव, स्तब्ध था, जिसमें कहीं कोई हलचल नहीं थी। ऐसे स्पन्दित सन्नाटे में गतिहीन, क्रियाहीन प्रियंवद वस्तुतः वीणा को साधने में प्रयासरत था अथवा वह आत्मशोधन कर रहा था।

कवि अज्ञेय ने यहाँ ‘सन्नाटे’ का अति सार्थक विशेषण ‘स्पन्दित’ प्रयुक्त किया है। वस्तुतः सभा तो पूर्णतया मौन, निस्तब्ध थी, परंतु सभाजनों के हृदय को प्रियंवद की जय-पराजय के प्रश्न अपने घात-प्रतिघातों से आंदोलित-विलोड़ित कर रहे थे। बाह्य वातावरण नीरव होते हुए भी अंतर्मन सहज आशंका के वशीभूत होकर अति व्याकुल अवस्था में स्पन्दित हो रहा था। इस शब्दहीन स्पन्दित वातावरण में कलावंत प्रियंवद एकाग्रचित होकर, एकात्मभाव से शनैः शनैः अपनी अंतश्चेतना से संपृक्त हुआ तथा बाह्य वातावरण से कटकर उस असाध्य वीणा को साधने का प्रयास कर रहा था।

व्याख्या 4

मैं सुनूँ,
गुनूँ,
विस्मय से भर आँकूँ
तेरे अनुभव का एक-एक अंतःस्वर
तेरे दोलन की लोरी पर झूमूँ मैं तन्मय-
गा तूः
तेरी लय पर तेरी साँसें
भरें, पुरें, रीतें, विश्रान्ति पायें।
प्रसंग सहित व्याख्या: पूर्व प्रसंग में ही किरीटी तरु के समक्ष विनयावनत प्रियंवद के मनोगत भावों को उद्भासित करते हुए कविवर अज्ञेय ने संवेदनशील कवि की अभिव्यक्ति के उपरांत उत्पन्न अद्भुत संतोष की भावना को प्रतीकात्मक रूप से चित्रित किया है। प्रियंवद किरीटी तरु को संबोधित करते हुए कहता है कि परंपरा से गृहीत व्यष्टि व समष्टिगत अनुभूतियाँ जो तुझमें केन्द्रीभूत हो गई हैं, उनके अंतःस्वरों को मैं सुनूँ, भली-भांति ग्रहण करूँ और आश्चर्यचकित होकर उनकी विवेचना करूँ।
‘अनुभवों का एक-एक अंतःस्वर’ कहने का तात्पर्य यह है कि मैं तेरे मात्र बाह्य नहीं अपितु संपूर्ण रहस्यों को जानना चाहता हूँ। ‘विस्मय से भर आँकूँ’ अति अर्थगर्भित पंक्ति है। जिस प्रकार एक शिशु जब घर के आँगन की सीमा में ही क्रीड़ारत रहता है तो वह बाह्य जगत के उपादानों से पूर्णतया अनभिज्ञ रहता है, जब कोई उसे गोद में उठाकर घर की सीमा से बाहर ले जाता है तो वह सभी वस्तुओं को हतप्रभ, आश्चर्यचकित होकर देखता है, उसे जानने का प्रयास करता है, उसी प्रकार प्रियंवद कहता है कि जब सृष्टि के रहस्यों से अनभिज्ञ मेरे समक्ष तुम एक-एक करके समस्त रहस्यों को अनावृत्त करोगे तो मैं विस्मित होकर चकित-सा उन रहस्यों की विवेचना करूँगा।

व्याख्या 5

सहसा वीणा झनझना उठी-
संगीतकार की आँखों में ठंडी पिघली ज्वाला सी झलक गई-
रोमांच एक बिजली सा सबके तन में दौड़ गया।
अवतरित हुआ संगीत
स्वयंभू
जिसमें सोया है अखंड
ब्रह्मा का मौन
अशेष प्रभामय।
डूब गए सब एक साथ।
सब अलग-अलग एकाकी पार तरे।
प्रसंग सहित व्याख्या: ‘असाध्य वीणा’ कविता की इन पंक्तियों में कवि अज्ञेय ने उस स्थिति का वर्णन किया है जबकि प्रियंवद की मौन साधना के परिणामस्वरूप अचानक वीणा बज उठती है। कवि कह रहा है कि मौन साधक प्रियंवद आत्मशोधन करते हुए जब पूरी तरह वीणा के प्रति समर्पित हो गया और उसने अपने अहंकार को वीणा के प्रति पूरी तरह समर्पित कर दिया तब अचानक वीणा के तार झनझना उठे।
उनसे जो स्वर-लहरी निकली उसकी एक चमक संगीतकार की आँखों में उस ज्वाला के समान दिखाई दी जो शीतल होकर पिघलने लगती है। स्पष्ट अर्थ यह है कि जिस प्रकार जमा हुआ हिम गर्मी पाकर पिघल जाता है वैसे ही वीणा प्रियंवद की मौन-साधना की उष्णता पाकर पिघल गई और उसकी स्वर-लहरी सुनकर संगीतकार की आँखों में एक अद्भुत ज्योति उत्पन्न हो गई।

व्याख्या 6

श्रेय नहीं कुछ मेराः
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में
वीणा के माध्यम से अपने को मैंने
सब-कुछ को सौंप दिया था-
सुना आपने जो वह मेरा नहीं,
न वीणा का थाः
वह तो सब कुछ की तथता थी-
महाशून्य
वह महामौन
अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय
जो शब्दहीन
सब में गाता है।
प्रसंग सहित व्याख्या: प्रस्तुत पद्यावतरण ‘असाध्य वीणा’ कविता के अंतिम भाग से अवतरित है। जो वीणा असाध्य थी, वह जब सध गई तब उससे जो स्वर निकला, उसका अलग-अलग प्रभाव सभी व्यक्तियों पर पड़ा। उस स्वर-लहरी में रानी ने ‘प्रेम अनन्य है’ जैसी ध्वनि सुनी तो राजा ने यह अनुभव किया कि विजय की देवी वरमाला लिए हुए राजा की यश सिद्धि में मंगलगान गा रही है। सभासदों ने वीणा से निकले हुए संगीत को अलग-अलग अर्थों में ग्रहण किया।
जब वीणा सध गई और संगीतकार ने आदरभाव से गोद में रखी हुई वीणा को धीरे से धरती पर रखा, तब उसने कहा कि यदि यह असाध्य वीणा सध गई है तो इसमें मेरा कोई योगदान नहीं है। वीणा को साधने में मैं अपना श्रेय नहीं मानता हूँ। वास्तव में तो इस वीणा को अपनी गोद में रखकर मैं स्वयं शून्य में डूब गया था। एक प्रकार से वीणा के द्वारा मैंने अपने आपको उस सर्वोच्च सत्ता को समर्पित कर दिया था जो सभी की सुरक्षा करती है।

अभ्यास हेतु महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (वन-लाइनर)

  1. असाध्य वीणा किस देश की लोक कथा पर आधारित है? ⇒ चीनी/जापानी

  2. इसमें बौद्ध धर्म के किस सिद्धांत की अनुभूति है? ⇒ तथता सिद्धांत

  3. असाध्य वीणा किस काव्य संग्रह में है? ⇒ आँगन के पार द्वार

  4. वीणा का निर्माण किस वृक्ष से हुआ था? ⇒ किरीट तरु

  5. वीणा का निर्माण किसने किया था? ⇒ वज्रकीर्ति

  6. अज्ञेय को ‘आँगन के पार द्वार’ पर साहित्य अकादमी कब मिला? ⇒ 1964 ई.

  7. अज्ञेय को ज्ञानपीठ पुरस्कार किस रचना पर मिला? ⇒ कितनी नावों में कितनी बार (1978 ई.)

  8. केशकम्बली प्रियंवद कहाँ रहता था? ⇒ गुफा में

  9. वीणा के संगीत में रानी ने क्या सुना? ⇒ अनन्य प्रेम सर्वोपरि है।

  10. प्रियंवद ने वीणा की साधना कैसे की? ⇒ आत्मसमर्पण और किरीट तरु के प्रति विसर्जन से।

  11. राजा ने संगीत को किस रूप में सुना? ⇒ विजयश्री और यश के रूप में।

  12. वीणा साधना संभव कैसे हुई? ⇒ शून्य और मौन से।

  13. वज्रकीर्ति की हठ साधना क्या थी? ⇒ वीणा को हर कोई न साध सके।

  14. राजा ने प्रियंवद को आसन दिया, राजा के मन में कौन सा भाव था? ⇒ कृतज्ञता।

  15. वीणा मौन होने पर प्रियंवद ने उसे कैसे रखा? ⇒ सोये हुए शिशु की तरह धीरे से।

  16. अज्ञेय का प्रसिद्ध कहानी संग्रह कौन सा है? ⇒ विपथगा।

  17. ‘बटुली’ शब्द का अर्थ क्या है? ⇒ भोजन पकाने का पात्र।

  18. असाध्य वीणा का नाम असाध्य क्यों पड़ा? ⇒ क्योंकि उसे कोई बजा नहीं सका था।

  19. अज्ञेय का जन्म कब हुआ था? ⇒ 1911 ई.

  20. अज्ञेय द्वारा संपादित ‘तार सप्तक’ कब प्रकाशित हुआ? ⇒ 1943 ई.

आशा है कि ‘असाध्य वीणा’ पर आधारित यह विस्तृत सामग्री आपकी पढ़ाई के लिए सहायक होगी।

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