अंतिम संशोधित (Last Updated): September 3, 2026
हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रमुख कथन, रचनाएँ और साहित्यिक योगदान (Hajari Prasad Dwivedi Ke Pramukh Kathan)
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हिंदी आलोचना, निबंध, उपन्यास और सांस्कृतिक इतिहास के क्षेत्र में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम एक स्तंभ के रूप में लिया जाता है। उन्होंने साहित्य, संस्कृति, समाज और मनुष्यता को लेकर जो मौलिक और क्रांतिकारी विचार दिए, वे आज भी हिंदी जगत में मार्गदर्शक माने जाते हैं। UGC NET/JRF, KVS, NVS, EMRS, UP/MP TGT-PGT, RPSC, BPSC, DSSSB तथा देश भर की विभिन्न हिंदी साहित्य प्रतियोगी परीक्षाओं और अकादमिक अध्ययन की दृष्टि से आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के कथन और उनकी कालक्रमानुसार रचनाएँ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस विस्तृत आलेख में उनके महत्वपूर्ण कथनों और संपूर्ण कृतित्व का संकलन प्रस्तुत है।
📌 आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का संक्षिप्त परिचय (Quick Facts)
पूरा नाम: आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
प्रमुख क्षेत्र: आलोचना, निबंध, उपन्यास, इतिहास लेखन और सांस्कृतिक चिंतन
योगदान: हिंदी साहित्य में शुक्ल-युग के बाद सांस्कृतिक और मानवतावादी आलोचना के प्रमुख प्रवर्तक।
प्रमुख विशेषता: उनके साहित्य और कथनों के केंद्र में हमेशा ‘मनुष्य’ और उसकी दुर्दम जिजीविषा रही है।
💬 आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रमुख कथन (Important Quotations)
साहित्य, समाज, संस्कृति और मानवीय स्वभाव पर आचार्य द्विवेदी के कहे गए कुछ सबसे चर्चित और महत्वपूर्ण कथन निम्नलिखित हैं:
आध्यात्मिक ऊँचाई तक समाज के बहुत थोड़े लोग ही पहुँच सकते हैं। बाकी लोग छोटे-मोटे दुनियावी टंटों में उलझे रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक आदर्श को विकृत कर देते हैं।
आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है।
आसमान में निरन्तर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है।
कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
कभी कभी शिष्य परम्परा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल सम्प्रदाय प्रवर्त्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी सम्प्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिन्तन कम हो जाता है।
कर्मफल का सिद्धान्त भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त खोजने पर अन्यान्य देशों के मनीषियों में भी पाया जाता है।
कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंक कर आगे बढ़ जाती है।
घृणा और द्वेष से जो बढ़ता है, वह शीघ्र ही पतन के गह्वर में गिर पड़ता है।
जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, आसक्त हो।
जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाय, वह फलदायक नहीं होगा।
जितना कुछ इस जीवन शक्ति को समर्थ बनाता है उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता हैं।
जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है, उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है।
जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परामुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता हैं।
जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग, शोक, दारिद्रय, अज्ञान तथा परामुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है।
डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं।
धर्म मनुष्य से त्याग की आशा रखता है।
नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा भक्ति तथा योग मूलक अनुभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम संस्कृति शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं।
पंडिताई भी एक बोझ है जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है, तो सहज हो जाती है तब वह बोझ नहीं रहती।
प्रवृतियों को दबाना नहीं चाहिए, उनसे दबना भी नहीं चाहिए।
पावक को कभी कलंक स्पर्श नहीं करता, दीपशिखा को अंधकार की कालिमा नहीं लगती, चंद्रमंडल को आकाश की नीलिमा कलंकित नहीं करती और जाह्नवी की वारिधारा को धरती का कलुष स्पर्श भी नहीं करता।
पुरुष का सत्य और है, नारी का और।
पुरुष निःसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वन्द्व है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।
पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।
प्रेम बड़ी वस्तु है, त्याग बड़ी वस्तु है और मनुष्य मात्र को वास्तविक मनुष्य बनाने वाला ज्ञान भी बड़ी वस्तु है।
ब्राह्मण न भिखारी होता है, न महासंधिविग्रहिक, वह धर्म का व्यवस्थापक होता है।
भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता हैं।
मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है।
मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं।
मनुष्य के भीतर नाखून बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उनके काटने की जो प्रवृत्ति है वह उसकी मनुष्यता की निशानी है।
मनुष्य में जो मनुष्यता है, जो उसे पशु से अलग कर देती है, वही आराध्य है। क्या साहित्य और क्या राजनीति, सबका एक मात्र लक्ष्य इसी मनुष्यता की सर्वांगीण उन्नति है।
मानव जीवन की तीन स्थितियाँ मानी गई हैं- विकृति, प्रवृत्ति और संस्कृति। विकृति अधोगामिनी स्थिति है तो संस्कृति ऊर्ध्वगामिनी।
माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं, यह इतिहास की चिरोद्धोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है।
माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए, यह सत्य है।
मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।
यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पाएँगे- मनुष्य की तृष्णा।
यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है।
राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत शिखा से भी अधिक चंचल है।
राजनैतिक पराधीनता बड़ी बुरी वस्तु है। वह मनुष्य को जीवन यात्रा में अग्रसर होने वाली वस्तुओं से वंचित कर देती है।
विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक सा होता है। आप दुर्दान्त डाकू के दिल में विनोदप्रियता भर दीजिए, वह लोकतंत्र का लीडर हो जाएगा, आप समाज सुधार के उत्साही कार्य कर्त्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजेक्शन दे दीजिए, वह अखबारनवीस हो जाएगा।
शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।
शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा सी अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है।
संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की चरम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य उत्पन्न करती है।
सत्य सार्वदेशिक होता है।
सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा-असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर।
सभ्यता बाह्य होने के कारण चंचल है, संस्कृति आंतरिक होने के कारण स्थायी।
सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अंतर के विकास का।
सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
साहित्य यदि जनता के भीतर आत्मविश्वास और अधिकार चेतना की संजीवनी शक्ति नहीं संचारित करता, तो परिणाम बड़े भयंकर होंगे।
सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है।
सुविधाओं को पा लेना ही बड़ी बात नहीं है, प्राप्त सुविधाओं को मनुष्य मात्र के मंगल के लिए नियोजित कर सकना भी बहुत बड़ी बात है।
स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।
स्नेह बड़ी दारुण वस्तु है, ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है।
स्यारों के स्पर्श से सिंह किशोरी कलुषित नहीं होती। असुरों के गृह में जाने से लक्ष्मी घर्षित नहीं होती। चींटियों के स्पर्श से कामधेनु अपमानित नहीं होती। चरित्रहीनों के बीच वास करने से सरस्वती कलंकित नहीं होती।
स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती।
हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगल विधायिनी बन सकेंगी। जब हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्रहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।
📚 आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के संपूर्ण साहित्य की सूची (कालक्रमानुसार)
परीक्षाओं में अक्सर इनकी रचनाओं का प्रकाशन वर्ष या कालक्रम पूछा जाता है। इनकी प्रमुख कृतियों की सूची इस प्रकार है:
सूर साहित्य (1936)
हिन्दी साहित्य की भूमिका (1940)
कबीर (1942)
बाणभट्ट की आत्मकथा (1946) — (उपन्यास)
अशोक के फूल (1948) — (निबंध संग्रह)
नाथ संप्रदाय (1950)
कल्पलता (1951)
प्राचीन भारत का कलात्मक विनोद (1952)
हिन्दी साहित्य का आदिकाल (1952)
मध्यकालीन धर्म साधना (1952)
हिन्दी साहित्य : उद्भव और विकास (1953)
विचार और वितर्क (1954)
नाथ सिद्धों की बानियां (1957)
मेघदूतः एक पुरानी कहानी (1957)
संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो (1957)
विचार प्रवाह (1959)
संदेश रासक (1960)
मृत्युंजय रवीन्द्र (1963)
चारू चन्द्रलेख (1963) — (उपन्यास)
सहज साधना (1963)
नाट्य शास्त्र की भूमिका एवं दशरूपक (1963)
कुटज (1964) — (निबंध संग्रह)
साहित्य सहचर (1965)
कालिदास की लालित्य योजना (1965)
मध्यकालीन बोध का स्वरूप (1970)
आलोक पर्व (1972) — (निबंध संग्रह – साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त)
पुनर्नवा (1973) — (उपन्यास)
अनामदास का पोथा (1974) — (उपन्यास)
FAQ ( प्रश्नोत्तर)
निष्कर्ष
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का संपूर्ण साहित्य मनुष्यता, भारतीय संस्कृति और इतिहास की अंतःपरतों को खोलने का एक अनूठा प्रयास है। उनके द्वारा कहे गए कथन और विचार केवल साहित्यिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि एक बेहतर इंसान और समाज के निर्माण के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए उनका यह वैचारिक योगदान सफलता की कुंजी साबित होता है।
🔗 हिंदी साहित्य के 10 चर्चित लेखक और कवि
| क्र.सं. | लेखक / कवि का नाम | मुख्य विशेषता / काल | इंटरनल लिंक (URL) |
| 1. | भारतेंदु हरिश्चंद्र | आधुनिक हिंदी गद्य के जनक / भारतेंदु युग | लिंक देखें |
| 2. | महावीर प्रसाद द्विवेदी | द्विवेदी युग के मार्गदर्शक और निबंधकार | लिंक देखें |
| 3. | जयशंकर प्रसाद | छायावाद के प्रमुख स्तंभ और नाटककार | लिंक देखें |
| 4. | सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ | छायावाद के मुक्तछंद के प्रणेता | लिंक देखें |
| 5. | सुमित्रानंदन पंत | प्रकृति के सुकुमार कवि / छायावाद | लिंक देखें |
| 6. | महादेवी वर्मा | आधुनिक मीरा / छायावाद की प्रमुख कवयित्री | लिंक देखें |
| 7. | प्रेमचंद (धनपत राय) | उपन्यास सम्राट / कथा साहित्य के शिखर पुरुष | लिंक देखें |
| 8. | अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) | प्रयोगवाद और नई कविता के प्रवर्तक | लिंक देखें |
| 9. | रामधारी सिंह ‘दिनकर’ | राष्ट्रकवि / ओज और विद्रोह के कवि | लिंक देखें |
| 10. | कृष्णा सोबती | आधुनिक कथा साहित्य और स्त्री-विमर्श की सशक्त हस्ताक्षर | लिंक देखें |
