हिन्दी में निबन्धों के प्रकार

आइए  आज निबन्धों के प्रकार के बारे में जानतें है प्रत्येक हिन्दी मित्र के लिए यह जानना अति आवश्यक है

 

हिन्दी निबन्धों के प्रकार
डाॅ. गणपति चन्द्र गुप्त ने निबन्ध के पांच प्रकार (भेद) बताए हैंः
1. विचारात्मक निबन्ध
2. भावात्मक निबन्ध
3. वर्णनात्मक निबन्ध
4. विवरणात्मक निबन्ध
5. आत्मपरक निबन्ध

आलोचनात्मक निबन्धों को विचारात्मक निबन्धों के अन्तर्गत ही रखना समीचीन है क्योंकि आलोचना विचार से अलग नहीं होती। इसी प्रकार वैयक्तिक, संस्मरणात्मक एवं हास्य-व्यंग्यात्मक निबन्धों को भी भावात्मक निबन्धों के अन्तर्गत समाविष्ट किया जा सकता है।
1. विचारात्मक निबन्ध-

गम्भीर विषयों पर चिन्तन मनन करके लिखे गए निबन्ध विचारात्मक निबन्ध होते है।
इनमें बुद्धि की प्रधानता होती है और विचारसूत्रों की प्रमुखता रहती है। लेखक का हृदय पक्ष दबा रहता है तथा बुद्धि पक्ष की प्रबलता इन निबन्धों में दिखाई पड़ती है। निबन्धों में विचारों की एक श्रृंखला रहती है और सारे विचार पूर्वापर संबंध से एक सूत्र में जुड़े रहते है। निबन्धों में कहीं व्यास शैली, कहीं समास शैली, और कहीं सूत्र शैली अपनाई जाती है। भाषा विषय के अनुसार प्रौढ़, गम्भीर एवं संस्कृतनिष्ठ रहती है। हिन्दी में इस प्रकार के निबन्ध लेखक हैं- आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, बाबू श्याम सुन्दर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डाॅ. नगेन्द्र आदि।

2. भावात्मक निबन्ध-

भावात्मक निबन्धों में भाव पक्ष अर्थात हृदय पक्ष की प्रधानता होती हैं। भावात्मक
निबन्ध लेखक के संवेदनशीलता को व्यक्त करते है। हिन्दी में लिखें गए वे निबन्ध जिनमें वैयक्तिक संस्पर्श है, संस्मरणात्मक तथ्य दिए गए है अथवा जिनमें हास्य-व्यंग्य की प्रधानता हैं, इसी वर्ग के अन्तर्गत आते है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के मनोविकार संबंधी निबन्धों में से कुछ इसी कोटि के है। ऐसे निबन्धों के लिए ही उनकी यह टिप्पणी उल्लेखनीय है- ‘‘ यात्रा के लिए निकलती रही हैं बुद्धि, पर हृदय को भी साथ लेकर। बुद्धि पथ पर हृदय भी अपने लिए कुछ-न-कुछ पाता रहा है।’’ उनके ‘ चिन्तामणी’ में संकलित निबन्ध ‘उत्साह’, ‘करूणा’ आदि इसी प्रकार के है। हिन्दी में भावात्मक निबन्धकारों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण निबन्धकार है- अध्यापक पूर्ण सिंह । उनके निबन्ध आचरण की सभ्यता , मजदूरी और प्रेम, पवित्रता, आदि इसी प्रकार के भावात्मक निबन्ध हैं। भावात्मक निबन्धों में हृदय पक्ष की प्रधानता रहती है तथा हास्य-व्यंग्य एवं मनोरंजन का तत्व प्रमुख होता है। ये निबन्ध लेखक के संवेदनशील हृदय का परिचय देते है। समाज में व्याप्त राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक विदू्रपताओं को भी इस प्रकार के निबन्धों के माध्यम से उजागर किया जाता है। हिन्दी निबन्धकारों में भारतेन्दु बाबू हरिशचन्द्र, प्रतापनारायण मिश्र, अध्यापक पूर्ण सिंह, गुलेरी जी, पद्मसिंह शर्मा, ब्रजनन्दन सहाय, रायकृष्ण दास इसी प्रकार के निबन्धकार है।

 

3. वर्णनात्मक निबन्ध-
वर्णनात्मक निबन्धों में निबन्धकार किसी घटना, तथ्य, दृश्य, वस्तु, स्थान आदि का
क्रमबंद्ध वर्णन इस प्रकार करता है कि पाठक के समक्ष वह दृश्य या घटना साकार हो जाती हैं। वर्णनात्मक निबन्धों में बौद्धिकता एवं भावुकता का सामंजस्य रहता है। भाषा सरल एवं सुबोध रहती हैं तथा लेखक का ध्यान तथ्य निरूपण पर अधिक रहता है, कल्पना पर कम । हिन्दी में बालकृष्ण भट्ट, बाबू गुलाब राय, कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर एवं रामवृक्ष बेनीपुरी के निबन्ध इसी श्रेणी के है।

4. विवरणात्मक निबन्ध-
विवरणात्मक निबंधों में ऐतिहासिक, सामाजिक, पौराणिक घटनों का विवरण दिया
जाता हैं तथा उनमें कल्पना का भी यथोचित समावेश होता है। वर्णन संवेदनशील एवं मार्मिक होते हैं तथा उनमें क्रमबंद्धता पर विशेष बल नहीं होता । वर्णन का संबंध वर्तमान से होता है जबकि विवरण का संबंध भूतकाल से । अतः इनमें संभावना पर विशेष बल होता है। हिन्दी के प्रारम्भिक निबन्धकार- भारतेन्दु हरिशचन्द्र, बाल कृष्ण भट्ट, प्रतापनारायण मिश्र, शिवपूजन सहाय आदि ने विवरणात्मक निबन्ध लिखे हैं।

5. आत्मपरक निबन्ध-
यद्यपि हर प्रकार के निबन्ध में लेखक के व्यक्तित्व की छाप दिखाई देती हैं तथापि
‘आत्मपरक निबन्धों’ में लेखक का व्यक्तित्व पूरी तरह उभरकर सामने आता है। वर्तमान युग में लिखे जाने वाले ललित निबन्ध भी आत्मपरक निबन्धों की कोटि में आते है। ललित निबन्धों में ललित्य का समावेश भाषा, विषय वस्तु, शैली-शिल्प में किया जाता हैं। लेखक का पाण्डित्य, लोक सम्पृक्ति एवं भाषा गत सौदर्य ऐसे निबन्धों में साफ झलकता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डाॅ. विद्यानिवास मिश्र, कुबेर नाथ राय हिन्दी के प्रमुख ललित निबन्धकार हैं। इनके अतिरिक्त डाॅ. विवेकी राय, देवन्द्र सत्यार्थी ने भी आत्मपरक निबन्धों की रचना की हैं।

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