आगमन विधि

आगमन विधि में पहले उदाहरण प्रस्तुत कर उदाहरणों द्वारा नियमों का निर्धारण किया जाता है। अर्थात छात्रों के समक्ष पहले बहूत से उदाहरणों, तत्वों एवं वस्तुओं का प्रदर्शन कर नियमों का निर्धारण करना ही आगमन विधि है। यह एक मनोवैज्ञानिक विधि है।
⇔ आगमन का अर्थ है प्रत्यक्ष उदाहरणों, अनुभवों तथा प्रयोगों से निष्कर्ष निकालना।
⇒ एक ऐसी शिक्षण प्रणाली जिसमें उदाहरणों की सहायता से सामान्य नियम का निर्धारण किया जाता है, आगमन शिक्षण-विधि कहलाती है।

⇒ आगमन विधि में अनुभवों, प्रयोगों तथा उदाहरणों का विस्तृत अध्ययन करके नियम बनाये जाते हैं।
⇒ इस विधि में तर्क करते हुए ’विशिष्ट से सामान्य की ओर’ तथा ’स्थूल से सूक्ष्म की ओर’ आगे बढ़ते हैं।
⇒ इस विधि द्वारा शिक्षण करते समय शिक्षक बालकों के समक्ष कुछ विशेष परिस्थितियाँ एवं उदाहरण प्रस्तुत करता है। इन उदाहरणों के आधार पर बालक तार्किक ढंग से विचार-विमर्श करते हुए किसी विशेष सिद्धान्त, नियम अथवा सूत्र पर पहुँचते हैं।
⇒नियमों सूत्रों आदि का प्रतिपादन करते समय इस विधि में बालक अपने अनुभवों, मानसिक शक्तियों तथा पूर्व-ज्ञान का प्रयोग करता हैं।

परिभाषा:
जाॅयसी – ’’आगमन विशेष दृष्टान्तों की सहायता से सामान्य नियमों को विधिपूर्वक प्राप्त करने की क्रिया है।
यंग – इस विधि में बालक विभिन्न स्थूल तथ्यों के आधार पर अपनी मानसिक शक्ति का पं्रयोग करते हुए स्वयं किसी विशेष सिद्धान्त, नियम अथवा सूत्र तक पहुँचता है।
लैण्डल – ’’जब बालकों के समक्ष अनेक तथ्यों, उदाहरणों एवं वस्तुओं को प्रस्तुत किया जाता है, तत्पश्चात् बालक स्वयं ही निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास करते है, तब वह विधि आगमन विधि कहलाती है।’’
⇒ आगमन विधि में बालक स्वयं तथ्यों, प्रयोगों एवं उदाहरणों की सहायता से किसी सूत्र या नियम विशेष का ज्ञान प्राप्त करता है तथा पूर्णरूप से सक्रिय रहता है अतः इस विधि द्वारा अर्जित किया गया ज्ञान ठोस एवं अधिक स्थाई होता हैं।
⇒ इसमें बालक की विभिन्न मानसिक शक्तियों का विकास भी होता है।

आगमन विधि द्वारा शिक्षण करते समय मुख्यरूप से चार सोपानों का प्रयोग किया जाता है –
1. विशिष्ट उदाहरणों का प्रस्तुतीकरण 3. निरीक्षण करना
2. नियमीकरण या सामान्यीकरण करना 4. परीक्षण एवं सत्यापन करना
आगमन विधि के गुण एवं विशेषताएँ:-
⇔इससे तर्क,विचार और निणर्यशक्ति का विकास होता है।
⇒ यह मनोवैज्ञानिक विधि है जिससे आत्म-निर्भरता व आत्म-विश्वास उत्पन्न होता है क्योंकि छात्र स्वयं नियम की खोज करते हैं।
⇒ संदर्भ के अनुसार व्याकरण पढाई जाती है।
⇒ व्याकरण अध्ययन के लिए यह सुलभ विधि है।
⇒ इस विधि की सहायता से विभिन्न नियमों, सम्बन्धों, सूत्रों तथा नवीन सिद्धान्तों आदि का प्रतिपादन करने में सहायता मिलती है।
⇒यह छोटी कक्षाओं के लिए सर्वाधिक उपयोगी एवं उपयुक्त विधि है।

 

⇒ इस विधि में बालक स्वयं उदाहरण निरीक्षण और परीक्षण के द्वारा ज्ञान अर्जित करते हैं। इसलिए इस विधि द्वारा प्राप्त ज्ञान अधिक स्थाई होता हैं।
⇒ आगमन विधि द्वारा बालकों की मानसिक शक्तियों यथा-आलोचनात्मक, निरीक्षण, तर्क विचार एवं निणर्य शक्ति का विकास होता है। यह शिक्षण की एक श्रेष्ठ विधि हैं।
⇒ यह एक वैज्ञानिक विधि है क्योंकि इस विधि द्वारा अर्जित ज्ञान प्रत्यक्ष तथ्यों पर आधारित होता है।
⇒ इसमें बालक सदैव नवीन ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्सुक बना रहता हैं।
⇒ इसमें नियम की खोज बालक स्वयं करते हैं जिससे उनमें आत्म-विश्वास की वृद्धि होती है। इसमें बालक अधिक क्रियाशील रहते हैं।
⇒ इस विधि के द्वारा बालक को नियम, सूत्रों का निर्धारण एवं सामान्यीकरण की प्रक्रिया का ज्ञान हो जाता है।
⇒ यह विधि मनोवैज्ञानिक है क्योंकि इसमें मनोहिन्दी के विभिन्न महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का अनुकरण किया जाता है।
⇒ इस विधि द्वारा बालकों को स्वयं कार्य करने की प्रेरणा मिलती है जिससे उनमें आत्म निरीक्षण तथा आत्म विश्वास की वृद्धि होती है।
⇒ इसके द्वारा बालकों में उत्सुकता एवं रुचि बनी रहती है।
⇒ इसके द्वारा बालक उदाहरणों की सहायता से स्वयं ज्ञान प्राप्त करते हैं जिसके कारण वे थकान का अनुभव नहीं करते तथा नवीन ज्ञान की प्राप्ति में सक्रिय बने रहते हैं।
⇒ इसमें बालक की रुचि का विकास होता है जिससे विषय सरल बन जाता हैं।
⇒यह बालक की सूक्ष्म बुद्धि एवं सूझ की वृद्धि के लिए उपयोगी है।
⇒ इस विधि द्वारा आसानी से नियम का निर्माण किया जा सकता है जिससे छात्रों मे जाँच करने व पुष्टि करने की आदत पङती है।
⇒ इस विधि में छात्र अधिक चैतन्यता प्रदर्शित करता हैं।
⇒ इसमें बालक स्वयं ही अपने परिश्रम के आधार पर सामान्य नियमों की ओर गति करते हैं।
आगमन विधि की सीमाएँ एवं दोष:-
⇒ इस विधि द्वारा बालकों में समस्या समाधान की योग्यता एवं क्षमता का विकास संभव नहीं है।
⇒ नियमीकरण अथवा सामान्यीकरण के लिए प्रत्यक्ष उदाहरणों का चयन एवं प्रस्तुतीकरण शिक्षक एवं शिक्षार्थी के लिए आसान काम नहीं है। अप्रशिक्षित शिक्षक इस प्रणाली का उचित रूप से प्रयोग नहीं कर सकता।

⇒ इस विधि की गति अत्यन्त धीमी है जिससे इसके द्वारा ज्ञान प्राप्ति में समय और परिश्रम अधिक लगता हैं।
⇒ इस विधि का प्रयोग करने के लिए पर्याप्त बुद्धि, सूझ-बूझ एवं परिश्रम की आवश्यकता होती है। अतः सभी स्तर के बालकों के लिए इसके द्वारा ज्ञान प्राप्त करना आसान नहीं है।
⇒ यह विधि निम्न कक्षाओं के लिये ही उपयोगी है क्योंकि उच्च कक्षाओं में पाठ्यक्रम इतना विस्तृत होता है कि इस विधि द्वारा सम्पूर्ण ज्ञान सीमित समय में प्राप्त करना संभव नहीं है।
⇒ इस विधि द्वारा प्राप्त ज्ञान क्रमबद्ध नहीं होता है।
⇒ इस विधि द्वारा प्राप्त परिणाम पूर्णतया सत्य नहीं होते, उनकी सत्यता इस बात पर निर्भर करती हैं कि वह परिणाम कितने उदाहरणों पर आधारित है, क्योंकि कोई भी परिणाम जितने अधिक विशिष्ट उदाहरणों पर आधारित होता है उसकी विश्वसनीयता एवं सत्यता उतनी ही अधिक होती है।

 

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