अंतिम संशोधित (Last Updated): June 11, 2022
आज के आर्टिकल में हम पाश्चात्य काव्यशास्त्री और दार्शनिक अरस्तु (Arstu) के बारे में पढेंगे ।
अरस्तु (Arstu)
⇒ अरस्तु का जन्म मकदूनिया के स्तगिरा नामक नगर में 384 ई. पू. में हुआ । अरस्तु के गुरु का नाम प्लेटो था ।
⇒ इन्हें पाश्चात्य काव्यशास्त्र का आधार माना जाता है।
काव्यशास्त्र पर इनकी दो प्रसिद्ध पुस्तकें है :
- भाषणशास्त्र
- काव्यशास्त्र
⇒ इन्होने दर्शन शास्त्र ,राजनीतिशास्त्र ,काव्यशास्त्र , भाषण शास्त्र , भौतिकशास्त्र ,जीवविज्ञान और मनोविज्ञान विषयों पर सैंकड़ों पुस्तकें लिखी ।
⇒ अरस्तु के ग्रंथों की संख्या 400 के आसपास बताई जाती है।
⇒ अपने काव्यशास्त्र संबंधी ग्रंथ ’पेरिपोइएतिकेस’ में अरस्तु ने काव्य के मौलिक सिद्धांतों का विवेचन किया है। 50 पृष्ठों का यह ग्रंथ छोटे-छोटे 26 अध्यायों में बँटा हुआ है। इस ग्रंथ की रचना का अनुमान 330 ई.पू. के आसपास लगाया जाता है।
⇒ अरस्तु कृत ’पेरिपोइएतिकेस’ (काव्यशास्त्र) में अध्याय 12 व 20 को बाद में जोङा गया।
⇒ ’पेरिपोइएतिकेस’ में आए महत्त्वपूर्ण यूनानी शब्द-
मिमेसिस (Imitation) – अनुकरण, कथार्सिस (Catharsis) – विरेचन, पेरिपेतेइआ (Reversal of the situation) – स्थिति-विपर्यय, अनग्नोरिसिस (Recognition) – अभिज्ञान, माइथास (Plat) – विरेचना, एथोस (Character) – चरित्र, पाथोस (Emotion) – भाव, प्राक्सिस (Action) – कार्यव्यापार।
⇒ ’तेखनेस रितोरिकेस’ नामक अपने भाषा शास्त्र के ग्रंथ में अरस्तु ने भाषा संबंधी विभिन्न प्रश्नों पर विचार किया है।
⇒ अरस्तु की कृति ’वसीयतनामा’ को दास-प्रथा से मुक्ति का घोषणा पत्र माना जाता है।
⇒ पहली बार कला और ललित कला के भेद को स्पष्ट करने का श्रेय अरस्तु को ही जाता है। इन्होंने ललित कला को एक स्वायत्त कला के रूप में घोषित किया।
छन्द की परिभाषा- प्रकार तथा महत्वपूर्ण उदाहरण
टी. एस. ईलियट के काव्य सिद्धान्त
वर्ड्सवर्थ का काव्यभाषा सिद्धान्त


