हरबर्टीय विधि || हिंदी शिक्षण विधि

आज की पोस्ट में हिंदी शिक्षण विधियों में हम हरबर्टीय विधि की चर्चा करेंगे और इसे अच्छे से समझेंगे …आप इसे अच्छे से तैयार करें

हरबर्टीय विधि

हरबर्टीय विधि || हरबर्ट की पंचपदी विधि

⇒हरबर्ट की पाठ योजना प्राचीनतम पाठ योजनाओं में से एक है। इस पाठ योजना के जन्मदाता प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री हरबर्ट है। प्रो. हरबर्ट की अधिगम के संबंध में यह धारणा है कि प्रत्येक छात्र बाहर से मिलने वाले ज्ञान को संचित करता रहता है, यदि नवीन ज्ञान को छोटे-छोटे सोपानों में बाँटकर उसे पूर्व संचित ज्ञान से संबंधित करके पढ़ाया जाये तो छात्र उसे अधिक शीघ्रता एवं सुगमता से ग्र्रहण करता है।

हरबर्ट पाठ योजना में स्मृति स्तर पर सीखने को अधिक प्रभावशाली माना जाता है। यह पाठ योजना विषय-वस्तु केन्द्रित है। इसमें पाठ के छात्रों के सम्मुख प्रस्तुतीकरण की आधिक महत्वपूर्ण माना जाता है और उस पर अधिक बल दिया जाता है, छात्रों की अपनी आवश्यकताओं, रुचियों, मूल्यों आदि को इसमें अधिक स्थान नहीं दिया जाता है।

हरबर्ट ने कक्षा शिक्षण के लिए सर्वप्रथम निम्न चार पदों का प्रतिपादन किया-

स्पष्टता: तथ्यों व विषयसामग्री को शिक्षार्थी के समक्ष स्पष्टता से प्रस्तुत करना।
सम्बद्ध: प्रस्तुत किए जाने वाले तथ्यों या नवीन ज्ञान को बालक के पूर्व ज्ञान से सम्बद्ध करना।
व्यवस्था: बालक के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले तथ्यों व नवीन ज्ञान को व्यवस्थित रूप देना।
विधि:
हरबर्ट ने उपर्युक्त चार सोपानों की विवेचना की जिसे उसके शिष्यों/अनुयायियों ने अधिक स्पष्ट व महत्वपूर्ण बनाने का प्रयास किया। उसके शिष्य जिलर ने सर्वप्रथम ‘स्पष्टता’ को दो भागों में विभक्त किया।
(1) प्रस्तावना
(2) प्रस्तुतीकरण
हरबर्ट के एक अन्य शिष्य राइन ने इनमें एक उपकथन और जोड़ा, वह था- ‘उद्देश्य’। इस परिवर्तन के बाद प्रथम दो पद इस प्रकार हो गए-
(1) (अ) प्रस्तावना
(ब) उद्देश्य कथन
(2) प्रस्तुतीकरण
इसके बाद हरबर्ट के अनुयायियों ने हरबर्ट के शेष तीन पदो के नामों में भी इस प्रकार परिवर्तन कर दिए-
सम्बद्ध- तुलना
व्यवस्था- सामान्यीकरण

विधि- प्रयोग

इस प्रकार हरबर्ट के शिक्षण पद अन्तिम रूप से इस प्रकार है-
(1) (अ) प्रस्तावना
(ब) उद्देश्य कथन
(2) प्रस्तुतीकरण
(3) तुलना
(4) सामान्यीकरण
(5) प्रयोग

प्रस्तावना-

वर्तमान पाठ को पढ़ने के लिए छात्र को मानसिक तैयारी करना इस चरण के अन्तर्गत है। प्रस्तावना में अध्यापक दो या तीन प्रश्नों के द्वारा छात्रों से उत्तर लेकर यह निकलवाने का प्रयास करता है कि आज कक्षा में उसे क्या पढ़ाया जाने वाला है। प्रसंग का ज्ञान कराकर वस्तुतः छात्र के पूर्वज्ञान को नवीन ज्ञान से सम्बद्ध करने का प्रयास प्रस्तावना में किया जाता है। पाठ की सफलता बहुत हद तक एक अच्छी प्रस्तावना पर निर्भर करती है।

प्रस्तुतीकरण-

सम्पूर्ण पाठ को दो या तीन खण्डों में विभक्त कर छात्रों के सम्मुख इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है जिससे समग्र पाठ्य-सामग्री उनकी समझ में आ जाए। इसे पाठ का प्रस्तुतीकरण भी कह सकते है। इसके अन्तर्गत शिक्षक के द्वारा किया गया आदर्श वाचन छात्रों का अनुकरण वाचन काठिन्य निवारण एवं केन्द्रिय बोध के प्रश्न प्रस्तुत किये जाते है।

तुलना का सहयोग-

छात्रों के पूर्व संचित ज्ञान एवं वर्तमान नवीन ज्ञान की तुलना की जाती है तथा अन्य विषयों के ज्ञान का स्थानान्तरण भी किया जाता है। भाषा शिक्षण में आने वाली कठिनाइयों का निवारण, व्याख्या, शंका समाधान आदि की अपेक्षा शिक्षक से छात्रों को रहती है। योग्य शिक्षक उपयुक्त उदाहरणों, दृष्टान्तों से विषय को सरल, सुबोध बनाकर प्रस्तुत करता है।

सामान्यीकरण-

विद्यार्थी संचित ज्ञान के आधार पर सामान्य बातों को समझकर उसका सामान्यीकरण करते हैं। गद्य शिक्षक में इस स्तर पर पुनरावृत्ति के प्रश्न जबकि कविता शिक्षण में भाव साम्य की कविताएँ देकर सामान्यीकरण किया जाता है। अपने पूर्व संचित ज्ञान की प्रस्तुत पाठ से तुलना कर विद्यार्थी स्वमान्य सिद्धान्तों का पता (निष्कर्ष) लगाते हैं। व्याकरण के पाठों में सामान्यीकरण विशेष लाभदायी होता है।

प्रयोग-

सीखे हुए नवीन ज्ञान से निर्मित सामान्य बनाकर विद्यार्थियों से उनका प्रयोग भी कराया जाता है। इसके लिए विद्यार्थी को कहा कार्य या गृहकार्य लिखित रूप में करके लाने को कहा जाता है। पढ़ाये गये विषय को विद्यार्थी ने किस सीमा तक समझा है। इसका मुल्यांकन भी इस सोपान में किया जाता है।
हरबर्टीय विधि मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है। इससे शिक्षण में क्रमबद्धता रहती है। भाषा शिक्षा में ये सोपान अत्यन्त लाभप्रद होते है। विज्ञान शिक्षण के लिए यह विधि उपयोगी नहीं है।

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