क्रियात्मक अनुसंधान क्या है? परिभाषा, विशेषताएँ और आवश्यकता | Action Research in Hindi

अंतिम संशोधित (Last Updated): August 27, 2026

क्रियात्मक अनुसंधान: अर्थ, परिभाषा, आवश्यकता और विशेषताएँ (Action Research in Hindi)

शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता और सुधार लाने के लिए ‘क्रियात्मक अनुसंधान’ (Action Research) का विशेष महत्व है। प्रतियोगी परीक्षाओं (जैसे REET, CTET, UPTET, DSSSB, RPSC, TGT, PGT) की दृष्टि से क्रियात्मक अनुसंधान से जुड़े सिद्धांत, परिभाषाएँ और इसकी उपयोगिता बार- Bआर्मी परीक्षाओं में पूछी जाती हैं। आज के इस आर्टिकल में हम क्रियात्मक अनुसंधान (Kriyatmak Anusandhan) के संपूर्ण स्वरूप को विस्तार से समझेंगे।

📌 क्रियात्मक अनुसंधान क्या है? (परिचय)

भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने और शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर करने के लिए अनुसंधान (Research) कार्य अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा के क्षेत्र में आने वाली विभिन्न समस्याओं का तात्कालिक और व्यावहारिक हल खोजने के लिए ‘क्रियात्मक अनुसंधान’ का विकास हुआ।

क्रियात्मक अनुसंधान आधुनिक मानवतावादी सिद्धांत पर आधारित है। शिक्षा के क्षेत्र में क्रियात्मक अनुसंधान का विचार सबसे पहले अमेरिका के कुछ शिक्षाशास्त्रियों (जैसे कोलियर, लेविन, हेरिकन और स्टीफन कोरे) द्वारा आरंभ किया गया था। क्रियात्मक अनुसंधान का सर्वप्रथम प्रयोग “बकिंघम” ने किया था, जबकि शिक्षा के क्षेत्र में इसे लोकप्रिय बनाने और इसके प्रवर्तक के रूप में स्टीफन एम. कोरे (Stephen M. Corey) का नाम सबसे प्रमुख है।

📖 क्रियात्मक अनुसंधान की प्रमुख परिभाषाएँ

  1. स्टीफन एम. कोरे के अनुसार:

    “क्रियात्मक अनुसंधान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी क्षेत्र के कार्यकर्त्ता अपनी समस्याओं का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन करते हैं, ताकि वे जो निर्णय लेते हैं तथा जो कार्य करते हैं, उनको सही दिशा मिल सके, उनमें सुधार किया जा सके तथा उनका मूल्यांकन किया जा सके।”

  2. गुड के अनुसार:

    “क्रियात्मक अनुसंधान वह शोध है, जिसमें अध्यापक, परिवीक्षक व प्रबंधक अपने निर्णयों और क्रियाओं में गुणवत्ता व सुधार लाने के लिए करते हैं।”

  3. मौलि के अनुसार:

    “क्रियात्मक अनुसंधान एक तत्स्थान अध्ययन है जिसका उद्देश्य किसी तात्कालिक समस्या का समाधान खोजना है।”

✨ क्रियात्मक अनुसंधान की प्रमुख विशेषताएँ

  • तात्कालिक समस्या का समाधान: इसमें विद्यालय की प्रतिदिन की और तात्कालिक समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।

  • उत्पादक और उपभोक्ता एक ही: इस अनुसंधान के उत्पादक और उपभोक्ता दोनों स्वयं शिक्षक, प्रधानाध्यापक, प्रबंधक और निरीक्षक ही होते हैं।

  • वैज्ञानिक दृष्टिकोण: विद्यालय की कार्य-प्रणाली में सुधार, संशोधन और प्रगति के लिए इसमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया जाता है।

  • समस्या का स्रोत: शिक्षा में क्रियात्मक अनुसंधान की समस्याओं का मुख्य स्रोत स्वयं स्कूल और कक्षा-कक्ष की परिस्थितियाँ होती हैं।

  • कार्य करते हुए सीखना: इसके माध्यम से शिक्षकों और प्रशासकों को कार्य करते हुए सीखने (Learning by Doing) का अवसर मिलता है, जो अधिक स्थायी होता है।

🎯 शिक्षा में क्रियात्मक अनुसंधान की आवश्यकता एवं महत्व

  • परंपरागत लीक से मुक्ति: हमारे स्कूल और शिक्षण पद्धतियाँ तब तक परंपरागत लीक पर चलती रहेंगी जब तक शिक्षक, प्रशासक और खुद जुड़े लोग इसका वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं करेंगे।

  • व्यावहारिक सुधार: अन्य प्रकार के मौलिक अनुसंधानों की तरह इसमें विद्यालय के जीवन से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि यह सीधे कक्षा की व्यावहारिक समस्याओं का हल ढूंढता है।

  • शैक्षिक गुणवत्ता का विकास: इसके प्रयोग से शिक्षकों की कार्य-कुशलता और छात्रों की शैक्षिक योग्यताओं में सकारात्मक विकास होता है।

अनुसंधान के प्रकार – Anusandhan ke Parkar

क्रियात्मक अनुसंधान

  • क्रियात्मक अनुसंधान
  • मौलिक अनुसंधान

क्रियात्मक अनुसंधान में अनुसंधानकर्ता – अध्यापक / निरीक्षक होता है |

मौलिक अनुसंधान में अनुसंधानकर्ता विद्यार्थी होता है |

क्रियात्मक अनुसंधान का अर्थ —

विद्यालय से सम्बंधित समस्याओं पर वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन कर सुधार करना |

  • क्रियात्मक अनुसंधान की अवधि 7-15 दिन होती है |

क्रियात्मक अनुसंधान के सोपान –

क्रियात्मक अनुसंधान के सोपान

  • समस्या का चयन
  • उपकल्पना का निर्माण
  • तथ्य संग्रहण की विधियाँ
  • तथ्यों का संकलन
  • तथ्यों का सांख्यिकीय विश्लेषण
  • तथ्यों पर आधारित निष्कर्ष
  • सत्यापन
  • परिणामों की सूचना देना

📌 निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जा सकता है कि क्रियात्मक अनुसंधान (Action Research) शिक्षा जगत के लिए एक ऐसा प्रभावी उपकरण है जो विद्यालय और कक्षा की रोजमर्रा की समस्याओं को तुरंत पहचान कर उनका वैज्ञानिक और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है। इसके माध्यम से शिक्षक और प्रबंधक अपनी शिक्षण कार्य-प्रणाली में निरंतर सुधार कर सकते हैं। शिक्षक पात्रता परीक्षाओं और शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन के लिए यह एक अत्यंत स्कोरिंग और महत्वपूर्ण टॉपिक है।

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