अंतिम संशोधित (Last Updated): September 5, 2026
द्विवेदीयुगीन काव्य प्रवृत्तियाँ (Dvivedi Yug ki Visheshta): हिंदी साहित्य का जागरण-सुधार काल
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आज की इस पोस्ट में हम आधुनिक काल के अंतर्गत द्विवेदीयुगीन काव्य प्रवृत्तियों (Dwivedi Yug ki Visheshta) का विस्तार से अध्ययन करेंगे और इसके महत्वपूर्ण तथ्यों को जानेंगे। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के नाम पर इस काल को ‘द्विवेदी युग’ या ‘जागरण-सुधार काल’ कहा जाता है। इस काल में हिंदी कविता को रीतिकाल की शृंगारिकता और रूढ़िवादिता से निकालकर राष्ट्रीयता, नैतिकता और समाज-सुधार की ओर मोड़ा गया।
1. देश प्रेम की भावना
द्विवेदीयुगीन कवियों ने जनमानस के बीच राष्ट्रप्रेम की लहर चलाई और स्वतंत्रता के प्रति जनमानस में चेतना का संचार किया। इस युग के रचनाकारों का राष्ट्रप्रेम भारतेन्दु युग की भाँति सामयिक रुदन से नहीं जुड़ा है, बल्कि समस्याओं के कारणों पर विचार करने के साथ-साथ उनके लिए समाधान ढूँढने से जुड़ा है—
“हम क्या थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी।
आओ मिलकर विचारें ये समस्याएँ सभी।।”
यह युग कारणों की जड़ तक जाने के पश्चात् उत्सर्ग और बलिदान के माध्यम से अपनी खोई हुई अस्मिता को प्राप्त करने के लिए प्रेरणा का माध्यम भी रहा है—
“देशभक्त वीरों मरने से कभी न डरना होगा।
प्राणों का बलिदान देश की वेदी पर करना होगा।।”
गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ की कविताओं में भी देशभक्ति की लहर स्पष्ट दिखाई देती है, जो उनके इस प्रसिद्ध कथन से स्पष्ट है—
“जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।।”
मैथिलीशरण गुप्त की रचना ‘भारत भारती’ में राष्ट्रप्रेम से संबंधित ओजस्वी कविताओं के लिखने के कारण अंग्रेजी सरकार ने इस कृति को जब्त कर लिया था।
2. सामाजिक समस्याओं का चित्रण
यह युग सुधारवादी युग या ‘जागरण सुधार काल’ भी कहलाता है। इस युग के कवियों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों और समस्याओं—यथा दहेज प्रथा, नारी उत्पीड़न, छुआछूत, बाल विवाह आदि—को अपनी कविता का प्रमुख विषय बनाया।
समाज में महिलाओं की शोचनीय स्थिति पर प्रतापनारायण मिश्र जैसे रचनाकार भी व्यथित हो उठते थे—
“कौन करेजा नहीं कसकत, सुनी विपत्ति बाल विधवा की।”
नारी की दयनीय दशा का अत्यंत मार्मिक चित्रण करते हुए मैथिलीशरण गुप्त जी ने लिखा—
“अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी।
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।।’’
द्विवेदी युग की काव्यधारा ने उपेक्षित और उपेक्षित-प्राय नारियों को अपने काव्य में केंद्रीय स्थान दिया। ‘यशोधरा’ के माध्यम से गौतम बुद्ध की त्यागी गई पत्नी का, ‘साकेत’ के माध्यम से उपेक्षित उर्मिला का, और ‘विष्णुप्रिया’ के माध्यम से चैतन्य महाप्रभु की पत्नी का त्याग व बलिदान प्रस्तुत किया गया—
“सखी वे मुझको कहकर जाते,
प्रियतम के प्राणों को पल में स्वयं सुसज्जित करके।
भेज देती रण में,
छत्र धर्म के नाते सखी वे मुझको कहकर जाते।।”
इसी प्रकार, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने ‘वैदेही वनवास’ और ‘प्रियप्रवास’ के माध्यम से नारी की वेदना और उनकी उपेक्षा के मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाने की कोशिश की।
3. नैतिकता एवं आदर्शवाद
द्विवेदीयुगीन काव्य पूरी तरह से आदर्शवादी और नीतिपरक है। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी नैतिकता एवं आदर्श के प्रबल पक्षधर थे, इसलिए इस युग में रीतिकालीन शृंगारिकता और नखशिख वर्णन का स्थान उच्च नैतिक मूल्यों ने ले लिया।
‘हरिऔध’ कृत ‘प्रियप्रवास’
मैथिलीशरण गुप्त कृत ‘साकेत’, ‘रंग में भंग’, ‘जयद्रथ वध’
रामनरेश त्रिपाठी कृत ‘मिलन’
ये सभी रचनाएँ उच्चकोटि की आदर्शवादी कृतियाँ हैं। रीतिकाल में जहाँ राधा-कृष्ण विशुद्ध रूप से शृंगार के आलंबन मात्र थे, वहीं द्विवेदी युग में आकर ‘प्रियप्रवास’ की राधा एक लोकसेविका और समाज से सरोकार रखने वाली कर्मठ नारी के रूप में सिद्ध होती है।
4. इतिवृत्तात्मकता
इतिवृत्तात्मकता का अर्थ है वस्तु वर्णन, इतिवृत्त (कथा) या आख्यान की प्रधानता। आदर्शवाद तथा बौद्धिकता की अधिकता के कारण द्विवेदी युग के कवियों ने वर्णन-प्रधान इतिवृत्तात्मकता को अपनाया। इसी विशेषता के कारण इस युग में कथात्मकता पर विशेष बल दिया गया और एक से बढ़कर एक प्रबंधकाव्य लिखे गए।
मैथिलीशरण गुप्त की रचनाएँ— ‘साकेत’, ‘जयद्रथवध’, ‘पंचवटी’, ‘यशोधरा’, ‘द्वापर’ आदि प्रमुख प्रबंधकाव्य हैं।
इसी प्रकार, अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की रचनाओं— ‘प्रियप्रवास’ तथा ‘वैदेही वनवास’ में भी इतिवृत्तात्मकता की स्पष्ट प्रधानता दिखाई देती है।
5. सभी काव्य रूपों का प्रयोग
द्विवेदी युग में लगभग सभी पारंपरिक और नवीन काव्य रूपों का सफल प्रयोग हुआ। मुक्तक, प्रबंध और प्रगीत (Lyric) प्रभृति सभी काव्यरूपों में रचनाएँ रची गईं। हिंदी के अनेक श्रेष्ठ खंडकाव्य भी इसी युग की देन हैं। इस युग के कवि मुक्तक रचनाओं की ओर भी प्रवृत्त हुए और छोटे-छोटे विषयों को आधार बनाकर स्वतंत्र पद्यों की रचना की गई।
‘हरिऔध’ ने समस्या-पूर्तियों के रूप में भी अनेक सुंदर मुक्तक लिखे हैं।
जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ ने ‘उद्धवशतक’ की अमर रचना की।
आगे चलकर छायावाद में जो प्रगीतों (गीत काव्य) का प्रणयन हुआ, उसकी एक सुदृढ़ शुरुआत इसी युग से हो चुकी थी।
6. भाषा परिवर्तन (खड़ी बोली का उत्थान)
इस युग की सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि यह रही कि काव्य की मुख्य भाषा ब्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली बन गई। इस युग के कवियों और आचार्यों ने खड़ी बोली में काव्योपयुक्तता के सभी संदेहों को हमेशा के लिए दूर कर दिया।
‘जयद्रथ वध’ की अपार लोकप्रियता ने ब्रजभाषा के मोह के बंधन को तोड़ दिया।
मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत भारती’ की लोकप्रियता खड़ी बोली की विजय-पताका सिद्ध हुई।
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के कठोर और परिष्कृत अनुशासन के कारण इस युग की भाषा सुबोध, व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध और पूरी तरह ‘रसानुरूप’ बन सकी।
7. छंद विविधता
इस युग में वर्ण्य विषय के समान ही छंदों के प्रयोग में भी अद्भुत विविधता स्पष्ट दिखाई देती है। इस युग के कवि पारंपरिक दोहा, कवित्त या सवैया तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि रोला, छप्पय, कुंडलिया, सार, गीतिका, हरिगीतिका, लावनी और वीर जैसे विभिन्न छंदों का खुलकर प्रयोग किया गया।
मैथिलीशरण गुप्त और अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ने छंदों के प्रयोग में अपने अद्भुत कौशल और अधिकार का परिचय दिया। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भी कवियों को छंदों के विशेषीकरण का परामर्श दिया था।
निष्कर्ष
संक्षेप में कहा जा सकता है कि इस युग के कवियों ने हिंदी काव्य को शृंगारिकता से राष्ट्रीयता की ओर, रूढ़िवादिता से स्वच्छंदता की ओर और जड़ता से प्रगति की ओर ले जाने में अपना अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। द्विवेदीयुगीन चेतना राष्ट्रीय प्रेम, सामाजिक चेतना, नैतिक भक्ति, प्रकृति-चित्रण और भाषा-संस्कार—इन सभी स्तरों पर अत्यंत प्रखर दिखाई पड़ती है।
इस काल की राष्ट्रभक्ति किसी भी प्रकार से राजभक्ति के आवरण में दबी या लिपटी नहीं थी, और न ही इस युग के रचनाकारों ने विदेशी सत्ता को कहीं कोई वरीयता दी। नवजागरणपरक चेतना से आविर्भूत यह राष्ट्रीय प्रेम भारत के गौरवशाली अतीत से जुड़ा हुआ है, जो वर्तमान की विभीषिका और पराधीनता को छिन्न-भिन्न करने के लिए भारतीय संस्कृति के जीवंत मूल्यों से प्रेरणा लेने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहा।
🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि
| क्र.सं. | लेखक / कवि का नाम | मुख्य विशेषता / काल | इंटरनल लिंक (URL) |
| 1. | भारतेंदु हरिश्चंद्र | आधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युग | लिंक देखें |
| 2. | महावीर प्रसाद द्विवेदी | द्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकार | लिंक देखें |
| 3. | जयशंकर प्रसाद | छायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककार | लिंक देखें |
| 4. | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ | छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेता | लिंक देखें |
| 5. | सुमित्रानंदन पंत | प्रकृति के सुकुमार कवि / छायावाद | लिंक देखें |
| 6. | महादेवी वर्मा | आधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्री | लिंक देखें |
| 7. | प्रेमचंद (धनपत राय) | उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुष | लिंक देखें |
| 8. | अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) | प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक | लिंक देखें |
| 9. | रामधारी सिंह ‘दिनकर’ | राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कवि | लिंक देखें |
| 10. | कृष्णा सोबती | आधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर | लिंक देखें |

